Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
एक मंत्री जी ने कहा है कि महंगाई से मैं बहुत ख़ुश हूँ, क्योंकि इससे किसानों को फ़ायदा होगा। यह परोपकार का ऐसा आयाम है जिसके लिये इतिहास हमेशा बेनी जी का ऋणी रहेगा। सब लोग सरकार की आलोचना करते हैं (उनको चाहिये कि वे सरकार से डरें, नहीं तो सरकार उनका फ़ेसबुक अकाउंट ब्लॉक करवा देगी) लेकिन इस समय कांग्रेस सरकार ने जो उपक्रम आरंभ किये हैं उनसे आश्वस्त हुआ जा सकता है कि या तो भविष्य आएगा ही नहीं, और आया तो उसको स्वर्णिम पॉलिश कर के आना होगा। वरना उसको इंडिया का वीज़ा ही नहीं दिया जायेगा। अब भविष्य कोई पाकिस्तानी घुसपैंठिया तो है नहीं, जो सुरंग बनाकर घुस आए।
ख़ैर, सरकार ने महंगाई बढ़ाकर न केवल किसानों की समस्याओं का हल निकाला है, बल्कि और भी बहुत से पेशों का भला किया है। महंगाई के कारण लोग भूख से परेशान हो जाएंगे, लूट-खसोट करने के लिये उनको अभिप्रेरणा मिलेगी। इससे समाज में अपराध बढ़ेंगे तो पुलिसवालों का भला होगा। कुछ लोग जेब बचाने के लिये स्वास्थ्य को ताक़ पर रख देंगे, इससे डॉक्टरों के बच्चे पल जाएंगे। जो लोग अपने बच्चों को भूखा मरते नहीं देख सकते, वे आत्महत्या के लिये प्रेरित होंगे। इससे श्मशान के पंडितों का परिवार चलेगा।
आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ीं तो मीडिया में शोर मचेगा। इससे पत्रकारों का पेट पलेगा। …इस समय सरकार पालनहार की भूमिका अदा कर रही है। आज तक किसी सरकार ने समाज के इन वर्गों की चिंता नहीं की। सरकार के इन प्रयासों की प्रशंसा करने के स्थान पर लोग माननीय बेनी जी की आलोचना कर रहे हैं।
मैं कृतज्ञता अर्पित करता हूँ सरकार के प्रति और अनुरोध करता हूँ कि कृपया मेरा फेसबुक अकाउंट ब्लॉक न करवाएँ, मैं इसी प्रकार समय-समय पर सरकार की चापलूसी करता रहूंगा। मैं जानता हूँ ‘सरकार’! आपकी मर्ज़ी के बिना 8 साल से देश का प्रधानमंत्री कुछ नहीं बोल पाया, तो मेरी क्या औक़ात है!
यदि फिर भी सरकार चाहे तो पूरा फेसबुक ही बंद करवा सकती है, वैसे भी जिस जनता के पेट भरने के भी लाले पड़ने वाले हैं वो बोलने या चिल्लाने के क़ाबिल ही कहाँ बचेगी। और यदि बीपीएल कार्ड पर फ्री के मोबाइल वगैरा की सुविधा लेकर बोल भी लेगी, तो उसकी सुनेगा कौन।
✍️ चिराग़ जैन
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आज स्वर्गीय दुष्यंत कुमार पर बहुत गुस्सा आ रहा है। उनका एक शेर पूरे हंगामे की जड़ बन गया है। पहले कोई भी विवाद खड़ा करने से पहले हर आदमी को यह भय रहता था कि मुझे कलेसी समझा जाएगा। लेकिन अब दुष्यंत ने सब कलेसियों को सुविधा दे दी है कि जब के कलेस करो और अंत में दो मिसरे बोल कर सारे आरोपों का पिंडदान कर डालो-
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
इस शेर को पूरा देश उसी भाव से सुनता है जिस भाव से द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर के मुख से अश्वत्थामा की मृत्यु का समाचार सुना था। ‘अश्वत्थामा हतोयतः…’ सुनने के बाद पूरे देश के कान बंद हो जाते हैं और यह समझ ही नहीं पाते कि अगले मिसरे में अगला किसी कोशिश की बात कर रहा है।
फ़ेसबुकियों से लेकर संसदियों तक; जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक हर जगह अवचेतन में गुलाम अली का हारमोनियम टुनटुनाने लगता है- हंगामा है क्यों बरपा…। शाम के प्राइम टाइम बुलेटिन में हर न्यूज़ चैनल पर चार-पाँच कलेसी सादर आमंत्रित किए जाते हैं कि लीजिए, जो क़सर संसद में या रैली में अधूरी रह गई हो, उसको पूरा करो। सबको लाकर काॅलर माइक लगा दिया जाता है। फिर एंकर बहुत सभ्य तरीक़े से सबकी राय जानना चाहता है। जब सब राय दे देते हैं तब बहस शुरू होती है कि विषय क्या हो। बहस कई बार गति पकड़ने का प्रयास करती है लेकिन हर बार एंकर स्पीड ब्रेकर लगाकर प्रश्न उछालता है कि पहले विषय तय कर लिया जाए। और फिर बहस उस विषय से भटक जाती है, जो कभी था ही नहीं। सब एक साथ हंगामा खड़ा करने लगते हैं। बेचारा एंकर सोमनाथ स्टाइल में मीरा कुमार की स्क्रिप्ट पढ़ता रहता है- बैठ जाइए, उनको बोलने दीजिए, कृपया शांत हो जाइए।’
बड़ी मुश्क़िल से सभी इस बात पर सहमत होते हैं कि उस बेचारे को भी सुन लिया जाए जो पिछले बीस मिनिट से हमने जुड़ चुका है। जैसे ही उससे बोलने को कहा जाता है, ऐन वक़्त पर उसके कान में लगा ईअर फोन निकल जाता है और उससे हमारा संपर्क टूट जाता है। इस मौक़े का लाभ उठाकर एंकर तुरंत बताता है कि वक़्त हो चला है एक ब्रेक का।
मैं भी विषय से उतना भटक चुका हूँ, जितना आवश्यक था। सो मैं दो पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करना चाहता हूँ-
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
✍️ चिराग़ जैन
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पिछले दिनों इस बात से पूरे समाज में सनसनी फैल गई कि अब लड़के-लड़कियाँ लो वेस्ट जीन्स नहीं पहन सकेंगे। मुद्दआ ये है कि इस प्रकार के परिधानों को उत्तेजक बताते हुए इन पर बैन लगा दिया गया है। अब ये विषय विश्वविद्यालयों की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं के वाद-विवाद व्यवसाय तक छाया रहेगा।
दरअसल हमारा जागरूक समाज इस निर्णय को इसलिए स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि यह हमारे मौलिक अधिकार ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का हनन है। इस संदर्भ में परम आदरणीया मल्लिका जी की एक सूक्ति उद्धृत की जा सकती है। जब उनके परिधानों को लेकर कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोगों ने हंगामा खड़ा किया था तो मल्लिका जी ने यह उद्बोधन देकर मुआमला शांत किया था कि मेरे पास ख़ूबसूरत बदन है तो मैं क्यों न दिखाऊँ। तर्क में दम था। सो हंगामाजीवियों को साँप संूघ गया और संपादकीय पृष्ठों से उठा विवाद पेज थ्री के इस बयान से समाप्त हो गया।
कदाचित् बुद्धिजीवियों ने यह सोचकर विवाद को आगे नहीं बढ़ाया कि यदि कल को मल्लिका जी ने उन्हें कम कपड़े पहनने की चुनौती दे डाली तो क्या होगा! सो अपनी इज़्ज़त अपने हाथ….। ख़ैर कपड़ों की तरह विषय भी भटक गया था। सो वापस लो वेस्ट जीन्स पर आते हैं।
यह मुआमला केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का नहीं है अपितु हमारे सभ्य समाज की ‘अनुभूति की स्वतंत्रता’ का भी है। जब कुछ ‘सुराग़’ ही नहीं दिखाई देगा तो कल्पनाशील समाज पूरी तस्वीर की कल्पना कैसे करेगा। और जब तस्वीर की कल्पना ही नहीं होगी तो वह सुखद अनुभूति कैसे होगी जो……….!
इतना ही नहीं, ये निर्णय पुनः हमारे समाज की महिलाओं को उसी पुरुषवादी कठघरे में ला खड़ा करने का एक षड्यंत्र है जिससे बाहर आने के लिए सैंकड़ों लोग महिला-मुक्ति का झंडा उठाए कमा रहे हैं। पहले पुरुषों ने धर्म के नाम पर महिलाओं को घर की चाहरदीवारी में क़ैद कर रखा था और अब पूरे कपड़ों में क़ैद करने के लिए समाज और सभ्यता की दुहाई दी जा रही है।
ये अन्याय नहीं चलेगा। और चूंकि क्रांति दबाने से और भड़कती है इसलिए यदि पुरुष यूँ ही मनमानी करते रहे और महिलाओं को पूरे कपड़े पहनाने को विवश किया गया तो महिलाएँ इसका और भी अधिक विरोध करेंगी और कोई काॅरपोरेट कंपनी अपनी सोशल रिस्पांसिबिलिटी निभाते हुए लो थाइज़ जीन्स लांच कर देगी। फिर देखते रह जाएंगे सारे पुरुष!
सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए इस निर्णय पर बैन लगाए। ज़रा सोचिए! एक ग़रीब आदमी जो अभी दो सप्ताह पहले लिवाइज़ की जीन्स ख़रीद कर लाया है, इस निर्णय के लागू होने से उसके दिल पर क्या बीतेगी। कहाँ से लाएगा नई जीन्स ख़रीदने के लिए वह पैसा। जिस दौर में लोगों के पास दाल-रोटी के लाले हैं, ऐसे में सरकार ने यदि इस प्रकार के निर्णयों पर रोक नहीं लगाई तो ग़रीबी कितनी बढ़ जाएगी।
वैसे भी जब गांधी जी अपने देशवासियों की चिंता में अपने पायजामे को धोती में बदल सकते हैं, तो गांधी जी के अनुयायी अपनी जीन्स को थोड़ा छोटा नहीं कर सकते। ये और बात है कि गांधी जी ने पाऊँचे काटे थे और हमने बैल्ट! पर मूल मुद्दआ तो कटौती का है। और कटौती हम कर रहे हैं। अब इस निर्णय पर पुनर्विचार होना चाहिए और इसको जीन्स से हटाकर टाॅप पर लागू करना चाहिए कि जो लो वेस्ट टाॅप पहनेगा उस पर ज़ुर्माना किया जाएगा। इससे हमारे टाॅप भी ऊपर उठेंगे और ‘संस्कृति’ भी!
“लड़कियाँ मंदिर में जींस पहन कर न आएं।” -यह वाक्य धर्म के वर्तमान स्वरूप की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करता है। इस वाक्य का एक अनुवाद यह है कि हम घर से भगवान् के दर्शन करने निकलते हैं और जींस देख कर भटक जाते हैं।
इस वाक्य का एक अर्थ यह भी है कि लड़कियो, कान खोल कर सुन लो, तुम जब जींस पहन कर भगवान् के दर्शन करने आती हो तो हमें कुछ हो जाता है, बस!
हम डरे हुए धर्मात्मा हैं। हम जानते हैं कि हमारी एकाग्रता को जींस की झलक और ईश्वर की मनोहारी मूर्ति में से एक को चुनना होगा तो हम क्या चुनेंगे। हमें अपनी भीतरी कुंठाओं का भान है। इसलिए हमें धार्मिक रखना है तो लड़कियों को ढँकी-दबी रहना होगा, अन्यथा हम क्या हो जाएंगे ये हम भी नहीं जानते।
हम खजुराहो जाकर सदैव सम्भोग मूर्तियों के गलियारों में उलझ कर रह जाते हैं। उन मूर्तियों का आकर्षण हमें कभी भी गलियारे के पार शिवालय तक नहीं पहुँचने देता।
जब हम ईश्वर के दर्शन कर रहे होते हैं तब तुम्हारी जींस के भीतर से एक तीव्र प्रकाश प्रस्फुटित होकर हमारे नयनों की ज्योति को कुंद कर देता है, इससे हमारी मति भ्रष्ट हो जाती है और हम अपनी आस्था के सूत्र ईश्वर की वेदी से खोलकर तुम्हारी जींस से बाँध देते हैं।
हमारे धर्म की रक्षा करो लड़कियो, जींस पहननी है तो बाज़ार में पहनो। बाजार में हमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन मंदिर में हमें बख्श दो प्लीज़।
✍️ चिराग़ जैन
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ओलंपिक हो या आस्कर, क्रिकेट हो या हाॅकी और विज्ञान हो या तकनीक; हमारा देश हमेशा ‘नम्बर वन’ बनने से चूक जाता है। पिछले दिनों एक उम्मीद तब बंधी जब एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने विश्व के सबसे भ्रष्ट राष्ट्र का चयन करने का निश्चय किया।
भ्रष्टाचार हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। न जाने कितने ही मीर ज़ाफरों और जयचंदों ने अपने-अपने समय में ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता की सत्ता को ललकारते हुए विपरीत परिस्थितियों में भी इस कला को जीवित रखने के लिए जान की बाज़ी लगाई थी। मंथरा, शकुनि, वीरभद्र और कंस जैसे अनेक भ्रष्ट शिरोमणियों से हमारे देश की धरती सदैव धन्य होती रही है। इसलिए मुझे विश्वास था कि भ्रष्ट राष्ट्रों की फेहरिस्त में तो हमारा देश अव्वल रहेगा ही। लेकिन हाय रे दुर्भाग्य! 158 देशों के इस सर्वेक्षण में भारत सत्तरवें स्थान पर रहा। हालांकि जापान, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े राष्ट्रों को हमने धता बता दिया लेकिन पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, फिलीपिन और नेपाल जैसे मुट्ठी भर देश हमें पछाड़ कर आगे बढ़ गए।
रिपोर्ट पढ़कर मेरा सिर शर्म से गड़ गया। एक क्षण में ही हमारे राजनेताओं, म्युनिसिपल कमेटियों, लालफीताशाहों, पुलिस, इंजीनियरों, डाॅक्टरों, सरकारी कर्मचारियांे और अध्यापकों के अथक प्रयासों पर पानी फेर दिया गया। अपने देश की महान विभूतियों का ऐसा अपमान देखकर जिस्म के रोमानी प्रदेशों में भयंकर अग्नि धधकने लगी। यह तो गनीमत है कि हमारे समाचार पत्रों का सर्कुलेशन अभी नर्क तक नहीं पहुंच सका है अन्यथा हमारे पूर्वज इस रिपोर्ट को पढ़कर हमें धिक्कारते। इस घटना ने हमें अपने पूर्वजों को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। एक रिपोर्ट ने हमारे सारे काले कारनामों पर पानी फेरकर हमें धवल तिलक लगा दिया। हमें इस सफेद धब्बे को अपनी काली चादर पर से मिटाना होगा।
मैं अक़्सर कल्पना करता हूँ एक ऐसे भारत की जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में सर्वाधिक भ्रष्ट राष्ट्र होने का गौरव प्राप्त होगा। चारों ओर भ्रष्टतंत्र का बोलबाला होगा। देश में शांति, सत्य, न्याय, सौहार्द, अहिंसा और सद्भाव जैसे बेकार पड़े मूल्यों के स्थान पर छल-कपट, धोखाधड़ी, ठगी, लूट, रिश्वतखोरी, जालसाजी, कालाबाज़ारी और मिलावट जैसे आदर्श तथा समसामयिक मूल्यों की स्थापना होगी।
बातें करने से क्रांति नहीं आती। इसलिए इस सपने को सच करने के लिए हमें मिलजुल कर देश का नक्शा बदलने के प्रयास करने होंगे। बाज़ार, घर, परिवार, शिक्षण संस्थान और मंदिरों से लेकर गांव, शहर, महानगर, प्रशासन, शासन और संसद आदि में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन करने होंगे ताकि परम आदरणीय, प्रातः स्मरणीय, लोकहितकारी श्री भ्रष्टाचार महोदय देश मंे अपने विराट रूप में अवतार ले सकें।
संसद भवन के भीतरी स्वरूप में कोई विशेष परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है लेकिन बाह्य परिसर में जो स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान निर्माताओं की ‘ऊबसूरत’ मूर्तियाँ ‘अशोभायमान’ हो रही हैं; वहाँ हर्षद मेहता जी, रोमेश शर्मा जी, बंगारू लक्ष्मण जी, दिलेर मेहंदी जी, सलमान खुर्शीद जी, ए राजा जी, सुरेश कलमाड़ी जी, राबर्ट वाड्रा जी, ओमप्रकाश चैटाला जी और सलमान खान जी जैसे महान लोगों की ‘खूबसूरत’ मूर्तियां सुशोभित होंगी। जहाँ अम्बेडकर संविधान लेकर संसद की ओर उंगली किए खड़े हैं वहां तेलगी जी हाथ में अपने हाथ से छापे हुए स्टाॅम्प पेपर के सेम्पल लिए मोबाइल पर बात करते दिखाई देंगे। उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश की कुर्सी के पीछे महात्मा गांधी की जगह नटवर लाल का चित्र होगा जिसके नीचे ‘सत्यमेव जयते’ जैसे अव्यवहारिक वाक्य के स्थान पर लिखा होगा ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’। इस प्रकार की व्यवस्था में लोग आत्मनिर्भर बनेंगे तथा अपने दम पर जीवन जीना सीखेंगे।
स्कूलों में बच्चों को जो किताबें पढ़ाई जाएंगी वे होंगी- ‘चाल भारती’, ‘आओ जुगाड़ सीखें’, ‘केस और उनकी निकासी’ तथा ‘हमारे घोटाले’ इत्यादि। राजनीति, चिकित्सा, अध्यापन, आध्यात्म, सुरक्षा, बीमा, परिवहन और यहाँ तक कि केन्द्रीय जाँच ब्यूरो जैसे नास्तिक सम्प्रदायों के लोेग भी एक मत से विराट भ्रष्ट पुरुष के अपावन चरणों में स्वयं को अर्पित कर ‘धननीय’ हो जाएंगे।
जैसे भला करने वालों को हमेशा बुराई ही मिलती है, ठीक इसी प्रकार हमें विश्व में एक गरिमामय पहचान दिलाने वाले आदरणीय भ्रष्टाचार जी को देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा बताया जा रहा है। कितने निकृष्ट हैं हम; अहसान-फरामोश। जब भी कोई हमारे देश की पहचान विश्व में स्थापित करने के लिए आगे बढ़ता है तो हम उसकी टांग खींचने लगते हैं। लेकिन ‘जा को राखे साइयां, मार सके न कोय’। यही कारण है कि सारे विरोध और तिरस्कार के बावजूद महान भ्रष्टाचार जी को कोई उनके पथ से डिगाने में कामयाब न हो सका। तमाम आलोचनाओं को अनदेखा करते हुए एक सच्चे साधक की तरह भ्रष्टाचार महोदय अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ते जा रहे हैं। डाॅ.कुंअर बेचैन का एक शेर है- ‘चलने को एक पांव से भी चल रहे हैं लोग, पर दूसरा भी साथ दे तो और बात है।’ यही स्थिति भ्रष्टाचार जी के साथ भी है।
भ्रष्टाचार जी लोकतंत्रात्मक शासन पद्धति के घोर समर्थक हैं। जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए हमारे उन्होंने भाषण, जलसे और रैलियों जैसे चालू माध्यमों का सहारा न लेकर एक महान शिक्षक की तरह अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि उनके साथ रहकर मानव कैसे महान बन सकता है। उन्होंने राजनीति, प्रशासन, खेल, बाज़ार और मंदिरों में ऐसे उदाहरण पेश किए जो उनके बताए पथ पर चलकर रातों रात धनवान तथा मीडियावान बन गए। कहते हैं कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जब जनता जनार्दन ने बंगारू लक्ष्मण जी, तेलगी जी और रोमेश शर्मा जी की कथा मीडिया रूपी व्यास से सुुनी तो अपने घर में भी भ्रष्टाचार भगवान की कथा कराने का निर्णय किया।
धीरे-धीरे मनुष्यों को समझ आने लगा कि कर्तव्य, नैतिकता, भाईचारा, इमानदारी, सच्चाई और मर्यादा जैसे घिसे-पिटे नियमों का पालन तो तुच्छ प्राणी करते हैं, या यूं कहें कि इनका पालन करके मनुष्य तुच्छ हो जाता है। लेकिन जो प्राणी अपना तन-मन-जीवन भ्रष्ट देवता को समर्पित कर देता है उसके गद्दे, कमरे, दीवान, कनस्तर और यहां तक कि सोफे तक भी धन के स्पर्श से पवित्र हो जाते हैं। लक्ष्मी उनकी दासी हो जाती है। घर स्वर्ग बन जाता है, और प्राणी अपने परिवार के साथ अपनी निजि इन्द्रसभा में बैठकर ब्रांडेड सुरा का पान करता है तथा अंतरा, धूपिया, लियोने और बिपाशा जैसी मल्लिकाओं का पावन नृत्य देखता है।
कहते हैं जिस समस्या का कोई समाधान न हो उस समस्या को ही समाधान समझ लेना चाहिए। यूँ तो भ्रष्टाचार स्वयं में कोई समस्या नहीं है लेकिन कुछ असामाजिक तत्वों की बात मान कर यदि एक क्षण के लिए इसे समस्या मान भी लिया जाए तो पिछले छः दशकों से हम अपनी ऊर्जा इस महान कला का विरोध करने में खर्च करते रहे हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि इसकी अनुमोदना की जाए तथा इस जुगाड़ यज्ञ में अपने भ्रष्ट कार्यों की आहुति दें।
इससे अनेक लाभ हैं। एक तो देश का नाम पूरे विश्व में रोशन हो सकेगा साथ ही जितना धन जाँच ब्यूरो, न्याय प्रक्रिया, प्राशासनिक कार्यवाहियों तथा आलोचनाओं पर खर्च होता है उसकी बचत होगी। संसद का समय किसी की निजि संपत्ति तथा व्यक्तिगत ज़िंदगी में बर्बाद होने से बच जाएगा और साथ ही साथ उस व्यक्ति विशेष की ज़िंदगी भी बर्बाद होने से बच जाएगी। रिश्वत जैसे हमारी शास्त्रीय परंपरा; जिसे एक प्रोपेगेंडा के तहत बुरा सिद्ध कर दिया गया है; उसका सम्मान बढ़ेगा। लोग एक दूसरे की सहायता के लिए अपने रेट फिक्स कर लेंगे। इससे सरकारी कार्यालयों की कार्यशैली में सुधार होगा तथा कोई भी बेहिचक अपना काम करवाने के लिए वास्तविक तरीके से अवगत हो सकेगा। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक रिश्वत से हमारी वार्षिक आय केवल 210 अरब रुपये है। इस रकम में बढ़ावा होगा।
जाली नोट बनाना, ड्रग्स बेचना, कालाबाज़ारी, चोरबाज़ारी, लूटपाट, हफ़्ता वसूली आदि मजबूत स्तंभों पर एक नया इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा होगा और बेरोज़गारी की समस्या से निजात मिलेगा। नकली स्टाॅम्प पेपर और सिक्के गलाने जैसे कुटिर उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा।
एक भ्रष्टाचार को स्वीकार करने से कितने सारे लाभ हैं और हमारे समाज के असामाजिक तत्व इस विराट पुरुष को धक्के मार कर बाहर निकालना चाहते हैं। हमारी तरक्की से जलने वाली विदेशी ताकतों के इशारों पर ये लोग जब परम श्रद्धेय भ्रष्टाचार महोदय को गाली देते हैं तो इससे हमारी आत्मा को बहुत ठेस पहुँचती है। ऐसे लोगों ने हमारी भावनाओं को आहत किया है और हमें इस अपराध के लिए उन्हें मुंह तोड़ जवाब देना होगा। आओ देश के होनहार नागरिकों आज यह शपथ लें कि- ‘हम भारत के लोग भारत को एक भ्रष्टसत्ता सम्पन्न, सम्पूर्ण जुगाड़वादी, लूटतंत्रात्मक राज्य बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे……’
✍️ चिराग़ जैन
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साहित्य संस्कृति का दर्पण है। इसी सूक्ति को ध्यान में रखते हुए हिन्दी कविता हमेशा से ही हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का अनुपालन करती रही है। यह और बात है कि इन सिध्दांतों की आड़ में काव्य के मूल सिध्दांत और स्वयं कविता भी बैकुण्ठवासी हो चली है।
हमारी संस्कृति हमेशा से ही अतिथियों को भगवान मानती रही है। यह दीगर बात है कि इसी सिध्दांत का लाभ उठाकर रावण सीता को उठाकर ले गया था और हरिश्चंद्र को राजा के पद से च्युत होकर श्मशान का पंडित बनना पड़ा और न जाने क्या-क्या अपमान भोगना पड़ा। ख़ैर ‘अतिथिदेवोभवः’ के सिध्दांत की परमकृपा के चलते बाबा तुलसी अपना गृहनगर छोड़ते ही परमात्मा स्वरूप पूजे जाने लगे। यदि उस ज़माने में हवाई जहाजों का चलन होता तो रामचरितमानस् की पहली प्रति यूएसए अथवा यूरोप के किसी ‘बड़े’ प्रकाशक बंधु ने आर्टपेपर पर फोरकलर में छापी होती। …लेकिन लाल रंग तिसको लगा, जिसके बड़ भागा (इसी कारण हतभागियों की किताब काले रंग से छपती है)।
इस सिध्दांत में भारतीय जुगाड़ संहिता की धारा 420 के अनुच्छेद 1 में एक छूट मिलती है- ‘यह कि यदि कोई धनिक जो कि भारत का नागरिक है, किसी विशेष अथवा सामान्य कारण से भारतीय भौगोलिक क्षेत्र से बाहर अपना निवास निर्माण नहीं कर पाया है तो भी उसकी खाता विवरणिका (बैंक स्टेटमेंट) में उपलब्ध शेष राशि के न्यूनतम नव अंकीय होने को आधार मानकर उसके काव्य को श्रेष्ठ काव्य की श्रेणी में गणित किया जा सकता है।’ जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे को सब कुछ दरसाई! बहिरो सुरै मूक पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई! (यहाँ पर जाकी से सूरदास जी का तात्पर्य बैंक बैलेंस से है)।
इसी धारा के अनुच्छेद 2 के अनुसार- ‘यदि कोई भारतीय नागरिक राजकीय सेवा में किसी ऐसे पद पर विराजमान है, जहाँ से वह साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों अथवा अकादमियों के सचिवों को विदेश यात्रा अथवा पुरस्कारों का वरदान देने में सक्षम हो तथा इस योग्यता के साथ-साथ स्वयं को कवि भी मानता हो तो उसके काव्यकर्म का सम्मान करना संपादकों तथा अकादमियों का परम कर्त्तव्य बन जाता है।’ जा पर कृपा राम की होई, ता पर कृपा करें सब कोई (इस चौपाई के रचनाकाल में घट-घटवासी राम सरकारी कुर्सी में जा बसे थे)।
बाद में कुछ विशेष प्रयोजनों के चलते इस धारा में एक अनुच्छेद और जोड़ा गया जिसके अनुसार- ‘यह कि कोई धनाढ्य मनुज जो कि एक पंक्ति भी शुध्द नहीं लिख सकता, ऐसे नागरिक को यदि कवि बनने की उत्कंठा जागे तो उसकी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्रकाशकों का दायित्व बन जाता है कि भारतीय संविधान के समानता के अधिकार का प्रयोग करते हुए उन्हें पाण्डुलिपि तैयार करके देवें। इसके लिए समय-समय पर कुछ ‘वास्तविक’ निर्धन कवियों की पाण्डुलिपि को यह कहकर निरस्त किया जाना आवश्यक है कि उनकी कविताएँ तो कूड़ा हैं। ऐसा कहकर निर्धन कवियों की रचनाओं को गुदड़ी में फेंक देना अपरिहार्य है ताकि समय पड़ने पर ‘गुदड़ी के लाल’ ढूंढे जा सकें और एक उत्तम पुरस्कारणीय पाण्डुलिपि तैयार की जा सके। विदेशी होगा पहला कवि, प्लेन से आया होगा गान, निकलकर रिजेक्टिड से चुपचाप, छपी होगी कविता अनजान।
इस प्रकार सभी भारतीय कवियों, साहित्यकारों, अप्रवासियों, धनिकों, प्रकाशकों, अधिकारियों तथा अन्य प्रत्येक नागरिक का धन्यवाद करते हुए अपनी आदत के अनुसार एक श्लोक को उध्दृत करना चाहूंगा। यह श्लोक प्रूफ की अशुध्दियों के चलते लम्बे समय से ग़लत छपता रहा है। आज मैं यहाँ पर उसका असली रूप प्रकाशित कर रहा हूँ-
मा लेखक प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत् धनाढ्यजुगाड़ादेकमवधी काव्यमोहितम्।।
अर्थात् हे लेखक! तुझे प्रतिष्ठा, आदर-सत्कार, मान-मर्यादा, गौरव, प्रसिध्दि, ख्याति, यश, कीर्ति, स्थिति, स्थान, स्थापना, ठौर, ठिकाना, ठहराव, आश्रय इत्यादि नित्य-निरंतर कभी भी न मिले, क्योंकि तूने इस जुगाड़तंत्र में निमग्न धनिकों, राजनायिकों, अप्रवासियों (जिनसे प्रकाशकों व अकादमिकों को कुछ लाभ हो सकता था) की, बिना किसी पत्रिका में प्रकाशित हुए ही आलोचना की है।
✍️ चिराग़ जैन
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पिछले रविवार को मेरे एक परिचित का फोन आया कि उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया है। यह और बात है कि मैंने कभी उनके पिताजी को देखा नहीं था लेकिन फिर भी परंपरानुसार मैंने फोन पर उन्हें यह जताने की हर संभव कोषिष की कि उनके पिताजी के निधन के इस आकस्मिक समाचार से मैं अर्द्धमृत सा हो गया हूँ। यदि उनके एकाध और पिताजी इसी प्रकार दिवंगत हो जाते तो मैं पूरी तरह मर गया होता।
फोन रखने के बाद मैंने कई दिनों से बेकार पड़े अपने सफेद कुर्ते-पायजामे पर इस्तरी की और देह के शेष हिस्सों को अस्त-व्यस्त कर कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गया। मेरे समान ही और भी बीस-बाईस अर्द्धमृतगण वहाँ पहले से ही उपस्थित थे, जो घर के बाहर हाथ बांधे हँसी रोके खड़े थे। मेरे पहुँचने पर सबने मुझे इस कौतूहल के साथ देखा मानो मेरी ही मृत्यु हुई हो। मैं झेंपकर अपने जीवित होने पर खिन्न होता हुआ एक ओर खड़ा हो गया। इसके बाद कुछ लोगों ने अपने-अपने पड़ोसियों के कान में कुछ कहा और फिर चेहरे पर शोक का स्थायी भाव लिए हुए पूर्ववत खड़े हो गए।
नवागंतुकों के स्वागत की इस परंपरा के निर्वाह के उपरांत उसे बताया जाता था कि लालाजी ने अभी प्राण त्यागे नहीं हैं। दो दिनों से वे कृत्रिम श्वास पर जीवित थे। वेंटिलेटर का पचास हज़ार रुपए रोज़ का ख़र्चा है। इसलिए आज परिवारवालों ने लिखकर दे दिया है कि वंेटिलेटर हटा दिया जाए। बस वेंटिलेटर हटते ही लालाजी दिवंगत हो जाएंगे और दस-बारह मिनिट में उनका पार्थिव शरीर घर ले आया जाएगा।
यही सूचना लगभग तीन घंटे तक लोगों के बीच आषा की किरण बनी रही। इस दौरान कुछ लोग ताज़ा समाचारों के लिए लगातार अस्पताल में स्थित लोगों से संपर्क बनाए हुए थे। शाम के लगभग चार बजे ख़बर मिली कि वंेटिलेटर हटा दिया गया है। ख़बर मिलते ही लोगों ने चैन की साँस ली। कुछ लोग अपने ज्योतिषियों को फोन कर पंचक आदि की गणना करवाने लगे। कुछ अपनी घड़ियों की ओर देखकर यह कालगणना करने लगे कि अभी घर पहुँचने में कितना समय लग सकता है। इसी प्रकार के कार्यक्रमोें में काफी समय बीत गया। कोई पोने पांच बजे अस्पताल की गाड़ी आकर रुकी। सभी मनुष्य अपनी स्वाभाविक जिज्ञासु प्रवृत्ति के चलते गाड़ी के इर्द-गिर्द इकट्ठा होने लगे।
लालाजी को चार-पांच लोगों ने गाड़ी से बाहर निकाला। उनकी श्वास अभी भी चल रही थी। उनको जीवित देख सबको घोर निराषा हुई। निराषा और शोक के इस माहौल से निकालते हुए लालाजी को घर के भीतर लिटाया गया। शेष आत्मीयजन घर के बाहर ही इंतज़ार करने लगे।
अब तक सभी के भीतर कथावाचकों की आत्माएं प्रवेष कर चुकीं थीं। सभी एक-दूसरे को मृत्युबोध और असार संसार के आँखों देखे क़िस्से सुनाने लगे। कई बार तो कथावाचक महोदय को देखकर ऐसा लगने लगता था कि वे अभी उठेंगे और हिमालय की कंदराओं में कहीं खो जाएंगे। लेकिन अगले ही क्षण जब वे जेब से तम्बाकू का पाउच निकालकर हालाहल के समान अपने मुख में डालते तो समझ आता कि अभी वे संसार में व्याप्त विष का पान कर रहे हैं और जब तक संसार का समस्त विष अपनी देह में धारण कर विष्व को विष मुक्त नहीं कर देंगे तब तक संन्यास नहीं लेंगे।
लोक-परलोक की इन्हीं चर्चाओं और भीष्म-प्रतिज्ञाओं के बीच जब सात बज गए तो अमृतक के भाई ने बाहर आकर हाथ जोड़कर धन्यवाद ज्ञापन किया और यह विष्वास दिलाया कि जैसे ही लालाजी अंतिम श्वास लेंगे, सबको समाचार दे दिया जाएगा। सबने उनको कृतज्ञता और क्रोध भरी दृष्टि से देखा और पत्थर जैसे क़दम उठाते हुए भारी मन लिए घर लौट आए।
✍️ चिराग़ जैन