Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
अब सही काम कर रहा हूँ मैं
अपने अंदर उतर रहा हूँ मैं
मैं कहाँ हूँ बता नहीं सकता
शायरी से गुज़र रहा हूँ मैं
चाहतें जो मुझे चिढ़ाती थीं
उनके अब पर कतर रहा हूँ मैं
जी रहा हूँ ये बात भी सच है
ये भी सच है कि मर रहा हूँ मैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
ओ ईश्वर कहलानेवाले
सारा विश्व बनानेवाले
क़िस्मत के पर्दे में छुपकर
सारा खेल रचानेवाले
अपना नाटक ख़ुद ही खेले मानव को इतना अवसर दे!
कर पाए, तो इतना कर दे!
तेरी मर्ज़ी होती है तो हम इस धरती पर आते हैं
तेरी मर्ज़ी से जीते हैं, तू कहता है, मर जाते हैं
तेरे हाथों की कठपुतली
जैसे चाहा वैसे उछली
पल भर को ढीली भी कर दे
हर इक कठपुतली की सुतली
एक दफ़ा पुतलों की डोरी, पुतलों के हाथों में धर दे
कर पाए, तो इतना कर दे!
सुनते हैं तूने ही सारी दुनिया को वरदान दिए हैं
कहने को इक जीभ बनाई, सुनने को दो कान दिए हैं
आवाज़ें सुंदरतम भर दीं
साँसों तक में सरगम भर दी
हर ख़ामोशी के ज़ख़्मों में
तूने सुर की मरहम भर दी
जो मन में ताण्डव करते हैं, उन शब्दों को भी तो स्वर दे
कर पाए तो इतना कर दे!
हो सकता है ऐसा हो तो, हम जीवन को दुःख से भर लें
हो सकता है यह सब कुछ हम शायद तुझसे बेहतर कर लें
या तो मन से जी लेने दे
या फिर मन से मर लेने दे
जो होगा देखा जाएगा
हमको मन की कर लेने दे
सुख-दुख जो भी हो, वो होगा खुद हासिल करने का वर दे
कर पाए तो इतना कर दे!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Jainism, Poetry
नयन खुले संधान हो गया
पलकें मूँदीं ध्यान हो गया
जो पाया, पीयूष बन गया
जो छोड़ा वह दान हो गया
जिनकी पूरी जीवनचर्या परिभाषा थी धर्म की
महाप्रज्ञ बस संत नहीं थे, उपमा थे सत्कर्म की
जन-जन तक पहुँचे इस ख़ातिर, सरलीकरण किया ग्रन्थों का
बँट कर बिखर नहीं जाएँ हम, एकीकरण किया पंथों का
धर्मोचित विज्ञान बन गया
गीत लिखा तो गान बन गया
जो भी उनके मुख से निकला
वो हर वचन महान बन गया
व्याख्या करते रहे जन्म भर, वे आगम के मर्म की
महाप्रज्ञ बस संत नहीं थे, उपमा थे सत्कर्म की
छोटे छोटे व्रत दिलवाए, अणु की ताक़त पहचानी
पूरी मानवता मोहित थी, वे बोले ऐसी वाणी
मानव को बस मानव माना
भेदभाव का पंथ न जाना
छोटे बच्चों को दे आए
आगम का अनमोल ख़ज़ाना
जीवन भर चर्चा की केवल मानव के गुण-धर्म की
महाप्रज्ञ बस संत नहीं थे, उपमा थे सत्कर्म की
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
किसी ख़्वाब को आज छू कर के देखें
अमां अब कोई आरज़ू कर के देखें
जिस इक बात पर हमसफ़र बन गए हम
वही बात फिर हू-ब-हू कर के देखें
ख़मोशी की राहें जुदा कर रही हैं
घड़ी दो घड़ी गुफ़्तगू कर के देखें
जहाँ से मरासिम फ़ना हो गया था
वहीं इक दफ़ा फिर शुरू करके देखें
कोई ज़ख़्म दिल को दुखाने लगा है
चलो आँसुओं से वजू कर के देखें
तकल्लुफ़ हटेगा, क़रीबी बढ़ेगी
जहाँ आप था, उसको तू करके देखें
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Jainism, Muktak, Poetry
कहीं मन्नत के धागे बांध कर आने नहीं पड़ते
किसी लालच से अपने तीर्थ फुसलाने नहीं पड़ते
हमारे देव बिन मांगे ही देते हैं हमें सब कुछ
हमें कुछ मांगने को हाथ फैलाने नहीं पड़ते
✍️ चिराग़ जैन