Blank Verse, Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished
बादलों के बीच तैरता
भारतीयता का रिवाज़ देखिए
आइए साहब
एयर इंडिया का जहाज देखिए
जब ये जहाज उड़ता है ना आसमान में
तो यह अकेला नहीं उड़ता
इसके साथ उड़ती हैं
हज़ारों आँखों की आशाएं
सुरक्षा की सारी परिभाषाएं
किसी की प्रतीक्षा से किया गया वादा
किसी का जीवन बचा लेने का इरादा
किसी का सपना पूरा करने की चाह
किसी का कॅरियर बना देने की परवाह
इस जहाज को
हम भारतीयों ने अपने श्रम से पोसा है
यह जहाज हर मंज़िल पर
सुरक्षित पहुँचने का भरोसा है
जब कोई विदेश जाता है इस जहाज से
तो यात्रा में उसको
अपनत्व का परिवेश मिलता है
विदेश की धरती पर कदम रखने से
एक क्षण पहले तक
उसे आसपास अपना देश मिलता है
सिपाही को मोर्चे पर पहुँचाना हो
आपदा के समय पर
मानव धर्म निभाना हो
मुसीबत में फँसे अभागों की
मदद का सवाल हो
बाढ़ हो, सूनामी हो,
अकाल हो या भूचाल हो
एयर इंडिया का जहाज
हर समय तैनात रहता है
हर मुश्किल में
अपने देशवासियों के साथ रहता है
भीतर झाँको
तो यात्रा की थकान के बीच
सुकून भरी निंदिया है
बाहर से देखो तो
आसमान के माथे पर
सजावटी बिंदिया है
जी साहब
ये एयर इंडिया है
जी हुज़ूर
ये एयर इंडिया है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
किसी एक घटना से पूरे व्यक्ति का, किसी एक व्यक्ति से पूरे समुदाय का, किसी एक समुदाय से पूर समाज का और किसी एक समाज से पूरे राष्ट्र का चरित्र आकलन करना हमारा अभ्यास है। इस अभ्यास में हम तर्कहीन हो जाते हैं। प्रत्येक बहस में हम अपनी बुद्धिमत्ता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से कूदते हैं और जब बुद्धिमत्ता बहस से पहले समाप्त हो जाती है तो ऐसे तर्क करने लगते हैं जिनसे सबको पता चल जाए कि हम केवल बुद्धिमत्ता के भरोसे बहस में नहीं आए हैं, देर तक टिके रहने के लिए हमारे पास मूर्खता भी है।
एक सांसद ने अपनी पार्टी के ही एक विधायक का जूतों से अभिनन्दन कर दिया। विवाद का कारण वही था- ‘तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा सफेद कैसे!’ इस सम्मान समारोह में बाकायदा मंत्रोच्चार के बीच अनुशासन की आहुति दी गई। इस घटना को सोशल मीडिया पर ट्रोल करते समय लोग पूरी पार्टी पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगे। यह ग़लत बात है। किसी भी एक व्यक्ति के आचरण से पूरी पार्टी का आचरण तय नहीं किया जा सकता। कोई भी एक व्यक्ति पूरी विचारधारा का चरित्र नहीं हो सकता। ऐसा करना अपने आकलन के साथ बेईमानी करना है।
यह हम पूर्व में भी करते रहे हैं। एक मणिशंकर अय्यर के बयान से पूरी कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। एक साध्वी के बयान से पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं। इस आचरण के कारण लोकतंत्र का जनमत भीड़ के उन्माद में परिवर्तित हो जाता है। यह हमने जातियों में भी किया है।
एक गांधी, महात्मा हो गए तो सारे गांधी ख़ुद को संत बताने पर उतारू हो गए। एक मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो सारे मोदी देश का पैसा लेकर घूमने निकल लिए। ऐसा करना ग़लत है। एक राहुल गांधी पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं हैं। एक नरेंद्र मोदी पूरी भाजपा का चरित्र नहीं हैं। एक लोहिया के वैचारिक कुनबे में सारे लोहिया जन्म नहीं लेते।
अम्बेडकर के बैनर तले इकट्ठा होकर लोग अम्बेडकर के बनाए कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। लोहिया की विरासत को बपौती माननेवाले सत्ता की वसीयत को लेकर सिर फुटव्वल करते मिले। भगवा पहनने से कोई हिन्दू नहीं हो जाता और चरखा चलाने से कोई गांधी नहीं हो जाता। इस बाह्य ढोंग के सहारे ही सियासत की गाड़ी चलती है।
हम सब जानते हैं कि मुसलमानों के मंच पर टोपी पहनकर चढ़नेवाले लीडर, हिंदुओं के मंच पर पहुँचते ही रामनामी ओढ़ लेते हैं। हम सबको मालूम है कि राहुल गांधी केवल वोट पाने के लिए दलितों के घर खाना खाने गए। हम सबको पता है कि सफाई कर्मियों के पैर धोकर मोदी जी ने चुनावी चाल चली है। हम सबको सब पता है। हम सब कुछ जानकर भी इस अभिनय को चरित्र के झरोखे से निहारते रहते हैं।
राहुल गांधी बैंगकॉक जाते हैं, नरेंद्र मोदी मिसेज अम्बानी से हाथ मिलाते हैं, राहुल गांधी ने शादी नहीं की, नरेंद्र मोदी ने पत्नी को छोड़ दिया, राहुल गांधी को भाषण देना नहीं आता, नरेंद्र मोदी ने अमरीका के प्रेजिडेंट को झूला झुलाया, राहुल गांधी के कुर्ते की जेब फटी है, नरेंद्र मोदी का सूट बहुत महंगा है …इन मुद्दों पर हम वोट देते हैं। एक दरवाज़े से निकलता हुआ हर शख़्स एक जैसा हो, यह सम्भव नहीं है। एक बगीचे में उगनेवाले सारे फूल एक जैसे नहीं होते। कई बार चमेली भी केवल झाड़ बनकर रह जाती है और कई बार नागफनियों पर भी खूबसूरत फूल खिल जाते हैं।
एक ही व्यक्ति एक विषय पर सही और दूसरे विषय पर ग़लत हो सकता है। लेकिन हम इतने ज़िद्दी हैं कि या तो किसी को शत प्रतिशत सही मानेंगे या शत प्रतिशत ग़लत। हर शख़्स में, हर समुदाय में, हर पंथ में, हर दल में, हर विचारधारा में, हर आंगन में, हर देश में, हर घटना में कुछ सही और कुछ ग़लत ज़रूर होता है। इन दोनों को अलग-अलग न किया जाए तो अंधभक्ति और अंधविरोध जन्म लेता है, सुचारु व्यवस्थाएँ नहीं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हम घटनाओं का सामान्यीकरण करने के अभ्यस्त हैं। किसी एक घटना से पूरे व्यक्ति का, किसी एक व्यक्ति से पूरे समुदाय का, किसी एक समुदाय से पूर समाज का और किसी एक समाज से पूरे राष्ट्र का चरित्र आकलन करना हमारा अभ्यास है। इस अभ्यास में हम तर्कहीन हो जाते हैं। प्रत्येक बहस में हम अपनी बुद्धिमत्ता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से कूदते हैं और जब बुद्धिमत्ता बहस से पहले समाप्त हो जाती है तो ऐसे तर्क करने लगते हैं जिनसे सबको पता चल जाए कि हम केवल बुद्धिमत्ता के भरोसे बहस में नहीं आए हैं, देर तक टिके रहने के लिए हमारे पास मूर्खता भी है। संत कबीर नगर में भाजपा के एक सांसद ने भाजपा के ही एक विधायक का अभिनन्दन कर दिया। विवाद का कारण वही था – “तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा सफेद कैसे!” इस सम्मान समारोह में बाकायदा मंत्रोच्चार के बीच अनुशासन की आहुति दी गई। इस घटना को सोशल मीडिया पर ट्रोल करते समय लोग पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। यह ग़लत बात है। किसी भी एक व्यक्ति के आचरण से पूरी पार्टी का आचरण तय नहीं किया जा सकता। कोई भी एक व्यक्ति पूरी विचारधारा का चरित्र नहीं हो सकता। ऐसा करना अपने आकलन के साथ बेईमानी करना है। यह हम पूर्व में भी करते रहे हैं। एक मणिशंकर अय्यर के बयान से पूरी कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। एक साध्वी के बयान से पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं। इस आचरण के कारण लोकतंत्र का जनमत भीड़ के उन्माद में परिवर्तित हो जाता है। यह हमने जातियों में भी किया है। एक गांधी महात्मा हो गए तो सारे गांधी ख़ुद को संत बताने पर उतारू हो गए। एक मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो सारे मोदी देश का पैसा लेकर घूमने निकल लिए। ऐसा करना ग़लत है। एक राहुल गांधी पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं हैं। एक नरेंद्र मोदी पूरी भाजपा का चरित्र नहीं हैं। एक लोहिया के वैचारिक कुनबे में सारे लोहिया जन्म नहीं लेते। अम्बेडकर के बैनर तले इकट्ठा होकर लोग अम्बेडकर के बनाए कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। लोहिया की विरासत को बपौती मानने वाले सत्ता की वसीयत को लेकर सिर फुटव्वल करते मिले। भगवा पहनने से कोई हिन्दू नहीं हो जाता और चरखा चलाने से कोई गांधी नहीं हो जाता। इस बाह्य ढोंग के सहारे ही सियासत की गाड़ी चलती है। हम सब जानते हैं कि मुसलमानों के मंच पर टोपी पहनकर चढ़ने वाले लीडर हिंदुओं के मंच पर पहुँचते ही रामनामी ओढ़ लेते हैं। हम सबको मालूम है कि राहुल गांधी केवल वोट पाने के लिए दलितों के घर खाना खाने गए। हम सबको पता है कि सफाई कर्मियों के पैर धोकर मोदी जी ने चुनावी चाल चली है। हम सबको सब पता है। हम सब कुछ जानकर भी इस अभिनय को चरित्र के झरोखे से निहारते रहते हैं। राहुल गांधी बैंगकॉक जाते हैं, नरेंद्र मोदी मिसेज अम्बानी से हाथ मिलाते हैं, राहुल गांधी ने शादी नहीं की, नरेंद्र मोदी ने पत्नी को छोड़ दिया, राहुल गांधी को भाषण देना नहीं आता, नरेंद्र मोदी ने अमरीका के प्रेजिडेंट को झूला झुलाया, राहुल गांधी के कुर्ते की जेब फटी है, नरेंद्र मोदी का सूट बहुत महंगा है …इन मुद्दों पर हम वोट देते हैं। एक दरवाज़े से निकलता हुआ हर शख़्स एक जैसा हो, यह सम्भव नहीं है। एक बगीचे में उगने वाले सारे फूल एक जैसे नहीं होते। कई बार चमेली भी केवल झाड़ बनकर रह जाती है और कई बार नागफनियों पर भी खूबसूरत फूल खिल जाते हैं। एक ही व्यक्ति एक विषय पर सही और दूसरे विषय पर ग़लत हो सकता है। लेकिन हम इतने जिद्दी हैं कि या तो किसी को शत प्रतिशत सही मानेंगे या शत प्रतिशत ग़लत। हर शख़्स में, हर समुदाय में, हर पंथ में, हर दल में, हर विचारधारा में, हर आंगन में, हर देश में, हर घटना में कुछ सही और कुछ ग़लत ज़रूर होता है। इन दोनों को अलग-अलग न किया जाए तो अंधभक्ति और अंधविरोध जन्म लेता है, सुचारु व्यवस्थाएं नहीं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
आशंका से जीत गई आशा की रेखा
धीरज ने बदला अपनी क़िस्मत का लेखा
दहशत के अंधियारे ने दम तोड़ दिया है
दुनिया ने पश्चिम से सूरज उगता देखा
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
दो देश आमने-सामने खड़े हैं। सीमा पर तनाव है। नभ, थल और जल में होनेवाली हर आहट किसी अनहोनी की आशंका से मन कँपा रही है। यह कंपन, भय का कंपन कतई नहीं है। देश की रक्षा में तैनात वीर बेटों को मृत्यु से भयभीत होने की फ़ुर्सत होती ही कहाँ है।
मीडिया, युद्ध के उन्माद को भुनाकर टीआरपी बटोर रहा है। अपने आरामदायक बिस्तर पर लेटकर दर्शक किसी एक्शन फिल्म की तरह इन बुलेटिन्स को देखते हुए उन्मादी हो रहे हैं। टीवी की स्क्रीन से नज़र हटाकर मोबाइल की स्क्रीन पर टिकाओ तो सोशल मीडिया पर युद्ध की उतावली दिखाई देने लगती है। पाकिस्तान में पकड़े गए भारतीय पायलट की दुर्दशा का वीडियो क्लिप फॉरवर्ड करके हर कोई अपने मोबाइल में दर्ज संपर्कों पर यह इम्प्रेशन जमा रहे हैं कि मेरे पास सबसे पुख्ता और लेटेस्ट जानकारियाँ हैं।
इससे शायद हमारा कोई सूक्ष्म अहंकार पुष्ट होता होगा लेकिन एक पल के लिए उस परिवार के प्रति करुणा भी जागनी चाहिए जिसका बेटा इस वीडियो में दुश्मनों के बीच घिरा दिखाई दे रहा है। हम शेखचिल्ली की तरह वीरता की बड़बोली बातें करते समय यह कल्पना ही नहीं कर पाते कि इस अपरिचित पायलट की जगह हमारा अपना कोई इस वीडियो में दिखाई दे रहा होता तो शायद उंगलियाँ रूह से पहले काँप जातीं।
दो-दो विश्वयुद्ध लड़ चुकने के बाद यूरोप ने युद्ध से तौबा कर ली है। पूरा यूरोप सीमाविहीन हो चला है। युद्ध, अफ़वाह, शौर्य के खोखले जुमले, बदला, हमला, विध्वंस और खून-ख़राबे में नष्ट होनेवाले संसाधन मानव के जीवन स्तर को सुधारने में व्यय हो रहे हैं। कहते हैं कि कलिंग का रक्तपात देखकर राजहठ का शौर्य भी विरक्त हो गया था। कहते हैं कि मरणासन्न सुयोधन ने श्वास डूबने से पूर्व युधिष्ठिर का पश्चाताप देखा था।
कुछ घंटों, कुछ दिनों, कुछ सप्ताहों का एक युद्ध दो देशों को विकास की दौड़ में दशकों पीछे धकेल देगा। कुछ क्षणों का उन्माद सैंकड़ों चौखटों को हमेशा हमेशा के लिए अंधियारे से भर देगा। कुछ पलों का प्रतिशोध एक पूरी पीढ़ी को अनाथ कर देगा। हमारे पास केवल आँकड़े आएंगे कि भारत के इतने सैनिक ‘शहीद हुए’ और पाकिस्तान के इतने सैनिक ‘मारे गए’। हम मारे गए सैनिकों की संख्या के सम्मुख शहीद हुए सैनिकों की संख्या रखकर कम-ज़्यादा का आकलन करेंगे और क्रिकेट मैच के स्कोरबोर्ड की तरह यह ज्ञात कर पाएंगे कि किसका पलड़ा भारी है। इस प्रक्रिया के संपन्न होने के बाद हम उन आँकड़ों को भुला देंगे और बेचैनी से न्यूज़ बुलेटिन देखने लगेंगे।
एक पल के लिए भी हम उस मारे गए अथवा शहीद हुए किसी सैनिक के परिवार की मनोदशा का अनुमान लगाने की ज़हमत नहीं उठाएंगे। ख़ूब खून-ख़राबा होने के बाद हमारे यहाँ के डिप्लोमेट्स, उस दुश्मन के डिप्लोमेट्स के साथ बातचीत का लिए स्वीकृति दे देंगे और फिर कुछ घंटों की मशक्कत के बाद किसी समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे। इस बीच जिन परिवारों के चिराग़ बूझेंगे उनकी सुधि किसी को नहीं आएगी। मीडिया सीमा रेखा को भूलकर शिखर वार्ता की तैयारियों, अतिथि देश के प्रधानमंत्री की पोशाक, खानपान, रुकने के स्थान और पर्यटन की कवरेज में व्यस्त हो जाएगा।
हम अपने सैनिकों के शौर्य को बिसारकर अपने देश की मेहमान नवाज़ी पर रीझने लगेंगे। एक काग़ज़ के टुकड़े पर हस्ताक्षर होंगे। दोनों मुल्कों के राष्ट्राध्यक्ष हाथ मिलाते हुए फ़ोटो खिंचवाएंगे। फिर एक साझा बयान जारी होगा और दस-बारह साल के लिये छुटपुट घटनाओं के भरोसे अपने सैनिकों को छोड़कर अपने-अपने काम में व्यस्त हो जाएंगे।
काश, हम अपने उन्माद के अंधियारे में बेटे खोने का दुःख टटोलने की कोशिश कर पाते। काश हम समझ पाते कि दो मुल्कों के एक सौ चालीस करोड़ लोगों के जीवन और भविष्य की कीमत पर युद्ध की ओर बढ़ना किसी के लिए भी सुखद नहीं होगा। काश हम स्वीकार कर पाते कि बातचीत की टेबल तक कि यात्रा यदि युद्ध के मैदान से होकर न जाए तो कई आंगनों को बिलखने से बचाया जा सकेगा।
✍️ चिराग़ जैन