Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जो सबके अपराध टटोलें
मीठे पानी में विष घोलें
जो जल से जल-जल जाते हैं
जब बोलें कड़वा ही बोलें
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं
दर्पण में उनका चेहरा है, उस पर भौंहें तान रहे हैं
हर युग में कान्हा जन्मे हैं, हर युग में शिशुपाल हुए हैं
जिस धरती पर बुद्ध चले थे, उस पर अंगुलिमाल हुए हैं
दशरथ ने मर कर समझाया, अनुचित के आगे मत झुकना
जब-जब कोपभवन की मानी, तब-तब युग बदहाल हुए हैं
कभी सुदर्शन से समझाए
कभी समर्पण के पथ आए
तम के चेले कभी, कहीं भी
सत के आगे टिक ना पाए
सच का जीवित रहना तय है, इसके बहुत प्रमाण रहे हैं
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं
ईर्ष्या ढूंढ रही है कमियाँ, प्रतिभा बस बढ़ती जाती है
तिनके तकते रह जाते हैं, और लता चढ़ती जाती है
बिन समझे कहने वालों ने, माटी सनी हथेली देखी
लेकिन लगन उसी माटी से, अमृत घट गढ़ती जाती है
अपनों को दुत्कार चुके हैं
यश-वैभव सब हार चुके हैं
एक ज़रा सी ज़िद्द के आगे
पूरा कुल संहार चुके हैं
ख़ुद के हित का ज्ञान नहीं है, कहने को विद्वान रहे हैं
वे बेचारे इक दर्पण को, जग का चेहरा मान रहे हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
आज 8 जून है। हिंदी कवि सम्मेलन जगत का सबसे उदास दिन। वर्ष 2009 में आज ही की तारीख़ के ब्रह्म मुहूर्त में हिंदी जगत् शोक में डूब गया था। 7 जून को बेतवा महोत्सव था। बहुत समृद्ध मंच था। प्रो अशोक चक्रधर, प्रदीप चौबे, ओमप्रकाश आदित्य, विनीत चौहान, नीरज पुरी, डॉ सरिता शर्मा, ओम व्यास ओम, देवल आशीष, पवन जैन, मदन मोहन समर, लाड सिंह गुर्जर और जॉनी बैरागी जैसे रचनाकारों ने देर रात तक शब्द यज्ञ किया। आश्चर्य यह था कि उस रात मंच पर लगभग प्रत्येक कवि की कविता में मृत्यु का ज़िक्र हुआ। मानो, मृत्यु आगत की सूचना दे रही हो। कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। सभी कवि अलग-अलग गाड़ियों में बैठकर होटल के लिए रवाना हुए। एक गाड़ी में ओमप्रकाश आदित्य, नीरज पुरी, लाडसिंह गुर्जर, ओम व्यास ओम और जॉनी बैरागी सवार हुए। राह में मृत्यु प्रतीक्षारत थी। रात के अंधेरे में हाइवे पर दौड़ती गाड़ी सड़क किनारे खड़े एक अनजान ट्रक से जा टकराई। सरस्वती कुल में सूतक लग गया। हास्य के शास्त्रीय रचनाकार ओमप्रकाश आदित्य को उसी क्षण यम ने सरस्वती से छीन लिया। गाड़ी के भीतर मृत्यु और पीड़ा ताण्डव कर रही थी। गाड़ी का चालक और आदित्य जी मृत पड़े थे। ओमव्यास ओम, नीरज पुरी और लाडसिंह गुर्जर ख़ून से लथपथ थे। जॉनी बैरागी पिछली सीट पर थे। उनके हाथ में फ्रैक्चर था। हड्डी टूटने की पीड़ा के बावजूद वे किसी तरह गाड़ी से बाहर निकले और सड़क पर आने वाली गाड़ियों से सहायता मांगने लगे। पीछे विनीत भाई, समर जी और देवल भाई की गाड़ी आ रही थी। जॉनी को सड़क पर देख विनीत भाई ने गाड़ी रुकवा ली। घटना की भयावहता देख कर देवल भाई विह्वल हो गए लेकिन विनीत भाई ने हिम्मत के साथ गाड़ी से कवियों को बाहर निकालना शुरू किया। नीरज भाई का शरीर भारी था। दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी में वे फँस गए थे। गम्भीर रूप से घायल होने के कारण हिम्मत हारने लगे थे। विनीत भाई उन्हें लगातार आश्वस्त करते रहे कि नीरज हिम्मत रखो, तुम्हें कुछ नहीं होगा। तब तक देश भर में फोन बज गए थे, पास के गाँववाले मदद के लिए आ गए थे, मदन मोहन समर जी ने युद्ध स्तर पर पुलिस की मदद मुहैया करवा दी थी। एक वायुयान नीरज भाई के परिवार को चंडीगढ़ से भोपाल के लिए ले उड़ा था। ओम व्यास ओम कोमा में जा चुके थे। लाडसिंह सिंह और नीरज पुरी देर तक संघर्ष करने के बाद मृत्यु के मेहमान बन चुके थे। बैतूल में नीरज पुरी, शाजापुर में लाड सिंह गुर्जर और दिल्ली में आदित्य जी के अंतिम संस्कार हुए। आदित्य जी के अंतिम संस्कार में अल्हड़ बीकानेरी भी पहुँचे। घटना से इस हद तक आहत थे कि मालवीय नगर श्मशान भूमि के बाहर ही बैठ गए। उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। अस्पताल में भर्ती हो गए। कहते हैं उन दिनों अल्हड़ जी बार बार एक फिल्मी नग़मा गुनगुनाते थे – “आ लौट के आजा मेरे मीत, तुझे मेरे गीत बुलाते हैं।” दस दिन तक जब मीत का कोई जवाब न आया तो 17 जून को अल्हड़ जी ख़ुद चले गए अपने मीत के पास। उधर ओम व्यास ओम बेसुध पड़े मृत्यु से लड़ रहे थे। उन दिनों तकनीक इतनी सहज नहीं थी, फिर भी किसी तरह उनकी कविताओं की रिकॉर्डिंग जुटाई गई और उन्हें सुनाई गई। देश भर का कवि समाज ओम व्यास जी के लिए बेचैन रहा। प्रशासनिक, मानवीय, तकनीकी और अन्य हर प्रकार की सहायता लिए पूरा हिंदी जगत् अनवरत तैनात रहा। लेकिन मृत्यु के साथ जारी यह युद्ध हम हार गए। एक महीने की अवधि में पाँच साथी खो गए। वो दौर याद आता है तो आज भी रूह काँप उठती है। मृत्यु, अंतिम संस्कार, उठावनी, तेरहवीं, रस्म पगड़ी…. ये सब शब्द अनुप्रास हो गए थे। मोबाइल की घण्टी बजती थी तो अनजान भय से मन काँपने लगता था। सरस्वती पुत्रों के इस सबसे कठिन दौर की बरसी पर सभी दिवंगतों को विनम्र श्रद्धांजलि!
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
उस पल जब चीख़ बन गई थी
एक नन्हीं किलकारी
जब दहल उठा था सारा ब्रह्मांड
जब दरक गई थी धरती
उस पल केवल तुम आई थीं
उसकी छटपटाहट को आलिंगन में भरकर दुलारने
तुम दूर ले गईं उसे बर्बर वहशी की पहुँच से! …
तुमने उसे मारा नहीं; बचा लिया है मृत्यु!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
महापुरुषों के लिए बहुत मुश्किल होता जा रहा है। यदि उनके वश में होता तो फेसबुक से अपनी डेट ऑफ बर्थ और डेट ऑफ डेथ ग़ायब कर देते। न रहता बाँस, न बजती बाँसुरी। पिछली 30 जनवरी को गांधी पूरे दिन सहमे रहे। क्योंकि सत्तर बरस बाद भी उनके देशवासी इस बात पर सहमत नहीं हो पाए हैं कि गांधी को आदर देना चाहिए या गाली। उनकी मृत्यु, हत्या थी या वध। उनका हत्यारा दैत्य था या देवता। एक बार क्लियर कर लो भाई। इतने बड़े देश में एक बार वोटिंग करवा लो, जो बहुमत तय कर दे, वह मान लो। रोज़-रोज़ की फ़जीहत क्यों करते हो। यही हाल 27 मई को नेहरू का था। लेकिन चुनावों में उन्हें जी भरकर कोसनेवाले रहनुमा ने जब राष्ट्र के नाम ट्वीट करके बताया कि नेहरू उतने बुरे नहीं थे, जितना मैं उन्हें चुनावी रैलियों में सिद्ध कर आया था, तो नेहरू की आँखों से ख़ुशी के आँसू निकल पड़े। 28 मई को सावरकर ने नेहरू को सूचना दी कि हाल मेरा भी बढ़िया नहीं है। पूरा देश दिन भर फेसबुक पर यही चिंतन करता रहा है कि सेल्यूलर जेल में मिले ज़ख़्मों पर मरहम लगाई जाए या माफी वाली चिट्ठी से इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ाई जाएँ। चंद्रशेखर आज़ाद भी कई वर्ष से कन्फ्यूज़ हैं कि जिस देश के लिए उन्होंने प्राण दिए, वह उन्हें शहीद समझता है या आतंकवादी! ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने टैगोर से पूछा कि गुरुदेव मेरा कुसूर क्या था। मैंने तो कभी सम्मान भी नहीं चाहा। उनका प्रश्न अनसुना करके गुरुदेव ने कहा, ”बाद में आना यार, अभी मैं ये समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि मैं जॉर्ज पंचम का चाटुकार हूँ या माँ भारती का बेटा हूँ।“
सबसे दयनीय स्थिति हेमंत करकरे की है। कई वर्ष तक बहादुरी की मिसाल बने रहने के बाद अचानक देश को लगा कि इस आदमी की थोड़ी ज़्यादा इज़्ज़त हो गई है। इसलिए उन्हें ग़द्दार, क्रूर, दोगला और न जाने क्या-क्या अलंकरण देकर ऐसा कर दिया कि परलोक में उन्होंने अपने बंग्ले के बाहर नेमप्लेट पर हेमंत किरकिरे लिखवा लिया है।
हाल ही में सारे महापुरुषों ने एक साझा बयान जारी करके कहा है कि- ‘प्यारे देशवासियो! हमारी मूर्तियों को तुड़वाकर फेंक दो, पाठ्यक्रमों से हमें बाहर कर दो, हमारे क़िस्से अगली पीढ़ियों को बिल्कुल मत बताओ, हमारे नाम को हर भवन, सड़कें, धर्मशालाएँ, अस्पताल, हवाई अड्डे, शहर, कस्बे, मुहल्ले पर से मिटा दो, हमारी समाधियों पर सरकारी दफ़्तर बनवा लो और देश के हर प्रवेश द्वार पर हमारे मुँह पर कालिख पुता चित्र स्थापित कर दो, ताकि इस देश में प्रवेश करनेवाला हर शख़्स यह सबक ले सके कि जो माली बाग़ को सुरक्षित रखने की झोंक में ज़मीन में संस्कार बोने भूल जाता है, उसका क्या हश्र होता है।’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
एक शुबहा अज़ान देता है
आइये हिज्र की नमाज़ पढ़ें
✍️ चिराग़ जैन