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लड़ाई की संभावनाएं

सुर-असुर; शैव-वैष्णव; कौरव-पाण्डव; आर्य-द्रविड़, बौद्ध-वैष्णव, जैन-बौद्ध, हिन्दू-मुस्लिम, भारतीय-अंग्रेज, ऊँच-नीच और अमीर-ग़रीब का परस्पर संघर्ष तो समझ लिया हमने! लेकिन रजवाड़े आपस में क्यों लड़े, मराठा-पेशवाओं में आपसी संघर्ष क्यों था, मुग़ल आपस में क्यों एक न हुए, मौर्यो में भितरघात कैसे हुआ, और तो और कांग्रेसी एक क्यों न रह सके, जनता दल क्यों विभक्त हुआ, तेलंगाना का संघर्ष क्यों हुआ, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा क्यों बना, शिवसेना दुफाड़ क्यों हो गई, वरुण गांधी और राहुल गांधी में क्यों नहीं बनी, प्रमोद महाजन और प्रवीण महाजन का अंत कैसे हुआ, आडवाणी जी और मोदी जी में दूरी क्यों है, केजरीवाल और अन्ना और योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण और किरण बेदी अलग-अलग क्यों हो गए। -इन सब प्रश्नों का अलग अलग उत्तर तलाशने की आवश्यकता नहीं है। सीधा सा मतलब है बंधु। किसी भी वर्ग को इस देश की समस्याओं का दोषी ठहराना बंद होना चाहिए। यदि सारे हिंदुओं को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा तो मुसलमान शीया-सुन्नी होकर लड़ेंगे। सारे मुसलमानों को बाहर निकाल दिया गया तो हिन्दू ब्राह्मण-बनिए-क्षत्रिय-शूद्र होकर सिर फोड़ेंगे। सबसे अहिंसक जैनियों को अकेला छोड़ दो तो वे श्वेताम्बर-दिगंबर-तेरापंथी-बीसपंथी-मूर्तिपूजक और न जाने क्या क्या होकर लड़ने लगेंगे। और शांति के प्रतिमान समझे जाने वाले बौद्धों को अकेला छोड़ दो तो उनके पास भी ढेर संभावनाएँ शेष हैं। गोत्र, वंश, कुल, भाषा, शिक्षा, पंथ किसी भी भेद पर लड़ना जब तय ही है तो किसी भी वर्ग को बाहर निकाल कर लड़ाई की संभावनाएं कम न करो। ऐसा करोगे तो लड़ाई हो जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

दलित का होत

भैये यो दलित दलित का होत है।
कछु नाय होत भाई। ई सब नेता-ऊता पहिले चुनाब-चुनाब की कुश्ती खेलत हैं, फिर हिन्दू-मुसलमान की कबड्डी। अऊर जब सबन से उकता जइहैं तब दलित-उलित का सलीमा लगा लई हैं।

✍️ चिराग़ जैन

बटुआ खोने के लाभ

आज मेरा बटुआ खो गया। बटुआ खोने के बाद मुझे पता चला कि इस देश में जितने भी लोग हैं वे सब जीवन में कभी न कभी बटुआ गँवा चुके हैं और उस अनुभव की कहानी सुनाने के लिए अवसर की तलाश में जीवन जी रहे हैं। कुछ दरिद्र लोग जिनके पास निजी अनुभव का अभाव है वे समय पड़ने पर अपने दोस्त, चाचा, ताऊ, मौसा या पड़ोसी के अनुभवों से काम चलाते हैं।
बटुआ खोने के बाद मुझे इस बात का भी एहसास हुआ कि मनुष्य नामक सामाजिक प्राणी जानता है कि उम्मीद पर दुनिया कायम है इसलिए उस पत्थर के नीचे से भी बटुए की तलाश करते हैं जिसे युगों पूर्व भगवान् राम ने भी छूकर अहिल्या नहीं बनाया था।
बटुआ खोने के बाद ही मुझे यह भी पता चला कि देश के लोग वाक्य के शुरू में “काश” और वाक्य के अंत में “ता” लगा कर घटी हुई घटना को भी घटने से रोकने की सम्भावना बनाए रखने में दक्ष हैं।
जो भी व्यक्ति घटनास्थल की लोकप्रियता से आकृष्ट होकर मुझ तक पहुँचता वो आते समय मुख पर कौतूहल, सुनते समय माथे में त्यौरियां और कथा समाप्ति के समय नीचे वाले होंठ को ठुड्डी तक ले जाने का असफल प्रयास करके गर्दन हिलाता हुआ भीड़ का हिस्सा बन जाता था। कहानी चूंकि मैं खुद “आह से उपजे गान” की तरह सुना रहा था इसलिए वह कुछ ही मिनिटों के “करत करत अभ्यास” से इतनी प्रभावी हो चली थी कि सुनने वाला लौटते हुए गर्दन झुकाकर यह सोच कर शर्मिंदा दिखाई देता था कि यदि वह मौक़ा ए वारदात पर मौजूद रहा होता तो बटुए के गिरते ही उसे दबोच लेता और मुझे देकर मेरा सारा कष्ट हर लेता।
बटुआ खोने के बाद मुझे यह भी अच्छी तरह पता चल गया कि बटुए जैसी कीमती चीज़ संभाल के रखनी चाहिए। एक सज्जन ने यह भी जानकारी दी कि बटुए के खोने से बहुत परेशानी हो जाती है।
कुछ लोगों ने मुझसे यह भी पूछा कि बटुए में पैसे थे क्या। मैंने उनको बताया कि नहीं पैसे तो मेरी कार के फ्यूल टैंक में थे, बटुए में तो मैंने पेट्रोल भरवा रखा था।
ये सुनकर उन्होंने अपने स्वेटर के गले में हाथ घुसाकर कमीज की जेब में से एक सौ बीस रूपये निकाले और बताया कि वे भी पैसे कभी बटुए में नहीं रखते, बटुआ हमेशा खाली रहता है ताकि कभी गुम हो तो पैसों का नुकसान न हो। ऐसा कहते हुए उन्होंने एक सौ बीस रूपये से अपनी कमीज की खाली जेब पुनः भर ली।
बटुआ खो जाने के बाद मुझे यह भी पता चल गया कि अगले चार-पाँच दिन मुझे इस उम्मीद में जीना चाहिए कि कोई भला आदमी मुझे फोन करके बताएगा कि आपका बटुआ हमें कहीं पड़ा मिला है, इसे हमसे वापस ले जाओ।

✍️ चिराग़ जैन

परिधि

जो लोग
चोरी किये जाने के ख़िलाफ़ हैं
वे लोग
सिर्फ दूसरों के द्वारा चोरी किये जाने के खिलाफ हैं

जो लोग
झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
वे लोग सिर्फ दूसरों का झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
और जो लोग
स्त्रियों को सुरक्षित देखना चाहते हैं
वे लोग
स्त्रियों को सिर्फ दूसरों से सुरक्षित देखना चाहते हैं

ये बात
समझ तो नहीं आती
लेकिन समझ रहा हूँ

कि वे लोग
जब चोरी करते पकड़े जाएँ
तो उसको इत्तफ़ाक़ समझना चाहिए
वे लोग
जब झूठ बोलते पकड़े जाएँ
तो उस परिस्थिति को समझना चाहिए
और वे लोग
जब किसी स्त्री को दबोचे हुए
नंगे होने लगें
तो उसको
ब्राॅड माइंडेड होकर देखना चाहिए

क्योंकि वे लोग
सभ्य समाज की परिधि हैं
और सभ्य होने के नाते
मुझे परिधि लांघने का
कोई हक़ नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

लालकिला कवि-सम्मेलन

प्यारे देशवासियो!
आपको यह सूचित करते हुए ख़ुशी हो रही है कि हम पंजाबी, हम सिंधी, हम ये, हम वो सब कुछ हैं लेकिन सुरक्षा कारणों से हम हिंदी नहीं हो पा रहे हैं। यह बताते हुए मैं फूला नहीं समा रहा हूँ कि हिंदी कवि-सम्मेलन जगत् का शीर्ष कहा जाने वाला लालकिला कवि-सम्मेलन इस बार सुरक्षा कारणों से “स्थगित” कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली सरकार केअधीनस्थ सभी भाषा अकादमियां कवि-सम्मेलन का आयोजन करती हैं। इस श्रृंखला में हिंदी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी और संस्कृत भाषा के कवि-सम्मेलन होते रहे हैं। इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय कवि-सम्मेलन था “हिंदी भाषा” का गणतंत्र दिवस कवि-सम्मेलन।
उक्त कार्यक्रम हर साल लालकिले के भीतर फुटबॉल मैदान में होता था। बीच में कुछ वर्ष यह आयोजन सुरक्षा कारणों से तालकटोरा स्टेडियम में भी हुआ। लेकिन इसके रद्द अथवा स्थगित होने की कोई घटना याद नहीं आती।
वैसे इस कार्यक्रम का रद्द होना देशहित में ही है। इसकी लोकप्रियता और गरिमा को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक अनेक प्रधानमंत्रियों ने इसमें उपस्थित रहकर अपना समय नष्ट किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और राज्यपालों को तो इसका आकर्षण कभी छोड़ ही न सका। ऐसे में इसके न होने से कितने सारे महत्वपूर्ण लोगों का कितना सारा कीमती समय बचा; यह गणतंत्र के लिए शुभ है।
अकादमी की ओर से आधिकारिक सूचना यह है कि स्थान उपलब्ध न होने के कारण कवि-सम्मेलन स्थगित किया जा रहा है। यह अच्छी बात है। गणतंत्र के अवसर पर लालकिले को सुरक्षा एजेंसियों ने किसी गुप्त स्थान पर छुपा दिया है ताकि आतंक की काली नज़र लालकिले की आभा को धूमिल न करदे। यदि लालकिले को कुछ हो जाता तो गणतंत्र परेड की झाँकियाँ कहाँ जाकर अपने पैर दबवातीं।
मेरे एक मित्र हैं जिनको अब मैं शत्रु मानने लगा हूँ। उन्होंने मुझसे इतना घटिया सवाल पूछा कि जब स्थान बदल कर बाकी भाषाओं का कवि-सम्मेलन हो सकता है तो हिंदी का क्यों नहीं। अब बोलो, कौन समझाए इनको! अरे यार, हिंदी की सुरक्षा ज़्यादा ज़रूरी है। हिंदी घुट-घुट कर मर जाए, तो हम स्वीकार कर सकते हैं लेकिन हिंदी आतंकियों की गोली से मरे इसे हमारी सरकार किसी सूरत बर्दाश्त नहीं कर सकती। वैसे भी, जिस प्रकार अन्य खेलों के उत्थान के लिए क्रिकेट पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है; जिस प्रकार पिछड़ों के विकास के लिए अगड़ों का शोषण ज़रूरी है उसी प्रकार अन्य भाषाओं के कवि-सम्मेलन की सफलता के लिए हिंदी के कवि-सम्मेलन को ठण्डे बस्ते में डालना अनिवार्य है।
अब ये मत पूछना कि विश्व पुस्तक मेला हज़ारों कीअव्यवस्थित भीड़ के साथ प्रगति मैदान में सुरक्षित रह सकता है तो कवि-सम्मेलन एक व्यवस्थित श्रोता समूह के साथ बंद इमारत में असुरक्षित क्यों है? ये भी मत पूछना कि छत्रसाल स्टेडियम में ऑड-इवन की क़ामयाबी का जश्न मनाने के लिए स्थान उपलब्ध हो सकता है तो कवि-सम्मेलन के लिए इतने बड़े शहर में स्थान का अभाव क्यों है?
इस प्रकार के प्रश्न बेमानी हैं। सरकार ने जनता की सुरक्षा के लिए ख़ुद को संकट में डाला। छत्रसाल स्टेडियम में मुख्यमंत्री जी ने सारे संकटों के सम्मुख अपनी छाती अड़ा दी और जनता के मुँह को काला होने से बचा लिया। इसको कहते हैं नेतृत्व। ऐसे लोगों की भावनाओं पर प्रश्न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को संदेह के घेरे में खड़ा कर देगा।
इसलिये एक टुच्चे से कवि-सम्मेलन के न होने का शोक न मनाओ रे बंधु बल्कि अपने भाग्य को सराहो कि हमारा देश किन महान विभूतियों के हाथ में है।

और हाँ
वो एन्ड में क्या बोलते हैं
जय हिन्द!

✍️ चिराग़ जैन

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