+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

सरकारी स्कूलों के बच्चों में संस्कार

श्री श्री रविशंकर ने बयान दिया है कि ”सरकारी स्कूलों के बच्चों में संस्कार नहीं होते।“ सुनकर लगा कि श्री श्री को अपनी खी-खी करवाने का चाव चढ़ा है। उनको कोई समझाये कि सरकारी स्कूलों में तो बच्चे ही नहीं होते। उन टीन वाले कमरों में ‘बाप’ पढ़ते हैं।
अमीरी की चम्मच मुँह में दबाए जन्मने वाले लाटसाहबों को अगर चार दिन इन सीलन भरे कमरों में बैठना पड़ जाये तो वे बिना किसी बाबा की सहायता के ‘सुदर्शन क्रिया’ करने लगेंगे। इसका प्रयोग करने के लिये बाबा स्वयं इन विद्यालयों का दौरा करें, वहाँ पहुँचते ही ‘कोऽहम्- कोऽहम्’ का मंत्र न बोलने लगें तो कहना।
ज़िम्मेदार लोगों को इस प्रकार की ग़ैर-ज़िम्मेदार बातें नहीं कहनी चाहियें। बाकी रही संस्कार की बात तो बाबा किसी दिन छुट्टी के समय कॉन्वेंट स्कूलों के बाहर जाकर देख लेना, संस्कृति और संस्कार किस प्रकार बसों के पीछे खड़े प्रेम और सद्भावना का प्रसार करते हैं, देख कर आपकी देह के विविध प्रदेशों के रोम राष्ट्रगान की मुद्रा में आ जाएंगे।
सरकारी स्कूलों की चुनौतियाँ बेशक़ टॉपर्स की फेहरिस्त तैयार न करने देती हों, लेकिन जीवन जीने का सही ज्ञान इन स्कूलों में आज भी बच्चे टाट्पट्टी पर बैठ कर ग्रहण कर लेते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

मेरी हिम्मत

निराशा तो मेरी आंखों को नम होने नहीं देगी
मगर उम्मीद मुझको चैन से सोने नहीं देगी
बहुत आसां नहीं होगा मेरे सपनों का सच होना
बहुत मुश्क़िल मेरी हिम्मत इसे होने नहीं देगी

✍️ चिराग़ जैन

वायरस

जब से
डाउनलोड की है
तुम्हारे नाम की फाइल
बार-बार हैंग होता है
दिल का सिस्टम

…शायद
कोई वायरस था
फाइल में।

जिसने सबसे पहले
डी-एक्टिवेट किया
ब्रेन का एंटी-वायरस
और फिर
करप्ट कर दिया
ऑपरेटिंग सिस्टम
स्लो कर दी
रैम भी!

…शायद
इंस्टाॅल करनी पड़ेगी
नई विंडो!

✍️ चिराग़ जैन

अधूरे ख़्वाब

हर रात
मैं बुनता था इक ख़्वाब
और फिर
उसको अधूरा छोड़
चुपचाप सो जाता था
कि कभी तुम्हारे साथ
साकार करूंगा
ख़्वाब में उभरा
ये ख़ूबसूरत लम्हा…

एक-एक करके
जाने कितने ही सपने
इकट्ठे हो गए
मेरे तकिए के नीचे।

आज जब सोने लगा मैं
बिना संजोए कोई ख़्वाब
तो अचानक
मेरे सामने खड़े हो गए
सैंकड़ों अधूरे ख़्वाब
तकिए के नीचे से निकलकर।

सबकी भंगिमा में मौजूद था
एक ही प्रश्न-
“अब हमारा क्या होगा?”

मैंने कहा-
“काश ये निर्णय
मेरे वश में होता!”

✍️ चिराग़ जैन

टोटका

बहुत उपजाऊ है
मेरे दिल की मिट्टी।
पनप जाता है
हर बीज
आसानी से।

बहुत आसानी से
फूट पड़ता है अंकुर,
बहुत आसानी से
द्विदल होता है बीज,
…लाल-लाल कोंपलें
……ताज़ा हरापन।

कभी ओस नहाई पत्तियाँ
तो कभी
गुपचुप बतियाती
डालियाँ।

कुछ पौधों पर
आ जाता है
बौर भी…
…लेकिन किसी डाल ने
कभी नहीं किया
फल का शृंगार…!

…शायद
कोई टोटका कर देता है
मेरी हरियाली पर!

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!