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छल

मैंने
भीगी फुलवारी से पूछा-
“कोई आया था क्या?”

वो बोली-
“एक बादल आया था
…बरखा बनकर!”

✍️ चिराग़ जैन

बदरा

जाने ये कैसा बदरा है
बदरा के भीतर मदिरा है
जब छलकी तो सब झूम उठे
जैसे मृदंग से धूम उठे
पीपल ने छेड़ी तान अलग
बूंदों ने गाया गान अलग
पुरवा ने ऐसा रास रचा
बिजुरी ने जी भर नाच नचा
पंछी कलरव करते डोले
कच्चे स्वप्नों ने पर खोले
बचपन बौराया तब भू पर
हाथों से बूंदें छू-छू कर
ऐसा मेघों में रोर हुआ
इक उत्सव-सा हर ओर हुआ
धुल गई धरा, खुल गई पवन
पावन पावन है अंतर्मन
श्वासों में शीतलता आई
नयनों में चंचलता छाई
सब कष्ट ग्रीष्म के भूल गए
बागों में झूले झूल गए
जिस क्षण जल से संलिप्त हुई
वसुधा की तृष्णा तृप्त हुई
ऐसा मौसम का ज्वर आया
प्यासों में पानी भर आया
जाने ऐसा क्या कृत्य करा
सब कुछ लगता है हरा-हरा

✍️ चिराग़ जैन

विरोध

देर तक खड़ा
रिरियाता रहा बादल
लेकिन नीम
रूठा ही रहा
न तो पाथेय दिया
निंबोरी का
न ही आंगन सँवारा
नीमपुष्प से।

लेट आए हो ना बदरा
अब भुगतो
भूख सहोगे
तो समझोगे
किसी की प्यास!

✍️ चिराग़ जैन

बरसात की एक सुबह

लाजवाब है आज की सुबह
रात भर
धोया गया है सारा शहर

हर पेड़ को
नहलाया गया है रात भर

उत्सव का
नज़ारा कर रहा हूँ
अपनी बालकॅनी से।

दारू पी है शायद
नीम और पीपल ने।
अभी तक झूम रहे हैं
दोनों याड़ी।

सहजने की फलियाँ
बिछ गई हैं
…मुजरा करने के बाद।

मिट्टी की ख़ुश्बू वाला फ्रेशनर
अभी भी महक रहा है
परिंदे घुस आए हैं
मुफ्त की पार्टी उड़ाने।

एक ख़ूबसूरत-सा अहसास
बौराए जाता है मुझे भी!

✍️ चिराग़ जैन

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