Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
रेत का साम्राज्य है बस
हो चुके हैं घाट बेबस
पर्वतों पर जल नहीं है
दूर तक बादल नहीं है
चल रहे हैं रेत पर, तपती दुपहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
पत्थरों के आख़िरी कण तक नहीं है बून्द जल की
याद रख पाए नमी को इस जतन में आँख छलकी
आँख के नीचे बची है शेष, झरनों की निशानी
पाँव के छाले सुनाते हैं जलाशय की कहानी
खेत से उठती हर इक आवाज़ बहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
स्रोत सूने हो गए हैं, बस्तियों में हैं शिकारी
थक चुका सागर तरस कर, प्यास जीती, आस हारी
जोड़ रखती थीं धरा को, वे जड़ें बिखराव में हैं
इक सदी का दर्द जीवित इन जड़ों के घाव में है
मर गया कलरव नदी की पीर लहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
श्रम जलाशय खोजता है रेत से सूखे क्षणों में
पीढ़ियाँ घिरने लगी हैं आग के आकर्षणों में
फूँक दे जो ज़िन्दगी को, अब न ऐसा स्वप्न पालो
हो सके तो नौनिहालों को झुलसने से बचा लो
हर नमी को सोखता सूरज सुनहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
कँपकँपाते शरीर को सफेद चादर में लपेटे हुए रोज़ सुबह एक बूढ़ी दादी ठंडे-ठंडे हाथों से गाल छूती है। मैं झल्लाकर सिर तक रजाई खींच लेता हूँ। दादी हँसकर रसोई में जाती है और सरसों के साग की ख़ुशबू से मेरे आलस्य में व्यवधान करती है। खेतों में हरी सब्ज़ियों की ताज़गी देखकर बूढ़ी दादी की क्यारियों से प्यार हो जाता है।
गाजर के हलवे की रंगत और ग़ज़क-रेवड़ी की झलक दिखाकर दादी मुझे रिझाती है। मैं रोज़ सुबह अंगड़ाइयों में टूटते आलस को भूलकर दादी की रसोई में घुस जाता हूँ। स्वाद और पेट को तृप्त करके मुझे दादी की शरारतों पर फिर से खीझ उठने लगती है। मैं टूटी हुई लकड़ियाँ जोड़कर अलाव जलाता हूँ और मूंगफलियों के आनंद में व्यस्त हो जाता हूँ।
मुझे अलाव की संगत में बैठा देखकर, दादी चुपचाप अपनी कोठरी में जा दुबकती है। थोड़ी देर बाद मूंगफलियों की संख्या कम होते-होते समाप्त होने लगती है। अलाव की रंगत फीकी पड़ जाती है। मैं दादी से छुपकर रजाई के आगोश में खो जाता हूँ। सुबह होते-होते; जब तक मैं दादी को भूलने लगता हूँ; हवा का एक झोंका गाल पर मीठी-सी चपत लगाकर कहता है- ‘उठ रे, दादी चाय के लिए अदरक कूट रही है।’
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
ओ रे बदरा बरस
बन के सावन सरस
राह धरती ने कबसे तकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की
हल ने काटी चिकौटी बहुत
पर धरा में नमी ही न थी
ख़ूब टपका पसीना मगर
प्यास में कुछ कमी ही न थी
प्रश्न बढ़ते रहे
हल सिसकते रहे
एड़ियाँ फट गईं खेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की
हिमशिखर का धवल कारवां
कौन जाने कहाँ लुट गया
पर्वतों पर लकीरें बनीं
और झरनों का दम घुँट गया
स्रोत सूखे सभी
घाट रूखे अभी
हर नदी हो गई रेत की
प्यास तू ही बुझा जेठ की
गीत बरखा नहाने चला
तो पसीना-पसीना हुआ
प्रीत जिस डाल पर झूलती
उसका हर पात झीना हुआ
गुलमुहर झर चुका
नीम का सर झुका
हाय मुरझा गई केतकी
प्यास तू ही बुझा जेठ की
जब तू आया तेरी राह में
घास का इक गलीचा सजा
मेंढ़कों ने धमक छेड़ दी
पत्तियों पर तराना बजा
फूल के संग झरी
नीम ने रसभरी
इक निम्बोली तुझे भेंट की
प्यास तू ही बुझा जेठ की
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Doha, Poetry
बरखा, बादल, बीजुरी, रिमझिम, झर-झर नीर
मीत संग सब नीक है, बिरहन कू सब पीर
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
आजकल दिल्ली का मौसम कुछ अजीब हो गया है। इस बार धूप गुलाबी होने से पहले ही चिलचिलाने लगी है। वसन्त की फुलवारी अभी ठीक से मुस्कुरा ही पाई थी कि आकाश में मंडराती चीलों की आवाज़ ने माहौल को एक मनहूस वीराने से ढाँप लिया। रंगों के नाम पर कुछ है तो बस पलाश, वो भी रह रहकर ऐसे टूट कर भूशायी होते हैं कि सौंदर्य की डोर पकड़ कर उभरता काम, क्षणभंगुरता के तथागत भाव से वनोन्मुखी हुआ जाता है। दिल्ली की सडकों पर निकलो तो पता चलता है कि पलाश के ही दो रंगों का सारा खेल चल रहा है। ज़्यादातर पेड़ों पर गहरा लाल रंग बड़बोला सा आसमान से बातें करता दिखाई देता है। कहीं-कहीं भगवा रंग भी है, लेकिन इस भगवा की ख़ूबसूरती लाल वाले दरख्तों की भीड़ में दब रही है। हाँ, हरे पत्ते दोनों ही से पूरी तरह नदारद हैं। कहीं किसी पेड़ पर दो-चार पत्ते बचे भी हैं, तो वे वृक्ष को फूलते देख उनके रंग पीले पड़ गए हैं। नीम, पीपल और जामुन के पुराने दरख़्त नए मौसम में उपेक्षित से खड़े हैं। बेपरवाह हवाओं ने उनके पास से गुज़रते हुए जो शरारत की है, उससे शर्मिंदा होकर वे ज़मीन में गड़े जा रहे हैं। ज़मीन अपने मूल से कटकर गिरे पत्तों की जर्जर देह से पट गई है। हवा का झोंका इन सूखे पत्तों को ज़रा सा छेड़ देता है तो ये एक दूसरे से टकराने लगते हैं। इससे एक खड़खड़ाहट की आवाज़ पैदा होती है। धरती ठहाका मार कर अपने जिस्म पर रेंगते इन कृतघ्नों पर हँसती है और हवाएँ मौसम की नमी सोखती हुईं दूर निकल जाती हैं।
✍️ चिराग़ जैन