बाज़ारीकरण
किस क़दर हावी हुई हैं व्यस्तताएँ देखिए
कसमसा कर रह गईं संवेदनाएँ देखिए
स्वार्थ, बाज़ारीकरण और वासना की धुंध में
खो चुकी हैं प्रेम की संभावनाएँ देखिए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
किस क़दर हावी हुई हैं व्यस्तताएँ देखिए
कसमसा कर रह गईं संवेदनाएँ देखिए
स्वार्थ, बाज़ारीकरण और वासना की धुंध में
खो चुकी हैं प्रेम की संभावनाएँ देखिए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
मैं नहीं मिटाना चाहता
आधुनिकता के प्रभावों को
न ही चिंतित हूँ मैं
फैशन के बढ़ते चलन से।
मैं तो सिर्फ़
संजो लेना चाहता हूँ
अपना परिवार…
…मुझे तो चिंता है
‘माँ’ पर लिखी
कविताओं की!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
कजरी, गारी, फाग, जोगीरे भूल गए
बंसी, तबले, ढोल, मंझीरे भूल गए
इतनी तेज़ी से दुनिया की ओर बढ़े
अपने घर को धीरे-धीरे भूल गए
✍️ चिराग़ जैन