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ऋषि कपूर के निधन पर कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दू विरोधी कहकर उनको श्रद्धांजलि देनेवालों को लानत भेजी। अमित शाह जी के कोविड संक्रमित होने पर भी कुछ संवेदनहीन लोगों ने नंगा नाच किया। राहत इंदौरी जी के निधन पर भी इस प्रवृत्ति को मुखर होते देखा।
यह किस समाज की स्थापना कर रहे हैं हम लोग? मतभेद को घृणा के किस मुकाम तक ले आए हैं हम? देर तक विचार किया, तो समझ आया कि जिस देश में धर्म अथवा जाति के आधार पर बने किसी राजनैतिक दल को संविधान में वैध नहीं माना जाता, उस देश की पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर समाज में घृणा फैलाने में सफल हो गई है।
विश्वास कीजिये, राजनीति का सिर्फ़ एक ही धर्म होता है और वह है सत्ता। इस धर्म के निर्वाह के लिए आध्यात्मिक मूल्यों से लेकर विचारधारा तक सबकी बलि चढ़ाई जा सकती है। जो आपसे आपके हिन्दू होने या मुस्लिम होने की दुहाई देकर वोट मांग रहा है, जो आपको दलित या सवर्ण होने का वास्ता देकर वोट मांग रहा है, वह किसी भी स्थिति में देश को समग्र विकास के पथ पर नहीं ले जा सकेगा।
राजनीति ने हमें विधर्मियों की घृणा से इतना लबरेज कर दिया है कि हम अपने ही धर्म के संस्कार भूल गए। ‘चाहे मय्यत हो किसी की, बढ़ के कंधा दीजिये, रंजिशें अपनी जगह, इंसानियत अपनी जगह’ – यह बात तो हमारी मनुष्यता की पक्षधर जान पड़ती है, इस बात ने तो कभी कहीं कोई दंगा नहीं करवाया! फिर हम इसको कैसे भूल गए?
मेघनाद की मृत्यु के उपरांत उसके शव को ससम्मान उसके परिजनों तक पहुँचानेवाले राम; अपनी पत्नी के अपहृता रावण तक कि मृत्यु को अपमानित न करने वाले राम; शत्रु की मूर्च्छा का उपचार करनेवाले सुषेण; शाप देने वाले श्रवण कुमार के माता-पिता की अंत्येष्टि करनेवाले दशरथ ….क्या कुछ भी याद नहीं रहा हमें। अभी तो राम मंदिर के शिलान्यास की ईंट भी ढंग से नहीं जमी कि हमने राम के समस्त आचरण से मुँह फेर लिया।
अनजाने शव को भी ससम्मान पंचतत्व में विलीन करनेवाले इस देश की संवेदनाएँ इतनी भौंथरी कैसे हो गईं भाई!
हमें क्यों नहीं समझ आता कि अनजाने ही जिन दलों के एजेंट बनकर हम आपस का व्यवहार कलुषित कर रहे हैं, उनके लिए हमारा धार्मिक मनोबल केवल वोट जुटाने का एक ज़रिया भर है। जिन विचारधाराओं के पीछे हम अपने अड़ोस-पड़ोस के लोगों से घृणा कर रहे हैं चुनाव का बाद सत्ता का जोड़-तोड़ के लिए उन विचारधाराओं का बलात्कार करने से पहले, हमसे एक बार पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा जाता।
मैं यहाँ उस हर दल की बात कर रहा हूँ जो ख़ुद को दक्षिणपंथी, वामपंथी, सेक्यूलर या अन्य किसी भी तमगे से नवाज़ने का ढोल पीटते हैं। यदि इनके पास सिद्धांत, नैतिकता या विचार जैसा कोई शब्द होता तो मूर्ति को फिजूलखर्च कहनेवाले आज ब्राह्मणों का वोट पाने के लिए मूर्ति बनवाने की घोषणा न कर रहे होते। यदि ये विचार के ही प्रति समर्पित होते तो वामपंथी दल राजग में कभी न रहे होते। कश्मीर में वह सरकार कभी न बनी होती जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
लेकिन इस सबके लिए राजनीति ही दोषी नहीं है। हम भी तो परशुराम की मूर्ति देखते ही उन नेताओं की पिछली करतूतें भूल जाने में माहिर हैं। हम भी तो राहुल गांधी का जनेऊ देखकर उसके धर्म पर बुलेटिनों में बहस करने लगते हैं।
हमें क्या लेना-देना, तुम्हारे धर्म से। तुम जनेऊ पहनो या न पहनो। तुम टोपी लगाओ या न लगाओ। तुमने चाय बेची या शोरूम चलाया… इस सबसे हमें क्या मतलब! हमें तो यह बताओ कि देश कैसे चलाओगे? हमें तो यह बताओ कि न्याय व्यवस्था कैसे सुधरेगी? हमें तो यह आश्वस्ति चाहिए कि हमारे वोट का दुरुपयोग तो नहीं करोगे?
किसी भी दल में सारी अच्छाइयाँ नहीं हो सकतीं। इसीलिए सभी दलों की थोड़ी-थोड़ी अच्छाई के दम पर लोकतंत्र की गाड़ी चलती रहती है। लेकिन आजकल लगभग सभी दलों में एक बुराई ज़रूर घर कर रही है कि किसी धार्मिक मुद्दे को उछाल दो तो जनता आपस में लड़कर ख़ुश रहती है। इस बुराई के लिए केवल जनता ज़िम्मेदार है। और जनता ही इस कैंसर से देश की राजनीति को मुक्त कर सकती है।
अब हम मृत्यु पर भी गाली-गलौज करने लगे हैं। कम से कम अब तो दो मिनिट का मौन रखकर इस मरती हुई मानवता को श्रद्धांजलि देने का प्रयास करें।
✍️ चिराग़ जैन
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हमारे यहाँ युगों-युगों से सब कहते रहे हैं कि अपने मन की सुनो। यह वाक्य इतनी बार कहा गया है कि इसमें प्राण ही न रहे। यह वाक्य नीरस हो गया, निष्प्रभावी हो गया। शब्द-शब्द पड़े रह गए और अर्थ के प्राण पखेरू उड़ गए।
यह सामान्य बात है। यह अक्सर होता है। किसी बात को बार-बार बोलो तो वह निष्प्राण हो जाती है। हमने सुना है कि बार-बार बोलने से मंत्र सिद्ध हो जाते हैं… होते होंगे। मैं मंत्र के विषय में नहीं जानता। मैं तो शब्दों को जानता हूँ, मैं तो वाक्यों को पहचानता हूँ। क्योंकि उन्हीं से मेरा काम पड़ता है।
जिससे हमारा काम न पड़े, उसे पहचानने से क्या लाभ! उसे हम पहचान ही न पाएंगे। किसी को पहचानने के लिए उसको प्रयोग करना आवश्यक होता है। व्यक्ति से लेकर शब्द तक यह बात अक्षरशः सत्य है। जिस शक्ल को आप अपनी स्मृति में किसी अच्छी या बुरी याद के साथ प्रयोग न कर सको, उसे याद रखना बहुत कठिन काम है। बाज़ार में हज़ारों शक्लें हमारे सामने से निकलती हैं, लेकिन वे हमें याद नहीं रहतीं। लेकिन उनमें से कोई हमें गाली बक दे तो उसे हम भूल न पाएंगे। कोई थप्पड़ मार दे, तो उसे मरते दम तक याद रखेंगे। और कोई प्रपोज़ कर दे, फिर तो नींद को भूल जाएंगे, पर उसे न भुला सकेंगे।
सो, मैं शब्दों को जानता हूँ। शब्द मुझे हर समय घेरे रहते हैं। और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जिन बातों को बार-बार बोला जाए, वे निष्प्राण हो जाती हैं। आप इसका प्रयोग करके देख लीजिए। आप किसी से मिलकर उसका हालचाल पूछ लें- ‘और सुनाओ, कैसे हो?’ यह वाक्य इतनी बार बोला जा चुका है कि चुक गया है। हमने हाल ही में घर बदला। जहाँ घर लिया है वह स्थान हवाई अड्डे के पास है। हर दो मिनिट बाद एक जहाज गुज़रता है। पहले कुछ दिन तो बड़ा संकट हो गया। नींद ही न आए। लेकिन धीरे-धीरे वह शोर निष्प्राण हो गया। उसने प्रभावित करना बंद कर दिया। अब जैगुआर भी उड़ता है तो हमें संज्ञान ही नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, ‘और सुनाओ, कैसे हो’ भी बोला जाता है… सामने वाला भी यंत्र की तरह ‘बढ़िया हूँ’ बोल देता है। लेकिन इन दोनों ही बातों का कोई प्रभाव नहीं होता।
हम ऐसा अपराध अनेक ज़रूरी वाक्यों के साथ कर चुके हैं। ‘आई लव यू’; ‘आई एम सॉरी’ और ‘हैलो’ से लेकर गालियों तक यही दुर्घटना घटी है। मनुष्य जाति का इतिहास गालियों के इतिहास के बराबर का ही होगा। कभी-कभी तो लगता है कि गालियाँ, मानव जाति से नौ-दस महीने बड़ी ही होंगी। शायद गालियों के अतिरिक्त किसी अन्य तत्व को मनुष्य ने अपने साथ इतनी लंबी यात्रा करने ही न दी होगी। गालियाँ सम्भवतः प्रारम्भ में ही बहुतायत प्रयोग से निष्प्राण हो गई हों। सो, उनको साथ रखने में हमें कोई आपत्ति न हुई। जिसका प्रभाव नहीं, उससे आपत्ति कैसी? आपत्तिजनक होने के लिए प्रभावशाली होना पहली शर्त है।
इसीलिए भीड़ से कभी किसी को कोई आपत्ति न हुई। नेतृत्व ज़रूर आपत्ति को जन्म दे सकता है। यदि आपसे किसी को कोई आपत्ति न हो, तो यह कोई प्रसन्नता का विषय नहीं है। यह ख़तरनाक़ बात है। यह जड़ता का सूचक है। यदि किसी को आपसे कष्ट है, किसी को आपसे ईर्ष्या है, किसी को आपसे आपत्ति है तो उसके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करना। वह अवश्य आपसे प्रभावित हुआ है। उसने आपके जीवन को अर्थ प्रदान किये हैं। अन्यथा आपका जीवन किसी गाली से अधिक अस्तित्व न रख पाता।
आपने लोगों के घर पर पुरखों की तस्वीरें देखी होंगीं। आपको आश्चर्य होगा, जब तक वे सब पुरखे जीते थे, तब तक जी का जंजाल बने हुए थे। उनके कारण पूरे घर का जीना हराम था। इसलिए उन्हें अपने घर में रखने को कोई भाई तैयार न हुआ होगा। लेकिन मरने के बाद उनसे कोई कष्ट नहीं हो सकता। अब वे कोई प्रभाव नहीं डाल सकते। इसलिए हर भाई ने अपने घर में उनकी तस्वीरें जड़वा ली हैं। तस्वीरों से किसी को कोई आपत्ति हो ही कैसे सकती है?
हमने निष्प्रभावी वस्तुओं को, निष्प्रभावी वाक्यों को ढोने में दक्षता प्राप्त की है। क्योंकि उनसे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा ही एक वाक्य है ‘अपने मन की सुनो।’ इस वाक्य में भी प्राण नहीं हैं। इसलिए कोई मन की नहीं सुनता।
और यह बहुत अच्छी बात है कि कोई मन की नहीं सुनता। यदि ग़लती से किसी दिन आपने अपने मन की सुन ली, तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। फिर हर किसी को देखकर मुस्कुराना सम्भव न होगा। मन बोलने लगा तो आपका सामाजिक जीवन नरक हो जाएगा। फिर आप सभ्य न रह सकेंगे। मन का कैनवास तो बहुत वैविध्यपूर्ण है। एक क्षण में, आपको किसी पर प्रेम आने लगेगा। और प्रेम भी ऐसा-वैसा नहीं। पूरा प्रेम। ऐसा कि सोचकर स्वयं आपका ही चेहरा लाल हो जाएगा। और अगले ही क्षण आप उसे पीटने लगोगे। आपने स्वयं न सुनी हों, ऐसी ऐसी गालियाँ बकने लगोगे। इसलिए मन की सुनने में बड़े संकट हैं। मन कभी भी पिटवा सकता है। मन का विधान, किसी भी युग के संविधान को सूट नहीं कर सकता।
इसीलिए जिसने यह भूल कर दी, जिसने अपने मन की सुन ली उसे हमने असभ्य मान लिया, उसे हमने असामाजिक घोषित कर दिया। पापी, अभद्र, चरित्रहीन, उच्छृंखल, अनैतिक, दुराचारी जैसे शब्द मन की सुनने वालों के ही अलंकार रहे हैं। मीरा ने मन की सुनी, उसे ज़हर दे दिया। सुकरात ने मन की सुनी, उसे भी ज़हर दे दिया। हीर-रांझा, सोहनी-मिर्ज़ा, लैला-मजनू ये सब मन की सुननेवाले लोग रहे। हमने इनके साथ क्या किया!
मन की सुनना ख़तरे से ख़ाली नहीं। यदि मन खोलकर रखना हो तो तैयार रहना, कि इसके बाद तत्कालीन नियम तुम्हारे दुश्मन हो जाएंगे। धर्म, समाज, नीति, विधान सब हाथ धोकर पीछे पड़ जाएंगे। फिर बाद में सबको क़िस्से सुनाए जाएंगे।
ये लैला-मजनू के क़िस्से प्यार के क़िस्से नहीं हैं। ये तो दहशत की कहानियाँ हैं; कि देखो, वो आए थे मन की सुनने, हमने उनका कैसा सत्यानाश किया है। पीढ़ियों को ये कहानियाँ इसलिए सुनाई जाती हैं, ताकि वे इन कहानियों से यह शिक्षा ले सकें कि कोई कितनी ही बार कहे, पर भूलकर भी मन की मत सुन लेना।
✍️ चिराग़ जैन
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नुक्कड़ का पनवाड़ी, चाय की मढ़ैया, बीड़ी-सिगरेट का खोखा, सिटी बस, लोकल ट्रेन और सार्वजनिक शौचालय की लाइन -ये सब चर्चाओं के स्वर्ग हैं। जैसे संसद में पक्ष और विपक्ष होते हैं, ऐसे ही इन चर्चाओं में भी पक्ष और विपक्ष होते हैं। विपक्ष के बिना चर्चा हो ही नहीं सकती। विपक्ष के अभाव में तो केवल गुणगान किया जा सकता है।
कुछ साल पहले तक, ‘केवल चर्चा को जारी रखने के लिए’ हर नुक्कड़ के पान की दुकान पर कुछ लोग ख़ुद को भाजपाई समझ लेते थे, और कुछ ख़ुद को कांग्रेसी। कभी पनवाड़ी फोन पर बतियाने लगता था तो भीड़ बढ़ने पर एकाध सपाई और बसपाई भी मिल जाता था। अगर पनवाड़ी का फोन कॉल लंबा चल जाए तो मनसे, झामुमो, जद, बीजद वगैरा की भी हाज़िरी लग जाती थी। फोन कॉल समाप्त होते ही पनवाड़ी तेज़ी से काम करके सब क्षत्रपों को निबटा देता था और राष्ट्रीय दलों के प्रतिनिधि चर्चा करते रहते थे। जो चर्चा से ऊब जाता था, वो अपने काम पर चला जाता; और जो काम से ऊब जाता था, वो चर्चा करने चला आता था। इन चर्चाओं में पनवाड़ी स्पीकर की भूमिका निभाता था और चर्चा को जीवित रखते हुए दोनों पक्षों को उकसाता रहता था। इस तरह वह चर्चा और पान पर एक साथ चूना लगाता रहता था।
चूँकि इन चर्चाओं से देश की राजनीति पर कोई असर नहीं पड़ता था इसलिए दोनों ही पक्ष चर्चा करते हुए उतने ही गंभीर होते थे, जितने तत्कालीन नेतागण देश को लेकर होते होंगे। इसका यह लाभ था कि चर्चा और संबंध दोनों सुरक्षित रहते थे।
इन चर्चाओं में से अधिकतम का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता था और हर चर्चालु स्वयं ही अपने आप को विजेता समझकर मन लगाकर काम करने लग जाता था।
पिछले कुछ वर्षों से इस संस्कृति को लकवा मार गया। चर्चालुओं का स्थान श्रद्धालुओं ने ले लिया। ये श्रद्धालु चर्चा को लेकर इतने गंभीर होते हैं कि चर्चास्थल से काम पर जाने की बजाय युद्धक्षेत्र की ओर उन्मुख हो जाते हैं। चर्चास्थल से कूच करते समय दोनों ही पक्ष के श्रद्धालु सामनेवाले को शिशुपाल और स्वयं को कृष्ण समझते हुए ‘नितीश भारद्वाज’ मार्का मुस्कान लिए मन ही मन गांधारी की तरह समूल नाश का शाप दे रहे होते हैं।
इन चर्चाओं कुछ बातें ‘मान ली जाती हैं’, जैसे –
1) जो भी व्यक्ति सवाल पूछ रहा है, वह मोदी जी से ही सवाल पूछ रहा है।
2) जो भी व्यक्ति सिस्टम के किसी अंग से ख़फ़ा है, वह इनडायरेक्टली मोदी जी का विरोध कर रहा है।
3) जो मोदी जी का समर्थक नहीं है, वह राहुल गांधी का समर्थक है, इसलिए इसे समझाना बेकार है।
4) जो मोदी जी का समर्थक है, वह समर्थक नहीं, भक्त है। इसलिए इसे समझाना भी बेकार है।
5) जो मोदी जी का समर्थक नहीं है वह चोर है।
6) जो मोदी जी का विरोधी नहीं है, वह मूर्ख है।
7) जो एनडीटीवी नहीं देखता, वह ज़ीन्यूज़ देखता है।
8) जो ज़ीन्यूज़ देखता है, उसे कुछ ग़लत नहीं दिखता।
9) जो मेरे व्हाट्सएप पर आया है, वह किसी और के व्हाट्सएप पर नहीं आया, इसलिये हर अज्ञानी तक ज्ञान की रौशनी पहुँचाना मेरा कर्त्तव्य है।
10) सामनेवाले चर्चालु की आँखों पर एक चश्मा चढ़ा हुआ है, जिसे उतरवाए बिना मेरा मनुष्य जन्म सफल न हो सकेगा।
इन दस बिंदुओं को सामने रखकर चर्चा की गंगा बह निकलती है, और इन्हीं दस बिंदुओं पर हल्की-फुल्की बून्दा-बांदी, मूसलाधार बन जाती है। हर श्रद्धालु सामनेवाले श्रद्धालु को क्रमशः मूर्ख, भ्रष्ट, चोर, ग़द्दार, राष्ट्रद्रोही और पापी समझते हुए, ‘इसे तो वक़्त ही समझाएगा’ का कुंठित शाप देने लगते हैं।
जो श्रद्धालु अपने पंथ के मंदिर के जिस देवता को पूजता है, उसी के अनुरूप चर्चाभक्ति में उसकी भाषा का स्तर गिरता है। हर श्रद्धालु के पास चर्चायज्ञ में बोलने को कुछ रटे-रटाए मंत्र हैं, जिन्हें वह कठोर परिश्रम करके व्हाट्सएप फ़ॉरवर्ड पद्धति से प्राप्त करता है। चर्चा का विषय कुछ भी हो, श्रद्धालु अपने-अपने मंत्र पढ़ते रहते हैं।
चूँकि दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के इन रटे-रटाए जुमलों से परिचित होते हैं इसलिए धार्मिक प्रार्थनाओं की तरह ये चर्चाएँ शोर पूरा करती हैं और असर शून्य।
भाजपा-कांग्रेस; राहुल-मोदी और भक्त-चमचा के आधार पर बँट रही जनता में फैलते विद्वेष को देखकर राजनीति अपने पूर्ववर्ती नेताओं का धन्यवाद ज्ञापन करती है कि जिस जनता को उन्होंने प्रजा बनकर रहना सिखाया था, वह अब श्रद्धालु बनकर एक-दूसरे से घृणा करके कितनी ख़ुश है!
✍️ चिराग़ जैन
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सामाजिक जीवन जीनेवाले लोग भी अंततः मनुष्य होते हैं। राजनीति, फ़िल्म जगत्, क्रिकेट, साहित्य, अध्यात्म या अन्य किसी भी क्षेत्र में सक्रिय व्यक्ति के दो पक्ष होते हैं, एक उसका निजी जीवन, दूसरा उसका सामाजिक जीवन।
हममें इतनी नैतिकता अवश्य होनी चाहिए कि उसके निजी जीवन को उसके सामाजिक जीवन से गड्ड-मड्ड न करें। ऐसा करके हम न केवल उस व्यक्ति को आहत करते हैं, अपितु अपनी सोच का टुच्चापन भी सार्वजनिक कर देते हैं।
राजनीति में यह सर्वाधिक होता है। फलाने जी के फलानी जी के साथ सम्बन्ध हैं, यह कहना सबसे आसान है। किसी की चरित्र हत्या करने से ज़्यादा आसान कुछ नहीं है। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि राजनेताओं से तुम्हें देश चलवाना है, या बेटी ब्याहनी है? हाँ, यदि किसी का निजी जीवन उसके सामाजिक आचरण को प्रभावित करने लगे तब शालीनता से इस विषय पर टोकना अवश्य चाहिए।
अमिताभ बच्चन के कोरोना संक्रमित होने की ख़बर पर रेखा जी के साथ उनका नाम जोड़कर जिस तरह सोशल मीडिया पर बातें बनाना, घृणास्पद हैं। विश्वास कीजिये, सामाजिक जीवन जीनेवाला हर व्यक्ति, अपनी निजी जिंदगी में आपसे ज़्यादा समस्याएँ और चुनौतियाँ झेलता है। लेकिन वह इन समस्याओं पर न तो कभी आपसे सहयोग मांगने आता है, न ही उनका असर अपने कार्यक्षेत्र में दिखने देता है। लेकिन वह यह भी अपेक्षा रखता है कि उसकी निजी संवेदनाओं को सार्वजनिक उपहास का विषय न बनाया जाए।
आप मज़ाक़ कीजिये ना, राजनेताओं के राजनैतिक जीवन पर मज़ाक़ कीजिये। आध्यात्मिक लोगों के प्रवचनों और तहरीरों में हुई चूक पर परिहास कीजिये; क्रिकेटर्स के खेल पर सवाल उठाइये, पिच पर उसके व्यवहार का मज़ा लीजिए, साहित्यकारों के लेखन, भाषण और भाषा की ख़ूब खिंचाई कीजिये, फिल्मी सितारों की भूमिकाओं, संवादों, अभिनय आदि पर जितना चाहे लिखिए लेकिन उनकी निजता में प्रवेश करते समय इतना सतर्क अवश्य रहें कि आपके नेतृत्व, आपके मनोरंजन, आपके आधात्मिक विकास और आपके बौद्धिक विकास के लिए ये लोग अपनी निजी ज़िन्दगी को अनदेखा कर देते हैं।
मैं हास्य का पक्षधर हूँ किन्तु किसी का दिल दुखाकर हँसते हुए ओंठ एक संवेदनहीन हृदय का प्रमाण होते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
छिछले बोल लुभाते हैं
नारे हिट हो जाते हैं
दोहरे अर्थ समेटे हेडिंग
मिलियन व्यू पा जाते हैं
फिर कहते हो मंचों से क्यों कविता अंतर्धान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई
सीधी-सादी कविता वाली पोस्ट कहीं खो जाती है
नोकझोंक की क्लिप दिखते ही शेयर कर ली जाती है
गीत सिसकते रहते हैं
छंद बिलखते रहते हैं
कविता-साधक फॉलोवर का
रस्ता तकते रहते हैं
जो शालीन रहा हो उसकी वॉल बहुत वीरान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई
सेंसेशन, वल्गर, फूहड़ता, इन पर सबका ध्यान हुआ
भद्दी बातें करती छोरी का जी भर गुणगान हुआ
अंधी हिंसक सोच चली
गाली और गलौज चली
नेगेटिव का बल देखो
वायरलियों की फौज चली
सभ्य सुसंस्कृत पोस्ट करी तो कचरे का सामान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई
ट्रोलिंग करते फिरते हैं सब अपने-अपने वाद लिए
मानवता एकाकी फिरती, अंतस में अवसाद लिए
जितना शिष्ट प्रलाप हुआ
उतना पश्चाताप हुआ
ओछापन तो ट्रेंड बना
गहरा लिखना पाप हुआ
चोरी करने की आदत भी ईश्वर का वरदान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई
✍️ चिराग़ जैन