Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
‘डाकखाना’ – यह केवल एक शब्द नहीं, एक पूरी संस्कृति है। संचार की सबसे प्रारंभिक अवस्था से मनुष्य का साथ देनेवाली चिट्ठी; संस्कृति में इतनी रची-बसी रही कि उस पर गीत लिखे गये। चिट्ठी, खत, पाती, नामा, लिफ़ाफ़ा, मजमून, नामाबर, डाकिया, तार, पोस्टकार्ड, डाकबाबू, लैटर बॉक्स, डाकटिकट और न जाने कितने ही शब्दों से सुसज्जित यह डाक-व्यवस्था शायरी और कविताओं के साथ साथ कहानी और उपन्यासों का भी महत्वपूर्ण अंग रही है।
‘पीली चिट्ठी’ मांगलिक अवसर का प्रतीक होती थी और कोना फटा हुआ पोस्टकार्ड अशुभ की सूचना लेकर आता था। चिट्ठी में लिखा गया एक-एक शब्द महत्वपूर्ण होता था। व्यक्तिगत चिट्ठियों में हाशिये पर की गई चित्रकारी देखकर पानेवाले को लिखनेवाले की मनोदशा का दर्शन हो जाता था।
चिट्ठी के प्रारम्भ में ‘आपका पत्र मिला’; ‘अत्रं कुशलं तत्रप्यस्तु’; ‘हम सब यहाँ कुशलतापूर्वक हैं, आशा है आप सब भी कुशल होंगे’ जैसे वाक्यांश औपचारिक होने के बावजूद रसपूर्ण लगते थे। इसी प्रकार ‘बड़ों को चरण स्पर्श और छोटों को ढेर सारा प्यार’ जैसा वाक्य चिट्ठी से पूरे परिवार को जोड़ देता था।
लैटर बॉक्स के नीचे सुरंग की कल्पना और रात में चिट्ठी पहुँचानेवाली परियों की कल्पना करनेवाला बचपन भी डाक-संस्कृति के साथ ही कहीं गुम हो गया। डाकिये की प्रतीक्षा करने वाली दोपहरी भी अब समय के चक्र से विदा हो गई हैं।
साथ ही नदारद हो गये हैं वे गीत, जो डाक संस्कृति के इर्द-गिर्द रचे जाते थे। ‘मास्टर जी की आई चिट्ठी’; ‘हमने सनम को ख़त लिखा’; ‘जाते हो परदेस पिया, जाते ही ख़त लिखना’; ‘कबूतर जा-जा’; ‘चिट्ठी आई है’; ‘चिट्ठी न कोई संदेश’; ‘ख़त लिख दे साँवरिया के नाम बाबू’; ‘फूल तुम्हें भेजा है ख़त में’; ‘डाकिया डाक लाया’; ‘डाक बाबू आया’; ‘संदेसे आते हैं’; ‘लिखे जो ख़त तुझे’; ‘फूलों के रंग से दिल की क़लम से तुझको लिखी रोज़ पाती’; ‘सुन ले बाबू ये पैग़ाम, मेरी चिट्ठी तेरे नाम’; ‘तेरे खुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे’ और ‘मैंने ख़त महबूब के नाम लिखा’ जैसे दर्जनों गीत हिंदी सिनेमा की तवारीख़ में हीरों की तरह जड़े हुए हैं।
कवि-सम्मेलनों में भी चिट्ठी का ख़ूब चलन रहा। मुझे अच्छी तरह याद है। हापुड़ के एक कवि-सम्मेलन में श्वेतकेशा ज्ञानवती सक्सेना जी ने एक गीत पढ़ा- ‘ऐसे में क्या चिट्ठी लिखूँ, जब कोना फटने के दिन हैं!’ गीत उनकी वय पर इतना एकरूप प्रतीत हुआ कि उसकी संवेदना ने भीतर तक सिहरन उत्पन्न कर दी थी। किशन सरोज जी का गीत ‘कर दिये लो आज गंगा में प्रवाहित सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र तुम निश्चिंत रहना’ श्रोताओं के मन और नयन दोनों को तर कर देता था। माया गोविंद जी का ‘डाकिये ने द्वार खटखटाया, अनबाँचा पत्र लौट आया’ गीत लोकप्रियता के कीर्तिमान खड़े कर गया। आज भी डॉ विष्णु सक्सेना जब अपने मुक्तक की चौथी पंक्ति पढ़ते हुए कहते हैं कि, ‘उसने गुस्से में मेरा ख़त चबा लिया होगा’ तो चिट्ठियों के सहारे जवान हुई हज़ारों प्रेम कहानियाँ जीवंत हो उठती हैं।
उर्दू शायरी भी इस विषय से भरी पड़ी है। ‘नामाबर तू ही बता तूने तो देखे होंगे/कैसे होते हैं वो ख़त, जिनका जवाब आता है’ सरीख़े सैंकड़ों अशआर लोगों की ज़ुबान पर चढ़े।
दाग़ देहलवी साहब का मशहूर शेर ‘तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किसका था/मैं था रक़ीब तो आखि़र वो नाम किसका था’; किसी उपन्यास का कथानक बन जाने की क्षमता रखता है। ‘लिफ़ाफ़ा देख के मजमून भाँप लेते हैं’ जैसे मिसरे मुहावरे बनकर मक़बूल हो गये। हाल ही में वाशु पाण्डेय ने भी चिट्ठियों में बन्द मुहब्बत की इबारत को बयान करते हुए कहा कि, ‘क़ासिद चिट्ठी तैश में आकर लिखी थी/ ले जाओ, पर देना मत शहज़ादी को’।
तकनीक बदली तो यह सब कुछ फ़ना हो गया। मोबाइल पर एसएमएस या कंप्यूटर पर ईमेल भेजनेवाली पीढ़ी को चिट्ठियों की उस जादुई दुनिया का अनुमान तक नहीं है। उदयप्रताप सिंह जी का ये शेर पढ़ते हुए आज भी मन तीन दशक पुरानी यादों में खो जाता है, ‘मोबाइलों के दौर के आशिक़ को क्या पता, रखते थे कैसे ख़त में कलेजा निकालकर’।
ब्याहता बिटिया की चिट्ठी मिलने पर माँ का खिला हुए चेहरा; होस्टल में रह रहे बेटे को चिट्ठी लिखती माँ की भीगी हुई पलकें; चिट्ठी में लिखे गये शब्दों के साथ अनलिखा दर्द पढ़ लेने का हुनर; हाशिये पर बनी चित्रकारी से मनोदशा पहचान लेने की कला और राखी के त्यौहार पर बहन की चिट्ठी खोलते भाइयों का कौतूहल अब देखने को नहीं मिलता।
‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ जैसी किताबें चिट्ठियों की अहमियत का चित्र प्रस्तुत करती हैं। लेकिन आज ‘ख़ून से लिख रहा हूँ स्याही न समझना’ सरीख़े मिसरे दूर खड़े होकर धूल खा रहे लैटर बॉक्स देखकर बिलख पड़ते होंगे। निदा साहब की दो पंक्तियाँ रह-रहकर उस क़िरदार की याद दिलाती हैं जिसे हम डाकिया कहते थे – ‘सीधा-सादा डाकिया जादू करे महान/एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान’।
टीवी और रेडियो पर चिट्ठियाँ भेजने का रिवाज़ अब इतिहास बन चुका है। संपादक के नाम पत्र और प्रकाशनार्थ रचना भेजने की क़वायद हम भूल चुके हैं। न ही संपादकों को अब ‘खेद सहित’ रचना लौटाने का स्वाद पता है।
आज विश्व डाक दिवस पर रमेश शर्मा जी के गीत का मुखड़ा एक पूरी परम्परा को श्रद्धांजलि देता हुआ जान पड़ता है – ‘ओ दूरभाष की सुविधाओं, मुझे वो चिट्ठी लौटा दो!’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
तेरा पब्जी करके बैन,
तोय ऐसो मज़ा चखाय देंगे
तेरा छिन जाएगा चैन,
तोय नानी याद दिलाय देंगे
जिन वीरों का सबरा जीवन टीकटोक ने खाया
एप्लिकेशन बैन करा के हिल्ला याद दिलाया
मेहनत करके दिन-रैन,
तेरा धंधा तले लगाय देंगे
तेरा छिन जाएगा चैन
तोय नानी याद दिलाय देंगे
अपना माल वहीं पर रख ले, हम ख़ुद बनवा लेंगे
तेरे घर कम पड़ता हो तो, तुझको भिजवा देंगे
तेरे छोटे-छोटे नैन
प्रोडक्शन से फटवाय देंगे
तेरा छिन जाएगा चैन,
तोय नानी याद दिलाय देंगे
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
शास्त्र कहते हैं कि हमें घटनाओं को दृष्टाभाव से देखना चाहिए। उनसे प्रभावित नहीं होना चाहिए। किंतु हम भारतीय, इतने संवेदनशील हैं कि हर घटना से विह्वल हो उठते हैं। यह स्वभाव संत-महंतों की वाणी की अवमानना है।
जब कई युगों में कई अवतार और महापुरुष मनुष्य को स्थितप्रज्ञ न बना सके तब ईश्वर ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सृजन किया। मीडिया ने हमारा मन पक्का करने के लिए हमें एक ही घटना से इतनी बार साक्षात्कार करवाया कि हमारा हृदय वज्र हो गया।
अमरीका में ट्विन टॉवर्स के गिरने की घटना कमज़ोर दिलवालों का दिल दहला न दे इसलिए विश्व भर के न्यूज़ चैनल्स ने उसे अलग-अलग एंगल से इतनी बार दिखाया कि सुख-दुःख के संसारी भाव में फँसे प्राणियों ने गिरनेवाली इमारतों की एक-एक मंज़िल इत्मीनान से गिन लीं।
इस प्रयोग के सफल रहने के बाद हमने संसद पर आतंकवादी हमले से लेकर मुंबई के ताज हमले तक सब कुछ साक्षी भाव से देखा। अपने अनुयायियों को इन ख़बरों से रोमांचित होते देख मीडिया ने हमें रोमांचित करने का नियमित कार्यक्रम तैयार कर लिया।
सूचना प्रेषण के टुच्चे लक्ष्य से प्रारम्भ हुई पत्रकारिता सनसनी, रोमांच और मनोरंजन जैसे विराट लक्ष्यों को साधने में सफल हुई। मीडिया ने प्रवचन नहीं किये, किन्तु अपने आचरण से हमें बताया कि कोई भी समस्या तभी तक बड़ी होती है जब तक अगली समस्या न आ जाए।
संत प्रवचन करते रह गए कि तूफ़ानों के सामने डटकर खड़े होना चाहिए। मीडिया ने यह काम करके दिखा दिया। जब भी कोई तूफ़ान भारत में प्रवेश करने लगा तो हमारे पत्रकार मुम्बई की चौपाटी पर कैमरा फिक्स करके डटकर खड़े हो गए। इस कठिन तपस्या से प्रसन्न हो बड़े से बड़े तूफ़ान ने अपना रास्ता बदल लिया।
इसे कहते हैं साधना। घटना घटे और ख़बर सुना दी जाए, यह तो कोई भी कर सकता है। इसमें काहे का बड़प्पन। घटना से ख़बर तो बनती ही आई है, लेकिन हमारे मीडिया ने ख़बर से घटना बनाकर यह प्रमाणित किया कि आदमी चाहे तो तक़दीर ही नहीं तरतीब भी बदल सकता है।
जिसके घर में कोई मौत हो गई हो, उस मातम में भी मृतक की पत्नी का बढ़िया से फ्रेम बनाकर उसको रोते हुए बाइट देने के लिए तैयार करने की क्षमता के लिए बेग़ैरती की जो तपस्या हमारे पत्रकारों को करनी पड़ती है, उसका अनुमान आम जनता को कभी नहीं हुआ।
मीडिया ने प्रण लिया है कि वह आपकी टीवी स्क्रीन को ख़ाली नहीं रहने देगा। इसलिए कोसी की बाढ़, कोयले के भंडार की समाप्ति, दुनिया नष्ट होने की भविष्यवाणी, कानपुर के पास सोना मिलने का सपना, सलमान का मुक़द्दमा, विकास का एनकाउंटर, राफेल की भारत यात्रा, पीएम का मोर प्रेम, कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक, सिंधिया का दलबदल, अमिताभ बच्चन की नानावटी यात्रा, पायलट का गुड़गांव भ्रमण और ऐसे ही तमाम मुद्दों को कई-कई दिन तक खींचने के बाद यकायक ग़ायब करके यह संदेश देता है कि यह संसार क्षणभंगुर है। इसको निर्लिप्त भाव से देखने वाला प्राणी ही सच्चे सुख को प्राप्त करता है।
सुशांत सिंह राजपूत मुआमले की जाँच को लेकर भी मीडिया ने यही समझाने का प्रयास किया कि जो तुम्हें दिख रहा है वह समस्या नहीं केवल भ्रम है। कल कोई नया झुनझुना मिलेगा तो यह मरीचिका यकायक ओझल हो जाएगी। किन्तु इसके ओझल होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि मीडिया जनता को रोमांचित करना बंद कर देगा। ‘द शो मस्ट गो ऑन’। इसके लिए किसी की चरित्र हत्या होती हो, तो हो जाए, इसके लिए किसी परिवार की संवेदनाएं खरोंची जाती हों तो खुरचने दो …बट द शो मस्त गो ऑन।
लॉकडाउन जैसे ख़बरहीन समय में भी मीडिया ने अपने धर्म से मुख नहीं मोड़ा। सुशांत सिंह राजपूत की मौत से हर रोज़ टीआरपी निचोड़ते रहे। फिर उसकी जाँच की प्रक्रिया की कड़ाही चढ़ गई। जिस अभिनेता की असमय मृत्यु से देश स्तब्ध हो गया था, अब उससे जुड़ी ख़बरों से ऊब होने लगी है। शोकमुक्ति का यह तरीक़ा कितना सफल रहा है।
हमें मीडिया के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए कि हमारे समाज को संवेदनहीन बनाकर निष्ठुर कर देने के लिए उसने कितनी गालियाँ खाई हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
ऋषि कपूर के निधन पर कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दू विरोधी कहकर उनको श्रद्धांजलि देनेवालों को लानत भेजी। अमित शाह जी के कोविड संक्रमित होने पर भी कुछ संवेदनहीन लोगों ने नंगा नाच किया। राहत इंदौरी जी के निधन पर भी इस प्रवृत्ति को मुखर होते देखा।
यह किस समाज की स्थापना कर रहे हैं हम लोग? मतभेद को घृणा के किस मुकाम तक ले आए हैं हम? देर तक विचार किया, तो समझ आया कि जिस देश में धर्म अथवा जाति के आधार पर बने किसी राजनैतिक दल को संविधान में वैध नहीं माना जाता, उस देश की पूरी राजनीति धर्म और जाति के आधार पर समाज में घृणा फैलाने में सफल हो गई है।
विश्वास कीजिये, राजनीति का सिर्फ़ एक ही धर्म होता है और वह है सत्ता। इस धर्म के निर्वाह के लिए आध्यात्मिक मूल्यों से लेकर विचारधारा तक सबकी बलि चढ़ाई जा सकती है। जो आपसे आपके हिन्दू होने या मुस्लिम होने की दुहाई देकर वोट मांग रहा है, जो आपको दलित या सवर्ण होने का वास्ता देकर वोट मांग रहा है, वह किसी भी स्थिति में देश को समग्र विकास के पथ पर नहीं ले जा सकेगा।
राजनीति ने हमें विधर्मियों की घृणा से इतना लबरेज कर दिया है कि हम अपने ही धर्म के संस्कार भूल गए। ‘चाहे मय्यत हो किसी की, बढ़ के कंधा दीजिये, रंजिशें अपनी जगह, इंसानियत अपनी जगह’ – यह बात तो हमारी मनुष्यता की पक्षधर जान पड़ती है, इस बात ने तो कभी कहीं कोई दंगा नहीं करवाया! फिर हम इसको कैसे भूल गए?
मेघनाद की मृत्यु के उपरांत उसके शव को ससम्मान उसके परिजनों तक पहुँचानेवाले राम; अपनी पत्नी के अपहृता रावण तक कि मृत्यु को अपमानित न करने वाले राम; शत्रु की मूर्च्छा का उपचार करनेवाले सुषेण; शाप देने वाले श्रवण कुमार के माता-पिता की अंत्येष्टि करनेवाले दशरथ ….क्या कुछ भी याद नहीं रहा हमें। अभी तो राम मंदिर के शिलान्यास की ईंट भी ढंग से नहीं जमी कि हमने राम के समस्त आचरण से मुँह फेर लिया।
अनजाने शव को भी ससम्मान पंचतत्व में विलीन करनेवाले इस देश की संवेदनाएँ इतनी भौंथरी कैसे हो गईं भाई!
हमें क्यों नहीं समझ आता कि अनजाने ही जिन दलों के एजेंट बनकर हम आपस का व्यवहार कलुषित कर रहे हैं, उनके लिए हमारा धार्मिक मनोबल केवल वोट जुटाने का एक ज़रिया भर है। जिन विचारधाराओं के पीछे हम अपने अड़ोस-पड़ोस के लोगों से घृणा कर रहे हैं चुनाव का बाद सत्ता का जोड़-तोड़ के लिए उन विचारधाराओं का बलात्कार करने से पहले, हमसे एक बार पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा जाता।
मैं यहाँ उस हर दल की बात कर रहा हूँ जो ख़ुद को दक्षिणपंथी, वामपंथी, सेक्यूलर या अन्य किसी भी तमगे से नवाज़ने का ढोल पीटते हैं। यदि इनके पास सिद्धांत, नैतिकता या विचार जैसा कोई शब्द होता तो मूर्ति को फिजूलखर्च कहनेवाले आज ब्राह्मणों का वोट पाने के लिए मूर्ति बनवाने की घोषणा न कर रहे होते। यदि ये विचार के ही प्रति समर्पित होते तो वामपंथी दल राजग में कभी न रहे होते। कश्मीर में वह सरकार कभी न बनी होती जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।
लेकिन इस सबके लिए राजनीति ही दोषी नहीं है। हम भी तो परशुराम की मूर्ति देखते ही उन नेताओं की पिछली करतूतें भूल जाने में माहिर हैं। हम भी तो राहुल गांधी का जनेऊ देखकर उसके धर्म पर बुलेटिनों में बहस करने लगते हैं।
हमें क्या लेना-देना, तुम्हारे धर्म से। तुम जनेऊ पहनो या न पहनो। तुम टोपी लगाओ या न लगाओ। तुमने चाय बेची या शोरूम चलाया… इस सबसे हमें क्या मतलब! हमें तो यह बताओ कि देश कैसे चलाओगे? हमें तो यह बताओ कि न्याय व्यवस्था कैसे सुधरेगी? हमें तो यह आश्वस्ति चाहिए कि हमारे वोट का दुरुपयोग तो नहीं करोगे?
किसी भी दल में सारी अच्छाइयाँ नहीं हो सकतीं। इसीलिए सभी दलों की थोड़ी-थोड़ी अच्छाई के दम पर लोकतंत्र की गाड़ी चलती रहती है। लेकिन आजकल लगभग सभी दलों में एक बुराई ज़रूर घर कर रही है कि किसी धार्मिक मुद्दे को उछाल दो तो जनता आपस में लड़कर ख़ुश रहती है। इस बुराई के लिए केवल जनता ज़िम्मेदार है। और जनता ही इस कैंसर से देश की राजनीति को मुक्त कर सकती है।
अब हम मृत्यु पर भी गाली-गलौज करने लगे हैं। कम से कम अब तो दो मिनिट का मौन रखकर इस मरती हुई मानवता को श्रद्धांजलि देने का प्रयास करें।
✍️ चिराग़ जैन
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हमारे यहाँ युगों-युगों से सब कहते रहे हैं कि अपने मन की सुनो। यह वाक्य इतनी बार कहा गया है कि इसमें प्राण ही न रहे। यह वाक्य नीरस हो गया, निष्प्रभावी हो गया। शब्द-शब्द पड़े रह गए और अर्थ के प्राण पखेरू उड़ गए।
यह सामान्य बात है। यह अक्सर होता है। किसी बात को बार-बार बोलो तो वह निष्प्राण हो जाती है। हमने सुना है कि बार-बार बोलने से मंत्र सिद्ध हो जाते हैं… होते होंगे। मैं मंत्र के विषय में नहीं जानता। मैं तो शब्दों को जानता हूँ, मैं तो वाक्यों को पहचानता हूँ। क्योंकि उन्हीं से मेरा काम पड़ता है।
जिससे हमारा काम न पड़े, उसे पहचानने से क्या लाभ! उसे हम पहचान ही न पाएंगे। किसी को पहचानने के लिए उसको प्रयोग करना आवश्यक होता है। व्यक्ति से लेकर शब्द तक यह बात अक्षरशः सत्य है। जिस शक्ल को आप अपनी स्मृति में किसी अच्छी या बुरी याद के साथ प्रयोग न कर सको, उसे याद रखना बहुत कठिन काम है। बाज़ार में हज़ारों शक्लें हमारे सामने से निकलती हैं, लेकिन वे हमें याद नहीं रहतीं। लेकिन उनमें से कोई हमें गाली बक दे तो उसे हम भूल न पाएंगे। कोई थप्पड़ मार दे, तो उसे मरते दम तक याद रखेंगे। और कोई प्रपोज़ कर दे, फिर तो नींद को भूल जाएंगे, पर उसे न भुला सकेंगे।
सो, मैं शब्दों को जानता हूँ। शब्द मुझे हर समय घेरे रहते हैं। और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जिन बातों को बार-बार बोला जाए, वे निष्प्राण हो जाती हैं। आप इसका प्रयोग करके देख लीजिए। आप किसी से मिलकर उसका हालचाल पूछ लें- ‘और सुनाओ, कैसे हो?’ यह वाक्य इतनी बार बोला जा चुका है कि चुक गया है। हमने हाल ही में घर बदला। जहाँ घर लिया है वह स्थान हवाई अड्डे के पास है। हर दो मिनिट बाद एक जहाज गुज़रता है। पहले कुछ दिन तो बड़ा संकट हो गया। नींद ही न आए। लेकिन धीरे-धीरे वह शोर निष्प्राण हो गया। उसने प्रभावित करना बंद कर दिया। अब जैगुआर भी उड़ता है तो हमें संज्ञान ही नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, ‘और सुनाओ, कैसे हो’ भी बोला जाता है… सामने वाला भी यंत्र की तरह ‘बढ़िया हूँ’ बोल देता है। लेकिन इन दोनों ही बातों का कोई प्रभाव नहीं होता।
हम ऐसा अपराध अनेक ज़रूरी वाक्यों के साथ कर चुके हैं। ‘आई लव यू’; ‘आई एम सॉरी’ और ‘हैलो’ से लेकर गालियों तक यही दुर्घटना घटी है। मनुष्य जाति का इतिहास गालियों के इतिहास के बराबर का ही होगा। कभी-कभी तो लगता है कि गालियाँ, मानव जाति से नौ-दस महीने बड़ी ही होंगी। शायद गालियों के अतिरिक्त किसी अन्य तत्व को मनुष्य ने अपने साथ इतनी लंबी यात्रा करने ही न दी होगी। गालियाँ सम्भवतः प्रारम्भ में ही बहुतायत प्रयोग से निष्प्राण हो गई हों। सो, उनको साथ रखने में हमें कोई आपत्ति न हुई। जिसका प्रभाव नहीं, उससे आपत्ति कैसी? आपत्तिजनक होने के लिए प्रभावशाली होना पहली शर्त है।
इसीलिए भीड़ से कभी किसी को कोई आपत्ति न हुई। नेतृत्व ज़रूर आपत्ति को जन्म दे सकता है। यदि आपसे किसी को कोई आपत्ति न हो, तो यह कोई प्रसन्नता का विषय नहीं है। यह ख़तरनाक़ बात है। यह जड़ता का सूचक है। यदि किसी को आपसे कष्ट है, किसी को आपसे ईर्ष्या है, किसी को आपसे आपत्ति है तो उसके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करना। वह अवश्य आपसे प्रभावित हुआ है। उसने आपके जीवन को अर्थ प्रदान किये हैं। अन्यथा आपका जीवन किसी गाली से अधिक अस्तित्व न रख पाता।
आपने लोगों के घर पर पुरखों की तस्वीरें देखी होंगीं। आपको आश्चर्य होगा, जब तक वे सब पुरखे जीते थे, तब तक जी का जंजाल बने हुए थे। उनके कारण पूरे घर का जीना हराम था। इसलिए उन्हें अपने घर में रखने को कोई भाई तैयार न हुआ होगा। लेकिन मरने के बाद उनसे कोई कष्ट नहीं हो सकता। अब वे कोई प्रभाव नहीं डाल सकते। इसलिए हर भाई ने अपने घर में उनकी तस्वीरें जड़वा ली हैं। तस्वीरों से किसी को कोई आपत्ति हो ही कैसे सकती है?
हमने निष्प्रभावी वस्तुओं को, निष्प्रभावी वाक्यों को ढोने में दक्षता प्राप्त की है। क्योंकि उनसे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसा ही एक वाक्य है ‘अपने मन की सुनो।’ इस वाक्य में भी प्राण नहीं हैं। इसलिए कोई मन की नहीं सुनता।
और यह बहुत अच्छी बात है कि कोई मन की नहीं सुनता। यदि ग़लती से किसी दिन आपने अपने मन की सुन ली, तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। फिर हर किसी को देखकर मुस्कुराना सम्भव न होगा। मन बोलने लगा तो आपका सामाजिक जीवन नरक हो जाएगा। फिर आप सभ्य न रह सकेंगे। मन का कैनवास तो बहुत वैविध्यपूर्ण है। एक क्षण में, आपको किसी पर प्रेम आने लगेगा। और प्रेम भी ऐसा-वैसा नहीं। पूरा प्रेम। ऐसा कि सोचकर स्वयं आपका ही चेहरा लाल हो जाएगा। और अगले ही क्षण आप उसे पीटने लगोगे। आपने स्वयं न सुनी हों, ऐसी ऐसी गालियाँ बकने लगोगे। इसलिए मन की सुनने में बड़े संकट हैं। मन कभी भी पिटवा सकता है। मन का विधान, किसी भी युग के संविधान को सूट नहीं कर सकता।
इसीलिए जिसने यह भूल कर दी, जिसने अपने मन की सुन ली उसे हमने असभ्य मान लिया, उसे हमने असामाजिक घोषित कर दिया। पापी, अभद्र, चरित्रहीन, उच्छृंखल, अनैतिक, दुराचारी जैसे शब्द मन की सुनने वालों के ही अलंकार रहे हैं। मीरा ने मन की सुनी, उसे ज़हर दे दिया। सुकरात ने मन की सुनी, उसे भी ज़हर दे दिया। हीर-रांझा, सोहनी-मिर्ज़ा, लैला-मजनू ये सब मन की सुननेवाले लोग रहे। हमने इनके साथ क्या किया!
मन की सुनना ख़तरे से ख़ाली नहीं। यदि मन खोलकर रखना हो तो तैयार रहना, कि इसके बाद तत्कालीन नियम तुम्हारे दुश्मन हो जाएंगे। धर्म, समाज, नीति, विधान सब हाथ धोकर पीछे पड़ जाएंगे। फिर बाद में सबको क़िस्से सुनाए जाएंगे।
ये लैला-मजनू के क़िस्से प्यार के क़िस्से नहीं हैं। ये तो दहशत की कहानियाँ हैं; कि देखो, वो आए थे मन की सुनने, हमने उनका कैसा सत्यानाश किया है। पीढ़ियों को ये कहानियाँ इसलिए सुनाई जाती हैं, ताकि वे इन कहानियों से यह शिक्षा ले सकें कि कोई कितनी ही बार कहे, पर भूलकर भी मन की मत सुन लेना।
✍️ चिराग़ जैन