Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
‘सत्ता का खेल तो चलेगा। सरकारें आएंगी-जाएंगी। पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतन्त्र अमर रहना चाहिए। क्या आज के समय में ये कठिन काम नहीं हो गया है? ये चर्चा तो आज समाप्त हो जाएगी। मगर कल से जो अध्याय शुरू होगा, उस अध्याय पर थोड़ा ग़ौर करने की ज़रूरत है। ये कटुता बढ़ना नहीं चाहिए।’ -पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के ये शब्द आज भी रह-रहकर हमारे कानों में गूंजते हैं।
सोशल मीडिया के इस दौर में वितण्डावाद का जो ताण्डव हम दिन-प्रतिदिन देख रहे हैं, उसके अंत में हमारे पास कटुता के अतिरिक्त कुछ शेष न रह जाएगा। राजनैतिक दलों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर जिस तरह से एक पूरी पीढ़ी की सोच को सीमित करने का प्रयास किया है, वह पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के स्वर में वर्णित ‘लोकतंत्र’ की परिकल्पना के विपरीत आचरण का मार्ग है। मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यह प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक राजनैतिक दल की है।
रामायण ने हमें सिखाया है कि शत्रु जिस द्वार से आक्रमण करेगा, समाधान भी उसी द्वार से आएगा। यही कारण है कि लक्ष्मण मूर्च्छित हुए तो वैद्य सुषेण भी उसी लंका से उपचार के लिए आए, जिससे मेघनाद आया था।
यदि हम आज से ही सोशल मीडिया का प्रयोग करते समय कुछ बातों का पालन करना प्रारंभ करें तो शायद इस माध्यम का प्रयोग करके प्रोपेगैंडा करने वाली सभी एजेंसियाँ हतोत्साहित होंगी। फिर देशहित की बात करने पर जब कोई आप पर तंज करेगा कि आप राजनैतिक माहौल सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं; तो आप उसे बता सकेंगे कि हम अफवाह के उस तंत्र की जड़ खोद रहे हैं, जिसकी डालियों पर सामाजिक विघटन के फल लगते हैं।
1. यदि जन-सामान्य की समस्या से जुड़ी अथवा लोकतंत्र की समालोचना से संबंधित किसी पोस्ट को अमुक राजनैतिक दल का ‘विरोध’ सिद्ध करने का प्रयास किया जाए तो ऐसे कमेंट्स को इग्नोर करेंगे। उन्हें उत्तर देते ही आप उन्हें सफल कर देंगे क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह है कि आप विषय को भूलकर स्वयं को निष्पक्ष साबित करने में व्यस्त हो जाएँ।
2. अश्लील, अभद्र तथा असंसदीय शब्दावली का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को (भले ही वह आपकी पोस्ट के समर्थन में हो) तुरंत ब्लॉक करेंगे।
3. किसी भी सम्प्रदाय की आड़ में कट्टरता, अराजकता और हिंसा का समर्थन करनेवाले व्यक्ति की पोस्ट/कमेंट को इग्नोर करेंगे।
4. उन फेक प्रोफाइल्स की पहचान करके उन्हें अपनी मित्रता सूची से बाहर करेंगे, जिनका निर्माण ही किसी दल अथवा विचारधारा के प्रचार हेतु किया गया है। ध्यान से देखने पर आप समझ जाएंगे कि ऐसी प्रोफाइल्स पर डीपी से लेकर वॉल तक कहीं भी प्रोफ़ाइल होल्डर की पहचान नहीं मिलती। इनकी वॉल पर या तो डीपी चेंज नोटिफिकेशन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा या फिर राजनैतिक दलों के प्रोपेगेंडा पेज से शेयर करके लाई गई पोस्ट्स होंगी। ये ही वो प्रोफाइल्स हैं जिनके दम पर राजनैतिक दल अफवाह और झूठ फैलाने तथा मुद्दों से भटकाने में सफल होते हैं।
5. किसी भी राजनेता के निजी जीवन में प्रवेश करके उसकी चरित्र हत्या को ‘आलोचना’ का नाम देने वाली पोस्ट से दूरी बनाए रखेंगे। क्योंकि किसी की निजता का सम्मान न किया गया तो भविष्य में कोई भी समाज के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं करेगा।
6. किसी राजनेता का नाम बिगाड़कर, या उसे फेंकू, तड़ीपार, पप्पू, टोंटीचोर आदि नाम से संबोधित करनेवालों को दूर से प्रणाम करेंगे क्योंकि इनके पास कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक समझ नहीं है, ये लोग सुनी-सुनाई अभद्रता से विषय को भटकाना चाहते हैं।
7. किसी भी राजनेता की बीमारी, चोट, कद-काठी, लिंग, जाति, धर्म, रंग, चेहरा-मोहरा और बोली का उपहास करके मूल विषय को भटकाने के प्रयासों से सावधान रहेंगे क्योंकि हमें राजनेताओं से जनता का नेतृत्व करवाना है, उनसे पारिवारिक सम्बंध नहीं जोड़ना है।
8. टीवी डिबेट में अलग-अलग राजनैतिक दलों के प्रवक्ता जिन जुमलों से बहस को नष्ट कर देते हैं, उन जुमलों से अपनी पोस्ट्स और कमेंट बॉक्स को बचाएंगे।
9. वर्तमान अथवा भविष्य के प्रश्न को इतिहास, जाति अथवा सम्प्रदाय पर अटकाकर नष्ट करने वालों को उत्तर देने में ऊर्जा ध्वंस नहीं करेंगे।
10. फेसबुक पर कुछ भी लिखने से पूर्व यह विचार अवश्य करेंगे कि इससे किसी प्रकार से मनुष्यता अथवा लोकतंत्र तो आहत नहीं हो रहा।
ये नियम यदि हमने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से पालन करने आरम्भ कर दिए तो मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि आप बहुत जल्दी ही अपने समाज को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाए जा रहे वितण्डों से मुक्ति होता देखेंगे।
और एक अंतिम बात- अपने रक्त संबंधों; पारिवारिक मित्रों; सहकर्मियों; सहयात्रियों अथवा संबंधियों से चर्चा करते समय यदि अपने पक्ष और संबंध में से किसी एक को चुनना पड़े तो संबंध को बचाएंगे क्योंकि जो हमारे अपने हैं, वो आज नहीं तो कल हमारे साथ अवश्य खड़े होंगे।
भारत एक ऐसा उपवन है जहाँ अलग-अलग रंग के फूल खिलते हैं। हमें उन व्यापारियों की कोई ज़रूरत नहीं है, जो फूलों को डालियों से अलग करके बाज़ार में बेच दें। हमें तो वह माली चाहिए जो अलग-अलग रंग के फूलों को करीने से लगाकर बगीचे की सुंदरता बढ़ा सके।
सहमत हों, तो राष्ट्रहित में शेयर ज़रूर करें।
✍️ चिराग़ जैन
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“अलवर में एक मूक-बधिर बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।” इस ख़बर में न तो ‘अलवर’ शब्द महत्वपूर्ण है, न ‘मूक-बधिर’। इसमें अगर कुछ महत्वपूर्ण है तो वह है बलात्कार। इसमें किसी शब्द पर शर्मिंदा हुआ जा सकता है तो वह शब्द है बलात्कार।
लेकिन हम इस एक शब्द को छोड़कर, बाक़ी हर शब्द पर चर्चा करेंगे। भाजपा समर्थक ‘अलवर’ शब्द को बार बार बोलकर राजस्थान की कांग्रेस सरकार को नीचा दिखाएंगे। उत्तर में कांग्रेस समर्थक ‘हाथरस-हाथरस’ चिल्लाकर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को चिकोटी काटेंगे। कोई ‘दलित-दलित’ चिल्लाएगा तो कोई बलात्कृता और बलात्कारी का धर्म बताकर चिल्लाने लगेगा।
लेकिन इन सब चीख़-चिल्लाहटों में वो एक चीख़ कराहकर दम तोड़ देगी, जो उस दुर्घटना में किसी चिड़िया के हलक़ से निकली होगी। हम बलात्कार को छोड़कर हर विषय पर चर्चा करेंगे।
आख़िर कब तक हम मूल विषय की आवाज़ को अपने शोर-शराबे की क्षमता से दबाते रहेंगे? कई बार ऐसा लगता है कि कहीं ये राजनैतिक दल इस बात की प्रतीक्षा तो नहीं करते कि चुनाव से पहले अगर विरोधी पार्टी की सरकार वाले राज्य में कोई बलात्कार हो जाए तो बाज़ी पलटी जा सकती है। …लेकिन मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि कोई मनुष्य किसी बलात्कार की प्रतीक्षा कर सकता है। लेकिन जिस तरह बलात्कार के बाद राजनीति होती है, उसे देखकर इस आशंका को सिरे से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता।
निश्चित रूप से, प्रशासन या राजनेता बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के समर्थन में नहीं हो सकते। लेकिन वे ऐसा कर पाने का नैतिक बल क्यों नहीं दिखा पाते कि इस तरह की किसी भी दुर्घटना पर अपराधी की जाति, धर्म और विचारधारा को दरकिनार करके स्पष्ट विरोध दर्ज कराए।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम ख़ालिस इंसान होकर सोचने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाते? किसानों की आत्महत्या भाजपा के शासनकाल में हुईं तो कांग्रेस शोर मचाने लगी। अरे भाई, एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं करते कि एक भी आत्महत्या प्रशासन के लिए शर्मनाक है। फिर चाहे वह जिसकी भी सरकार हो।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम सब कोरे भारतवासी होकर क्यों नहीं सोच सकते। एक बार भाजपा समर्थक भाजपा से, और कांग्रेस समर्थक कांग्रेस से सवाल क्यों नहीं पूछ पाते?
ऐसी कौन सी शासन व्यवस्था का सपना हम देख चुके हैं जिसमें शासन कोई भी करे, व्यवस्था पूरी तरह चरमराई ही रहेगी? एक बार महंगे को महंगा, झूठे को झूठा, मूढ़ को मूढ़, भ्रष्ट को भ्रष्ट, अभद्र को अभद्र, अश्लील को अश्लील क्यों नहीं कहा जा सकता?
एक बार विपक्षी पार्टी में मौजूद किसी अच्छे इंसान की सार्वजनिक प्रशंसा क्यों नहीं की जा सकती? इतने लंबे समय तक राजनीति को प्रमुख मानकर देख चुके तो एक बार मुद्दों को प्रमुख मानकर क्यों नहीं देखा जा सकता?
किसानों के आंदोलन पर पानी की बौछार करवाने वाली सत्ता की आलोचना करने वाला विपक्ष एक बार इतना नैतिक बल क्यों नहीं जुटा पाता कि वह रामदेव के आंदोलन पर आधीरात को हुए लाठीचार्ज के लिए क्षमायाचना कर सके।
अलवर के बलात्कार पर अशोक गहलोत को घेरने वाले भाजपाई एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं कर पाते कि बलात्कार हाथरस में हो या हैदराबाद में; अलवर में हो या दिल्ली में …बलात्कार सिर्फ़ बलात्कार होता है। और इस अपराध के अपराधियों को यथाशीघ्र सज़ा दिलवाने के लिए हम सब राजनीतिज्ञ एकजुट होकर काम करेंगे।
एक बार किसी बलात्कार की ख़बर में घटनास्थल, जाति और धर्म टटोलने से पहले हम अपने घर के आंगन में खेलती किलकारी के सिर पर हाथ फेरकर यह शपथ क्यों नहीं उठा सकते कि कम से कम इस एक विषय पर हमारी धारणा किसी राजनैतिक प्रोपेगेंडा से प्रभावित नहीं होगी। न पक्ष में, न विपक्ष में।
दलित का बलात्कार! क्या मतलब है इस बात का? सवर्ण का होता तो क्या अपराध न होता? मुस्लिम के साथ दरिंदगी? हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन के साथ होती तो दुखद न होती? आख़िर कब तक हम इन मातमों में माइक तलाशते रहेंगे?
कोई सद्भाव की बात करे तो उसमें वामपंथ तलाशा जाने लगता है। कोई मिलकर रहने को कहे तो उसे कांग्रेसी चमचा कहकर ट्रोल किया जाता है। कोई सांस्कृतिक चेतना का हवाला दे तो उसे संघी और भाजपाई कहकर अपमानित किया जाता है। कोई मनुष्यता पर सतर्क विवरण प्रस्तुत कर तो उसे रवीश का चेला कहा जाता है। कोई सभी दलों से अलग हटकर केवल भारतीय होने की अपील करे तो उसे केजरीवाल की राह पर चलने वाला बताया जाने लगता है।
मैं देश के सभी राजनैतिक दलों से अपील करता हूँ; मैं देश के सभी बुद्धिजीवियों से अनुरोध करता हूँ; मैं देश के सभी धर्मगुरुओं से निवेदन करता हूँ; मैं देश की सभी सेलिब्रिटीज़ से रिक्वेस्ट करता हूँ कि घृणा और विघटन की राह पर बहुत आगे निकल आए इस देश को एक बार मनुष्यता की भव्यता की याद दिलाएँ ताकि जब हमारी अगली पीढ़ी के साथ कोई अन्याय हो तो उसके आँसू पोंछने वाले हाथ उससे उसकी जाति, कुल, धर्म या राजनैतिक विचारधारा का सर्टिफिकेट न मांगे।
✍️ चिराग़ जैन
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एक अभिनेत्री ने कुछ ऐसे बयान दिये हैं, जो तथ्यात्मक रूप से मिथ्या हो सकते हैं, लेकिन इन बयानों का विरोध करनेवालों की भाषा तथा तर्कशक्ति ने अभिनेत्री के मिथ्या भाषण से ध्यान भंग करने में महती भूमिका अदा की है। ‘कम कपड़े पहनकर फिल्मी पर्दे पर आनेवाली नचनिया हमें बताएगी कि आज़ादी क्या होती है!’ -यह वाक्य पढ़कर मुझे लगा कि कुतर्क तथा तर्कहीनता इस देश की किसी भी बहस का अंग बन चुका है। क्यों भाई, यदि किसी अभिनेता/अभिनेत्री ने किसी फिल्म में नकारात्मक भूमिका निर्वाह की है तो क्या इससे उसका चरित्र आंका जाएगा? क्या कम कपड़े पहननेवाले इस देश के नागरिक नहीं हैं?
कोई ‘क्या’ कह रहा है -इस मुद्दे पर बहस को केंद्रित करने की बजाय हम उसके परिधान, उसकी जाति, उसके धर्म, उसके व्यवसाय, उसकी पारिवारिक स्थिति और उसकी निजता को क्यों टटोलने लगते हैं?
आज़ादी भीख में मिलनेवाली बात कोई साड़ी-ब्लाउज़ या सूट-शलवार पहनकर कहे तो क्या यह सत्य हो जाएगी? हमें लम्बे समय से मूल मुद्दे को भटकाने के संस्कार दिए गए हैं। टीवी पर होने वाली बहसें यह ट्रेनिंग देने में सफल हुई हैं।
प्रश्न पूर्व का पूछा जाएगा तो उत्तरदाता उसे उठाकर दक्षिण में पटक देगा और फिर दक्षिणवाले उस प्रश्न को अनर्गल साबित कर देंगे। इतना हो हल्ला होगा कि कुछ घड़ी बाद ख़ुद प्रश्न भी यह भूल चुका होगा कि मेरा जन्म क्यों हुआ था।
कोई वर्तमान का प्रश्न करे, तो उसे इतिहास दिखाने लगो। कोई इतिहास पर तुम्हारी ज़ुबान पकड़ ले तो उसे धर्म-जाति के मेले में ग़ुम कर दो। कोई धर्म-जाति पर प्रश्न लेकर खड़ा हो तो उसे आस्था आहत करने के आरोप में राष्ट्रद्रोही और धर्मद्रोही करार दे दो। और यहाँ से भी वह बच जाए तो उसके निजी जीवन, उसके पहनावे, उसके भाषाई उच्चारण दोष, उसके खानपान जैसे विषयों पर बिना बात की बहस छेड़ दो।
नरेंद्र मोदी चलते-चलते संसद की सीढ़ियों पर लड़खड़ा गये और हम इस घटना से उनको नालायक साबित करने लगे। नरेंद्र मोदी बेध्यानी में राष्ट्रगान की धुन पर सावधान न हुए और हम उस क्लिप को लेकर ठट्ठा करने लगे। नरेंद्र मोदी ने बताया कि उनका सीना छप्पन इंच का है और हम इस आधार पर उन्हें महान मानने लगे। चुनाव रैली में राहुल गांधी ने कुर्ते की फटी जेब दिखाई और हम राहुल गांधी को मूर्ख कहने लगे। किसी बयान में योगी आदित्यनाथ के मुँह से लक्ष्मण की जगह भरत निकल गया और हमने हंगामा उठा लिया।
क्यों भाई? हमें राजनेताओं से देश चलवाना है या भागवत सुननी है? किसी की जेब फटी होगी तो उससे उसके राजनैतिक निर्णय पर क्या फर्क पड़ जाएगा? हमें नरेंद्र मोदी से देश चलवाना है या भारोत्तोलन करवाना है? राष्ट्रगान पर सावधान खड़े रहना चाहिए, यह बात तो प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ा दी जाती है। लेकिन अगर कभी किसी से कोई चूक हो जाए तो उसे उसकी राष्ट्रभक्ति से जोड़कर क्यों देखा जाए?
कोई राजनेता अपनी पत्नी से अलग रह रहा है तो यह उसका व्यक्तिगत मुआमला है। इस पर प्रश्न उठाने का अधिकार उसकी पत्नी के अतिरिक्त किसी को भी क्यों हो? कोई राजनेता विवाह नहीं कर रहा तो यह भी उसका निजी निर्णय है? इससे उसके राजनैतिक निर्णयों के आकलन कैसे किया जा सकता है?
कभी विचार करके देखें तो हम पाएंगे कि अपने राजनीतिज्ञों को यह बात हमने ही सिखाई है कि असल राजनीति को छोड़कर इधर-उधर के ड्रामे करते रहो तो जनता ज़्यादा वोट देगी। अन्यथा हर काम वोट के लिए करनेवाले लोग ऐसे कार्यों का प्रोपेगैंडा क्यों करते, जिनका ‘राज्य की नीतियों’ से कोई लेना-देना नहीं हो।
कोई वैष्णोदेवी जाए तो जाने दो। कोई केदारनाथ जाए तो यह उसकी निजी आस्था है। कोई अजमेर में चादर चढ़ाए तो उस उसका पर्सनल मुआमला है। कोई मंदिर में झाड़ू लगाए तो यह उसकी मर्ज़ी है। कोई राममंदिर में दीये जलाए तो यह उसका अपना मत है। हम इन सब कार्यों को उनकी राजनैतिक स्थिति का मापदण्ड क्यों बनाते हैं? हम ऐसा क्यों मान बैठे हैं कि धर्मस्थल पर जानेवाला व्यक्ति भ्रष्टाचारी हो हो नहीं सकता; वह भी तब जब हमारे देश के न्यायालयों में धर्मस्थलों पर हुए कदाचार के सैंकड़ो मुआमले लम्बित हैं।
हम निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन को अलग-अलग करके क्यों नहीं देख पाते।
सीता का परित्याग करने वाले राम आदर्श राजा हैं। राधा को बिरह देने वाले कृष्ण सर्वश्रेष्ठ राजनीतिज्ञ हैं। यशोधरा और राहुल को सोता छोड़कर जानेवाले तथागत सर्वाेत्कृष्ट ज्ञानी हैं। क्या इन कथाओं से भी हम यह नहीं सीख सकते कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक प्रश्नों के सटीक उत्तर दे रहा हो तो उस समय उसे निजता के कठघरे में घसीटकर प्रश्नावली नहीं बदलनी चाहिए।
✍️ चिराग़ जैन
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आज पुनः अनुरोध कर रहा हूँ कि किसी रचनाकार की रचना अथवा उसकी रचना का कोई अंश सोशल मीडिया पर पोस्ट करते समय रचनाकार का नाम अवश्य लिखें।
ऐसा न करने की स्थिति में निम्नलिखित स्थितियां उत्पन्न होती हैं :
1) रचना अनाथ हो जाती है, और लोग उसे सोशल मीडिया की रचना कहने लगते हैं। मूल रचनाकार अपनी ही रचना को सुनाते हुए चोर कहलाने लगता है।
2) कोई अन्य व्यक्ति उस अनाथ रचना को अपने नाम से सुनाने या पोस्ट करने लगे तो मूल रचनाकार उसे अपनी सिद्ध करने में थक जाता है।
फेसबुक पर यह विषय कई बार उठाया है लेकिन लोग ज्ञान देते हैं कि अगर कोई आपकी रचना शेयर कर रहा है तो आपको ख़ुशी होनी चाहिए। उल्टे हमें बताया जाता है कि अपनी रचना को अपनी कहने की जो कोशिश हम कर रहे हैं वह हमारी छोटी सोच की परिचायक है।
सो महान सोच वाले इन लोगों से यही कहना चाहूंगा कि रचनाकार की रचना उसकी सन्तान की तरह होती है। यदि किसी के बालक सुन्दर हैं तो उन्हें प्यार करने का हक़ पूरे गाँव को होता है, लेकिन उनका अपहरण कर लेने का अधिकार किसी को नहीं है।
सोशल मीडिया की इन्हीं प्रवृत्तियों का लाभ उठाकर कुछ चोर कवियों ने ख़ूब प्रसिद्ध पंक्तियों को भी जस का तस या एकाध शब्द बदलकर अपने नाम से पोस्ट करने की सिरीज़ चला रखी है। यदि पुण्य-पाप होते हैं तो इन सब चोरियों का पाप उनके खाते में जाएगा, जो किसी की रचना उद्धृत करते समय रचनाकार का नाम लिखना/बोलना आवश्यक नहीं समझते।
इस स्थिति के सुधार के लिए निम्न दो क़दम उठाए जा सकते हैं
1. कोई भी ऐसा मेसेज फॉरवर्ड न करें, जिसमें रचनाकार का नाम न लिखा हो।
2. यदि कहीं किसी जगह ऐसी प्रवृत्ति दिखे तो उसके कमेंट बॉक्स में मूल रचनाकार का नाम अवश्य लिख कर आएं।
सोशल मीडिया की चौर्य प्रवृत्ति को इतना न बढ़ने दें कि मौलिक रचनाकार अपनी पंक्तियाँ पोस्ट करना बन्द कर दें।
✍️ चिराग़ जैन
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मोबाइल फोन की तरह मन भी अलग-अलग परिस्थिति में अलग-अलग मोड पर सैट हो जाता है। सम्भवतः मनोविज्ञान में इसी को मूड कहा जाता हो।
कभी हम बहुत ख़ुश होते हैं, मतलब हम हैप्पी मोड में हैं। ऐसे ही सैड मोड, कन्फ्यूज़्ड मोड और एंग्री मोड भी हम सबके भीतर ऑन-ऑफ होते रहते हैं। यह सहज मानवीय स्वभाव भी है। लेकिन कुछ लोग पूरा जीवन एक ही मोड में बिता देते हैं। इनके सॉफ्टवेयर में बाक़ी किसी मोड पर जाने की वायरिंग ही नहीं होती। आप किसी भी परिस्थिति का वायर छू दो, वह उनके फिक्स मोड को ही पॉवर सप्लाई करेगा।
ऐसा अक्सर भयभीत मोड और चिड़चिड़ा मोड के लोगों के साथ होता है। चिड़चिड़ा मोड के व्यक्ति हमेशा चिड़चिड़ाहट के अलंकार से अपना चेहरा सजाए रखते हैं। जिनका ऊपर का ओंठ कुछ शूकराकार होता हुआ ऊपर उठा रहता है और नासिका के मध्यभाग को सिकोड़ने की कवायद में दोनों नथुने भैंसे के नथुनों से प्रतियोगिता करते रहते हैं। चूँकि भैंसा कभी-कभी थकता भी है, इसलिए वह वर्ष में तीन-चार बार इनसे हार जाता है। इस विजय से इनकी चिड़चिड़ी शिराओं में प्रसन्नता की जो ऊर्जा प्रवाहित होती है, वह भी अंततः चिड़चिड़ाहट में ही परिणत हो जाती है।
लगभग यही स्थिति भयभीत मोड के मनुष्यों की होती है। वे किसी भी बात से भयभीत हो सकते हैं। बल्कि यूँ कहिये कि वे बिना बात के ही भयभीत रहते हैं। आप उनको सामान्य फोन मिलाकर दीपावली की बधाई दें। वे तुरन्त भयभीत हो जाएंगे कि आपको उनसे क्या लोभ है जो आप उन्हें बधाई देने के लिए फोन कर रहे हैं? आप उनकी प्रशंसा करो तो वे भयभीत होकर आपकी प्रशंसा में षड्यंत्र सूंघने लगेंगे। आप उनकी प्रशंसा न करो तो वे आपके भीतर ईर्ष्या के समंदर देख लेंगे।
इनकी स्थिति उस मुर्गे की तरह होती है जो जन्मते ही यह मान बैठता है कि उसका जन्म केवल कटने के लिए हुआ है। इस महान विचार को स्वीकार करने के बाद वह जीवन भर डॉक्टर और कसाई के बीच भेद कर पाने की क्षमता गँवा बैठता है।
संदेह इनकी धमनियों में अनवरत दौड़ता रहता है। इनकी धड़कनों से अहर्निश ‘सावधान-सावधान’ की प्रतिध्वनि मुखरित होती है। सड़क पर चलते हुए दो व्यक्ति यदि हँसते हुए दिख जाएँ तो ये कल्पनाशीलता का प्रयोग करके उनकी सामान्य हँसी को पहले ठहाका और फिर राक्षसी अट्टहास बना लेते हैं। फिर वे दोनों अनजान मनुष्य इन्हें लुटेरे लगने लगते हैं।
इनकी यह असीम प्रतिभा इन्हें कभी चैन से सोने नहीं देती। ये भी किसी तपस्यारत योगी की तरह पूरा जीवन अपनी भय के कबूतर का अपने हृदय के भीतर ही पोषण करते रहते हैं। यदि कभी कोई प्रसन्नता, मेनका बनकर इनकी साधना भंग करने का प्रयास करे तो ये अपने क्रोध की अग्नि से उस प्रसन्नता को उत्पन्न करनेवाले का सुख-चैन भस्म कर देते हैं।
इस मोड के लोगों में यदि ग़लती से स्वयं को समझदार समझने की पैन ड्राइव और लग गयी तो फिर तो इनका पूरा सिस्टम डिस्को करने लगता है। पैन ड्राइव का प्रभाव इनसे समझदार होने का अभिनय करवाता है और इनकी नैसर्गिक मेधा रह-रहकर इनके पर्यायवाची में लगी ‘ऊ’ की मात्रा को लम्बा करती रहती है। अब इनका भय झुंझलाहट के सिंगार से युक्त हो जाता है। झुंझलाहट इसलिए कि पैनड्राइव लगाने के बावजूद कोई इन्हें समझदार मानने को तैयार नहीं होता और ये स्वयं को समझदार मान चुके होते हैं।
इन विरोधाभासी मान्यताओं के बीच ये बेचारे समझदारी के अभिनय का अनुपात बढ़ाते हुए लोगों से सौहार्दपूर्ण व्यवहार का अतिरिक्त प्रयास करने लगते हैं। अपने भयभीत विवेक से ये जिसे ‘सफल’ मान रहे होते हैं, उसकी तरह बैठने लगते हैं, उसकी तरह बोलने का प्रयास करते हैं; लेकिन ज्यों ही कोई इनके अभिनय को सत्य समझकर इनकी समझदारी की प्रशंसा कर देता है, तो इनकी नैसर्गिक प्रतिभा तुरन्त प्रकट हो जाती है और वह उस प्रशंसा में षड्यंत्र सूंघने लगती है।
काश अपनी असुरक्षा-ग्रंथि को पुष्ट करने की बजाय कभी ये लोग यह स्वीकार कर सकें कि हमारे पास है ही क्या जो कोई हमसे छीन लेगा…! काश ये लोग समझ सकें कि ख़ुश रहना बहुत बड़ी कला है, और इस कला पर हर प्रकार का भय स्वाहा किया जा सकता है।
✍️ चिराग़ जैन