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हमारे यहाँ एक नया चलन चल पड़ा है कि जैसे ही आप कोई पर्व मनाने लगो तो कुछ लोग उसके लिए तर्कहीन प्रश्न उठाते हैं और दूध में खटाई डालकर स्वयं को लीक से हटकर चलता दिखाने की कोशिश में लग जाते हैं।
कल यही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के साथ भी हुआ। जब सब लोग महिलाओं की उपलब्धि, महत्व, क्षमता और प्रतिभा की चर्चा कर रहे थे तब सोशल मीडिया पर लीक से हटकर चलने की होड़ में कुछ लोग हर वर्ष की तरह इस बार भी पूछ रहे थे कि महिला दिवस एक ही दिन क्यों?
अजीब सवाल है यार। हम पूरे वर्ष लक्ष्मी की आकांक्षा करते हैं किंतु दिवाली वर्ष में एक दिन ही क्यों आती है? हम पूरे वर्ष स्वतंत्र रहते हैं किंतु स्वतंत्रता दिवस एक ही दिन क्यों मनाते हैं? हम पूरे वर्ष अपनी बहन के प्रति स्नेहसिक्त रहते हैं किंतु रक्षाबंधन एक ही दिन क्यों मनाते हैं? संतति के शुभ के लिए मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी और पति के सुख की कामना का पर्व करवा चौथ भी वर्ष में एक ही दिन मनाया जाता है! बेटियों के प्रति शुभेच्छा तो पूरे वर्ष रहती है, फिर हरियाली तीज एक ही दिन क्यों मनाई जाती है?
यह अनावश्यक असंतोष की प्रवृत्ति है, जो विवाद उत्पन्न करके उत्सव के उत्साह को भंग करती है। ऐसे सवाल हिन्दी दिवस पर भी उठते हैं। और जो लोग अपनी फेसबुक पर यह प्रश्न लिखकर स्वयं को क्रांतिकारी समझ रहे होते हैं उन्हें इतना भी भान नहीं है कि यह क्रांति इतनी बार हो चुकी है कि अब इससे प्रभाव नहीं, चिढ़ उत्पन्न होती है।
वर्ष के 365 दिन में से एक पूरा दिन जीवन के किसी एक पक्ष अथवा भाव को समर्पित करना ऐसा ही है, ज्यों लंबे सफ़र पर निकलते हुए पैट्रोल पम्प पर रुकना। गाड़ी पैट्रोल पम्प से ऊर्जा ग्रहण कर सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र तय करती है। इस सफ़र में हर क्षण पैट्रोल गाड़ी की गति का कारक भी रहता है। किन्तु सफ़र में हर दस क़दम पर गाड़ी रोककर पैट्रोल का धन्यवाद ज्ञापन नहीं किया जाता।
ये महिला दिवस, ये हिंदी दिवस, ये हरियाली तीज जैसे पर्व वही पैट्रोल पम्प हैं जहाँ रुककर जीवन, किसी सम्बन्ध अथवा जीवनी शक्ति से स्वयं को इतना भर लेता है ताकि उस तत्व के साथ पूरे दमखम के साथ जीवन जिया जा सके।
देह को भोजन की आवश्यकता होती है, अतएव हम दिन में दो-तीन बार डाइनिंग टेबल पर बैठते हैं। अब कोई प्रश्न कर दे कि दस-पंद्रह मिनिट ही क्यों, आप पूरे दिन डाइनिंग टेबल पर क्यों नहीं बैठते? लीक से हटकर चलना हो तो यह विवाद खड़ा करके भोजन का आनन्द धूमिल किया जा सकता है किंतु अंततः इस प्रश्न के लिए ‘मूढ़ता’ से बढ़िया संज्ञा ढूंढ़ पाना असंभव होगा।
हाँ, यदि कोई व्यक्ति अन्न का अपमान करता हो, कोई भोजन को गाली देता हो अथवा दूसरों को भोजन करते देख उन्हें अपशब्द कहता हो तो ऐसे व्यक्ति को एक क्षण भी डायनिंग टेबल पर बैठने का अधिकार नहीं है। ऐसे व्यक्ति को एक कण भी भोजन नहीं मिले इसके लिए वैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। सो ऐसी व्यवस्था हमारे कानून में है। जो व्यक्ति महिलाओं के प्रति आपराधिक सोच रखता हो अथवा महिलाओं के प्रति किसी अपराध में संलग्न हो उसे हमारा न्यायालय दंड देता है।
यदि कहीं किसी महिला के साथ कोई अपराध हुआ हो तो इस हवाले से पूरे विश्व से महिला दिवस का उत्सव तो नहीं छीना जा सकता। किसी महिला ने कोई अपराध कर दिया तो भी महिला दिवस के उत्सव की भर्त्सना करना उचित नहीं हो सकता। किसी भाई ने अपनी बहन की हत्या कर दी, तो पूरे समाज से राखी थोड़े ही छीन ली जाएगी? बल्कि जब-जब रक्षाबंधन का पर्व आएगा तब-तब अपनी बहनों के प्रति किसी विद्वेष से भरे भाइयों के मन का कुछ कलुष धुलेगा ही।
जब-जब हिंदी दिवस आएगा तो सरकारी दफ्तरों में हिंदी में पत्राचार करनेवालों को कुछ नैतिक बल ही मिलेगा। जब-जब महिला दिवस मनाया जाएगा, तब-तब महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी, अश्लील अथवा संकुचित सोच रखने वाले लोगों की नज़रें नीची ही होंगी।
साल में 365 दिन यदि बिखर-बिखरकर लोग महिलाओं के महत्व पर लिखेंगे तो वह छितराई हुई फुहार होगी जिससे कुछ विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा, किन्तु जब एक दिन ये सारी फुहारें एक साथ मिलकर बरसती हैं तो सोच पर जमी धूल और समाज में पड़े कचरे को बहा ले जाती हैं, धरती का मन तृप्त कर देती हैं और फिर पूरे बरस धरती पर हरियाली दिखाई देती है।
✍️ चिराग़ जैन
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हर इक मर्यादा के उस पार न हो जाएँ
इक रोज़ कहीं हम सब, बीमार न हो जाएँ
लाइक्स और कमेंट्स बटोरने की ललक सोशल मीडिया यूज़र्स से जो न करवा दे, वही कम है। इस होड़ में किसी की चरित्र हत्या होती हो, तो होती रहे; किसी की जीवन भर की साधना पर कालिख़ पुतती हो तो पुत जाये; किसी का जीवन बर्बाद होता हो तो हो जाये; किसी का परिवार नष्ट होता हो तो हो जाये; हमें तो बस इससे मतलब है कि हमारी पोस्ट की रीच कितनी हुई!
और पढ़नेवाले भी इतनी जल्दबाज़ी में रहते हैं कि लिखनेवाले की बात का पूर्णार्थ और भावार्थ ग्रहण किये बिना ही लाइक ठोककर आगे बढ़ जाते हैं। कुछ लोग तो पढ़ने की जेहमत भी नहीं उठाते और हर पोस्ट को लाइक करते हुए अभियान की तरह फेसबुक का दौरा करते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण सोशल मीडिया की विश्वसनीयता और नैतिकता लगभग ध्वंस हो चली है।
इण्डियन आइडियल नामक एक रिएलिटी शो में श्री संतोष आनन्द जी को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया तो संतोष जी के अनुभव तथा जीवन यात्रा को सुनकर लोगों की आँखें भर आईं। इस भावुकता में नेहा कक्कड़ ने संतोष जी को पाँच लाख रुपये की राशि ‘भेंट’ करने की पेशकश की तो संतोष जी ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि ‘मैं बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति हूँ इसलिए यह राशि स्वीकार नहीं कर सकता।’ इस पर नेहा ने रुंधे हुए गले से कहा कि मैं आपकी पोती हूँ और आप मेरी ख़ुशी के लिए यह राशि स्वीकार करें।
इस घटना को कुछ लाइक-लोलुपों ने यह कहकर फेसबुक पर पोस्ट किया कि ‘इतना मशहूर गीतकार भीख मांगकर गुज़ारा कर रहा है।’
उफ़, इस एक शब्द ने नेहा कक्कड़ के वात्सल्य और संतोष आनंद जी के स्वाभिमान; दोनों को गाली दी। हमें याद है जब संतोष जी के परिवार पर सबसे बड़ा दुःख टूटा था तब भी हमने संतोष जी को टूटते हुए नहीं देखा। अपने जवान बेटे की श्रद्धांजलि सभा में जब संतोष जी ने माइक थामा तो उनके बूढ़े जिस्म के सम्मुख उनका आत्मविश्वास तथा उनका जीवट सूर्य की तरह दमक रहा था। जिन संतोष आनंद का जीवन हिम्मत और स्वाभिमान के लिए अलंकृत होना चाहिए उनके जीवन को दया की कहानी बनाने का कुप्रयास किसी पाप से कम नहीं है।
कलाकार समाज की धरोहर भी होता है और उत्तरदायित्व भी। कलाकार समाज के एकाकी क्षणों का सम्बल होता है। कलाकार किसी व्यक्ति के भीतर चल रहे घमासान में उसके आत्मबल की ढाल होता है। न जाने कब, कौन-सी कविता, किसी मनुष्य को आत्मघात से बचा लाती है। न जाने कब कौन-सी पंक्ति किसी मनुष्य को अपराधी होने से रोक लेती है। न जाने कब कौन-सा संगीत भीतर ही भीतर घुट रहे मनुष्य को अभिव्यक्त होने में सहायता कर देता है।
कला की यह सामाजिक उपयोगिता समझनेवाले लोग कलाकारों का सम्मान करते हैं। इन अनुभवों से गुज़रे हुए लोग जब अपने प्रिय कलाकार को कोई राशि अर्पित करते हैं तो वह ‘भीख’ नहीं, ‘भेंट’ कहलाती है। सड़क किनारे ठण्ड में ठिठुर रहे किसी निर्धन के प्रति करुणा से भरकर उसे चादर या कम्बल ओढ़ाने में और अपने पिता को दुःशाला ओढ़ाने में जो अन्तर है; वही अन्तर ‘भीख’ और ‘भेंट’ में है।
सोशल मीडिया की जल्दबाज़ प्रवृत्ति से किसी के स्वाभिमान पर कैसा वज्रपात होता है; काश यह बात लोग समझ सकें।
किसी की निजता को बदनाम करके अपने पेज की रीच बढ़ाना कितना घातक चलन है; काश यह बात लोग समझ सकें।
काश यह बात लोग समझ सकें कि शब्दों के घाव कभी नहीं भरते। काश, कुछ भी लिख देने से पहले यह बात लोग समझ सकें कि संन्यास लेकर भी सम्राट अशोक अपने हाथों मारे गये लोगों को जीवित नहीं कर सके थे।
✍️ चिराग़ जैन
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हिन्दी साहित्य में दो क़िस्म के पाठक होते हैं। पहली श्रेणी है प्रशंसक पाठकों की। वे सोशल मीडिया पर खाता बनाते ही टटोल-टटोल कर लेखकों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं। फिर उनकी हर पोस्ट को देखते ही उसके नीचे कुछ निश्चित शब्दयुग्म पेस्ट करके निकल लेते हैं। इस सबमें ये इतने व्यस्त होते हैं कि इन्हें रचनाएँ पढ़ने की भी फुर्सत नहीं मिल पाती। सुबह उठते ही वे पेंडिंग फाइल्स की तरह रचनाओं पर हस्ताक्षर करने बैठ जाते हैं। ‘वाह’; ‘अद्भुत’; ‘कालजयी’; ‘क़माल’; ‘लाजवाब’ और ‘निःशब्द’ जैसे अनेक शब्द इनके क्लिपबोर्ड पर हमेशा तैयार रहते हैं। इस प्रवृत्ति को देखते हुए फेसबुक ने ‘मान गए गुरु’; ‘सुपर’; ‘यू आर बेस्ट’ और ‘ब्यूटीफुल’ जैसे डिजिटल प्रशंसाक्षरों के एनिमेशन भी बना दिए हैं।
इस श्रेणी के पाठकों ने अनेक कानितकरों को तेंदुलकर होने का भ्रम पलवाया है। लेकिन इनसे भी ख़तरनाक़ होते हैं दूसरी क़िस्म के पाठक। ये भी फेसबुक पर प्रकट होते ही बाक़ायदा रचनाकारों को टटोलते हैं। लेकिन ये प्रथम दिवस से यह माने बैठे होते हैं कि यदि तुलसीदास जी ने मानस की प्रूफ रीडिंग इनसे कराई होती तो मानस आज ब्रह्मांड स्तरीय रचना बन गयी होती।
हर रचना पर प्रतिक्रिया देने की ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ इन्होंने भी उठा रखी होती है। किन्तु ये प्रथम श्रेणी के पाठकों की तरह आलस्य में बिना पढ़े रचना के नीचे अपनी टिप्पणी नहीं लिखते; बल्कि ये तब तक किसी रचना को पढ़ते हैं जब तक इनके भीतर का नामवर जागकर उस रचना से लंबी टिप्पणी तैयार न कर ले। एक बात तय है, इनकी टिप्पणी का सामान्यता एक स्थायी भाव होता है कि तुम बिना बात के कवि/लेखक बने डोल रहे हो और इस जनभावना में अपना स्वर मिलाकर मैं अपने भीतर के रामविलास शर्मा का गला नहीं घोंट सकता।
मेघनाद के निकुम्बरा यज्ञ की भाँति जब इनकी कठिन साधना को भंग करने इनके भीतर स्वयं लेखक बन जाने के वानर कुलबुलाने लगते हैं तब ये अपनी समस्त सृजनात्मक नेगिटीविटी का गट्ठड़ बनाकर मंचीय कवियों अथवा लेखकों के आचरण अथवा जीवन पर कुछ लिखते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि सृजन ‘चाहे कैसा भी हो’ उसके बिम्ब का आकाश रचनाकार की सोच से बड़ा नहीं हो सकता।
फिर अपने लिखे इस ‘कुछ’ की किसी स्थापित साहित्यिक विधा से तुलना करते हुए ये अपनी जंघा पीटने लगते हैं। मांसल जंघा पर हथेली की चपत से जो ध्वनि उत्पन्न होती है उसे ‘घनघोर तालियाँ’ समझकर ये प्रसन्न हो उठते हैं।
इसके बाद इनकी लेखनी यकायक ‘केवट की नौका’ से ‘पुष्पक विमान’ हो जाती है। जिसकी भी पंचवटी में ‘सीता’ सरीखी कोई स्त्री हो, उससे इनका स्वाभाविक वैर हो जाता है।
अब ये दिन भर अपनी शूपर्णखा को त्रिकालसुंदरी घोषित करने के प्रयास में रहते हैं और रात भर सीतायुक्त आंगनों पर पत्थर मारने में व्यस्त रहते हैं। इनके लिखे पर भी वाह-वाह करनेवालों की कभी कमी नहीं होती, क्योंकि प्रथम श्रेणी के पाठकों का क्लिपबोर्ड भी क़ानून की देवी की तरह सबको आँख पर पट्टी बांधकर देखता है।
लेकिन रात में जिन आंगनों पर इनके पत्थर बरसते हैं, उनकी मुस्कुराहटों पर इन निशाचरी खरोंचों के निशान देर तक दिखाई देते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया। इस घटना पर एक तबक़ा पुलिस को साधुवाद देते हुए यह तर्क दे रहा था कि न्याय व्यवस्था की विफलता के कारण पुलिस का यह क़दम तर्कसंगत है। यह शाबासी इस बात की भी गवाही दे रही थी कि यह एनकाउंटर एक वेल प्लैन्ड इंसिडेंट था।
विकास दुबे एनकाउंटर केस में भी लगभग यही तर्क दिये गये और उन बधाई संदेशों में उत्तर प्रदेश सरकार की भूरि-भूरि प्रशंसा से यह प्रतिध्वित हो रहा था कि पुलिस सरकार के निर्देश पर काम कर रही थी और सरकार में शेरदिल व्यक्ति बैठा है इसलिये अपराधी को ऑन द स्पॉट निपटाया जा सका।
किन्तु हाथरस काण्ड में पुलिस द्वारा किये गये अर्द्धरात्रि शवदाह में पुलिस की ग़लती बताकर सरकार ने कुछ पुलिसवालों को सस्पेंड कर दिया। सरकार ने उस परिवार को मुआवज़ा और सरकारी नौकरी दी जिसने कथित रूप से अपनी ही बेटी की हत्या करके उसका आरोप कुछ ‘बेचारे’ बेगुनाहों पर मढ़ दिया।
सलमान ख़ान को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई और चंद घण्टों की भागदौड़ में ही उस ऊँची अदालत ने उसको बरी कर दिया, जिसमें अपील दर्ज कराने में महीनों गुज़र जाते हैं। उस समय यह तर्क दिया गया कि समाजोपयोगी व्यक्ति होने के नाते सलमान ख़ान की रिहाई तर्कसंगत है।
सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के मामले में उसी समाजोपयोगी व्यक्ति सलमान ख़ान के चरित्र को फ़िल्म जगत् का सबसे बड़ा माफिया, नेपोटिज़्म का पोषक और न जाने किन-किन अलंकारों से सुसज्जित किया गया।
कंगना राणावत के दफ़्तर पर बुलडोजर चला, तब बताया गया कि राज्य सरकार सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके निजी द्वेष निकाल रही है। अर्णब गोस्वामी को जेल हुई तो बताया गया कि राज्य सरकार ने पुलिस के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई है। निचली अदालत ने अर्णब गोस्वामी की जमानत रद्द की तो पता चला कि न्यायपालिका राज्य सरकार के इशारे पर काम कर रही है। फिर अदालती कार्रवाई की धीमी गति के नियम को तोड़कर कछुआ, खरगोश की तरह दौड़ा और ताबड़तोड़ अर्णब भैया की जमानत ऊँची अदालत से मंज़ूर हो गयी। हम सुप्रीम कोर्ट के प्रति कृतज्ञता से भर गये। हमने न्याय व्यवस्था की तारीफ़ों के पुल बांध दिये।
काफ़ी कन्फ्यूज़न क्रिएट हो गया है। समझ नहीं आ रहा कि-
1) वास्तव में हमारी न्याय व्यवस्था नपुंसक है या महान है?
2) यदि न्यायालय समाजोपयोगी व्यक्ति की पहचान करने में सक्षम है तो फिर न्याय की मूर्ति की आँखों पर पट्टी बांधने के पीछे क्या उद्देश्य है?
3) विकास दुबे के एनकाउंटर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री को बधाइयाँ क्यों मिलती हैं? फिर हाथरस में पुलिसवाले क्यों सस्पेंड होते हैं?
4) पुलिस द्वारा क़ानून की धज्जियाँ उड़ाकर एनकाउंटर करना कैसे उचित है?
5) यदि निचली अदालत राज्य सरकार के इशारे पर चल सकती है तो ऊँची अदालतें केंद्र सरकार के इशारे पर क्यों नहीं चल सकतीं?
6) हैदराबाद, कानपुर और हाथरस में पुलिस की मनमानी जस्टिफाइड है, तो मुम्बई में पुलिस की मनमानी अन्याय कैसे है?
7) यदि महाराष्ट्र की राज्य सरकार सरकारी विभागों और संवैधानिक संस्थाओं का प्रयोग अपने हित में कर सकती है तो अन्य प्रदेशों की सरकारें और केंद्र में बैठी सरकारें ऐसा क्यों नहीं कर सकती?
और सबसे महत्वपूर्ण जिज्ञासा- यदि हर बार, हर घटना पर मापदंड बदल जाने हैं तो हमारे देश में लिखित संविधान की व्यवस्था क्यों है?
मैं इस देश के लोकतंत्र से इतनी सी अपेक्षा करता हूँ कि हमारे लिखित संविधान से ऊपर कोई भी न हो। यदि समाज में कोई विकृति व्याप्त हो तो हमारे चुने हुए प्रतिनिधि देश की सबसे बड़ी पंचायत में बैठकर उस विकृति के समाधान हेतु लिखित संविधान में आवश्यक परिवर्तन करें और न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक का तमाम तंत्र उसी लिखित संविधान के अनुरूप आचरण करके लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखें। इसके इतर व्यवस्था को जिस भी तरीके से चलाया जायेगा उसका प्रत्यक्ष शिकार भले ही अर्णब हो, कंगना हो या रिया हो… लेकिन परोक्ष रूप से उसका हर वार लोकतंत्र की आत्मा पर ही होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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हम घटना और व्यक्ति में अन्तर करना क्यों नहीं सीख पाते। हमारी मान्यता ऐसी क्यों है कि जिसकी एक ग़लती सिद्ध हो गयी है, वह अन्य सब जगह भी ग़लत ही होगा। एक ही व्यक्ति एक जगह सही और दूसरी जगह ग़लत क्यों नहीं हो सकता।
हमारा समाज लम्बे समय से इस रोग से ग्रस्त है कि जिसे हमने नायक मान लिया उसके प्रत्येक कार्य को सही मान बैठे और जिसका एक कृत्य ग़लत हुआ उसके व्यक्तित्व से घृणा कर बैठे।
इसी प्रवृत्ति का दुष्परिणाम है कि जब कोई किसी राजनैतिक निर्णय का विरोध करता है तो बाक़ी सब लोग यह कहने लगते हैं कि कल तक तो तुम अमुक का समर्थन करते थे, आज विरोध कर रहे हो। यही कारण है कि किसी घटना अथवा निर्णय का विरोध या समर्थन करनेवाले को किसी व्यक्ति का विरोधी या समर्थक घोषित कर दिया जाता है।
हाल ही में हुई अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी के संदर्भ में उठने वाली आवाज़ से अर्नब, शिवसेना, भाजपा, कांग्रेस, राष्ट्रवाद, वामपंथ या अन्य किसी संज्ञा के पक्ष-विपक्ष की प्रतिध्वनि सुनने के प्रयास में हम भारतीय लोकतंत्र की उस बीमारी को अनदेखा कर रहे हैं जो बड़ी तेज़ी से उभरकर पटल पर आना चाह रही है।
अर्नब गोस्वामी की गिरफ़्तारी इस बात का प्रमाण है कि राजनीति अपने विरोधियों को दबाने के लिए कार्यपालिका का प्रयोग करती है। वहीं सुसाइड नोट में नामज़द होने के बावजूद तीन आरोपियों पर कोई कार्रवाई न होना भी इस बात का प्रमाण है कि रसूखदार लोग राजनैतिक प्रभाव से न्याय की मशीनरी से खिलवाड़ कर सकते हैं।
इस घटना से यह एक बार फिर सिद्ध हुआ है कि पुलिस जाँच में जो अपराधी सिद्ध हुआ है, वह निर्दाेष भी हो सकता है और पुलिस जिसे निर्दाेष क़रार देती है वह अपराधी भी हो सकता है। इस घटना से न तो केवल पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगा है, न ही केवल राजनीति की कार्यशैली का पर्दाफ़ाश हुआ है। इस घटना से उस कार्यपालिका की ईमानदारी तथा निष्ठा कठघरे में आ खड़ी हुई है, जिसके हाथों में इस लोकतंत्र ने आंतरिक सुरक्षा का दायित्व सौंपा हुआ है।
प्रश्न न तो किसी उद्धव ठाकरे का है न ही किसी संजय राउत का; मुद्दा न किसी अर्नब का है न ही किसी रिया या कंगना का। प्रश्न यह है कि इस देश में सत्ता पर क़ाबिज़ मस्तिष्कों के हाथ में कठपुतली की तरह नाचता तंत्र इस देश के लोक का कितना और कैसा कल्याण कर सकता है? प्रश्न यह है कि इस देश का कोई भी नागरिक किसी राजनैतिक गलियारे की नज़रों में खटकते ही एक पूरी क़ौम का दुश्मन कैसे बना दिया जाता है। प्रश्न यह है कि जब कोई व्यक्ति समस्त राजनैतिक दलों की समान स्वार्थवादी सोच पर सवाल उठाने की कोशिश करता है तब अचानक उसके चरित्र, उसकी राष्ट्रभक्ति, उसका व्यक्तिगत जीवन और उसकी ईमानदारी के विवाद का शोर क्यों मचने लगता है?
एक अभिनेता के रूप में शत्रुघ्न सिन्हा मेरी पसंद या नापसंद हो सकते हैं, किंतु इस आकलन से मेरी उनके राजनैतिक जीवन के प्रति राय का अनुमान क्यों किया जाता है? एक प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के किसी निर्णय से मैं सहमत या विमत हो सकता हूँ किन्तु इससे उनके व्यक्तित्व के विषय में मेरी राय का आकलन क्यों किया जाता है? मैंने कभी मुनव्वर राणा की शायरी का अनुमोदन किया हो तो इसका यह अर्थ कैसे हो गया कि मुझे उनके विवादित बयानों से भी उतनी ही मुहब्बत होगी?
पुलिस की कार्यशैली से मैं असंतुष्ट हूँ तो इसका यह तात्पर्य कैसे हो गया कि मैं पुलिस रहित समाज का पक्षधर हूँ? न्याय व्यवस्था की धीमी गति और पेचीदा औपचारिकताओं के विरोध में कुछ कहने का यह अर्थ कैसे हो गया कि मुझे न्यायपालिका से रहित अराजक लोकतंत्र चाहिये?
अगर मैं अमुक से नफ़रत नहीं करता हूँ तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि मैं उससे प्यार करता हूँ। ‘हाँ’ का अभाव ‘न’ नहीं है। जीत न पाने का अर्थ हार जाना नहीं है। जीवित न होने का अर्थ मर जाना नहीं है।
हम अपने पूर्वग्रहों के कारण जजमेंटल होने के आदी हो गये हैं। समाज की इसी जल्दबाज़ी का लाभ उठाकर राजनैतिक स्वार्थ साधे जा रहे हैं। आपकी एक उक्ति को संदर्भ बनाकर आपके पूरे जीवन और चरित्र का चित्र प्रस्तुत किया जाता है। और मज़े की बात यह है कि वह उक्ति भी राजनीति के तत्कालीन स्वार्थों के अनुरूप बदलती रहती है।
जब वसुंधरा राजे मैदान में होंगी तो कांग्रेसी कार्यकर्त्ता रानी लक्ष्मीबाई की मदद न करने के ग्वालियर घराने के अपराध गिनाएंगे। जब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे तो भाजपाई उनके खानदान को जी भर-भर कोसेंगे और राष्ट्रद्रोही सिद्ध करेंगे। फिर जब ज्योतिरादित्य भाजपा में आ जाएंगे तो भाजपावालों से सिंधिया खानदान के लिए निर्मित सभी अपशब्द कांग्रेस वाले ख़रीद लेंगे।
नीतीश कुमार, मोदी जी को कम्यूनल कहकर इस हद तक घृणा प्रदर्शित करते हैं कि उनके माध्यम से सहायतार्थ मिलने वाला चंदा भी उनको स्वीकार नहीं होता। बाद में राजनैतिक समीकरण देखते हुए वे ही नीतीश कुमार उन्हीं मोदी जी का फोटो दिखाकर वोट मांगने लगते हैं। सारी ज़िन्दगी कांग्रेस की यशोगाथा गानेवाले सचिन पायलट, अशोक गहलोत के विरुद्ध गाली-गलौज करते हैं और फिर सब रास्ते बन्द होते देख उन्हीं अशोक गहलोत को बुज़ुर्ग बताकर उनकी शरण स्वीकार कर लेते हैं।
स्वार्थों के इस घिनौने खेल में समाज, धर्म, कार्यपालिका, पत्रकारिता और यहाँ तक कि मनुष्यता की भी बोली लगायी जा रही है। भारतीय समाज के हितैषी वे लोग नहीं हैं जो किसी के चाबी भरते ही खिलौने की तरह कलाबाज़ी खाने लगते हैं, बल्कि भारत का भविष्य उन लोगों की ओर निहार रहा है जो नकारखाने में तूती की आवाज़ को भी सुनने की क्षमता रखते हैं।
✍️ चिराग़ जैन