+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

सम्मानित भारत का ड्राफ्ट

किसी भी देश की समृद्धि संसाधनों के समुचित वितरण पर निर्भर करती है। भारत में संसाधनों की बहुतायत के बाद भी ग़रीबी, अव्यवस्था, अपराध, भुखमरी, बेघरी, बेरोज़गारी, अराजकता और रिश्वतखोरी जैसी समस्याएं कम नहीं हो पा रही हैं। सरकारी योजनाएं केवल कोरा प्रचार बनकर रह जाती हैं और जनता की स्थिति जस की तस रहती है। सड़कें चौड़ी की जाती हैं लेकिन जाम कम नहीं होता, रोज़ नए अस्पताल खोले जा रहे हैं लेकिन मरीजों को अस्पतालों के बरामदों में मरना पड़ता है, खूब रेलगाड़ियां चलती हैं लेकिन आरक्षण नहीं मिलता, स्कूल खुलते जा रहे हैं लेकिन एडमिशन की मारामारी है, खेती ख़ूब होती है लेकिन थालियां रीती हैं। हम इन सब समस्याओं का निदान ढूंढने निकलते हैं और राजनैतिक इच्छाशक्ति, भ्रष्टाचार, जमाखोरी और लालफीताशाही की निंदा में उलझ कर रह जाते हैं। सरकारें आत्मप्रचार के लिए अरबों रुपये के विज्ञापन कर देती है और समस्या वहीं की वहीं रहती है। विपक्ष सरकार के कार्यों की आलोचना करता है पर समस्या वहीं की वहीं रहती है। अफ़सर जैसे तैसे काग़ज़ों का पेट भरते भरते ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं पर समस्या वहीं की वहीं रहती है। इतना पैसा, इतनी योजनाएं, इतने अफसर, इतने कर्मचारी, इतनी समाजसेवी संस्थाएं, इतने घोषणापत्र और इतने आंदोलन मिलकर भी देश की किसी समस्या का निदान इसलिए नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि समस्या की जड़ पर कोई चर्चा ही नहीं कर रहा। चमड़ी पर लगे कोढ़ को हटाने के लिए मरहम लेपा जा रहा है पर ख़ून साफ़ करने का उपचार कोई नहीं कर रहा। भारत की किसी भी समस्या को पकड़ कर उसके प्रारंभिक छोर तक कि यात्रा की जाए तो हमें एक ही शब्द दिखाई देगा – “जनसंख्या”। इस एक शब्द के आधार पर भारतीय समस्याओं का मकड़जाल बुना हुआ है। यह एक ऐसी समस्या है जिसको नियंत्रित किये बिना देश के विकास की बातें चुनावी जुमलेबाज़ी से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। हमें हिन्दू-मुस्लिम बनाकर ज़्यादा बच्चे पैदा करने के बयान दिए जाते हैं। यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो ऐसा हर बयान राष्ट्रद्रोह जैसा अपराध है। भारतीय लोकतंत्र में वोट की संख्या को ही सत्ता का मापदंड बना दिया गया है। इसके स्थान पर यदि वोट की गुणवत्ता को तवज्जोह दी जाती तो स्थिति इतनी भयावह कभी नहीं होती। किसी भी परिवार के पहले बच्चे को ही मतदान का अधिकार हो, पहले बच्चे को ही सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, पहले बच्चे की सरकारी नौकरी की गारंटी हो, पहले बच्चे को आयकर में छूट मिले, पहले बच्चे की शिक्षा तथा स्वास्थ्य मुफ्त हो… यह सुनने में थोड़ा कठोर लग सकता है लेकिन सोचने पर ज्ञात होगा कि जानवरों की तरह अस्पतालों, स्टेशनों, फुटपाथों और झुग्गियों में घिसट रहे भारत को सम्मानजनक जीवन देने के लिए इसके सिवाय अन्य कोई उपाय नहीं है। आज ही कि तिथि से ठीक दस माह के बाद की तारीख़ निर्धारित करके सरकार “एक बालक विधेयक” लागू कर दे कि इस तिथि के बाद जो भी बच्चे जन्म लेंगे उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ तभी मिलेगा यदि वे पहली संतान होंगे। यह कानून अब तक जन्म चुके या गर्भस्थ किसी भी मनुष्य के साथ अन्याय किये बिना जनसंख्या नियंत्रण का चमत्कार कर देगा। अभी भी सरकारी नौकरी में मेटरनिटी तथा चाइल्ड केयर लीव के संदर्भ में इस प्रकार के नियम सफलतापूर्वक क्रियान्वित हैं, इसलिए ऐसे नियमों के क्रियान्वयन में कोई विशेष बाधा नहीं आएगी। सरकार के कुल विज्ञापन बजट का तीस प्रतिशत व्यय इस कानून के प्रसार पर ख़र्च हो तो आज से बीस साल बाद हम उस भारत के दर्शन कर पाएंगे जिसके हर नागरिक को सम्मानपूर्ण जीवन का अर्थ पता होगा।

✍️ चिराग़ जैन

मज़ाकिया भारत

हम भारत के लोग बहुत मज़ाकिया हैं, इसलिए हमने भारतीय तंत्र और भारतीय लोकतंत्र दोनों का मज़ाक़ बना दिया है।
हम भारत के लोग संविधान की शपथ लेकर झूठ बोलने में दक्ष हो चुके हैं। हमने इतना विश्वास कमाया है कि जब हम झूठ बोलते हैं तो सब बिना सुने ही समझ जाते हैं कि हम झूठ ही बोल रहे हैं। सब यह भी समझ चुके हैं कि हम किसी भी कीमत पर झूठ बोलना नहीं छोड़ेंगे, इसलिए कोई हमारे झूठ पर ऐतराज भी नहीं करता।
हम भारत के लोग परंपराओं के पोषक हैं। इसलिए हम आज भी जाति, ऊँच-नीच और धर्म के नाम पर बँटे हुए हैं। इस बँटवारे के कारण देश और समाज का बंटाधार होता हो, तो भी हम परंपराओं से मुख मोड़ने वाले नहीं हैं।
हम भारत के लोग परस्पर जुड़े हुए हैं इसलिए अपने दोष देखे बिना दूसरों को दोषी सिद्ध करके प्रसन्न रहते हैं। न्यायालय निर्णय सुनाते हुए प्रशासन को लापरवाह बताकर प्रसन्न है, प्रशासन रिश्वत लेते हुए विधायिका को अपराधी बताकर प्रसन्न है, विधायिका वोट मांगते समय जनता को कामचोर बताकर प्रसन्न है, और जनता कानून तोड़ते समय सबको भ्रष्ट बताकर प्रसन्न है। इस प्रकार हमारा देश एक प्रसन्न राष्ट्र बन चुका है।
हम भारत के लोग कर्मशील हैं, इसलिए हम ऐसी नौकरी की तलाश में रहते हैं जिसमें टेबल के ऊपर और नीचे हर तरफ काम किया जा सके। हम दूसरों को कर्मशील बनाना चाहते हैं अतएव अपनी कर्मण्यता का बखान करने में गर्व की अनुभूति करते हैं।
हम भारत के लोग अपने संविधान तथा तंत्र के प्रति आश्वस्त हैं इसलिए कोई भी अपराध करते हुए निडर रहते हैं। हमारा नेतृत्व तथा मीडिया हमें अपराधी हो जाने के लिए निरंतर प्रेरित करता रहता है। लाखों-करोड़ों रुपयों के घोटाले हमें निरंतर धिक्कारते हैं कि देश के कर्णधार कितना श्रम कर रहे हैं और हम एक अदद कार लोन की भी किश्तें चुकाकर देश के विकास को अवरुद्ध कर रहे हैं।
हम भारत के लोग मंदिर, मस्जिद, गाय, जनेऊ, धर्म, जाति, बुआ, भतीजा, शिवपाल-अखिलेश, उत्तर-दक्षिण, राहुल का धर्म, मोदी की डिग्री और पद्मावती जैसे मुद्दों पर चुनाव करते हैं ताकि विश्व समुदाय को यह संदेश मिले कि हमारे देश में रोटी, कपड़ा, मकान, रोज़गार, सुरक्षा, न्याय, शिक्षा, सड़क, बिजली, पानी जैसी समस्याओं पर पार पा लिया गया है। क्योंकि विश्व समुदाय जानता है कि इन समस्याओं के रहते कोई देश बेमतलब के मुद्दों को तूल नहीं दे सकता। इससे विश्व समुदाय में हमारा सम्मान बढ़ता है।
हम भारत के लोग बेहद भावुक हैं और वर्तमान में जीने में विश्वास रखते हैं। इसलिए किसी भी आतंकवादी घटना के बाद हमें सेना का शौर्य याद आने लगता है। और कुछ ही दिनों में हम चुनाव के खिलवाड़ और नेताओं की गाली-गलौज के चक्कर में व्यस्त होकर सेना को पुनः भुला देते हैं।
हम भारत के लोग देशप्रेमी हैं। इसलिए हर नुक्कड़ पर मोदीभक्त या राहुलभक्त होकर घंटों चर्चा करते हैं। यदि ग़लती से कोई देशभक्त हमारे बीच में बोल पड़े तो उसे कांग्रेस या भाजपा का दलाल सिध्द करने में जुट जाते हैं।
हम भारत के लोग केवल एक प्रश्न स्वयं से कभी नहीं पूछते, कि हमें अपने बच्चों को ईमानदार नागरिक बनने की शिक्षा देनी चाहिए या बेईमान अवसरवादी बनने की?

✍️ चिराग़ जैन

सामान्यीकरण

हम घटनाओं का सामान्यीकरण करने के अभ्यस्त हैं। किसी एक घटना से पूरे व्यक्ति का, किसी एक व्यक्ति से पूरे समुदाय का, किसी एक समुदाय से पूर समाज का और किसी एक समाज से पूरे राष्ट्र का चरित्र आकलन करना हमारा अभ्यास है। इस अभ्यास में हम तर्कहीन हो जाते हैं। प्रत्येक बहस में हम अपनी बुद्धिमत्ता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से कूदते हैं और जब बुद्धिमत्ता बहस से पहले समाप्त हो जाती है तो ऐसे तर्क करने लगते हैं जिनसे सबको पता चल जाए कि हम केवल बुद्धिमत्ता के भरोसे बहस में नहीं आए हैं, देर तक टिके रहने के लिए हमारे पास मूर्खता भी है। संत कबीर नगर में भाजपा के एक सांसद ने भाजपा के ही एक विधायक का अभिनन्दन कर दिया। विवाद का कारण वही था – “तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा सफेद कैसे!” इस सम्मान समारोह में बाकायदा मंत्रोच्चार के बीच अनुशासन की आहुति दी गई। इस घटना को सोशल मीडिया पर ट्रोल करते समय लोग पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। यह ग़लत बात है। किसी भी एक व्यक्ति के आचरण से पूरी पार्टी का आचरण तय नहीं किया जा सकता। कोई भी एक व्यक्ति पूरी विचारधारा का चरित्र नहीं हो सकता। ऐसा करना अपने आकलन के साथ बेईमानी करना है। यह हम पूर्व में भी करते रहे हैं। एक मणिशंकर अय्यर के बयान से पूरी कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। एक साध्वी के बयान से पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं। इस आचरण के कारण लोकतंत्र का जनमत भीड़ के उन्माद में परिवर्तित हो जाता है। यह हमने जातियों में भी किया है। एक गांधी महात्मा हो गए तो सारे गांधी ख़ुद को संत बताने पर उतारू हो गए। एक मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो सारे मोदी देश का पैसा लेकर घूमने निकल लिए। ऐसा करना ग़लत है। एक राहुल गांधी पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं हैं। एक नरेंद्र मोदी पूरी भाजपा का चरित्र नहीं हैं। एक लोहिया के वैचारिक कुनबे में सारे लोहिया जन्म नहीं लेते। अम्बेडकर के बैनर तले इकट्ठा होकर लोग अम्बेडकर के बनाए कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। लोहिया की विरासत को बपौती मानने वाले सत्ता की वसीयत को लेकर सिर फुटव्वल करते मिले। भगवा पहनने से कोई हिन्दू नहीं हो जाता और चरखा चलाने से कोई गांधी नहीं हो जाता। इस बाह्य ढोंग के सहारे ही सियासत की गाड़ी चलती है। हम सब जानते हैं कि मुसलमानों के मंच पर टोपी पहनकर चढ़ने वाले लीडर हिंदुओं के मंच पर पहुँचते ही रामनामी ओढ़ लेते हैं। हम सबको मालूम है कि राहुल गांधी केवल वोट पाने के लिए दलितों के घर खाना खाने गए। हम सबको पता है कि सफाई कर्मियों के पैर धोकर मोदी जी ने चुनावी चाल चली है। हम सबको सब पता है। हम सब कुछ जानकर भी इस अभिनय को चरित्र के झरोखे से निहारते रहते हैं। राहुल गांधी बैंगकॉक जाते हैं, नरेंद्र मोदी मिसेज अम्बानी से हाथ मिलाते हैं, राहुल गांधी ने शादी नहीं की, नरेंद्र मोदी ने पत्नी को छोड़ दिया, राहुल गांधी को भाषण देना नहीं आता, नरेंद्र मोदी ने अमरीका के प्रेजिडेंट को झूला झुलाया, राहुल गांधी के कुर्ते की जेब फटी है, नरेंद्र मोदी का सूट बहुत महंगा है …इन मुद्दों पर हम वोट देते हैं। एक दरवाज़े से निकलता हुआ हर शख़्स एक जैसा हो, यह सम्भव नहीं है। एक बगीचे में उगने वाले सारे फूल एक जैसे नहीं होते। कई बार चमेली भी केवल झाड़ बनकर रह जाती है और कई बार नागफनियों पर भी खूबसूरत फूल खिल जाते हैं। एक ही व्यक्ति एक विषय पर सही और दूसरे विषय पर ग़लत हो सकता है। लेकिन हम इतने जिद्दी हैं कि या तो किसी को शत प्रतिशत सही मानेंगे या शत प्रतिशत ग़लत। हर शख़्स में, हर समुदाय में, हर पंथ में, हर दल में, हर विचारधारा में, हर आंगन में, हर देश में, हर घटना में कुछ सही और कुछ ग़लत ज़रूर होता है। इन दोनों को अलग-अलग न किया जाए तो अंधभक्ति और अंधविरोध जन्म लेता है, सुचारु व्यवस्थाएं नहीं।

✍️ चिराग़ जैन

बापू के नाम पाती!

गांधी!
जब कोई तुम्हें गाली देता है
तब मुझे महसूस होता है
कि जिस देश को
तुमने दूसरा गाल आगे करने का
पाठ पढ़ाया था
उस देश के पास गाल है ही नहीं
सिर्फ़ हाथ हैं
जो तुम्हारे गाल पर
थप्पड़ मार-मार कर
तुम्हारा ही सबक याद करने का
ढोंग कर रहा है।

बापू!
तुम्हारा कृतज्ञता ज्ञापन करने
कोई नहीं आएगा
क्योंकि हम जानते हैं
कि तुमने उन्हें भी बद्दुआ नहीं दी
जिन्होंने तुम्हें पत्थर मारे
इसलिए तुम्हें गाली देने में
कोई ख़तरा नहीं है।

महात्मा!
तुम्हारे सिद्धांत
यतीम होकर भटक रहे हैं
स्वतंत्र भारत में
क्योंकि जिन्होंने तुम्हारे नाम को भुनाकर
सत्ता पाई है
उनके पास इन सिद्धांतों को देखने की
फ़ुर्सत नहीं है
और जो तुम्हारे नाम को भुना न सके
उनके पास इन सिद्धांतों को पालने का
सामर्थ्य नहीं है।

राष्ट्रपिता!
हम तुम्हें आज़ादी का नायक नहीं मानते
क्योंकि हम यह मानते हैं
कि तुम्हें नायक मान लेने से
बाकी सब नायकों का अपमान हो जाएगा
हम बाकी सबको भी
आज़ादी का नायक नहीं मानते
बल्कि हमने झुंड बनाकर
एक एक नायक चुन लिया है

अब हर झुंड
अपने नायक को महान बताते हुए
बाकी सबको गाली देता है
ताकि किसी भी नायक को ऐसा न लगे
कि उसके लिए इस देश में कोई लड़ नहीं रहा।

हे देवदूत!
मैं राजघाट पर तुम्हें पुष्पांजलि देने
कभी नहीं आऊंगा
क्योंकि मैं जानता हूँ
कि तुम वहाँ हो ही नहीं।
क्योंकि मैं जानता हूँ
कि तुम नज़रें झुकाकर जा चुके हो
ये देश छोड़कर

कई बार…।
कई बार तुम्हारी हताश उच्छ्वासों ने
उच्चारा है – “हे राम!”

✍️ चिराग़ जैन

हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।

हवा में
ज़हर घुलता जा रहा है।

वो सारी गंदगी
जो आग के ज़रिए
हवाओं में कहीं ग़ुम हो गई थी;
वही अब साँस के ज़रिए
हमारे फेफड़ों में जम रही है।
हमारी साँस की सरगम सुनाती धौंकनी से
अचानक आह की आवाज़ आने लग गई है।

कोई तो है
जो अपने साथ बीती ज़्यादती का
हमारी नस्ल से दिन-रात बदला ले रहा है।
कोई तो है
जो हमसे ही हमारी कौम को बर्बाद करने के लिए
बारूद-असला ले रहा है।

कोई तो है जिसे मालूम है
कमरे को ठंडा कर रहे
हर देवता का दूसरा चेहरा
बड़ा भभका उठाता है।
कोई तो है जिसे एहसास है
हर आँख में पलती
हर इक अय्याश हसरत की
कोई मजलूम ही क़ीमत चुकाता है।

हमारा ढोंग खुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।

सुना है
पेड़ बादल को बुलाने के लिए
बाँहें उठाते थे।
सुना है प्यास से थक कर परिंदे
बारिशों की मिन्नतों के गीत गाते थे।
सुना है
सर्दियों में खेत कोहरे की रिजाई ओढ़ लेते थे।
सुना है
फूल गुलशन में टहलती तितलियों को
रोक लेने की सुबह से होड़ लेते थे।

सुना है
एक मुद्दत से किसी भी फूल से मिलने
कोई तितली नहीं आई।
सुना है
एक अरसे से
सिमटते जा रहे तालाब पर
बदली नहीं छाई।
सुना है
पूस की ठंडी ठिठुरती रात में भी
खेत नँगा सो रहा है।
सुना है कोयलें सब ग़ैर-हाज़िर हो चुकी हैं;
सुना है बांझ होते जा रहे फलदार पेड़ों की
पुराना बाग़ लाशें ढो रहा है।

सुना है
हर नदी नाराज़ हैं।
हवाएं रोज़ बेइज़्ज़त हुई हैं।
ज़मीं के ख़ूबसूरत जिस्म पर
तेज़ाब फेंका है हमारी हसरतों ने।
सुना है पेड़ अब इस बेअदब इंसान को
छाया नहीं देते।

जिन्हें हम पूजते थे देवता कहकर
बहुत बेफ़िक्र थे हम लोग जिस आगोश में रहकर
सुकूँ देता था जिनका साथ, जिनका संग
बहुत गहरा था जो इक दोस्ती का रंग

वो गहरा रंग धुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!