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अनूप जलोटा का निजी जीवन

रोज़गार की प्रवृत्ति से व्यक्ति की प्रवृत्ति का आकलन करना हमारी पुरानी आदत है। पूरी वर्ण-व्यवस्था इसी आदत की देन थी। इसी आदत के चलते हम कथावाचकों को संत मानने लगे। हम यह सोच ही न पाए कि किसी कहानी को रोचक ढंग से कहने के लिए क़िस्सागोई का अभ्यास किया जाता है, भक्ति का नहीं। इसी भ्रांति ने धर्म का सत्यानाश किया है। धर्मस्थलों की देखरेख के लिए नियुक्त केयरटेकर को हमने धर्म का ठेकेदार समझ लिया। धीरे-धीरे हम सन्त-फ़क़ीरों और धर्म में रोज़गार तलाशने वालों के मध्य भेद करने की क्षमता खो बैठे।
ठीक ऐसा ही हम अनूप जलोटा प्रकरण में कर रहे हैं। अनूप जलोटा एक श्रेष्ठ गायक हैं। उन्होंने ग़ज़ल गायकी में हाथ आजमाए लेकिन उनकी आवाज़ भजन के लिए अधिक उपयुक्त थी, इसलिए उन्होंने भजन गाना शुरू कर दिया। लेकिन हम उन्हें आध्यात्मिक पुरुष मान बैठे। जैसे हम जागरण में भजन गानेवाले आर्केस्ट्रा आर्टिस्ट को माता का भक्त मान बैठते हैं और भेंट चढ़ाकर उनसे आशीर्वाद की अपेक्षा करते हैं।
इस अंतर को समझना होगा। बिग बॉस में इस बार जोड़ी की एंट्री होनी थी। अनूप जी से भी जोड़ी से ही एंट्री मंगवाई गई होगी। एक भजन गायक की कम उम्र की प्रेमिका वह भी तीन असफल विवाह सम्बन्धों के बाद… इस परिस्थिति में बिगबॉस के निर्माताओं को रोचक तत्व दिखाई दिया। यही रोचकता तलाशकर टीआरपी का धंधा करना रिएलिटी शो बनानेवालों का रोज़गार है।
कोई व्यक्ति अपना रोज़गार कैसे करता है, कितनी ईमानदारी से करता है; इन्हीं प्रश्नों की चर्चा महत्वपूर्ण है। कोई अपने व्यक्तिगत जीवन में क्या करता है इससे उसके रोज़गार पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विश्व भर को चमत्कृत करनेवाले आइंस्टाइन को उनके परिवार ने एक बेहद ग़ैर-ज़िम्मेदार व्यक्ति घोषित किया था। किसी के व्यक्तिगत जीवन से उसकी प्रतिभा, उसके सामाजिक जीवन, उसके रोज़गार का आकलन करेंगे तो हम युगों के बहुत क़ीमती रत्न खो देंगे क्योंकि हर हीरा अपने निजी जीवन में केवल एक पत्थर होता है।

✍️ चिराग़ जैन

ज्ञान की सजावट

भारत में समाज सुधारकों की भरमार रही है लेकिन समाज सुधर न सका। इसका यह अर्थ नहीं है कि समाज सुधारकों के मन में कोई बेईमानी थी। इसका कारण यह है कि हमारी ग्राह्यता और उनकी सम्प्रेषणीयता में तारतम्य नहीं था। यदि ऐसा न होता तो एक नानक ही पर्याप्त थे समूची मानवता के लिए। एक महावीर ही बहुत थे प्राणिमात्र के चित्त में अहिंसा की प्रतिष्ठापना के लिए। एक तथागत के बाद अन्य किसी की आवश्यकता ही न होती। ये सब निष्ठा और ऊर्जा के चरम पर पहुँचे हुए लोग थे।
किन्तु हमारी ग्राह्यता इतनी क्षमतावान न हो सकी। हम समझने में चूक कर गए। हम वह सुन ही न सके जो इन सुधारकों ने कहा। हम उनके तत्पर्यों से दाएँ-बाएँ होते रहे। हमने अपने-अपने अर्थ गढ़ लिए।
उन्होंने कहा- ‘कन्या भ्रूण हत्या न करो’। हमने सुना- ‘कन्या के अतिरिक्त सबकी भ्रूण हत्या कर दो।’ उन्होंने कहा- ‘स्त्री को कमज़ोर मत समझो।’ हमने सुना- ‘कमज़ोर तो पुरुष है, उसे कुचल दो।’ उन्होंने कहा- ‘मज़हब के नाम पर मत लड़ो।’ हमने सुना- ‘अन्य किसी भी कारण से लड़ते रहो।’ उन्होंने कहा- ‘दहेज के लिए वधू को मत मारो।’ हमने सुना- ‘दहेज के ऐसे क़ानून बना दो कि वर को मारा जा सके।’
हमने वो सुना ही नहीं, जो वे कहना चाहते थे। उन्होंने सती प्रथा की कुरीति का विरोध किया। किसी जीते जागते प्राणी को चिता में झोंक देने की परंपरा का विरोध किया। उन्होंने विधवा स्त्रियों पर किये जाने वाले अत्याचारों के विरोध किया। लेकिन उन्होंने ऐसा कदापि नहीं कहा कि किसी विधवा स्त्री को उच्छृंखल होने दिया जाय। उन्होंने यह कतई नहीं कहा कि वैधव्य सहानुभूति अर्जित करने का ज़रिया बना दिया जाय।
उन्होंने जाति प्रथा का विरोध किया। मनुष्य को मनुष्य समझने की वक़ालत की। किन्तु हमने उनके इस प्रयास को पलट दिया। हमने पूर्व में शोषित होते रहे मनुष्यों के वंशजों को पूर्व के सवर्ण समुदाय की संतानों से बदला लेने के मार्ग खोल दिये। जिन्हें संभ्रांत बनाना था, उन्हें अराजक बनाने पर तुल गए हम।
नारियों को क़ानून के तराजू पर समानांतर रखने को कहा गया तो हमने क़ानून का तराजू ही झुका दिया। हमने नारी को इतनी हिम्मत न दी कि वह उचककर न्याय तंत्र को छू सके बल्कि हमने न्याय का संतुलित वृक्ष ही नारी के क़दमों में झुका डाला। अब अन्याय उलट गया। एक ही ओर झुकी-झुकी न्याय प्रक्रिया कुबड़ी हो गई है। हम समस्याओं का समाधान ढूंढते-ढूंढते समाधान को समस्या बना बैठे।
हम समझ ही न सके कि धरती पर न होने का अर्थ आकाश में होना नहीं है। लेकिन हम युगों-युगों से धरती से अनुपस्थित लोगों को तारों में ढूंढने की प्रक्रिया में व्यस्त हैं। हम मान बैठे हैं कि यदि कोई आस्तिक नहीं है तो वह नास्तिक ही होगा। हमने धारणा बना ली है कि जो इस्लाम को नहीं मानता वह क़ाफ़िर ही होगा। हम आश्वस्त हो गए हैं कि जो सत्य नहीं बोलता वह असत्य अवश्य बोलेगा।
कैसी मूर्खतापूर्ण मान्यता है। किसी ने कहा कि फलां धर्म का सम्मान करो, और हमने सुना कि बाकी सब धर्मों का अपमान करो। किसी ने कहा कि फलां धर्मग्रंथ में सब सच लिखा है और हम मान बैठे कि बाकी सब ग्रंथ झूठे हैं।
चूक सुधारकों से भी हुई है। उन्होंने प्रापक के स्तर को समझे बिना, उसकी समझ की फ्रीक्वेंसी को मापे बिना ही संदेश भेज दिया। यह समझा ही नहीं कि हवाई जहाज से जाने वाली डाक उस स्थान पर नहीं भेजनी चाहिए जहाँ हवाई अड्डा ही न बना है। संदेश का माध्यम क्या है यह कतई महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए, बल्कि संदेश का प्रभाव कितना है इसको मापदंड बनाना चाहिए।
विशेषणों ने बड़े विचारों की हत्या कर दी। सीधे कहना चाहिए था कि भ्रूण हत्या न करो। बस, बात यहीं सम्पन्न हो जाती। इसमें कन्या या कुमार का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए था। आपको स्पष्ट बोलना था कि न्याय निष्पक्ष होना चाहिए। इसमें स्त्री, पुरुष, दलित, सवर्ण, गोरा, काला जैसे शब्द जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं थी। साफ-साफ कह देते कि मांसाहार न करो। इसमें गाय, सूअर, बकरा, कुत्ता न जोड़ते तो संदेश समाधान बन जाता।
ज्ञान की सजावट के चक्कर में आपने समाधान को समस्या बना दिया। आज तक हमने इस ढर्रे को बदला नहीं है। हम अभी तक विशेषणों की लुटिया में समाधान का सागर भरने की होड़ कर रहे हैं और यही कारण है कि हर सामाजिक आंदोलन की लुटिया डूबती जा रही है।

✍️ चिराग़ जैन

संजू

आरोप को अपराध मानकर किसी के प्रति राय क़ायम कर लेने की हमारी सामान्य प्रवृत्ति किसी के जीवन को किस हद्द तक चुनौतियों से बेन्ध सकती है -इसी तथ्य की प्रामाणिक कथा है संजू। मीडिया इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाकर जनमानस की मानसिक लतों का पोषण करता हुआ अपना गुजर-बसर कर रहा है।
हम कुछ परंपरागत अफवाहों को सच मानते हुए अपनी कई पीढ़ियाँ बर्बाद कर चुके हैं। अफवाहों के इसी हवनकुण्ड में कई महत्वपूर्ण जिंदगियां स्वाहा करने में हम कभी हिचकते भी नहीं हैं। संजय दत्त ऐसे ही हवन कुंड में भस्म हुई एक ऐसी प्रतिभा का नाम है जिसने उतार-चढ़ाव के अनेक आश्चर्यजनक दौर जिये।
संजू फ़िल्म हर उस ख़बर पर एक प्रश्नचिन्ह है जिसने डेढ़ मिनिट की सनसनी के चक्कर में एक मुकम्मल ज़िन्दगी तबाह कर डाली। सामाजिक जीवन जीने वालों के व्यक्तिगत चरित्र की पड़ताल करना और उसके विषय में कहानियों की फसलें बोने में हमे बड़ा मजा आता है। आश्चर्य यह है कि किसी पर आरोप लगाकर उसकी चरित्र-हत्या करने वाला मीडिया आज तक कभी किसी की ज़िंदगी बर्बाद करने के बाद क्षमायाचना करने भी प्रकट न हो सका।
अदालतों में चल रही सुनवाई को दरकिनार कर फैसले सुनाने वाले मीडिया की घिनौनी तस्वीर का पर्दाफाश किया गया है इस फ़िल्म ने। फ़िल्म को देखकर संजय दत्त के प्रति संवेदना जन्मती है और सुनील दत्त के प्रति सम्मान। चुनौतियों से जूझने की प्रवृत्ति और कभी न थकने का जज़्बा उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष था जिसे अब से पहले न तो किसी न्यूज़ चैनल ने स्पेशल स्टोरी बनाकर दिखाया था न ही किसी गॉसिप मैगज़ीन ने। कमलेश उर्फ परेश जैसे किसी दोस्त का रिश्ता संजय दत्त की किस्मत से ईर्ष्या उत्पन्न करता है।
मज़े की बात यह है कि संजय दत्त के रोम-रोम पर नज़र रखने वाली मीडिया को उनके इस साए का कभी आभास न हुआ। ड्रग पेडलर्स कैसे काम करते हैं और बचपन पर अधिक अनुशासन कैसा असर डालता है -इन दोनों सवालों को बहुत करीने से फ़िल्म में पेश किया गया है। सिल्क स्मिता के बाद सम्भवतः पहली बार किसी भारतीय सिने स्टार की बायोपिक बनी है। बदनाम ज़िन्दगियों के अनकहे पहलुओं को उजागर करती ये दोनों ही फिल्में यह तो सिद्ध करती हैं कि अखबारों के समझाने पर जिसे हम बुरा आदमी कहकर छोड़ देते हैं उसके भीतर भी काफ़ी कुछ अच्छा छुपा होता है जिसे देखने के लिए उसके साथ कुछ वक़्त बिताने की दरकार होती है।

✍️ चिराग़ जैन

त्रिशंकु

एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ
सरगम गाने वाली वीणा
किसको अपनी पीर सुनाएँ

ऊपर अनगिन फूल खिले हैं
जिनकी देह सुगंध बिखेरे
भीतर जड़ में गंधियाते हैं
पत्तों की लाशों के डेरे
जितनी बढ़ती उमस जड़ों की
उतने फूल महकते जाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ

कलकल करती जिस धारा की
घाटों पर पूजा होती है
वो निश्छल नदिया बेचारी
उद्गम पर रिस-रिस रोती है
अंत, गरजता खारापन है
आदि, गलन से ग्रसित शिलाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ

असुरों के संहारक राजा
कोपभवन से हार गए हैं
दुनिया का मन जीत लिया पर
अंतर्मन से हार गए हैं
घर की चैखट पर टूटी हैं
कितनी अपराजेय ध्वजाएँ
एक तरफ़ अभिनन्दन जग का
एक तरफ़ घर की चिन्ताएँ

✍️ चिराग़ जैन

वीरे दी वेडिंग

“वीरे दी वेडिंग” चार लड़कियों की कहानी हैं जिन्हें बारहवीं कक्षा की परीक्षा सम्पन्न होने की ख़ुशी में घरवाले घर में शराब पार्टी अरेंज करके देते हैं। पहली लड़की विवाह से पूर्व अपने बॉस से सेक्स सम्बन्ध बनाती है। यह लड़की अपनी सहेलियों के कहने पर अपने मंगेतर को भरी महफ़िल में किस करने की कोशिश करती है और जब मंगेतर इस पर ऐतराज करता है तो सरे-आम उसको माँ की गाली देती है। यही लड़की अपनी सहेली की शादी के बीच से निकल कर एक ऐसे लड़के के साथ जाकर सो जाती है जिसका वह नाम भी नहीं जानती। .
दूसरी लड़की का पति उसे हस्त-मैथुन करते हुए पकड़ लेता है। वह लड़की अपने पति को छोड़कर अपने पिता के घर लौट आती है। यह लड़की अपनी सहेली को इस बात पर ताना देती है कि वह किसी से सेक्स किये बिना शादी कैसे कर सकती है। यह लड़की अपने पिता को बताती है कि उसके पति ने उसे क्यों छोड़ दिया तो उसका पिता उसे कहता है “मुझे पहले बताना था, तेरे पति को तो मैं लटका दूँगा।”
तीसरी लड़की अपनी सहेली को बताती है कि टेस्ट ड्राइव किये बिना तो मैं गाड़ी भी न लूँ फिर तू पति कैसे ले सकती है। चौथी लड़की अपने प्रेमी से इस बात पर आश्चर्य जताती है कि जब हम दो साल से साथ रह रहे हैं तो फिर तू शादी क्यों करना चाहता है! ये चारों लड़कियां बेहद सभ्य परिवारों से आती हैं इसलिए “फ़िल्म की स्क्रिप्ट की तथाकथित डिमांड पर” हिंदी भाषा के कुछ अश्लील शब्द जिन्हें हम गाली कहते हैं उनको बीप कर दिया गया है। लेकिन इन्हीं लड़कियों ने फ़िल्म में कुछ अंग्रेजी की शब्दावली का प्रयोग भी किया है।
अंग्रेजी वह पतित पावनी है जिसमें नहाकर अश्लीलता भी स्टेटस सिंबल बन जाती है। इसीलिए पूरी फिल्म में बार बार FUCK, ASS, SHIT जैसे पवित्र शब्दों को सेंसर ने स्वीकार कर लिया। “मेरी लेले”; “तेरी लेने के लिए डिग्री भी चाहिए”; “उसे अपनी तीसहजारी दिखा दे”; “चढ़ जा”; “तूने बॉस को ठोक दिया”; “अपना हाथ जगन्नाथ”; ओ हेलो, हमारा भी ले लो” और “मेरी फटी पड़ी है” जैसे संवाद इन चारों लड़कियों के मुँह से उचर कर फ़िल्म की और स्त्री अस्मिता की शोभा बढ़ा रहे हैं।
जब-जब इन भौंडे संवादों और अश्लील इशारों पर सिनेमा हॉल में सीटियां गूंजी तब-तब मुझे नारी सशक्तिकरण के अभियान अपने मुँह पर कालिख पोते खड़े दिखाई दिए। जब जब फ़िल्म में सोनम कपूर पर उसकी सहेलियों ने अश्लील कमेंट किये तब तब लड़की को घूरने पर भी उसे प्रताड़ना मानने वाला कानून और अधिक अंधा प्रतीत हुआ। जब स्वरा भास्कर के हस्तमैथुन दृश्य पर सिनेमा हॉल का अंधेरा सिसकारियों से भर गया तब तब मुझे “नारी-सम्मान” के नारे लूले नज़र आने लगे।
कानून कहता है कि किसी स्त्री को अश्लील इशारे करना या उसे अश्लील सामग्री दिखाना अपराध है। लेकिन फ़िल्म की चारों अबला नारियाँ फुकेट में नंगे नाच देखने जाएँ तो यह बोल्डनेस है। इस फ़िल्म में प्रदर्शित लड़कियां समाज के जिस चेहरे का चित्र उतार रही हैं उसे देखकर कानून, मर्यादा, समाज और संस्कृति के परदों के पीछे जारी सभ्यता के इस भौंडे नाटक का यवनिका पतन हो जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

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