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नए साल में राजनीति

बार-बार हारने के बाद भी आखिरकार
राहुल जी जीतने लगे हैं हर चाल में
उन्नीस में थोड़ा देख-भालकर फेंकियेगा
खुद ही न फँस जाओ जुमलों के जाल में
कांग्रेसियों को भी संभलकर चलना है
डूबने न लग जाओ, अगले उछाल में
गाय, गधे, घोड़े छोड़कर अब यह सोचो
ऊँट किस करवट बैठे नए साल में

✍️ चिराग़ जैन

चुनाव आ गए

अभी सबके ही पत्ते खुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
सारे नेता सड़क पर मिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

पहला युद्ध टिकट बँटने का हर दल के भीतर होगा
दलबदलू मौका ढूंढेंगे, किस दल में बेहतर होगा
भाषण, रैली, वादे, गाली, पग-पग ये मंज़र होगा
टोपी और किसी की होगी, और किसी का सर होगा
अब तो पानी में पत्थर घुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
अभी सबके ही पत्ते खुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

देशप्रेम का रोज़ दिखेगा कोरा ड्रामा, हंगामा
वादे झूठे, जुमले झूठे, झूठा जामा हंगामा
कोई है बेटा जनता का, कोई मामा हंगामा
हर छुटभैया नेता कूदे पहन पजामा, हंगामा
सबके खद्दर के कुर्ते सिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
सारे नेता सड़क पर मिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

बीजेपी को रामलला की याद आएगी वोटिंग है
कट्टर दुश्मन से भी हाथ मिला आएगी वोटिंग है
कांग्रेस की करतूतों को गिनवाएगी वोटिंग है
जो भी प्रश्न करोगे उसको भटकाएगी वोटिंग है
असली मुद्दे सड़क पर रुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
अभी सबके ही पत्ते खुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

राहुल बाबा को भगवान बनाने निकले कांग्रेसी
जनता को इक गुड्डे से बहलाने निकले कांग्रेसी
बीजेपी के सारे पाप गिनाने निकले कांग्रेसी
नौ सौ चूहे खाकर हज को जाने निकले कांग्रेसी
अब तो कीचड़ से कपड़े धुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
अभी सबके ही पत्ते खुलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

एक अकेले राहुल गांधी कितना काम करें भैया
पार्टी के हर इक खेमे का युद्ध विराम करें भैया
कुर्ते की बाजू ऊपर करके संग्राम करें भैया
दिन में रैली रात में बैठक, कब विश्राम करें भैया
जन समर्थन में पापड़ बिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
सारे नेता सड़क पर मिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

शाम-सवेरे दाग़ रहे जुमलों के गोले मोदी जी
अपने खातों पर रखते हैं सबके झोले मोदी जी
डमरू लेकर कर देते हैं भम भम भोले मोदी जी
हर रैली में मित्रो-मित्रो करते डोले मोदी जी
राहुल बाबा पे जम कर पिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
सारे नेता सड़क पर मिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

मनमानी वाले कर पाएं सीएम पद की सैर नहीं
जनता से पूछा तो बोली कांग्रेसी भी ग़ैर नहीं
हम उनको कैसे चुन लें जो भू पर धरते पैर नहीं
मोदी जी से वैर नहीं पर रानी जी की ख़ैर नहीं
हाय इनके न नखरे झिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए
सारे नेता सड़क पर मिलेंगे
कि देश में चुनाव आ गए

✍️ चिराग़ जैन

प्यार कहाँ खो बैठे

जिसको छू लेने से मन की महक गुलाबी हो जाती थी
जिसमें आँखें बतियाती थीं, हम वो प्यार कहाँ खो बैठे
जिसके दम पर हम दोनों का अपनापन गहरा होता था
जो हमको इक-दूजे पर था, वो अधिकार कहाँ खो बैठे

जाने कैसी ज़िद्द पनपी है, संवादों का स्वर ऐंठा है
तन पर मन भर बोझ चढ़ा है, मन ऐसा तन कर बैठा है
ख़ुशियों की क्यारी जिसके आलिंगन में फूला करती थी
जिसमें रिश्ता पंख पसारे, वो विस्तार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

बातें करने बैठ गए तो फिर बातों का छोर नहीं था
नयनों में बस मुस्कानों का डेरा था, कुछ और नहीं था
जो छोटी सी दुनिया हमको, दुनिया से अच्छी लगती थी
जिसमें अपने सब अपने थे, वो संसार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

आपस की सरगम ऐसी थी, खटपट से भी सुर सजते थे
पल भर सन्नाटा होता था, फिर घंटों नूपुर बजते थे
जो धागा हम-तुम दोनों को आपस में बांधे रखता था
जिससे हम हर बार जुड़े थे, वो इस बार कहाँ खो बैठे
हम वो प्यार कहाँ खो बैठे

✍️ चिराग़ जैन

पुरुषोचित

जनक ने कहा-
“प्रत्यंचा चढ़ाओ!”
तुमने धनुष ही तोड़ दिया।

जनता ने कहा-
“धोबी की पत्नी को न्याय दिलाओ!”
तुमने अपनी पत्नी को ही छोड़ दिया।

धनुष तोड़ कर सीता को तो वर लाए
फिर कभी सुधि नहीं ली
उस टूटे वरदान की,
सीता को त्याग कर उदाहरण तो बन गए
लेकिन चिंता नहीं की
अर्धांगिनी के सम्मान की।

मांगलिक कार्यों में
शस्त्र का खण्डन
और ऋषि का कोप
अपशकुन था राम जी!
और सँवारने की कोशिश में
बिगाड़ कर छोड़ देना
तुम्हारा पुरुषोचित गुण था राम जी!

✍️ चिराग़ जैन

हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।

हवा में
ज़हर घुलता जा रहा है।

वो सारी गंदगी
जो आग के ज़रिए
हवाओं में कहीं ग़ुम हो गई थी;
वही अब साँस के ज़रिए
हमारे फेफड़ों में जम रही है।
हमारी साँस की सरगम सुनाती धौंकनी से
अचानक आह की आवाज़ आने लग गई है।

कोई तो है
जो अपने साथ बीती ज़्यादती का
हमारी नस्ल से दिन-रात बदला ले रहा है।
कोई तो है
जो हमसे ही हमारी कौम को बर्बाद करने के लिए
बारूद-असला ले रहा है।

कोई तो है जिसे मालूम है
कमरे को ठंडा कर रहे
हर देवता का दूसरा चेहरा
बड़ा भभका उठाता है।
कोई तो है जिसे एहसास है
हर आँख में पलती
हर इक अय्याश हसरत की
कोई मजलूम ही क़ीमत चुकाता है।

हमारा ढोंग खुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।

सुना है
पेड़ बादल को बुलाने के लिए
बाँहें उठाते थे।
सुना है प्यास से थक कर परिंदे
बारिशों की मिन्नतों के गीत गाते थे।
सुना है
सर्दियों में खेत कोहरे की रिजाई ओढ़ लेते थे।
सुना है
फूल गुलशन में टहलती तितलियों को
रोक लेने की सुबह से होड़ लेते थे।

सुना है
एक मुद्दत से किसी भी फूल से मिलने
कोई तितली नहीं आई।
सुना है
एक अरसे से
सिमटते जा रहे तालाब पर
बदली नहीं छाई।
सुना है
पूस की ठंडी ठिठुरती रात में भी
खेत नँगा सो रहा है।
सुना है कोयलें सब ग़ैर-हाज़िर हो चुकी हैं;
सुना है बांझ होते जा रहे फलदार पेड़ों की
पुराना बाग़ लाशें ढो रहा है।

सुना है
हर नदी नाराज़ हैं।
हवाएं रोज़ बेइज़्ज़त हुई हैं।
ज़मीं के ख़ूबसूरत जिस्म पर
तेज़ाब फेंका है हमारी हसरतों ने।
सुना है पेड़ अब इस बेअदब इंसान को
छाया नहीं देते।

जिन्हें हम पूजते थे देवता कहकर
बहुत बेफ़िक्र थे हम लोग जिस आगोश में रहकर
सुकूँ देता था जिनका साथ, जिनका संग
बहुत गहरा था जो इक दोस्ती का रंग

वो गहरा रंग धुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है

✍️ चिराग़ जैन

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