+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

क्या करोगे

कहाँ तक झूठ का पर्दा करोगे
कभी तो झील में चेहरा करोगे

बिछाकर जाल दाना डालता है
तो क्या सय्याद का सजदा करोगे?

कराहों को दबाया जा रहा है
कहीं चीखें उठीं तो क्या करोगे

सुना है भूख शर्मिंदा हुई है
हवस को कब तलक पूरा करोगे

अगर ज़िल्लत की आदत पड़ गई तो
फिर ऐसी ज़िन्दगी का क्या करोगे

उजालों को मिटा कर देख लेना
अंधेरे में तुम्हीं रोया करोगे

✍️ चिराग़ जैन

दुर्घटना : एक अवसर

एक फिल्मी सितारे ने अपने घर में फाँसी लगा ली। ख़बर सुनकर देश सन्न रह गया, लेकिन एक विशेष वर्ग ने उसके फिल्मी क़िरदार को लेकर उसे अपने धर्म का विरोधी घोषित किया और उसकी मृत्यु पर शोक न करने के संदेश सोशल मीडिया पर लिखे।
बाद में दो दलों के राजनैतिक हित टकराए और उस आत्महत्या को हत्या कहकर मुद्दे को हवा दी गई। कोरोना को ढाल बनाकर दूसरी स्टेट के पुलिस अधिकारी को क्वेरेन्टीन कर दिया गया। फिर सीबीआई, फिर नारकोटिक्स, फिर रिया की गिरफ़्तारी, फिर कंगना राणावत, फिर पूरे बॉलीवुड का ड्रग्स एंगल, फिर बॉलीवुड को उत्तर प्रदेश लाने की बात! पोस्टमार्टम रपट पर संदेह करके पोस्टमार्टम रपट का पोस्टमार्टम कराया गया। जिन्होंने सुशांत को अपने धर्म का विरोधी बताया था, उन्होंने ही बिहार में सुशांत राजपूत के चित्र दिखाकर वोट मांगे। और इतने सब ड्रामे के बाद सीबीआई को आत्महत्या के एंगल से जाँच करने के लिए नियुक्त किया गया।
कहीं कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटती है तो राजनीति की आँखों में आँसू नहीं, चमक आती है। उत्तर प्रदेश में बलात्कार हो तो भाजपा विरोधी राजनीतिज्ञ ख़ुश हो गए कि योगी सरकार को घेरने का मौक़ा मिल गया। अलवर में बलात्कार हो गया तो भाजपा ने राहत की साँस ली कि अब जब कोई हाथरस की बीन बजाएगा तो हम अलवर का नगाड़ा पीट कर उसकी आवाज़ को दबा देंगे।
विश्वास कीजिये, ये सब घटनाएँ राजनीति के लिये ‘अवसर’ से अधिक कुछ नहीं हैं। आज पाँच पुलिसवाले सस्पेंड कर दिए गए, ताकि हम सरकार की वाहवाही कर सकें। हम यह कभी नहीं समझेंगे कि जब तक राजनीति के रिमोट पर उंगली नहीं लगती, तब तक न तो पुलिस हिलती है न ही प्रशासन! डीएम का निलंबन भी हो जाए तो रिमोट पर उंगलियाँ तो वही रहेंगी।
इस हंगामे के बीच हम पुलिस के रवैये पर इतने फोकस्ड हो गए हैं कि अपराधियों पर किसी का ध्यान ही नहीं है। और यह वही पुलिस है जिसकी गाड़ी पलटने पर हुए एनकाउंटर की घटना पर उसके गुण गाए जा रहे थे। उन्नाव हो या जयपुर; दिल्ली हो या मुम्बई; राजनीति, मुद्दों की खरपतवार में सत्ता का फल ढूंढ ही लेती है।
हमारा दुर्भाग्य यह है कि जब ये सब राजनैतिक दल खरपतवार में घुसकर सत्ता का फल ढूंढ रहे होते हैं तब हम यह भ्रम पाल लेते हैं कि ये खेत को खरपतवार से मुक्त करने के लिए मेहनत कर रहे हैं। यह इनकी आपसी खेल भावना है कि हारनेवाला भी कभी यह भेद नहीं खोलता कि खेत में दरअस्ल हुआ क्या था।
जनता, इस राजनैतिक खिलवाड़ के लिए आपस में दुश्मनी पालने की बजाय, यदि केवल मौन रहना भी शुरू कर दे तो राजनीति के हाथों देश का छला जाना बंद हो जाएगा। क्योंकि जब जनता आपस में लड़ने लगती है, तो राजनीति के पासों की आवाज़ सुनाई नहीं देती।

✍️ चिराग़ जैन

रात के अंधेरे में

सुना है कि चिरैया के नुचे हुए पंखों को उसके घोंसले की मिट्टी नसीब न हो सकी। रात के अंधेरे में घरवालों को घर में बन्द करके पुलिस ने बिटिया की चिता जला दी। उसकी मिट्टी से लिपटकर रो लेने का भी अधिकार न मिल सका लाचार परिवार को।
सुनते हैं, इस देश में कोई असुरक्षित महसूस करे तो पुलिस उसे सुरक्षा देती है। लेकिन अपने आंगन की निरपराध चिरैया का दाह संस्कार करने का अधिकार मांगनेवाले परिवार से पुलिस को न जाने कौन-सी असुरक्षा महसूस हुई होगी। जेल में बन्द दुर्दांत अपराधी के परिवार में कोई मौत हो जाए तो उसे भी अंतिम संस्कार में शामिल होने की छूट मिल जाती है, लेकिन यह क्या था कि परिवार में मौत होने पर निरपराध परिवार को घर में क़ैद करके अंतिम संस्कार किया गया। हो सकता है कि अव्यवस्था को रोकने के लिये प्रशासन को यह आवश्यक जान पड़ा हो, किन्तु मनुष्यता के लिए यह कृत्य उस अपराध से कम नहीं था, जिसके कारण उस आंगन की चहक मातम में बदल गई।
इंद्रजीत की मृत्यु के बाद श्रीराम ने पुत्र के अंतिम संस्कार तक युद्ध विराम की घोषणा करके शोकग्रस्त शत्रु को जो अभय दिया था, कल रात हाथरस में उस परम्परा की चिता जल गई।
इस देश का तंत्र एक आमूल-चूल परिवर्तन की बाट जोह रहा है। स्पष्ट शब्दों में सुन लीजिए, क़ानून की आँखों में धूल झोंकने पर आप जिसकी पीठ थपथपाएंगे, वह एक दिन आपकी आँखों में धूल ज़रूर झोंकेगा। इसलिए, अच्छा अथवा बुरा, सशक्त अथवा कमज़ोर; जो भी लिखित संविधान हमारे पास है; उसका मखौल बनाने की इजाज़त किसी को नहीं मिलनी चाहिए; फिर चाहे वह पुलिस हो या अपराधी!
एक बेटी कल रात मिट्टी हो गई। जाओ चिरैया, तुम्हारे पोर-पोर पर हुए घाव किसी पोस्टमार्टम रपट में कम या ज़्यादा दर्ज हो जाएंगे; लेकिन तुम्हारी आत्मा पर जो खरोंचें पड़ी हैं उनकी सिसकी लिखने के लिए कोई पोथी पूरी न पड़ेगी। अब हम तुम्हारी जाति पर चर्चा करके तुम्हारे मनुष्य होने के अधिकार का हनन करेंगे; अब हमारा तंत्र तुम्हारे बयान बदलने की कहानियाँ गढ़कर तुम्हारे प्रति उपजी संवेदनाओं पर आरी चलाएगा। अच्छा हुआ बिटिया, तुमने आँखें मूंद लीं, वरना इस देश में न्याय की तलाश में तुम्हें यह तंत्र बार-बार वह हादसा दोहराता हुआ दिखता।

✍️ चिराग़ जैन

राजभाषा का निरीक्षण

जिस समस्या का कोई समाधान न हो उस समस्या को ही समाधान मान लेना चाहिए। इस महान विचार से प्रेरित होकर हम समाधान को समस्या बना देने में निष्णात हो गए।
देश को स्वतंत्रता मिली तो राजभाषा का प्रश्न उठा। प्रश्न उठते ही हमने वही किया जो हम करते आए हैं। हमने धड़ल्ले से राजभाषा के विभाग खोल दिये। थोक के भाव निदेशालय और संस्थान बनाकर हिंदी को सरकारी तंत्र में ऐसा उलझाया कि प्रश्न उठानेवालों की बोलती बंद हो गई। स्वयं हिंदी को निरीक्षणों और तिमाही रपट के ऐसे थर्ड डिग्री टॉर्चर मिलने लगे कि हिंदी आज तक उस आदमी को कोस रही है जिसने उसके उत्थान का प्रश्न उठाया था।
क्या ज़रूरत थी यह सब करने की। अच्छी-भली लोगों के मुँह पर चढ़ी थी। उसे उठाकर सरकारी दफ़्तरों में ला पटका। जब कभी हिंदी दिवस आता है या राजभाषा समिति का निरीक्षण आता है तब इसे नहला-धुलाकर पेश कर दिया जाता है और निरीक्षण सम्पन्न होते ही पुनः दफ्तर के सबसे बदबूदार कोने में पटक दिया जाता है।
यह निरीक्षण भी क़माल होता है। देश की सबसे बड़ी पंचायत से कुछ पंच दफ़्तरों का निरीक्षण करने निकलते हैं। निरीक्षण की न्यूनतम शर्त यह है कि दफ़्तर किसी रमणीक स्थल पर बना हो। क्योंकि वे जानते हैं कि जब हिंदी की फाइलों में कुछ नहीं मिलेगा तब निहारने को प्राकृतिक सौंदर्य की आवश्यकता पड़ेगी। वैसे भी जो माँ प्रकृति से दूर हो वह माँ हिंदी के क़रीब कैसे हो सकता है।
बहरहाल, निरीक्षण की सूचना मिलते ही दफ़्तर के अधिकारियों से लेकर कर्मचारी तक काम पर लग जाते हैं। मुख्यालय में नियुक्त राजभाषा अधिकारी तुरंत निरीक्षण के निशाने पर आए दफ़्तर में प्रकट हो जाते हैं। रात-दिन जागकर निरीक्षकों के लिए श्रेष्ठतम प्रवास की व्यवस्था की जाती है। मुख्यालय इस पुनीत कार्य हेतु अलग से बजट की व्यवस्था करता है। प्रत्येक निरीक्षक के लिए अलग से गाड़ी तैनात होती है। उनके पर्यटन की योजना बनाई जाती है। उनके भोजन के मेन्यू सेट किये जाते हैं। उन्हें प्रकारांतर से उपहार देने की प्लानिंग होती है। ये सब महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होने के बाद दफ़्तर की सभी नाम-पट्टिकाएँ गर्म-गर्म देवनागरी में पकाकर परोसने की तैयारी होती है। और निरीक्षण से ठीक पहले कार्यालय में हिंदी के कामकाज की फाइलें चकाचक कर दी जाती हैं।
यद्यपि मंत्रालय के पत्र में यह स्पष्ट लिखा जाता है कि उपरोक्त व्यवस्था सम्बन्धी व्यय नहीं करना है। तथापि राजभाषा के अनुभवी अधिकारी जानते हैं कि निर्देश में लिखा गया ‘नहीं’ पढ़ने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए।
निरीक्षकों का कर्मठ दल हवाई अड्डे से ही निरीक्षण प्रारम्भ कर देता है। उनके स्वागत में खड़े कर्मचारी से लेकर गाड़ी पर चिपके स्टीकरों तक हिंदी की उपस्थिति जाँची जाती है। चूँकि सब कुछ पहले से ही तय होता है अतएव कहीं कोई चूक नहीं होती। यह देखकर पहले से ही तय कार्यक्रम के अनुरूप आधे निरीक्षक प्रसन्नता प्रदर्शित करते हैं और बाक़ी के आधे थोड़े उखड़े-उखड़े बने रहते हैं। ऐसा करने से निरीक्षण का डेकोरम बना रहता है।
कार्यालय में प्रवेश करते हुए स्वागत की वेला में पूरा कार्यालय हिन्दीमय हो जाता है। सब हिंदी बोल रहे होते हैं। जहाँ न बोलना हो वहाँ भी सभी हिंदी बोल रहे होते हैं। फिनांस के नाम से बदनाम कमरा अचानक वित्त विभाग हो उठता है। परफोर्मा यकायक प्रपत्र बन जाता है। अटेंडेंस रजिस्टर पर नया आवरण चढ़ाकर उसे उपस्थिति पत्रिका बना दिया जाता है।
निरीक्षण दल जानता है कि यह कायाकल्प उनके आगमन से एकाध दिन पूर्व ही हुआ है तथापि वे कार्यालय में हिंदी की स्थिति देखकर संतुष्ट होने की भंगिमा बना लेते हैं। हिन्दीमय वातावरण में चायपान करते समय उन्हें उनके प्रवास, भोजन तथा पर्यटन के कार्यक्रमों से अवगत करा दिया जाता है। इस सूचना के प्रेषित होते ही कार्यालय की कुछ फाइलों का पूर्वनिर्धारित औचक निरीक्षण सम्पन्न कर लिया जाता है। अगली सुबह निरीक्षण की समस्त कार्यवाही समाप्त होने के बाद निरीक्षण दल प्रकृति के वैभव का निरीक्षण करने लगता है और कार्यालय अपनी स्थायी वेशभूषा में लौट आता है। हिंदी बेचारी आचरण से निकलकर पुनः फाइलों के आवरण में सिमट जाती है।
न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका और विधायिका तक हिंदी के लिए प्रवेश निषेध की तख़्ती हर वर्ष और पुख़्ता होती जा रही है। व्यापार में हिंदी को स्थापित करने के लिए नियुक्त लोग हिंदी का व्यापार करने में संलग्न हैं। हिंदी पखवाड़े के दौरान कार्यालय के बाहर नीले रंग का सरकारी बैनर लटक जाता है। उसके बाद पूरे वर्ष हिंदी का चेहरा उस बैनर की तरह लटका रहता है।
राजभाषा विभागों का बजट पूरे कार्यालय के बजट का सबसे तुच्छ भाग होता है। और वह भी सत्र समाप्ति के समय जबरन व्यय किया जाता है। हिंदी को राजभाषा बनाने का यह ढोंग क क्षेत्र से ग क्षेत्र तक समान रूप से चल रहा है। कार्यालयी हिंदी इतनी क्लिष्ट और अव्यवहारिक बना दी गई है कि जब कभी किसी राजभाषा अधिकारी की अंतरात्मा जागती है तो वह स्वयं हिंदी की कृत्रिम सूरत को देखकर अपनी अंतरात्मा को हिंदी की एक लोरी गाकर सुला देता है।

✍️ चिराग़ जैन

उलाहना

मैं अंधेरों के नगर में दीप धरने जा रहा हूँ
तुम उजालों की प्रतीक्षा में समय व्यतीत करना
मैं पसीने से नदी का पाट भरने जा रहा हूँ
तुम किसी बरसात की मनुहार का संगीत गढ़ना

कर्मरत अर्जुन हुआ तो कृष्ण उसके सारथी थे
देवता जीवन बदल सकते नहीं केवल भजन से
आ गई चलकर अकेली जो गहन अंधियार में भी
जूझना ही सीख लेते, भोर की पहली किरण से
भाग्य की हर हार को मैं जीत करने जा रहा हूँ
तुम स्वयं को हस्तरेखा बाँच कर भयभीत करना

पाँव चलने के लिए तैयार हैं बस ये बहुत है
क्यों करूँ परवाह इसकी, कौन मेरे साथ आया
मन, भुजाएँ, श्वास, धड़कन, दृष्टि मेरे पास हो बस
और सब कुछ बोझ भर है, जो अभी तक है जुटाया
मैं स्वयं के हाथ से अब ख़ुद सँवरने जा रहा हूँ
तुम समूची सृष्टि से बस आचरण विपरीत करना

सृष्टि का हर तंत्र मेरे ही लिये निर्मित हुआ है
नियति के हर शाप और वरदान का कारण स्वयं हूँ
यक्षप्रश्नों के सभी उत्तर मुझी को खोजने हैं
मैं स्वयं के हर पतन-उत्थान का कारण स्वयं हूँ
मैं जगत् का सौख्य अपने नाम करने जा रहा हूँ
तुम सदा उपलब्ध दुःख-सुख को समर्पित प्रीत करना
✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!