Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
‘नो एफआईआर, नो इन्वेस्टिगेशन, नो चार्जशीट, फैसला ऑन द स्पॉट…’ -ऐसे संवाद फिल्मों में तो बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन असल ज़िन्दगी में इस डायलॉग पर काम करनेवाले कार्यपालक निरंकुश हो जाते हैं।
यह सत्य है कि भारतीय न्याय प्रक्रिया की धीमी गति और लचर व्यवस्था का ही दुष्प्रभाव है कि ‘फ़ैसला ऑन द स्पॉट’ जैसे अराजक संवाद इस देश में ‘लोकप्रिय’ हो जाते हैं। पुलिस की वर्दी पहनकर भी क़ानून को ताक पर रखनेवाले पुलिसवालों को हमने ‘दबंग’; ‘सिंघम’; ‘सिमबा’ और ‘पुलिसगिरी’ जैसी फिल्मों में अराजक होते देखा तो हमने यह कहकर स्वयं को संतुष्ट कर लिया कि इस देश में अपराधियों का यही इलाज है।
यदि डॉक्टर अयोग्य होगा तो कंपाउंडर के हाथ में सर्जिकल नाइफ़ सौंप देंगे क्या? डॉक्टर को कर्मठ और सक्षम बनाने की बजाय हम कंपाउंडर के ऑपरेशन करने को तो जस्टिफाई नहीं किया जा सकता ना! निरंतर डॉक्टरों के साथ रहने का कारण, ऑपरेशन थियेटर में आने-जाने के कारण वार्ड बॉय भी शल्य चिकित्सा की शब्दावली सीख जाता है, लेकिन उसे किसी की सर्जरी करने को तो नहीं कहा जा सकता ना!
न्यायालय किसी लोकतंत्र के शल्य चिकित्सक हैं और पुलिसकर्मी इस अस्पताल का नॉन मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ। अस्पताल की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह स्टाफ बहुत आवश्यक है, किन्तु सामान्य बुखार में भी कोई टेबलेट लिखने की छूट इस स्टाफ को नहीं दी जा सकती।
हैदराबाद में जब पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया था तो लोगों को तालियाँ पीटते देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था। मैं यह नहीं जानता कि वह एनकाउंटर झूठा था या बनावटी। लेकिन उस घटना पर पुलिस की पीठ थपथपाने वाले यह ज़रूर मानते थे कि पुलिस ने एनकाउंटर का नाटक करके आरोपियों की हत्या की है। यदि वह एनकाउंटर सत्य भी रहा हो तो भी इलाज के लिए वार्ड से ऑपरेशन थियेटर में ले जाते समय यदि किसी मरीज़ की मौत हो जाए तो उसका श्रेय अथवा दोष वार्ड बॉय को कैसे दिया जा सकता है?
उस दिन हैदराबाद की घटना पर जो सोशल मीडिया ट्रोलिंग हुई थी वह इस देश की संवैधानिक तथा न्यायिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा कुठाराघात था। उसके बाद विकास दुबे प्रकरण, फिर मृतका के घरवालों को घर में बंद करके आधी रात को पेट्रोल डालकर शवदाह करने की घटना या कोई भी अन्य नागरिक… ये सब घटनाएँ उस अराजकता का एक झरोखा है, जो हमारे समाज में मूर्खतापूर्ण महत्वाकांक्षाओं के हाथों बोई जा रही है।
मरनेवाले को हिन्दू अथवा मुस्लिम के स्थान पर इस देश के एक नागरिक के रूप में देखेंगे तो आप स्वीकार कर सकेंगे कि उसे अदालत में अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए था। जिन फिल्मों में हमने पुलिसिया गुंडागर्दी पर तालियाँ बजाई हैं, उन्हीं फिल्मों से यह भी सीखा जा सकता है कि कई बार परिस्थितियाँ और इत्तेफ़ाक किसी निर्दाेष को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर देते हैं। अदालतें इसी संदेह की पड़ताल करने का माध्यम हैं।
मैं फिर दोहरा रहा हूँ कि न्याय व्यवस्था को आत्मावलोकन करके अपनी गति तथा कार्यप्रणाली को सुधारने की सख़्त ज़रूरत है। लेकिन जब तक यह काम न हो तब तक भी न्यायालय का विकल्प थाना नहीं हो सकता।
भारतीय लोकतंत्र की एक इकाई होने के नाते प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह व्यवस्था का सम्मान करे। अराजकता किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। व्यवस्था में कोई ख़ामी आई तो उसे सुधारा जा सकता है किंतु अराजकता का चेहरा समाजसेवा, राष्ट्रहित और समाजहित से हू-ब-हू भी मिलता हो तो भी उसके निरंकुश होने की शत-प्रतिशत गारंटी होती है।
आशा है कि भविष्य में किसी कम्पाउंडर को सर्जरी करते देखेंगे तो कम से कम हम तालियाँ तो नहीं पीटेंगे; क्योंकि अगली बार ऑपरेशन टेबल पर हम भी हो सकते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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बचपन में हमें जो कहानियाँ पढ़ाई गयी हैं; उनके झोलझाल को समझने में पूरी ज़िन्दगी कन्फ्यूज़ हो गयी है। कबूतर और बहेलिये की कहानी ने हमारे दिमाग़ में भरा कि हमें सबकी मदद करनी चाहिए। तो सारस और केकड़े वाली कहानी ने बताया कि जिसकी मदद करोगे, वही तुम्हें मार डालेगा।
बन्दर और मगरमच्छ की कहानी पढ़कर हम समझ गए कि जिसे हम मीठे जामुन खिलाएंगे, वही दोस्त एक दिन हमारा कलेजा खाने के षड्यंत्र में शामिल होगा। यह सोचकर हम दोस्तों को संदेह की दृष्टि से देखने लगे तो अध्यापक ने शेर और चूहे की कहानी पढ़ाकर बताया कि इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि हमें अपने दोस्तों का भला करेंगे तो दोस्त भी हमारा भला करेंगे।
लोमड़ी और सारस की कहानी पढ़कर हमने ‘जैसे को तैसा’ सरीखा महान वाक्य सीख लिया तो ‘साधु और बिच्छू’ की कहानी ने बताया कि यदि बिच्छू अपनी बुराई नहीं छोड़ रहा तो साधु अपनी अच्छाई क्यों छोड़े।
इन विरोधाभासी कहानियों को पढ़कर जो पीढ़ी तैयार हुई उसके सामने यह मुसीबत हमेशा बनी रही कि वह साधु की तरह बिच्छू के डंक को इग्नोर करके उसे बचाए या फिर लोमड़ी की तरह सुराही का बदला लेने के लिए थाली में खीर परोसकर सारस के सामने रख दे।
हम यह बूझते ही रह जाते हैं कि सूई चुभोनेवाले दर्जी पर कीचड़ फेंकने वाला हाथी बनना है या फिर राजा की उंगली कटने पर ‘ईश्वर जो करता है अच्छे के लिए करता है’ कहने वाला मंत्री बनना है।
हमारे पाठ्यक्रम निर्माताओं ने सम्भवतः यह विचार ही नहीं किया कि वे वास्तव में बच्चों को बताना क्या चाहते हैं। उन्हें यह समझ ही नहीं आया कि लकड़हारे की जिस कहानी से बच्चों को ‘संगठन में शक्ति है’ का पाठ पढ़ा रहे थे, उसी कहानी से कुछ बच्चे ‘फूट डालो शासन करो’ का गुर सीख बैठे।
उन्हें यह भान ही न रहा कुल्हाड़ी और जलपरी वाली जिस कहानी से ईमानदारी की शिक्षा देने निकले थे उसी कहानी का अंत होते-होते वे ईमानदारी के साथ लालच का स्वाद चखा बैठे।
यदि इन कहानियों का व्यक्तित्व के निर्माण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता तो फिर इन भालू, बन्दर, खरगोश और कछुओं की अनावश्यक गल्प को पढ़ाने में बचपन का क़ीमती समय क्यों नष्ट किया गया? और यदि इन्हीं कहानियों के आधार पर बच्चों का चरित्र निर्माण होता है, तो फिर इनमें इतना विरोधाभास क्यों देखने को मिला? इस विषय को इतना ग़ैर-ज़िम्मेदार रवैये से कैसे देखा जा सकता है?
एक ओर ‘हार की जीत’ जैसी कहानी पढ़ाकर हमें यह बताया गया कि यदि बाबा भारती अपने आचरण को संयत कर लें तो खड़गसिंह जैसे डाकू का भी हृदय परिवर्तन हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ़ हमें यह भी बताया गया कि चींटी ने हाथी की सूंड में घुसकर उसके अहंकार को चकनाचूर कर दिया। अब जब भी अपने अहंकार के मद में चूर होकर मेरी सुख-शांति में सेंध लगाता है तो मैं समझ नहीं पाता कि मुझे बाबा भारती जैसा आचरण करना है या फिर उस अहंकारी की सूंड में घुसकर उसे काट लेना है।
इन कहानियों ने हमारी बौद्धिक क्षमताओं को इतना कुंद कर दिया है कि हम सही और ग़लत का विवेक भूलकर कहानी के एक पक्ष को पकड़कर उसके पीछे चल पड़ते हैं।
इन्हीं कहानियों की बदौलत हम एक पूरी पीढ़ी को ऐसे मस्तिष्क की सौगात दे बैठे हैं, जो एक बार जिसे नायक मान ले, फिर उसकी सब बातें उसे सही लगने लगती हैं।
इसी कन्फ्यूज़न की वजह से हमें ‘दीवार’ फ़िल्म में स्मगलर बना अमिताभ जस्टिफाइड लगता है और ‘ज़ंजीर’ फ़िल्म में पुलिसवाला बना अमिताभ जस्टिफाइड लगता है। इसी अविवेक की वजह से हम शहंशाह फ़िल्म में क़ानून अपने हाथ में लेनेवाला अमिताभ भी पसंद है और शोले फ़िल्म में गब्बर की सुपारी लेनेवाला अमिताभ भी पसंद है।
हम दरअस्ल कहानी को समझते ही नहीं हैं। बल्कि हम तो नायक की पूँछ पकड़कर कथानक और अन्य पात्रों का आकलन करते हैं।
बचपन मे अध्यापक ने जिसकी ओर इंगित करके बता दिया कि यह नायक है, हमने उसके दृष्टिकोण से कहानियों को समझने में बचपन बिता दिया।
डायरेक्टर ने इशारे से जिसको नायक के रूप में प्रस्तुत कर दिया, उसकी नशाखोरी और आपराधिक कृत्यों को भी हमने स्टाइल कहकर जस्टिफाई कर लिया।
राजनीति ने जिसे नायक बनाकर प्रस्तुत कर दिया, उसके षड्यंत्र को भी हमने यह कहकर प्रचारित किया कि देखो अपने विरोधियों को क्या मज़ा चखाया है।
इन नायकों को महान मानने में हमारे देश का नुक़सान हुआ तो हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, हमारे समाज का बेड़ा ग़र्क हुआ तो भी हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा और हमारे चरित्र में अविवेक की दीमक लग गयी तो भी हमें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।
✍️ चिराग़ जैन
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दो साल के घनघोर निठल्लेपन के बाद मुझे कवि-सम्मेलन का आमंत्रण मिला तो मैं फूला नहीं समा रहा था। सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल न होता तो उस दिन मेरा आयतन दो गज की सीमा को पार कर गया होता। जिस मोबाइल की घण्टी से भी रेमडिसिवर की बदबू आने लगी थी, उससे फिर से होटल से उठाए हुए शैम्पू और साबुन की ख़ुशबू आने लगी।
कोविड के भयावह दौर से गुज़र कर जो धड़कन विरक्ति की झपताल में चलने लगे गयी थी उसने यकायक द्रुत गति की कहरवा का रुख़ कर लिया।
पुराने मकान की दीवार पर गड़ी हुई कील में युगों से लटक रहे रस्सी के टुकड़े जैसी बेकार मेरी उंगलियाँ अचानक हाईटेंशन वायर की तरह फड़फड़ाने लगीं। मैनें मोबाइल में पड़ी ट्रेवल एप को इन फड़फड़ाती उंगलियों से छुआ तो उस एप्प ने मुझे उसी दृष्टि से देखा जिस दृष्टि से कभी देवकी माई ने कंस को मारकर आए कन्हैया को देखा होगा।
‘डिपार्चर’; ‘अराइवल’; ‘ट्रेवल डेट’ और ‘पैसेंजर डिटेल’ जैसे शब्दों को पढ़कर मेरी आँखें भर आईं। भीगी पलकों से बुक हुई टिकट को देखा तो उसका एक-एक शब्द अजंता की किसी अप्रतिम पेंटिंग की तरह मन पर छप गया। जिस एयरलाइंस के लोगो को भी कभी नज़र उठाकर नहीं देखा था, उसके लोगो की एक-एक लकीर को आँखों में बसा लिया। पीएनआर ऐसे रट गया, ज्यों साधनारत किसी तपस्वी को मंत्र रट जाता है।
टिकट बुकिंग का अलौकिक आनन्द उठाने के पश्चात मेरी गर्दन ने घूमकर कमरे के उस कोने पर दृष्टिपात किया, जहाँ चार-चार पहियों की स्वामिनी एक अटैची दो वर्ष से जड़वत खड़ी थी। ज्यों ही मैंने उसे छुआ तो ऐसा महसूस हुआ कि बरसों से पाषाण की तरह जी रही किसी अहल्या में प्राण संचरित हो गये हों। मेरे हाथ लगाते ही वह अपने चारों पहियों पर एक साथ नृत्य कर उठी। हैंडल पकड़कर मैंने उस पर नियंत्रण न किया होता तो वह उसी क्षण दौड़कर हवाई अड्डे पहुँच गयी होती।
मैंने बड़े प्यार से अटैची को बिस्तर पर लिटाया। फिर सलीक़े से उसकी ज़िप को टटोल कर रनर को पकड़ा। अटैची की ज़िप खुलने की आवाज़ सुनने को व्याकुल कान उत्साह में आँख के करीब झुक चुके थे। रनर एक निश्चित दिशा में चलने लगा और अटैची की सीत्कार जैसी आवाज़ ने पूरे माहौल को रोमांचित कर दिया। दोनों रनर बौराए हुए तीतरों की भाँति अलग-अलग दिशा में दौड़ गये और मेरे बाएँ हाथ ने आगे बढ़कर लगभग इस अंदाज़ में अटैची के दोनों फलक खोल दिये ज्यों अलीबाबा सिमसिम के भीतर कोई ख़ज़ाने का बक्सा खोल रहा हो। अटैची खुलते ही मेरी आँखें अटैची से होड़ करने लगीं। हालाँकि यह मुझे पहले से पता था कि अटैची ख़ाली होगी लेकिन फिर भी मैं आँख फाड़-फाड़कर उस ख़ालीपन को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था।
अटैची में सजाने को जब मैंने कपड़ों की अलमारी खोली तो अलमारी के कब्ज़ों ने चूँ की आवाज़ करके मुझे सूचना दे दी कि कपड़े काफ़ी नाराज़ हैं, ज़्यादा चू-चपड़ मत करना। मैंने शर्मिंदगी से भरकर कलफ़ लगे कपड़ों की ओर देखा तो उन्होंने मुझे उसी हिकारत से देखा जैसे द्रौपदी ने चीरहरण के बाद युधिष्ठिर को देखा था। किंतु ढीठ होकर मैंने भी हैंगर पकड़कर एक जोड़ी पैंट-शर्ट को ठीक वैसे उतार लिया जैसे कीचक की अभद्रता के बाद भी कंक ने सैरन्ध्री को समझाने-बुझाने की हिम्मत जुटा ली थी।
लेकिन इस बार कपड़े मुझसे ज़्यादा ढीठ निकले। हैंगर से उतरने के बाद भी उनके माथे पर एक सिलवट पड़ी रह ही गयी थी। मैं समझ गया कि इस बार नरमी से काम न चलेगा। इतने दिन एक ही आसन में टँके-टँके कपड़ों ने अकड़ना सीख लिया है, सो मैंने भी इस्तरी लेकर उन्हें गर्मी दिखाई तब जाकर मुआमला शान्त हो सका।
एक-एक सामान को समझा-बुझाकर अटैची में जमाने के बाद अटैची के दोनों रनर्स को पुनः क़रीब लाया गया और महीनों से ख़ाली खड़ी बेचारी अटैची को तृप्त करके एक ओर खड़ा कर दिया गया। भीतर से भरे व्यक्तित्व की तरह अटैची का आत्मविश्वास भी देखने लायक था। पहले छूने भर से बौरा जाने वाली अटैची अब हिलाने पर भी ठहरकर पाँव बढ़ा रही थी।
मैं पूरी तैयारी करके मोबाइल में सुबह चार बजे का अलार्म लगाने लगा तो मोबाइल की घड़ी ने टोका – ‘इतने फॉर्मल क्यों हो रहा है बे, दो साल बाद कार्यक्रम का आमंत्रण मिला है। दस तो बज ही गए हैं… चार-छह घण्टे इस आमंत्रण का प्रचार कर… इस क्षण को एन्जॉय कर…!’
मुझे अपने टुच्चेपन पर शर्मिंदगी हुई। भरा हुआ कवि भी भला सोता है! यही तो समय है आत्मविश्वास के साथ बाक़ी कवियों को फोन कर-करके यह कहने का- ‘चलो, अब मैं सोता हूँ, सुबह जल्दी उठना है, छह बजे एयरपोर्ट पहुँचना है ना!’
✍️ चिराग़ जैन
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आचरण को आवरण से अधिक महत्व देने का नाम है जैनत्व! जैन आगम में प्रथमानुयोग का अध्ययन करें तो ऐसे सैंकड़ों चरित्र मिल जाएंगे, जिन्होंने अपने चारित्रिक बल से अनीति को हतोत्साहित किया है। तीर्थंकर पार्श्वनाथ पर उपसर्ग करनेवाले कमठ से लेकर मुनि मानतुंग को कारागृह में बन्द कर देने की घटना तक संहनन तथा आत्मबल ही नायकत्व का निर्धारण करता रहा है।
यही क्षमा, यही धैर्य, यही संहनन, यही अहिंसा यदि हम वर्तमान में भी बचा ले गए, तो यह अपने जैनत्व के प्रति हमारा सबसे बड़ा योगदान होगा। किन्तु हम उद्वेग के प्रवाह में उलटबांसी करके अपने आधार को ही ध्वस्त करने पर आमादा हुए जा रहे हैं। हम नपुंसक से अहिंसक की तुक मिलाकर बड़े गर्व से कहते हैं कि जैनी अहिंसक हैं, नपुंसक नहीं! मुट्ठी और जबड़े भींचकर जब कोई यह जुमला बोलता है, तो मुझे लगता है कि वह अपनी परम्परा के मस्तक पर मुष्ठी प्रहार करके गौरव मान रहा है। ऐसी अनुभूति होती है कि हिंसा के प्रतिकार में हिंसक हो जाने की बजाय अहिंसा तथा क्षमा का रास्ता अपनाकर सामनेवाले के चरित्र को प्रभावित करनेवालों को नपुंसक कहा जा रहा है।
श्रीमद रायचंद्र और महात्मा गांधी ने जैन धर्म के जिस आत्मबल को आत्मसात करके एक गाल पर थप्पड़ मारने पर दूसरा गाल आगे करने की बात कही, उसकी खिल्ली उड़ती दिखाई देती है।
तीर्थंकर नेमिनाथ को जब ज्ञात हुआ कि उनके विवाहोत्सव में अतिथि सत्कार के लिए पशुओं की बलि दी जानी है तो इस हिंसा का प्रतिकार करने के लिए उन्होंने तलवार नहीं खींची थी। बल्कि अपने आचरण से उस कृत्य में संलग्न लोगों को शर्मिंदा करने का उपक्रम किया था। उन्होंने तो यह नहीं कहा कि हमें आप नपुंसक न समझ लें, इसलिए हम अहिंसा को तिलांजलि दे देकर पशुओं की हत्या करनेवालों की हत्या कर देंगे।
सेठ सुदर्शन, राजा श्रीपाल, मुनि सुखमाल, मुनि समन्तभद्र और न जाने कितने श्रावक-श्रमणों ने धर्म तथा निजी सुखों की रक्षार्थ ‘विरोधी हिंसा’ की ओट लेकर हिंसक बन जाने के स्थान पर अपने आत्मबल तथा साधना के बल पर धर्म की रक्षा की।
धर्म की रक्षा उसके अनुयाइयों को जीवित रखकर नहीं बल्कि उसके आदर्शों को जीवित रखकर की जा सकती है। किसी ने हमारे धर्म का अपमान किया और हम उसकी गर्दन उतारने दौड़ पड़े तो समझ लीजिए कि विरोधी ने तो केवल धर्म की देह को पत्थर मारे थे, लेकिन अनुयाइयों ने उसकी आत्मा खरोंच दी। जिन्होंने सिर पर सिगड़ी रखे जाने के बावजूद उपसर्गी का प्रतिकार न किया, उन्हें क्या हम नपुंसक कहने लगेंगे?
जैनत्व के इतिहास में एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलेगा कि जहाँ युद्ध करनेवाले अथवा युद्ध जीतनेवाले को उसके दैहिक बल के कारण पूजा गया हो। हमने युद्ध में संलग्न बाहुबली को नहीं पूजा, हमने तो सर्वस्व त्यागनेवाले बाहुबली को पूजा है। हमने चक्रवर्ती भरत को नहीं पूजा, हमने तो मुनि भरत को पूजा है।
धर्म को सीढ़ी बनाकर उद्वेग पर सवारी करनेवाले लोग इस धर्म की आत्मा के लिए सर्वाधिक ख़तरनाक लोग हैं। जिस पर पत्थर फेंका गया, उसे शांत रखना कठिन कार्य है। यह कार्य मुनियों ने किया। यह कार्य पुरखों ने किया। और इसी कठिन कार्य को करते हुए जैनत्व की आत्मा को अक्षुण्ण रखा है हमारे पूर्वजों ने। किन्तु उद्वेग को अराजक बना देना सरल कार्य है। इस सरल कार्य को करके जैन धर्म के पाले में खड़े होकर जिनत्व की मूल भावना को चोट पहुँचा रहे हैं कुछ लोग। उनके बहकावे में आने से बचें। क्योंकि आगम की रक्षा हेतु मुट्ठी भींच लेने की बात से अधिक हास्यास्पद कुछ नहीं हो सकता!
✍️ चिराग़ जैन
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‘बंधन भी सुख का कारण हो सकता है’ – इस अद्भुत सत्य का अनोखा उदाहरण है रक्षाबंधन! यद्यपि मैं जानता हूँ कि ईश्वर ने सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को आत्मरक्षा हेतु आत्मनिर्भर बनाया है तथापि मुझे इस बात का एहसास है कि नाड़ी पर एक धागा बांधकर मन में अपनत्व की जिस अपेक्षा को गतिमान किया जाता है; वह संवेदना के स्नायु तंत्र को आनन्दित कर देती है।
कोई हम पर इतना अधिकार रखे कि हमें अपनी रक्षा का दायित्व सौंप दे… अहा! इस अनुभूति से मन कितना बलिष्ठ हो उठता है।
सम्भवतः हम इस त्यौहार की इस अलौकिक ख़ुशी को सही से समझ ही नहीं सके हैं। इसीलिए हमने इसको किन्हीं अर्थों में परिहास बना डाला है। यदि किसी लड़की को अहसास हो जाए कि अमुक परिचित लड़का उसके प्रति प्रेम का भाव रखता है, अथवा उसे प्रपोज़ करनेवाला है तो वह लड़की उसको राखी बांधने निकल पड़ती है! उधर लड़के को अनुमान हो जाए कि जिससे वह प्रेम करता है, वह उसे राखी बांधने की जुगत में है तो लड़का राखी से बचने का उपाय खोजने लगता है!
इस परिस्थिति के दोनों ही पात्र बचकानी हरकतें कर रहे हैं। जिसकी नीयत में तुम्हें खोट दिखाई दे रहा है, उसको राखी जैसे सम्मान से सम्मानित कैसे किया जा सकता है? और जिसकी तुम राखी से भयभीत हो, उससे तुम कम से कम प्रेम तो कभी नहीं कर सकते!
राखी एक पदक है। राखी एक सम्मान है। यदि कोई स्त्री किसी पुरुष को इस सम्मान के योग्य समझती है तो यह उस पुरुष के लिए गौरव का विषय है। सोशल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के इस युग में जब स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को भौंडा करके परोसने के सभी द्वार खुले हैं ऐसे में राखी का एक धागा संवेदनाशून्य होते सम्बन्धों पर संवेदना के काँचुकीय की भूमिका निर्वाह करता है।
✍️ चिराग़ जैन