Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
जिन्होंने यह कहना शुरू किया कि इस्लाम ख़तरे में है, उन्हीं के नुमाइंदों ने अफगानिस्तान पर जबरन कब्ज़ा कर लिया। यूएनओ में स्थायी सदस्यता की डींगें हाँकनेवाले देशों के लिए यह शर्मिंदगी भरी लानत है। सबसे उम्दा हथियार बनानेवाले देशों के लिए यह डूब मरने की बात है। मानवाधिकार के नाम पर अन्य देशों की निजता में हस्तक्षेप करनेवाले चौधरियों के लिए यह निर्वस्त्र होने जैसा अनुभव है।
धार्मिक कट्टरता की ओट में सत्ता की गलियाँ तलाश रही बर्बरता का घिनौना चेहरा तालिबान की हरक़तों में साफ दिखाई दे रहा है। कट्टरता के खोल में छिपे ये लिजलिजे कीड़े अपने खोल की मज़बूती को लेकर इतने आश्वस्त हैं कि अब ये पूरी मनुष्यता को चाटने की तैयारी में जुट गए हैं।
चूँकि वैचारिक स्तर पर विकसित होती मानवता इनके खोल के लिए सर्वाधिक हानिकारक है, इसलिए ज्यों ही कोई व्यक्ति इन्हें सोच के स्तर पर विकास करता दीख पड़ता है, ये तुरन्त बर्बर हो जाते हैं। मुस्कुराहट और ठहाके इनके आतंक पर सबसे बड़ा आघात हैं, इसलिए हँसानेवाले लोगों के विरुद्ध ये धर्म और संस्कृति के अपमान की निराधार दलीलें परोसने लगते हैं। उत्सव मनाते हुए लोग इन्हें अपने दहशती सम्मोहन से छूटते हुए प्रतीत होते हैं इसलिए उत्सवों की हत्या के लिए ये बम फोड़ने लगते हैं। ज्यों ही मनुष्यता को यह एहसास होने लगता है कि वह इक्कीसवीं सदी में खड़ी है, ये तुरन्त उसे घसीटकर सोलहवीं शताब्दी में ले जाने की ज़िद्द करने लगते हैं। मनुष्यता मिल-जुलकर रहना चाहती है और बर्बरता उसे अलग-थलग कबीलों में बाँटने के लिए जी-जान लगाए बैठी है। लकड़ियों के गट्ठड़ को विभाजित करके उसे आसानी से तोड़ सकने की कला में बर्बरता माहिर है।
हमने इतिहास से सबक नहीं लिया तो आज वर्तमान हमें सिखा रहा है कि धार्मिक कट्टरता की ओट में पनपा एक तालिबान पूरी दुनिया के बड़े-बड़े धुरंधरों की नपुंसकता पर से पर्दा हटा चुका है। यदि पूरी दुनिया के सारे देश मिलकर इस एक कबीले की जकड़ से अफगानिस्तान को मुक्त नहीं करा सकते तो कम से कम इतना तो अवश्य करें कि अपने समाज को कट्टरता के दंश से मुक्त कराने के प्रयास तुरन्त प्रारम्भ कर दें ताकि इस तालिबानी फफूंद को अपने पैर पसारने का वातावरण न मिल सके।
और हाँ, गहरी श्वास लेकर सोचोगे तो समझ आएगा कि किसी भी धर्म को सबसे ज़्यादा नुक़सान उन्हीं लोगों से होता है जो उस धर्म के अनुयाइयों में यह बात प्रचारित करते हैं कि तुम्हारा धर्म ख़तरे में है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
कैसे इस पर न्यौछावर हो अपना ख़ून-पसीना सीखें
वक़्त पड़े तो फौलादी साबित हो हर इक सीना, सीखें
शीश कटे तो उसका, जिसने भारत-भू पर आँख उठाई
हम इस पर मरना क्यों चाहें, इसकी ख़ातिर जीना सीखें
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
दिल में काफी बड़ा घोटाला पकड़ा गया है। जिस विभाग को शरीर में ख़ून वितरित करने का उत्तरदायित्व दिया गया था, वह पिछले 36 वर्ष से कुछ रक्त बचाकर दिल के भीतर फेंकता रहा है। इस भ्रष्टाचार की वजह से दिल का पूरा तंत्र कमज़ोर होता रहा और अब वह अपनी क्षमता का एक-चौथाई काम ही कर पा रहा है।
जाँच कमेटी ने उक्त विभाग को बदल देने की कड़ी सिफ़ारिश की है। काफ़ी देर तक पड़ताल के बाद जाँचकर्ताओं को पता चला कि दिल बड़ा है। यह सुनकर मुझे हँसी आ गयी। छोटा रहा होता, तो कविता कैसे लिख पाता!
बहरहाल, ज़िन्दगी ने मुझे यह अवसर दिया है कि अपना दिल चीर के दिखा सकूँ। देख लेना, कुछ नहीं निकलेगा इसमें। फिर मैं डंके की चोट कह सकूंगा कि मैं कोई बात दिल में नहीं रखता।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
विचारधारा वह बोझा है, जो योग्य पात्रों पर लादकर कुम्हार हाथ हिलाते हुए ‘इधर-उधर’ विचरते रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
कोरोना की दूसरी लहर बीत चुकी है, लेकिन राजनीति में ख़ुशी की लहर नहीं आई। वे अब भी आपस में लड़ रहे हैं।
जब देश में कोरोना का ताण्डव चल रहा था तो पॉलिटिकल पार्टियों में इस बात पर लड़ाई थी कि ये जनता तुम्हारी है, इसे तुम बचाओ। अब जब ताण्डव शान्त हुआ है तो हर पार्टी यह चिल्ला रही है कि ये जनता हमारी है, इसे हमने बचाया है।
हमारे पॉलिटीशन्स का मन बड़ा चंचल है। इसलिए जब वे एक बात पर लड़ते-लड़ते बोर हो जाते हैं तो उसे छोड़कर नए विषय पर लड़ने लगते हैं। और जब सब विषयों से बोर हो जाते हैं तो चुनाव लड़ने लगते हैं।
चुनाव के आगे दुनिया की सारी लड़ाइयाँ छोटी लगने लगती हैं। इसलिए अब देश के नेता यूपी में चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली आने-जाने लगे हैं। जो तकनीकी कारणों से यूपी के चुनाव में सीधे भाग नहीं ले पाएंगे वे वैक्सीन की सफलता और हेल्थ सिस्टम की कैपेसिटी का झुनझुना बजाकर टाइम पास करते रहेंगे।
जब किसी पॉलिटिकल पार्टी के नेताओं को लड़ने के लिए कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिलता, तो वो आपस में लड़ने लगते हैं। इसी व्यवस्था के तहत दो-तीन दिन भाजपा में यह सुगबुगाहट हुई कि योगी जी यूपी चुनाव में भाजपा का चेहरा नहीं होंगे। लेकिन केन्द्रीय कार्यालय ने झट से स्पष्टीकरण देकर अफ़वाहों का मज़ा किरकिरा कर दिया। इस स्पष्टीकरण से यह तय हो गया कि योगी जी ही मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे। और कांग्रेस से जतिन प्रसाद को भाजपा में मिलाकर यह भी बता दिया गया कि यह चुनाव भी भाजपा अपने पॉपुलर स्टाइल से ही लड़ेगी।
उधर जतिन प्रसाद के भाजपा में जाने से कांग्रेसी बहुत दुःखी हैं। उनका कष्ट ये है कि उन्हें यूपी में जतिन प्रसाद के बिना ही हारना पड़ेगा।
मुख्य मुद्दे चुनाव में रोड़ा न अटकाएँ, इसके लिए राजनैतिक प्रवक्ताओं ने टीवी डिबेट में टोंटी, हाथी और मंदिर जैसे मंत्र पढ़ने शुरू कर दिए हैं। इन मंत्रों के प्रभाव से शिक्षा, रोज़गार, महंगाई, सड़क, पानी, बिजली और क़ानून व्यवस्था जैसे भूत ग़ायब हो जाते हैं।
ग़ायब होने से याद आया, पिछले दिनों ट्विटर ने उपराष्ट्रपति के अकाउंट से ब्लू टिक ग़ायब कर दिया। इससे पूरे देश में हड़कंप मच गया। इस हड़कम्प से हमें समझ आया कि जिन व्यक्तित्वों के ट्विटर पर होने से ट्विटर वेरिफाइड होता था, उन व्यक्तियों को भी अब ट्विटर के वेरिफिकेशन से फ़र्क़ पड़ने लगा है। नेता वही जो ट्विटर मन भाए।
उपराष्ट्रपति के खाते का ब्लू टिक हटने से विपक्षी नेताओं ने भी अपने ट्विटर खातों पर ट्विटर की निंदा की और मन ही मन उसको शाबासी दी।
शाबासी से याद आया, पिछले दिनों उद्धव ठाकरे भी प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली आए। हर न्यूज़ चैनल पर हंगामा मच गया कि बिना चुनाव के दो नेता आपस में मिल कैसे सकते हैं! इस महत्वपूर्ण ख़बर की कवरेज में न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर्स ने जनता को बताया कि उद्धव जी और मोदी जी के बीच बहुत मधुर सम्बन्ध हैं। ये सुनकर जनता को चक्कर आ गया कि इनके मधुर सम्बन्धों की भाषा इतनी मीठी है तो दुश्मनी के लिए ये किस भाषा से शब्द इम्पोर्ट करते होंगे।
बहरहाल, चुनाव के बादल आसमान में छाने लगे हैं। उत्तर प्रदेश में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनने की वजह से वहाँ मूसलाधार रैलियाँ होने की संभावना है। बीच-बीच में गालियों की ओलावृष्टि होने की भी आशंका है।
टेलीफोन की रिंगटोन पर जनता के लिए हिदायत जारी की जा रही है कि बहुत ज़रूरी काम होने पर ही घर से बाहर निकलें।
हिदायत सुनकर लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब उनके ज़िले में रैली होगी और वे बिना मास्क के, एक-दूसरे से सटकर घर से बाहर निकल पाएंगे।
✍️ चिराग़ जैन