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चरित्र का प्रमाण

रघुवीर अवध से वनवास को चले तो
रोते-रोते पैरों से लिपट गई धरती
शठ कोई झपट के ले गया जनकसुता
शव इतने गिरे कि पट गई धरती
हनुमान राम जी की भक्ति का सबूत लाओ!
फटे हुए सीने में सिमट गई धरती
सीता से चरित्र का प्रमाण मांगा राम ने तो
पीर इतनी बढ़ी कि फट गई धरती

✍️ चिराग़ जैन

संयम का उपदेश

जब मन में ताण्डव करते हों संबंधों के क्लेश
तब कोई भी दे सकता है संयम का उपदेश
धीरज संग ढहने लगते जब यादों के अवशेष
ऐसे में पीड़ा देता है संयम का उपदेश

भाई का शव देख हुआ जब एक विभीषण क्लांत
तब यह ज्ञान मिला संकट में मन को रखिये शांत
ओछे हैं जो पीड़ा लखकर खो देते हैं धीर
दारुण दुख पाकर संयत हों वे ही सच्चे वीर
लक्ष्मण पर मूच्र्छा छाई तो बदल गया परिवेश

जो अर्जुन को समझाते थे, है संसार असार
पूर्व नियत घटनाओं का ही आभासी विस्तार
बंधु, सखा, परिवार, पितामह, शैशव के अनुबंध\
जो समझाते थे मिथ्या हैं ये सारे संबंध
वो रो-रोकर भिजवाते थे राधा को संदेश

✍️ चिराग़ जैन

पड़ताल

जी भर कर पड़ताल करो तुम
मन में उपजी शंकाओं की
संदेहों से खारी होंगी
मीठी झीलें आशाओं की

जब भी प्रश्न करोगे कोई उत्तर तुमको मिल जाएगा
पर संदेहों के कंकर से अपनापन तो हिल जाएगा
इक हलचल सी मच जाएगी, पाल हिलेगी नौकाओं की
संदेहों से खारी होंगी, मीठी झीलें आशाओं की

ख़ुद से पूछो अग्नि परीक्षा से आख़िर किसने क्या पाया
सीता ने सम्मान गँवाया, राघव ने अधिकार गँवाया
धोबी के लांछन से कम थी, सारी पीड़ा लंकाओं की
संदेहों से खारी होंगी, मीठी झीलें आशाओं की

यह भी सच है, राम छुएं तो प्राण पुनः संचारित होंगे
यह भी सच है पीड़ित दोषी से पहले अभिशापित होंगे
पत्थर बनकर रह जाएगी, देह अभागी अबलाओं की
संदेहों से खारी होंगी, मीठी झीलें आशाओं की

क्वारे सच पर प्रश्न उठाना क्या सचमुच संत्रास नहीं है
कैसा क्षण है, पतवारों को नाविक पर विश्वास नहीं है
शंका के बीहड़ में पनपी, नागफनी आशंकाओं की
संदेहों से खारी होंगी, मीठी झीलें आशाओं की

खुद को साबित करते-करते, ढल जाएगी धूप सुनहरी
आक्रोशों की हुई गवाही, भावुकता की लगी कचहरी
चतुराई तो हत्यारिन है, निश्छल सी अभिलाषाओं की
संदेहों से खारी होंगी, मीठी झीलें आशाओं की

✍️ चिराग़ जैन

हर ख़ुशी वनवास में है

कोई तो मंथरा रनिवास में है
अवध की हर ख़ुशी वनवास में है

अवध वालो हृदय को वज्र कर लो
कोई पत्थर छुअन की आस में है

कोई हठ पर अड़ा कोई नियम पर
मगर दशरथ गहन संत्रास में है

विवादों में तो कठिनाई बहुत है
क्या उससे भी अधिक उल्लास में है

दिलों में राम बसते हैं हमारे
मगर रावण हमारी श्वास में है

✍️ चिराग़ जैन

शिखरों का निर्माण

सिद्धांतों की बलिवेदी पर, अपनापन बलिदान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

लंका हो या अवधपुरी हो, सब ही ने ली अग्निपरीक्षा
धोबी के आक्षेपों की भी, मन में कर ली स्वयं समीक्षा
नष्ट सभी ने सीताओं का, सारा सुख-सौभाग किया है
रावण ने अपहरण किया था, राघव ने परित्याग किया है
जो मर्यादित थे उनका भी, पल में अलग विधान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

मथुरा जाने के निर्णय में, राधा की स्वीकृति भी थी क्या
राजपथों पर बढ़ते पग ने, पगडण्डी की पीर सुनी क्या
कौरव, पाण्डव, शकुनी, गीता, नगरी स्वर्ग लजाने वाली
याद नहीं आई पल भर भी, वो पगली बरसाने वाली
उदय किसी का तब ही संभव, जब कोई अवसान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

लक्ष्मण ने निजधर्म निभाया, उर्मिल भीतर-भीतर रोई
घिरा इधर अभिमन्यु अगर तो, उधर उत्तरा सिसकी कोई
गौतम की कुण्ठा को झेले एक अहिल्या पत्थर बनकर
रजवाड़ों की आन बचाई, पद्मिनियों ने जौहर रचकर
आधारों पर पैर टिकाकर, शिखरों का निर्माण हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

✍️ चिराग़ जैन

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