Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
प्रेम की राह में पीर के गाँव हैं
प्रेम फिर भी हमेशा लुभावन हुआ
एक सावन बिना प्रेम पतझर बना
पतझरों ने छुआ प्रेम; सावन हुआ
जब नदी ने समुन्दर छुआ झूम कर
तब नदी की सुधा को निचोड़ा गया
अपहरण कर लिया सूर्य ने देह का
और बादल उसे ओढ़ बौरा गया
हिमशिखर में ढली, आँसुओं-सी गली
छू सकूँ फिर समुन्दर -यही मन हुआ
एक अनमोल पल की पिपासा लिए
मौन साधक जगत् में विचरता रहा
घोर तप में तपी देह जर्जर हुई
श्वास से आस का स्रोत झरता रहा
चल पड़े प्राण आनन्द के मार्ग पर
जग कहे- ‘साधना का समापन हुआ’
एक राधा कथा से नदारद हुई
एक मीरा अचानक हवा हो गई
सिसकियाँ उर्मिला की घुटीं मन ही मन
मंथरा इक अमर बद्दुआ हो गई
बस कथा ने सभी को अमर कर दिया
फिर न राघव हुए ना दशानन हुआ
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
उठ जा रे
देख सुबह से बरस रहा है रामजी।
….बेमौसम
….झमाझम।
मुझे चिंता हुई
रामलीलाओं का क्या होगा?
और अधबने रावण के पुतले…
…वो तो भीग गए होंगे।
देखने गया
तो पाया
सब कुछ भीग गया था
रामलीला का मंच
रावण का दरबार
ऋष्यमूक पर्वत
दंडक वन
पर्णकुटी
पुष्पक विमान।
…ये क्या किया रामजी
अपनी ही लीला पर
पानी फेर दिया।
और वो अधबना रावण
पानी-पानी…
चीथड़े बन गए थे
उसके नीले, पीले परिधान
छाती तक काली हो गई थी
मूँछों के रंग से
और आँखों को ढँक लिया था
सोने के मुकुट ने बहकर।
वाह रे रावण
त्रेता से कलयुग तक आ गया
लेकिन आँखों पर आज भी
सोने का पर्दा!
लटक गया था रावण का चेहरा
लीला कमेटी के
पदाधिकारियों की तरह।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Purushottam
त्याग दी हर कामना निष्काम बनने के लिए
तीन पहरों तक तपा दिन, शाम बनने के लिए
घर, नगर, परिवार, ममता, प्रेम, अपनापन, दुलार
राम ने खोया बहुत श्रीराम बनने के लिए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
इन नासमझों का होगा नहीं रे कल्याण
रामधरा पर मांग रहे हैं रामलला के प्रमाण
श्रीराम बसे हैं आंगन में, पावन तुलसी की क्यारी में
श्री राम बसे हैं घर-घर में, आपस की दुनियादारी में
श्रीराम हमारी आँखों में, श्रीराम हमारे सपनों में
श्रीराम हैं सारे संबंधों में, सब रिश्तों में, अपनों में
बोलो कण-कण व्यापी का, कैसे करोगे परिमाण
मांगो प्रमाण रामायण के, इस भारत भू के कण-कण से
सरयू की निर्मल धारा से, और अवधपुरी के आंगन से
पूरब के उस मिथिलांचल से, पश्चिम के उस दंडक वन से
उत्तर के बृहत् हिमालय से, दक्षिण के उस भीषण रण से
देगा गवाही तुम्हें, सागर का थोथा अभिमान
ढूंढो शबरी के बेरों में, जंगल की दुर्गम राहों में
तिनकों की पावन कुटिया में, महलों की सिक्त निगाहों में
कब राम हुए थे ये पूछो, जंगल के हर इक वानर से
जिसने रावण को टक्कर दी, उस पंछी के टूटे पर से
भ्राता भरत से पूछो, पूजे थे जिसने पदत्राण
रामायण इस भारत भू के गौरव की अमर कहानी है
ये कथा हमारे पुरखों के पौरुष की एक निशानी है
रामायण केवल ग्रंथ नहीं, संस्कृति का ताना-बाना है
इस रामायण को झुठलाना, इस संस्कृति को झुठलाना है
इसमें बसा है अपने भारत का स्वर्णिम स्वाभिमान
जिनको पढ़ कर जीना सीखा, उनको मिथ्या बतलाते हैं
ये रावण के गोरे वंशज, राघव पर प्रश्न उठाते हैं
ये मैकाले के दूत भला तुलसी को क्योंकर मानेंगे
जो ख़ुद को जान नहीं पाए, रघुपति को क्या पहचानेंगे
आंखों पे पट्टी बांधे, करने चले हैं पहचान
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
यहाँ प्रारब्ध का लेखा सिकन्दर तक ने भोगा है
पड़ोसी की ख़ताओं को समन्दर तक ने भोगा है
बहुत चाहा बचाना राम ने रावण को मरने से
मग़र जो लिख गया वो तो कलन्दर तक ने भोगा है
✍️ चिराग़ जैन