+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

देशगीत

नाम रहेगा शेष हमारा
सर्वोत्तम परिवेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

आज़ादी के नग़मे गाकर, देशप्रेम की अलख जगाकर
स्वाभिमान हित जी लेते हैं, सिर्फ़ घास की रोटी खाकर
पल भर में तलवार हमारी हो सकती है खूं की प्यासी
पल भर में ही हो सकते हैं, शस्त्र त्यागकर हम सन्यासी
विष पीता अखिलेश हमारा
वज्र बना दरवेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

ओज रुधिर में, रौद्र नयन में, रूप भयानक वैरी के हित
करुणा निर्दोषों के दुःख पर, पीठ बंधा वात्सल्य सुरक्षित
हमने सीखा ढंग से जीना, हमने सीखा ढंग से मरना
सुंदरता पर आँच हुई तो, हमने सीखा जौहर करना
शाश्वत सुख उद्देश हमारा
शांतिपरक निर्देश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

हम अनुनय की बोली बोलें, रस्ता मांगें हाथ पसारे
अभिमानी के लिए भरे हैं हमने आँखों में अंगारे
हम अपनी पर आ जाएँ तो सागर से अमृत चखते हैं
हम अपनी पर आ जाएँ तो पर्वत उंगली पर रखते हैं
सागर-सा आवेश हमारा
दास हुआ लंकेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

मस्त फ़क़ीरों की धरती है, शांति-अहिंसा के अभिलाषी
वन्देमातरम गाते-गाते, रण में कूद पड़े संन्यासी
हमने सागर को लांघा है, पर्वत लेकर उड़े गगन में
एक वचन पूरा करने को, चैदह वर्ष बिताए वन में
सीधा-सादा वेश हमारा
प्रेम-त्याग संदेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

आपस में लड़ते हैं तो क्या, दुःख में साथ खड़े होते हैं
हर मुश्किल के आगे हम ही, सीना तान अड़े होते हैं
जब संकट ने पाँव पसारे, जब भी कोई आफत आई
एक साथ मिलकर जूझे हैं, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई
शौर्य रहेगा शेष हमारा
मिट जाएगा क्लेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

वनवासों को पूजा हमने, राजपाट हमने ठुकराया
जिससे मोह किया वो छूटा, जिसको त्याग दिया वो पाया
हम घर में रहकर वैरागी, हम वन में रहकर शासक हैं
योग-भोग दोनों के साधक, हम प्रियतम के आराधक हैं
मत मानो आदेश हमारा
पर समझो उपदेश हमारा
दुनिया का हर रंग यहाँ है
ऐसा अनुपम देश हमारा

✍️ चिराग़ जैन

पुनर्समीक्षा

किस पर्वत से पत्थर आया, कैसे रूप धरा पत्थर ने
बस इतने भर से मूरत की, प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी
पूछ लिया यदि उत्सुक होकर, शिल्पी की घायल उंगली से
तो फिर इस पूरे मंदिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

रामकथा लिखना चाहो तो, केवट का किस्सा सुन लेना
कैसे त्याग गए पल भर में, शासन का हिस्सा सुन लेना
सागर से सुनना यश गाथा, जिसको क्रोध दिखा राघव का
शबरी और निषाद कहेंगे, जिनको शोध दिखा राघव का
वह पत्थर गाथा गाएगा परस जिसे इंसान किया था
उन ऋषियों के दल से पूछो जिन सबका कल्याण किया था
लिखना, कैसा युद्ध हुआ था राघव का दम्भी रावण से
पूछ नहीं लेना भूले से, परित्यक्ता सीता के मन से
अगर सिया ने मन खोला तो बहुत प्रतीक्षा करनी होगी
तो फिर इस पूरे मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

बस यह लिखना कैसे निर्धन ब्राह्मण से संबंध निभाया
बस यह लिखना किस कौशल से कालयवन का अंत कराया
बस यह लिखना उस नटवर का रणकौशल में यश कितना था
बस यह लिखना पूरे युग पर मधुसूदन का वश कितना था
गौवर्द्धन पर्वत बोलेगा जिसको उंगली पर रखा था
भीष्म-धनंजय की सुन लेना, जिनने रूप विराट लखा था
गीता के श्लोकों को पढ़कर, श्रद्धा का लेखा भर देना
राधा के बिरही यौवन को, बिल्कुल अनदेखा कर देना
राधा से उद्धव उलझे तो विस्मृत शिक्षा करनी होगी
फिर इस पूरे ही मंदिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

बोधगया के वन बोलेंगे कितने थे विद्वान तथागत
नालंदा जगकर बोलेगा क्या थे दिव्य महान तथागत
ईश्वर का अवतार वही था, नगरवधू का मन बोलेगा
शांति-अहिंसा का गायक था, धरती का कण-कण बोलेगा
मुख पर कैसी दिव्य प्रभा थी, शिष्यों की टोली बोलेगी
इक दिन यह सारी मानवता उनकी ही बोली बोलेगी
तप की इक अनुपम शैली से युग के पन्ने मोड़ गए थे
राहुल से मत चर्चा करना, उसको सोता छोड़ गए थे
परित्यक्ता के अधर खुले तो खंडित निष्ठा करनी होगी
फिर इस पूरे ही मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

जो तरु जग को फल देता है उसकी जड़ें उमस सहती है
जो घाटों की प्यास बुझा दे, वह नदिया प्यासी रहती है
अक्सर दीपक के भीतर ही गहन अंधेरा छुप जाता है
तेज दुपहरी की आभा में, मौन सवेरा छुप जाता है
जिस पर्वत में करुणा जागी उसके जल को बहना होगा
अमृत घट उपजाकर भी सागर को खारा रहना होगा
जग की भूख मिटानी है तो हल की चुभन सहन कर लेना
उजियारा फैलाना है तो निज को पूर्ण दहन कर लेना
हर पूजित को दायित्वों की कठिन परीक्षा करनी होगी
इतिहासों को हर मन्दिर की पुनः समीक्षा करनी होगी

✍️ चिराग़ जैन

वैदेही वनवासी है

रघुपति राघव के चेहरे पर गहरी आज उदासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

राजसूय के आयोजन का वैभव आज पधारा है
इक राघव के मन से बाहर हर कोना उजियारा है
गाजे-बाजे, ढोल-नगाड़े, शुभ-मंगल और छप्पन भोग
राम समझते हैं क्षणभंगुर हैं ये सब के सब संयोग
जनकसुता का प्रेम लब्ध है, बाकी सब आभासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

रघुकुल राघव की जय-जय से धरती-नभ आच्छादित है
कीर्ति ध्वजा की सजधज लखकर जन-गण-मन आह्लादित है
किन्तु सियावर राम हृदय को यह उत्सव इक तर्पण है
प्राणप्रिया सीता पीड़ित है, धोबी को आमंत्रण है
बाहर राजा-सा दिखता है, भीतर इक संन्यासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

पूजन में तो स्वर्णसिया से रीति निभा ली जाएगी
किन्तु हिया से नेह लुटाती प्रीति कहाँ से आएगी
उच्चारण होगा मंत्रों का, यज्ञ प्रखरता पाएगा
किन्तु वियोगी मन समिधा से पूर्व भस्म हो जाएगा
प्रियतम के बिन क्या उद्यापन, विरही मन उपवासी है
अवधपुरी में उत्सव है पर वैदेही वनवासी है

✍️ चिराग़ जैन

संघर्ष का जयगान

लड़ते-लड़ते हार गया था कल जो सूरज अंधियारे से
उसकी एक किरण से गहरे अंधकार की मौत हो गई
मस्तक की त्यौरी बन जाती थी जिस विष का नित्य ठिकाना
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई

जिस रिश्ते को छोड़ गए थे निर्जन वन में निपट अकेला
जिसको अपनेपन से ज़्यादा भाया दुनिया भर का मेला
जिसका था अनुमान हमें वो हारा-टूटा मिल जाएगा
या तो अब वो नहीं मिलेगा या फिर रूठा मिल जाएगा
जिसको झूठी चमक-दमक में गहरी पीड़ा दे आए थे
उसको हँसते-गाते पाकर शर्मसार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई

धरती के शासन की इच्छा जीवन का आधार बनी थी
क्रूर अशोक भयावह जिसकी बर्बरता अख़बार बनी थी
जिसको निर्दोषों का रक्त बहाने मे कुछ क्षोभ नहीं था
जिसको मन की कोमलता के रक्षण का भी लोभ नहीं था
जिसकी अपराजेय कीर्ति को हार कभी स्वीकार नहीं थी
जब वैराग्य घटा तो उसकी जीत-हार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई

जिनके दिए उदाहरण हमने, उनके जीवन समतल कब थे
उनकी भाग्य लकीरों में जाने कैसे-कैसे करतब थे
जिसको इधर डुबोया जग ने, उसको उधर उबर जाना है
धड़कन की रेखा सीधी होने का मतलब मर जाना है
समय पुरानी तलवारों को घिसकर पैना कर देता है
जंग दिखे तो यह मत समझो तेज धार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई

✍️ चिराग़ जैन

स्त्री के साथ हुए दुर्व्यवहार की उत्तरदायी स्त्री नहीं है

सिचुएशन 1 : राधा कृष्ण से प्रेम करती थीं। कृष्ण भी उनसे प्रेम करते थे। दोनों अविवाहित थे किंतु इस प्रेम पर किसी को कोई आपत्ति नहीं। निष्कर्ष : परस्पर सहमति पर आधारित संबंध स्वीकार्य है।

सिचुएशन 2 : कर्ण को द्रौपदी के स्वयंवर में भाग नहीं लेने दिया गया। रावण सीता स्वयंवर में भाग नहीं ले पाए। कर्ण ने सुयोधन के बल पर स्वयंवर के अपमान का प्रतिशोध लेने का प्रयास किया। रावण ने सीता का अपहरण करके अपनी आसक्ति की तुष्टि का प्रयास किया। रावण, कर्ण, सुयोधन, सुशासन आदि सभी लोकनिंद्य होकर युद्ध में खेत हुए। निष्कर्ष : स्त्री को प्रतिशोध की अग्नि शांत करने का “सामान” समझना भयावह भूल है।

सिचुएशन 3 : शूर्पनखा लक्ष्मण पर आसक्त हुई और लक्ष्मण की असहमति के बावजूद उस पर दबाव बनाने का प्रयास किया। लक्ष्मण ने शूर्पनखा की नाक काट दी। निष्कर्ष : पुरुष की सहमति को महत्वहीन समझना स्त्री के अपमान का कारण हो सकता है।

सिचुएशन 4 : अहिल्या पर आसक्ति इंद्र का अपराध था। गौतम ऋषि को भ्रमित कर अहिल्या का बलात्कार करने की घटना में अहिल्या निर्दोष थी फिर भी गौतम ऋषि ने अहिल्या का परित्याग किया। राम ने स्वयं अहिल्या के साथ हुए अन्याय का निदान किया। निष्कर्ष : स्त्री के साथ हुए दुर्व्यवहार की उत्तरदायी स्त्री नहीं है। इस पोस्ट से हमें यह शिक्षा मिलती है कि शास्त्र पूजने की नहीं, पढ़ने की चीज़ हैं।

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!