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बहुत टॉप रमेश मुस्कान

ज़िन्दगी जीने के एक रवैये का नाम है – ‘रमेश मुस्कान’! आडम्बर, झूठ, परिश्रम, महत्वाकांक्षा और औपचारिकता से रहित एक सहज, प्रसन्न, उन्मुक्त और संतुष्ट जीवन का सटीक उदाहरण है रमेश मुस्कान का जीवन।
मंच पर जमने और कविता लिखने की कला किसी से भी सीखी जा सकती है लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी तनाव से मुक्त रहने की स्थितप्रज्ञता सिखाने के लिए रमेश मुस्कान के अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति मेरे आसपास नहीं है।
दृष्टि इतनी तेज़ कि सामने वाले की आँखों में यदि एक पल के लिए भी कोई रंग उतरा हो तो वह अनदेखा नहीं रह सकता। कान इतने तेज़ कि बात करने वाले के शब्दों की सरसराहट में छिपे हुए भाव की आहट भी सुन लें। आकलन इतना स्पष्ट कि उठने के अंदाज़ से किसी के गिरने की अवस्था भाँप लें और अन्वेषण इतना ईमानदार कि जो व्यक्ति अभी-अभी हानि पहुँचा कर गया हो उसके वार की भी प्रशंसा करने से न चूकें।
एक व्यक्ति के रूप में बेहद शानदार और एक कवि के रूप में उतने ही आलसी। शब्द चयन और अन्वेषण की विलक्षण क्षमताओं को देखते हुए अनेक नक्षत्रों ने ठहर कर इनके किसी परिधि पर आने की प्रतीक्षा की, लेकिन पूरी आकाशगंगा चक्कर खाती फिर रही है कि कोई ध्रुवतारा रंचमात्र भी हिले बिना कैसे प्रकाशमान रह पाता है!
जब कोई शुभचिंतक इनके लाभ के लिए इनके श्रमरूप का दर्शन करने की प्रतीक्षा करने लगता है तो ये और अधिक स्थिर होकर उस शुभचिंतक के थक जाने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। इतिहास साक्षी है कि प्रतीक्षाओं की इस स्पर्धा में आज तक रमेश मुस्कान विजयस्थल से टस-से-मस नहीं हुए हैं।
पर्यटन और बतरस उनके प्रिय चाव हैं। यदि पर्यटन का लोभ न होता तो कदाचित इनकी लेखनी से हिंदी साहित्य के हाथ उतना भी ख़ज़ाना न लगा होता, जितने लिखे को ये महाशय बहुत माने बैठे हैं। बतरस में निश्चित ही इनका कोई विकल्प नहीं है, लेकिन माइक के समक्ष ये एकदम सीरियस हो जाते हैं और माइक के विकिरण से अपनी रक्षार्थ शीघ्रातिशीघ्र अपने आसन पर आ विराजते हैं। माइक से दूर होते ही मंच पर इनकी प्रत्युत्पन्नमति पुनः बांबी में से बाहर निकल आती है।
चूँकि लाभ और रमेश मुस्कान के मध्य आलस्य की एक गहरी खाई है, अतएव सत्य बोलते हुए इन्हें कभी डर नहीं लगता। ये जानते हैं कि कोई चाहकर भी इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि इस कार्य के लिए ये पूर्णतया आत्मनिर्भर हैं।
इतने सब के बावजूद एक सत्य अकाट्य है कि जिसके पास रमेश मुस्कान जैसा दोस्त हो वह कभी असफल नहीं हो सकता क्योंकि असफल होने के सारे रास्ते रमेश मुस्कान जानते हैं और अपने दोस्तों को कभी उन रास्तों पर जाने नहीं देते।

✍️ चिराग़ जैन

किशन सरोज जी नहीं रहे

ले गया चुनकर कँवल कोई हठी युवराज
ताल के शैवाल-सा हिलता रहा मन

स्वर्ग का युवराज गीत-सरोवर के सबसे ख़ूबसूरत कँवल को ले चला और गीतों के रसिकों का मन काँपता रह गया। विरह और पीड़ा से परिपूर्ण किशन सरोज जी का कवित्व गीत की सबसे परिष्कृत शब्दावली का साधक था। मेहंदी रचे हाथों से दीप तिरोहित होते देख किशन सरोज जी वर्तिका के मोहपाश में बंधने की बजाय, जल में हुई सिहरन को महसूस करते रहे। गीत की संवेदना की सूक्ष्म दृष्टि का इससे बढ़िया कोई और उदाहरण तलाश पाना कठिन है। किशन जी के गीतों में यह सूक्ष्मदृष्टि फिर-फिर कर उतरती दिखती है।
अन्य गीतकारों की तरह स्वार्थ की ओट में जताए जा रहे संबंध भी उन्होंने गीत में अभिव्यक्त किये किंतु उनके लिए जो बिम्ब विधान किशन सरोज जी के पास था, वह अन्य गीतकारों के पास नहीं मिलता।

एक पल में आँख ओझल, हिरनियों का दल हुआ
कौन जाने, तन हुआ घायल कि मन घायल हुआ
बहुत घबराए अकेले प्राण, नदिया के किनारे
फिर लगा प्यासे हिरण के बाण, नदिया के किनारे

समर्पण की पराकाष्ठा और किसी अपने को अभय करने के लिए किस हद्द तक पहुँचा जा सकता है, यह बात समझने के लिए उनके गीत की इन पंक्तियों को जीना पड़ेगा र:

थे हमारे प्यार से जो-जो सुपरिचित
छोड़ आया सब पुराने मित्र
तुम निश्चिन्त रहना!
कर दिए लो आज गंगा में प्रवाहित
सब तुम्हारे पत्र, सारे चित्र
तुम निश्चिन्त रहना!

अभिव्यक्ति के लिए इतनी सक्षम प्रतिभा और अनुभूति के लिए इतना संवेदनशील मन का संयोग ही किसी मनुष्य को किशन सरोज बना सकता है। एक गीत के मुखड़े में वे सामान्य बिम्ब विधान पर कविताएँ रचनेवालों को इशारे से बताते हैं कि संवेदना की दृष्टि जहाँ पड़ती है, वहीं कविता खड़ी मिलती है। अहा, क्या गीत है –

नीम तरु से फूल झरते हैं
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य!

यही आश्चर्य-बोध उनके प्रतीकों, बिंबों और शब्द-चयन को अभ्यार्थियों के लिए पाठशाला बना देता है। कितना बड़ा गीतकार, और कितना सहज मनुष्य! यह विलक्षण था। अपनी किसी आवश्यकता को तब तक किसी के सम्मुख प्रकट नहीं करते थे, जब तक उसे अनदेखा करना सम्भव होता था और फिर जब कहना पड़ता था तो संकोच का सागर उनके मन से उनकी वाणी तक लहलहाने लगता था।
न कोई लाग-लपेट, न कोई दिखावा और न ही कोई महत्वाकांक्षा, न किसी से स्पर्धा! केवल दो ही शब्द उनके पूरे जीवन का परकोटा रहे रू एक प्रेम, दूसरा गीत!
आज किशन जी विदा हो गए। गीत की गंगा में बहाए गए उनके सीप-शंख चुनकर आने वाली पीढियां गीत-वधुओं के कुन्तलों में गूँथती रहेंगी और गीत की कनुप्रिया की स्वर्णकेशी व्यथा का गायन युग-युग तक किशन सरोज जी के अस्तित्व की गवाही देता रहेगा।

✍️ चिराग़ जैन

राजेन्द्र राजन : हिंदी गीत की साकार प्रतिभा

किसी की भावनाओं का सत्कार करना, प्रेम है। किसी की अनुभूतियों को शब्द में ढलने से पहले ही अक्षरशः समझ लेना, प्रेम है। किसी के अभीष्ट को अपनी आकांक्षाओं से अधिक वरीयता देना, प्रेम है। अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का कौशल, काव्य सृजन की प्रथम अर्हता है। यही कारण है कि प्रेमजन्य समर्पण, मनुष्य को कवि बनाता है और कवि को बेहतर कवि।
जब कोई प्रेम में होता है तो कविता की ओर उसकी रुचि बढ़ जाती है। चूँकि मनुष्य जीवन में एक बार प्रेम अवश्य करता है इसीलिए मनुष्य जीवन में एक बार कविता भी अवश्य लिखता है। जीवन के इस मोड़ से कुछ लोग कविता का राजमार्ग पकड़कर प्रेम की स्मृतियों को सजीव बनाए रखते हैं, और बाक़ी लोग कविता, प्रेम और उसकी स्मृतियाँ वहीं छोड़कर दुनियादारी की पगडंडियों में ग़ुम हो जाते हैं।
राजेन्द्र राजन जी इन दोनों प्रकार के लोगों से विलग हैं। वे न तो कविता के राजमार्ग की ओर आकृष्ट हुए, न ही दुनियादारी के जंजाल में ग़ुम हुए। वे तो उसी गाम पर ठहरकर गीत के एक ऐसे विराट वृक्ष बन गए, जिसकी डालियाँ काव्य के राजमार्ग पर बढ़नेवाले पथिकों को भी छाँव देती रहती हैं और दुनियादारी में खो चुके लोगों को भी उनके खो चुके हरेपन का एहसास कराती रहती हैं।
राजमार्ग वाले बटोही स्वयं के कवि होने का दम्भ लिए लोकप्रियता की अंधी दौड़ में दौड़ते रहते हैं और पगडंडियों के जंजाल में फँसे लोग रोज़मर्रा की उलझनों का हल ढूंढते रह जाते हैं। लेकिन भावनाओं और विवशताओं के जंक्शन पर खड़ा यह कल्पवृक्ष अनवरत गीतपुष्पों की वर्षा करता रहता है। यह स्वयं चलकर कहीं नहीं जाता, लेकिन कोई इसके साए में से गुज़रता है, तो यह बिना कहे उसे गुनगुनाहट की महक और संवेदनाओं की ऑक्सीजन से सराबोर कर देता है।
राजन जी के गीतों की सहजता, उनकी इसी निस्पृहता का सुफल है। वे मिलन और विरह को एक साथ गुनगुनाते हैं। वे प्रेम के पूरब और पश्चिम को अपने एक गीत से जोड़ने की क्षमता रखते हैं। वे किसी भी एक ओर झुके हुए नहीं दिखाई देते, इसी कारण वे लिख पाते हैं कि-

केवल दो गीत लिखे मैंने
इक गीत तुम्हारे मिलने का,
इक गीत तुम्हारे खोने का

जिस गीतकार ने मिलने और खोने, दोनों अवसरों में कविता की तलाश कर ली हो, उसे स्थितप्रज्ञ कहा जा सकता है। राजन जी के लिए जीवन की हर परिस्थिति को गीत कर देना ही श्वासों की सार्थकता रहा। उन्होंने संसार से कभी कोई अपेक्षा भी नहीं की। उनकी अभिलाषा रही कि उन्हें नित्य क्षीण होती उनकी देह के साथ एकाकी छोड़ दिया जाए, ताकि इस क्षरण को गीत बनाने में उन्हें कोई बाधा न झेलनी पड़े-

माना अंधियारे कोने हैं
जिन कोनों में मैं रहता हूँ
जिस पल का प्रारब्ध रुदन है
उस पल भी हँसता रहता हूँ
टूट रहा हूँ- हर पल, हर पग
मांग रहा हूँ फिर भी ओ जग
मुझसे मेरे अंग न छीनो
मुझसे मेरे रंग न छीनो

राजन जी का व्यक्तित्व, एक संपूर्ण कवि का व्यक्तित्व है। गहराई बढ़ने के साथ-साथ समुद्र के चेहरे पर जो शांति घटित होती है, वह राजन जी के व्यक्तित्व में आसानी से दिखाई देती है। वे नैराश्य के अंधियारे को आशा की एक किरण थमाने में विश्वास रखते हैं-

तीरगी में इक उजाले कि किरण मिल जाए बस
इससे ज़्यादा चाहिए भी क्या किसी फ़नकार से

वे किसी का मन हल्का करने के लिए अपने पूरे व्यक्तित्व को एक कंधा बना देने के पक्ष में दिखाई देते हैं-

भले ही देर तक सुनता रहा हूँ उसका अफ़साना
मगर मैं और सुन लूंगा, कि उसका मन तो हल्का हो

यदि कवि की कविताओं से उसके व्यक्तिगत अनुभवों का चित्र बनाना समीचीन हो तो राजेन्द्र राजन जी के गीतों में झाँककर देखा जा सकता है कि उनके अनुभवों में प्रेम की ऐसी गहन अनुभूतियों का एक किरदार श्वास लेता है, जिसके निमीलित नयनों की कोरों पर अश्रु खिलखिलाते हैं और सूखे हुए अधरों से मुस्कुराहट बहती है।
वे प्रेम की भीगी हुई यादों को गुनगुनाते हुए भी उतने ही संतुष्ट दिखते हैं, जितने सहज प्रेम की भोगी हुई यामिनियों को गाते हुए दिखते हैं। राजन जी सप्रयास कवि नहीं बने हैं। सप्रयास कवि बना भी नहीं जा सकता। वे तो अन्तस में बहती कविता की धारा में से गीत की अंजुरी भरने का कौशल जानते हैं। निजी अनुभूतियों को अलगनी पर लटकाकर उनसे टपकते रस का चित्र उकेरने की क्षमता है उनके पास। ‘सुख की भूख न दुःख की चिंता’ जैसे मन की साधना से प्रस्फुटित उनका रचनाकार अपने समय की प्रेम मनोदशाओं का ऐसा कैमरा बना, जो गणपति भाव से अपनी आँखों को कान बनाकर अनुभूत को शब्द देता रहा। उन्होंने कहा भी है-

एहसासों के संबंधों में आँखों की भाषा मुखरित है
जिन रिश्तों को मन छूता है, हाथों से छूना वर्जित है

✍️ चिराग़ जैन

महाप्रज्ञ

नयन खुले संधान हो गया
पलकें मूँदीं ध्यान हो गया
जो पाया, पीयूष बन गया
जो छोड़ा वह दान हो गया
जिनकी पूरी जीवनचर्या परिभाषा थी धर्म की
महाप्रज्ञ बस संत नहीं थे, उपमा थे सत्कर्म की

जन-जन तक पहुँचे इस ख़ातिर, सरलीकरण किया ग्रन्थों का
बँट कर बिखर नहीं जाएँ हम, एकीकरण किया पंथों का
धर्मोचित विज्ञान बन गया
गीत लिखा तो गान बन गया
जो भी उनके मुख से निकला
वो हर वचन महान बन गया
व्याख्या करते रहे जन्म भर, वे आगम के मर्म की
महाप्रज्ञ बस संत नहीं थे, उपमा थे सत्कर्म की

छोटे छोटे व्रत दिलवाए, अणु की ताक़त पहचानी
पूरी मानवता मोहित थी, वे बोले ऐसी वाणी
मानव को बस मानव माना
भेदभाव का पंथ न जाना
छोटे बच्चों को दे आए
आगम का अनमोल ख़ज़ाना
जीवन भर चर्चा की केवल मानव के गुण-धर्म की
महाप्रज्ञ बस संत नहीं थे, उपमा थे सत्कर्म की
✍️ चिराग़ जैन

याद प्रदीप चौबे की

ज़िन्दगी को सलीक़े से जीना क्या होता है, इस प्रश्न का उत्तर उन सबके पास है जिन्होंने प्रदीप चौबे जी को देखा है। एक ऐसा शख़्स जिसने अपनी शर्तों को किसी भी शर्त पर कभी छोड़ा नहीं। कवि सम्मेलन में गए तो होटल से लेकर मंच तक सब कुछ व्यवस्थित। संयोजन किया तो उनके द्वारा आमंत्रित कवि को क्या क्या ज़रूरत पड़ सकती है, इसका पूरा-पूरा ध्यान; कविता पढ़ी तो एक भी लफ़्ज़ बेमानी नहीं बोला; यात्रा की तो ट्रेन के बिस्तर से लेकर गाड़ी की पिछली सीट के तकिए तक सब कुछ टिप-टॉप। आरंभ के बैनर तले वे ऐसी गोष्ठियाँ करवाते थे जिनमें श्रोता चुन-चुनकर बुलाए जाते थे।
संवेदना इतनी प्रबल कि करुणा की एक पंक्ति पर बिलख पड़ते थे और आत्मबल इतना दृढ़ कि भयंकर स्थिति में भी अपने चेहरे को मटकाते हुए चुटकी ले लेते थे। दुनिया के सबसे सामान्य वाक्य को भी केवल अपनी अदा से ठहाके में तब्दील कर देने का कौशल था उनके पास। सामान्य सी बात को भी तनी हुई भृकुटियों और शरारत भरी मुस्कान के साथ जब वे आँख मारते हुए बोलते थे तो उनकी अदा आनंद उत्पन्न करती थी। बोलते हुए स्वर का आरोह-अवरोह उनके एक-एक जुमले को लतीफ़ा बना देता था। हाज़िरजवाबी ऐसी कि यदि भरे क्रोध में भी किसी को डाँटा तो उस क्षण के संवाद हास्य के संस्मरण बन गए।
कला और प्रतिभा के वे पारखी थे। संगीत, चित्रकला, कविता, अभिनय तथा नृत्य की इतनी महीन समीक्षा करते थे कि स्वयं कृतिकार आश्चर्य से भर जाता था। एक-एक शेर को इतने मन से सुनते थे, कि कोई बात छूट न जाए और जहाँ कविता होती थी, वहाँ इतनी ईमानदार सराहना करते थे कि सुनानेवाला निहाल हो जाता था।
प्रवृत्तियों को भाँपने में दक्ष थे। सामनेवाला जो नहीं कह रहा होता था, उसे पहले सुनते थे। और एक बार सामनेवाले को पढ़ लें तो प्रतिक्रिया देने में विलम्ब नहीं करते थे। छद्म और शातिर लोगों को कई बार रुलाकर लौटाने का इतिहास रहा है प्रदीप जी का।
शरारती इतने थे, कि यात्रा में दो लोगों की बातचीत में बिना शामिल हुए ही मुस्कुराते हुए भिन्न-भिन्न अर्थ निकालकर रस लेते रहते थे। इसी रस से उत्पन्न शरारती मुस्कान उनकी पहचान थी।
साफ़गोई और निर्लिप्तता ने उन्हें बेहद अंतर्मुखी बना दिया था। परफेक्शनिस्ट थे, इसीलिए अपने कम्फर्ट ज़ोन में किसी का दख़ल बर्दाश्त नहीं करते थे। लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी बहुत देर तक क्रोध उन्होंने कभी नहीं किया। किसी भी अनचाहे विवाद को एक जुमले से ठहाके में बदल देने का हुनर आता था उन्हें।
अपने कम्फर्ट के दायरे में प्रवेश करने का अधिकार उन्होंने कभी भी किसी को नहीं दिया। शब्दों का अपव्यय उन्हें कतई पसंद नहीं था। उनकी एक ख़ासियत यह भी थी कि वे यदि किसी की प्रशंसा कर रहे होते थे तो उसकी वास्तविकता में कोई संशय नहीं हो सकता था, क्योंकि जो कुछ उन्हें नापसन्द होता था उसको अपनी नापसंदगी जताने में वे कभी नहीं हिचकते थे। जीनियस शब्द और जीनियस लोग उन्हें बेहद पसंद थे। चाटुकारों और दिखावटी लोगों से उन्हें परहेज था। वे जीनियस और खरे लोगों की संगत पाकर प्रसन्न होते थे।
सच बोलते समय वे सामने वाले के मन की चिंता करना बहुत ज़्यादा अनावश्यक समझते थे। झूठी प्रशंसा करनेवालों को बर्दाश्त करने की उनकी क्षमता कुछेक सेकेण्ड में जवाब दे जाती थी। क़िस्सागोई और बतरस के वे मास्टर थे। भयंकर आपात स्थिति की रिपोर्टिंग भी इतने चुटीले अंदाज़ में करते थे कि तनाव छूमंतर हो जाए। भीतर बाहर एक सरीखा जीवन जीनेवाले प्रदीप जी जैसे लोग अब शायद मुश्किल से ही देखने को मिलेंगे, जो अपने ड्राइंग रूम की दीवार पर लिखवा सकें कि- ‘इतना तो चलता है, यहाँ नहीं चलता है।’
मुझे याद है, उन दिनों मैं लगभग रोज़ गीत लिखता था। यात्राओं में अन्य कविमित्र इस बात पर परिहास भी करते थे कि इसे अकेला छोड़ दो तो ये नया गीत लिख लाएगा। प्रदीप जी को ग़ज़लों का शौक़ था। मैंने बिराटनगर से बागडोगरा आते हुए रास्ते में उन्हें कुछ अशआर सुना दिए। उन्होंने भरपूर सराहना की। घण्टे भर बाद अपने सुप्रसिद्ध अंदाज़ में वाक्यों को लगभग गाते हुए बोले- ‘चिराग़, तुम बहुत बढ़िया शेर कहते हो… मुझे भेज दिया करो…’ इससे पहले कि मैं कुछ बोलता उन्होंने उसी सुर में आरोह बढ़ाते हुए वाक्य पूरा किया ‘….गीत मत भेजना!’
जब वे संवाद करते थे तो उनके ओंठ, उनकी आँखें, उनकी भृकुटि, उनकी गर्दन, उनके हाथ, उनकी उंगलियाँ… सब एक साथ बोलने लगते थे।
इतने जीवन्त कवि ने यकायक इस दुनिया को अलविदा कहा तो महसूस हुआ कि हँसता-हँसाता वह व्यक्तित्व कितने सारे तनाव झेलता था, इसका अनुमान किसी को नहीं था। हँसानेवाले का आँसू सृष्टि की सबसे अनावश्यक वस्तु है… प्रदीप जी इस बात को समझ गए थे, इसलिए उन्होंने अपने आँसुओं को अपने व्यक्तित्व के शोरूम में कभी डिस्प्ले नहीं किया।
उनके पास दिल से लेकर जिस्म तक अनेक घाव रहे लेकिन उन्होंने मंच पर कभी इन घावों की संवेदना नहीं बटोरी। प्रदीप जी एक संपूर्ण कवि थे। कभी वक़्त ने आकलन किया तो पता चलेगा कि 11 अप्रैल 2019 को ग्वालियर में जो काया भस्म हुई थी, उसमें एक प्रदीप्त सूर्य ने सत्तर बरस तक प्रवास किया था।
✍️ चिराग़ जैन

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