Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
“कविता व्याकरण के दोष बर्दाश्त कर सकती है लेकिन भाव के चरित्र में मिलावट नहीं झेल पाती।” – यही गुरुमंत्र दिया था मेरे भीतर के कवि को श्री राजगोपाल सिंह जी ने। पितृत्व और गुरुत्व की गुणमुक्ताओं को मित्रता के सूत्र में पिरोने से संबंध का जो गलहार बनेगा, बस वही नाम है मेरे और उनके सम्बन्ध का। कितनी ही यात्राओं, कितने ही संस्मरणों और कितने ही संघर्षों के चित्र सजीव हो उठते हैं, उनका नाम गुनने भर से। ग़ज़ल और गीत के अतिरिक्त बाग़वानी के वे ख़ूब शौकीन थे। बोनसाई और कैक्टस की उनकी दीवानगी उनके व्यक्तित्व का दर्पण बन गई। बोनसाई की तरह उन्होंने जीवन भर अपना क़द बढ़ाने से अधिक ध्यान अपने अस्तित्व की पूर्णता पर दिया और कैक्टस की तरह कंटीला जीवन जीने के बावजूद कहीं से भी तड़कने पर गीत का दूधिया बहाव कम नहीं हुआ। कैक्टस कंटकों के लिए जाना जाता है, लेकिन राजगोपाल जी ने यह समझा कि काँटों की बदनामी झेलता कैक्टस वर्ष में एक बार पुष्पित भी होता है और जब यह पुष्प खिलता है तो इसके एक फूल के सम्मुख हज़ारों कुमुदनियों की प्रसिद्धि फीकी पड़ जाती है। आज भी नजफगढ़ में उनके घर की छत पर उनके ये बोनसाई और कैक्टस उनकी मान्यताओं का अनुवाद कर रहे हैं। उनके अशआर में यह हरियाली अपने पूरे सौष्ठव के साथ उपस्थित है। प्रकृति के प्रेम में पगी ग़ज़लों के रचयिता के जन्मदिन का आयोजन है। वे तो नहीं होंगे लेकिन उनकी स्मृतियां होंगी, उनका चित्र होगा और उनकी कविताओं में प्रदर्शित उनका पूरा चरित्र होगा। पूरा जीवन लेखनी को समर्पित करने वाले राजगोपाल सिंह जी को याद करने के लिए अपने जीवन के कुछ पल निकाल सकें तो आप भी आना! अच्छा लगेगा!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
एक पूरा जीवन समाप्त हो जाने की एक और ख़बर आई। वे शशि साहब जो कभी चहकते हुए एक नौजवान थे, वे जिनका अंदाज़ “स्टाइल” कहलाता था, वे जिनका उठना-बैठना, खानपान, आना-जाना सब कुछ सुर्खियों में तब्दील हो जाता था; आज “हमेशा” के लिए विदा हो गए। वो शरारती आंखें अब कभी नहीं खुलेंगी। कितना जरूरी और बेतुका सत्य है मृत्यु! और कितना निष्ठुर है लोकप्रियता का भ्रम! जिनका फ़िल्म में मरण देख कर लोगों की पलकें भीग जाती थीं आज उनके महागमन की ख़बर भी केवल एक सिंगल कॉलम न्यूज़ से ज़्यादा कुछ नहीं है। सामाजिक लोगों का जीवन किसी खूबसूरत जश्न जैसा है। जब इस जश्न पर नूर बरसता है तो पूरी दुनिया मुँह बाये इसकी रौशनी से झिलमिलाते संसार को देखती है लेकिन जश्न का रंग उतरने के बाद वही जीवन कितना वीरान और बदरंग हो जाता है- इसकी सुधि लेने कोई नहीं जाता। शशि जी ने जीवन के अंतिम कुछ वर्ष बेहद कष्ट में गुज़ारे। राजेश खन्ना भी अवसाद के दंश से रोज़ घायल हुए और अंततः चल बसे। दिलीप साहब, अटल जी और भी अनेक दैदीप्यमान सूरज किसी गुमनाम अंधेरे में जीवन काट रहे हैं। ये सब घटनाएँ आज इसलिए संदर्भित हो गई हैं कि कभी हमारे मनोरंजन, खेल, विज्ञान, राजनीति, कला, उद्योग और अन्य क्षेत्रों की धुरि रहे व्यक्तित्व हमारे भविष्य की धरोहर हैं। उनके अनुभवों की ऊर्जा को व्हील चेयर पर घिसटने के लिए छोड़ देने की बजाय यदि भविष्य के निर्माण हेतु प्रयोग करने का उपक्रम किया जाए तो संभवतः निजी जीवन को तिरोहित कर अनवरत मेहनत करने वाले लोग अधिक जिजीविषा से मानव जाति की सेवा कर पाएंगे। अलविदा शशि साहब!
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished
सूखी बावड़ी
बिलख कर रोई है आज;
सूखे कुओं की कागलें
क्षण भर छलछला कर
सूख गई हैं फिर से;
जर्जर तालाबों की मिट्टी
बैठ गई है थक कर!
पानी की पीर को
बानी देने वाली आवाज़
ख़ामोश हो गई है आज।
सूखे स्रोतों से बतिया कर
जो तर कर देता था उनका दामन
वो निःशब्द हो गया है।
एक पानीदार कहानी
अचानक
गुम हो गई है
किसी पुरानी अभागी नदी की तरह।
धाराओं की बीमारियाँ
तलाशती उँगलियाँ
टटोल नहीं पाईं
अपनी काया को जकड़ रहे
केकड़े का शिकंजा।
किसी मीठे तालाब की
आख़िरी बूंद सूखने जैसा है ये पल
किसी मीठी बावड़ी के
पाट दिए जाने जैसा है
ये समाचार
किसी लबालब कुँए के
रीत जाने जैसा है ये अवसाद
…अनुपम मिश्र को
जिन्होंने जाना है
उनकी आँखें छलकी नहीं हैं;
सूख गई हैं!
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
भारत के ओज स्वरावतार
जनता के मन की दृढ़ पुकार
कविता के तेजस्वी सपूत
वाणी में शौर्य सुधा अकूत
ज्वाला से जब भर गए नेत्र
शब्दों में उतरा कुरुक्षेत्र
गाया करुणा की भृकुटि तान
वह रश्मिरथी का महागान
गीतों में सामधेनी धधकी
जनहित की ज्यों दामिनी दमकी
श्रृंगार रचा उर्वशी सजी
कविता के घर पाजेब बजी
ऐसा शब्दों का प्यार सधा
श्रृंगार सधा, अंगार सधा
शोध अरु इतिहास मिलाय रचे
संस्कृति के चार अध्याय रचे
शासन से आँख मिलाय जिया
नभपिण्डो से बतियाय जिया
है कौन निविड़ जो हरा नहीं
दिनकर जीवत है मरा नहीं
जब भी सत्ता बौराती है
जनता दिनकर को गाती है
जब भी अंधियारा गहरेगा
दिनकर प्राची में प्रहरेगा
रश्मियाँ नहीं लेतीं विराम
दिनकर को शत्-शत् है प्रणाम
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
एक अज्ञात कलाकार ने
हवा में कुछ लकीरें बनायीं
कुछ खड़ी रेखाएँ
जैसे भृकुटि के मध्य त्यौरियाँ पड़ती हैं
कुछ आड़ी रेखाएँ
जैसे ललाट पर बौद्धिकता उभरती है।
कुछ अर्द्धवृत्ताकार
जैसे नयनों के नीचे की चिन्ताएँ
कुछ हल्की पनियाई
जैसे आँखों की कोरों पर तैरती इच्छाएँ
कुछ होंठों पर बिखरी मुस्कानों की
सुखद यादों जैसी
और कुछ कसमसाते हुए
पूरे न हो सके वादों जैसी।
कुछ ख़ुशियों की
कुछ ग़म की
कुछ आशाओं के उजियारे की
कुछ निराशाओं के तम की
कुछ अप्राप्य के प्रति रोष की
और कुछ असीम संतोष की
…इन आड़ी-तिरछी रेखाओं में
जाने कब एक व्यक्तित्व उभर आया
मैं रेखाएँ देखता रह गया
और हवा में मेरा चेहरा उकर आया!
✍️ चिराग़ जैन