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क्या करोगे

कहाँ तक झूठ का पर्दा करोगे
कभी तो झील में चेहरा करोगे

बिछाकर जाल दाना डालता है
तो क्या सय्याद का सजदा करोगे?

कराहों को दबाया जा रहा है
कहीं चीखें उठीं तो क्या करोगे

सुना है भूख शर्मिंदा हुई है
हवस को कब तलक पूरा करोगे

अगर ज़िल्लत की आदत पड़ गई तो
फिर ऐसी ज़िन्दगी का क्या करोगे

उजालों को मिटा कर देख लेना
अंधेरे में तुम्हीं रोया करोगे

✍️ चिराग़ जैन

दुर्घटना : एक अवसर

एक फिल्मी सितारे ने अपने घर में फाँसी लगा ली। ख़बर सुनकर देश सन्न रह गया, लेकिन एक विशेष वर्ग ने उसके फिल्मी क़िरदार को लेकर उसे अपने धर्म का विरोधी घोषित किया और उसकी मृत्यु पर शोक न करने के संदेश सोशल मीडिया पर लिखे।
बाद में दो दलों के राजनैतिक हित टकराए और उस आत्महत्या को हत्या कहकर मुद्दे को हवा दी गई। कोरोना को ढाल बनाकर दूसरी स्टेट के पुलिस अधिकारी को क्वेरेन्टीन कर दिया गया। फिर सीबीआई, फिर नारकोटिक्स, फिर रिया की गिरफ़्तारी, फिर कंगना राणावत, फिर पूरे बॉलीवुड का ड्रग्स एंगल, फिर बॉलीवुड को उत्तर प्रदेश लाने की बात! पोस्टमार्टम रपट पर संदेह करके पोस्टमार्टम रपट का पोस्टमार्टम कराया गया। जिन्होंने सुशांत को अपने धर्म का विरोधी बताया था, उन्होंने ही बिहार में सुशांत राजपूत के चित्र दिखाकर वोट मांगे। और इतने सब ड्रामे के बाद सीबीआई को आत्महत्या के एंगल से जाँच करने के लिए नियुक्त किया गया।
कहीं कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटती है तो राजनीति की आँखों में आँसू नहीं, चमक आती है। उत्तर प्रदेश में बलात्कार हो तो भाजपा विरोधी राजनीतिज्ञ ख़ुश हो गए कि योगी सरकार को घेरने का मौक़ा मिल गया। अलवर में बलात्कार हो गया तो भाजपा ने राहत की साँस ली कि अब जब कोई हाथरस की बीन बजाएगा तो हम अलवर का नगाड़ा पीट कर उसकी आवाज़ को दबा देंगे।
विश्वास कीजिये, ये सब घटनाएँ राजनीति के लिये ‘अवसर’ से अधिक कुछ नहीं हैं। आज पाँच पुलिसवाले सस्पेंड कर दिए गए, ताकि हम सरकार की वाहवाही कर सकें। हम यह कभी नहीं समझेंगे कि जब तक राजनीति के रिमोट पर उंगली नहीं लगती, तब तक न तो पुलिस हिलती है न ही प्रशासन! डीएम का निलंबन भी हो जाए तो रिमोट पर उंगलियाँ तो वही रहेंगी।
इस हंगामे के बीच हम पुलिस के रवैये पर इतने फोकस्ड हो गए हैं कि अपराधियों पर किसी का ध्यान ही नहीं है। और यह वही पुलिस है जिसकी गाड़ी पलटने पर हुए एनकाउंटर की घटना पर उसके गुण गाए जा रहे थे। उन्नाव हो या जयपुर; दिल्ली हो या मुम्बई; राजनीति, मुद्दों की खरपतवार में सत्ता का फल ढूंढ ही लेती है।
हमारा दुर्भाग्य यह है कि जब ये सब राजनैतिक दल खरपतवार में घुसकर सत्ता का फल ढूंढ रहे होते हैं तब हम यह भ्रम पाल लेते हैं कि ये खेत को खरपतवार से मुक्त करने के लिए मेहनत कर रहे हैं। यह इनकी आपसी खेल भावना है कि हारनेवाला भी कभी यह भेद नहीं खोलता कि खेत में दरअस्ल हुआ क्या था।
जनता, इस राजनैतिक खिलवाड़ के लिए आपस में दुश्मनी पालने की बजाय, यदि केवल मौन रहना भी शुरू कर दे तो राजनीति के हाथों देश का छला जाना बंद हो जाएगा। क्योंकि जब जनता आपस में लड़ने लगती है, तो राजनीति के पासों की आवाज़ सुनाई नहीं देती।

✍️ चिराग़ जैन

वधस्थल में है लोकतंत्र

सोशल मीडिया पर एक पार्टी विशेष के नेताजी पर कोई टिप्पणी की जाए अथवा कोई प्रश्न पूछा जाए तो यकायक कमेंट बॉक्स गालियों से भरने लगता है। इन गालीबाज़ों की प्रोफाइल देखें तो अधिकतर ने अपनी प्रोफाइल पर किसी धर्मविशेष अथवा दलविशेष के समर्थन की घोषणा कर रखी होती है।
इस घोषणा के तमगे से सजी प्रोफ़ाइलधारी जब अश्लील, भद्दी और असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं, तो उससे उस धर्म अथवा दल की छवि पर क्या प्रभाव पड़ेगा -इस विषय पर कोई इसलिए नहीं बोलना चाहता क्योंकि राजनीति को यह बात समझ आ गई है कि इस देश से लोकतंत्र का दौर समाप्त होने जा रहा है और ‘बाहुबल’ के आधार पर वह तानाशाही व्याप्त हो रही ह,ै जिसे सभ्य भाषा में गुंडागर्दी कहा जाता है। और गुंडागर्दी के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करनेवाले सभ्य नागरिकों की नहीं, बल्कि अराजक, असभ्य और बर्बर मवालियों की आवश्यकता होती है।
मुम्बई में व्यंग्य-चित्र फॉरवर्ड करने पर एक दल विशेष के कार्यकर्ताओं द्वारा एक वरिष्ठ नागरिक की पिटाई की घटना उसी विषबेल का पहला फल है जो पूरे देश में एक राष्ट्रीय पार्टी ने अब तक बोई है। भीड़ की आड़ में निजी दुश्मनी निकालने की परंपरा, मॉब लिंचिंग की गलियों से गुज़रते हुए अब सरेआम गुंडागर्दी की शक्ल ले चुकी है।
कंगना रनौत के मुद्दे पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार की राजनैतिक तनातनी का विकृततम रूप यह है कि एक राजनैतिक दल अपने मुखपत्र में साफ़-साफ़ लिखता है कि कंगना रनौत ने पानी में रहकर मगरमच्छ से वैर किया है।
उफ़्फ़! क्या यही लोकतंत्र की भाषा है। समाचार पत्र के माध्यम से सरेआम धमकी देने के लिए क्या कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। हम रिया, कंगना, सुशांत के कंधे पर रखी राजनैतिक बंदूकों के डिजाइन पर मुग्ध होकर यह क्यों नहीं देख पा रहे हैं कि सिस्टम की विफलताओं का लाभ उठाकर इन राजनैतिक बंदूकों से लोकतंत्र की हत्या की जा रही है।
भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस, टीएमसी, जद …ये सब वेदियाँ तभी तक पूज्य हैं जब तक लोकतंत्र का मंदिर सलामत रह सकेगा। हम किसी भी राजनैतिक विचारधारा से प्रभावित हों, लेकिन लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डालनेवालों का विरोध करते समय उस विचारधारा के परिचय पत्र का बचाव नहीं करना चाहिए।
भारत की मूल प्रवृत्ति लोकतंत्रात्मक है। यदि लोकतंत्र ध्वस्त हुआ तो कुछ न बच सकेगा। सत्ता का विरोध करनेवालों पर अचानक भिन्न-भिन्न धाराएँ लगने लगती हैं। क्यों भई! इस देश के सिस्टम को शर्म से मर नहीं जाना चाहिए कि मुंबई जैसे शहर में कंगना रनौत जैसी प्रसिद्ध हस्ती ने ग़ैरकानूनी निर्माण कर रखा था और उस पर एक्शन तब हुआ जब उसने सत्ता का विरोध किया। क्या हमारी एजेंसियों को अपने नाकारापन पर शर्म नहीं आनी चाहिए कि मुंबई फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोग ड्रग्स का सेवन करते हैं और उसकी खुशबू तक एजेंसियों को तब तक नहीं आती जब तक रिया चक्रवर्ती को गिरफ़्तार करने के बाकी सब रास्ते बंद नहीं हो गए।
शर्मनाक स्थिति तक आ चुका है हमारा सिस्टम और वधस्थल में लाकर बांध दिया गया है हमारा लोकतंत्र। अपनी-अपनी राजनैतिक निष्ठाएँ त्यागकर यदि लोकतंत्र के पक्ष में चेतना नहीं आई तो हमारे महान देश के भविष्य पर गहरा अंधकार पसर जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

पत्रकारिता का अंधा युग

जिस पत्रकारिता ने आदर्श, सिद्धांत, जनहित, सच और क्रांति जैसे शब्दों को अर्थ प्रदान किये, वही आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। सुनते हैं कि देश में जब कभी विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के स्तम्भ जर्जर हुए हैं, तब-तब अकेले इस एक स्तम्भ ने लोकतंत्र के ढाँचे को बचाए रखा है। ‘जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’ जैसे जुमलों से सुसज्जित पत्रकारिता आज ‘दलाली’ की गाली झेलने पर विवश है। गणेश शंकर विद्यार्थी और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे कलमकारों के वंशज आज जनता से पिट रहे हैं और गालियाँ खा रहे हैं।
ग़ुलामी के दिनों में अंग्रेज सरकार की नाक में दम करनेवाली पत्रकारिता; आपातकाल में इंदिरा सरकार के खि़लाफ़ काले पन्ने पोतने वाली पत्रकारिता आज इतनी लाचार और जर्जर हो गई है कि नैतिकता और आदर्श तो दूर, अपने पेशे के मूलभूत नियमों का निर्वाह करने में भी असमर्थ सिद्ध हो रही है।
कभी पत्रकारों को इस बात का अभिमान होता था कि उनकी स्टोरी पर आज संसद में सवाल पूछा गया। कभी संपादक इस बात पर इतराते थे कि उनका अख़बार आज संसद में लहराया गया। कभी राजनीति को इससे फ़र्क़ पड़ता था कि अख़बार उनके विषय में क्या लिख रहे हैं। लेकिन आज राजनीति ने लोकतंत्र के वाचडॉग को स्ट्रीट डॉग जितना महत्व देना भी बंद कर दिया है। जो जनता पत्रकारों को अपनी आखि़री उम्मीद मानती थी, वह आज पत्रकारों को मारने पर उतारू है।
टीआरपी की अंधी दौड़ ने सुंदरियों को एंकर बनाने की जो मुहिम शुरू की थी वह आज चैनल वॉर तक आ पहुँची है। कभी अख़बार पढ़कर राजनीति की दिशा तय की जाती थी, लेकिन आज राजनीति का मूड देखकर ख़बरें बनाई जा रही हैं। चैनल के एंकर किसी आततायी आक्रमणकारी की तरह अराजकता की हद्द को लांघकर ख़बरें पढ़ रहे हैं। सड़क पर खड़ा पत्रकार हाँफ-हाँफ कर पीटूसी कर रहा है। बहस में माँ-बहन की गालियाँ ऑन एयर जाने लगी हैं।
क्या यही वह न्यूज़ एंकरिंग है जिसकी बुनियाद सुरेन्द्र प्रताप सिंह सरीखे संवेदनशील मनुष्य ने रखी थी। अख़बारों ने बाज़ार का लेप इतना ज़्यादा लगा लिया है कि अख़बार की आत्मा कहा जाने वाला सम्पादकीय पृष्ठ हाशिये पर चला गया है। इलैक्ट्रॉनिक मीडिया में नम्बर वन की ऐसी होड़ है कि बलात्कार और अपराध की ख़बरों को चटपटा बनाने के लिए मनुष्यता को चूल्हे की आँच में झोंकना आम हो गया है।
कभी जनमत की देवी कही जाने वाली पत्रकारिता आज उद्योगपतियों की रखैल और हुक्मरानों की दासी हो चली है। हिंदी फिल्मों में भी जिस पत्रकारिता की बेईमानी के सीन दिखाने में हिचकिचाहट बनी रही है, वह आज बिना सेंसर की ‘सी क्लास’ फिल्मों से भी ज़्यादा नीचे उतर आई है।
ख़बरों से खेलने और स्क्रीन भरने के कौशल से टीआरपी के आँकड़े जुटाते पत्रकार अगर इस वक़्त में ठहरकर अपने अस्तित्व की चिंता न कर सके तो यह स्थिति और भी भयावह हो जाएगी। कुर्सी से उछल-उछलकर टीआरपी बटोरते एंकर यह विचार करें कि जिनका काम जनता को बौद्धिक ख़ुराक़ देना था, वे आज घृणा मिश्रित उपहास के पात्र बनते जा रहे हैं।
धन अर्जित करना कोई अपराध नहीं है, लेकिन धन की इस भूख में जनहित को भेंट चढ़ा देना न तो नैतिकता है, न ही समझदारी। आज राजनैतिक दलों की और अपने अन्नदाता उद्योगपतियों के हस्तक्षेप के कारण यह स्थिति तो आ ही चुकी है कि सत्ताधारी दल की मर्ज़ी के बिना स्टोरी तो क्या टिपर चलाने की भी हैसियत किसी चैनल की नहीं है। इस स्थिति का प्रतिकार न किया गया तो सत्ता के स्वार्थ और जनता की घृणा के मध्य पत्रकारों की हालत यह होगी कि फ़ख़्र से गाड़ी पर ‘प्रेस’ का स्टिकर चिपकानेवाले व्हाइट कॉलर जर्नलिस्ट्स को यह बताते हुए शर्म आएगी कि वे मीडिया से हैं।

✍️ चिराग़ जैन

भाई-भतीजा

जब भी जनता के हाथों नतीजा रहा
फिर न चाचा रहा ना भतीजा रहा

लोग अभिनय के दम पर सफल हो गए
ख़ूबसूरत भले थोबड़ा भी नहीं
अपने बेटे को हीरो बना ना सके
जुबली हीरो व यश चोपड़ा भी नहीं
काम पर्दे पे बोला न अरबाज़ का
भाई का भाई पर मन पसीजा रहा
जब भी जनता के हाथों नतीजा रहा
फिर न चाचा रहा ना भतीजा रहा

सिर्फ एप्रोच से काम चलता अगर
तो गावस्कर का बेटा निकलता नहीं
बाप ने ओडीआई खिला तो दिया
फील्ड में बाप का नाम चलता नहीं
दो सिरीज़ों में रोहन बाहर हो गया
उसकी क़िस्मत में दौरा न तीजा रहा
जब भी जनता के हाथों नतीजा रहा
फिर न चाचा रहा ना भतीजा रहा

तीन पीएम हुए एक परिवार से
और बाकी के ग्यारह कहाँ से हुए
राष्ट्रपतियों की सूची उठा लीजिए
सब ज़मीनी थे या आसमां से हुए
ठाकरे और यादव के परिवार थे
जिनमें चाचा का दुश्मन भतीजा रहा
जब भी जनता के हाथों नतीजा रहा
फिर न चाचा रहा ना भतीजा रहा

✍️ चिराग़ जैन

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