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इलेक्सन

क्या करना है कारोबार
कल और इलेक्सन होंगे
कल और इलेक्सन होंगे, घनघोर इलेक्सन होंगे
हर ओर इलेक्शन होंगे, पुरजोर इलेक्शन होंगे
सब कुछ मुफ्त मिलेगा यार
कल और इलेक्सन होंगे

एमपी वाले चावल देंगे, दिल्ली वाई-फाई
पटना जाकर फोकट में ले लेंगे यार दवाई
मेहनत के मुँह पर पोतेंगे, उंगली की सब स्याही
जब उंगली से काम चले तो काहे देह हिलाई
महंगा वोटों का बाजार
कल और इलेक्सन होंगे

हर नेता में होड़ लगी है, ख़ूब लुटाओ पैसा
राजनीति में सब जायज़ है, इसमें खटका कैसा
भैंस उसी की, जिसने अपने खूंटे बांधा भैंसा
उसने ऐसी-तैसी की थी, हमने ऐसा-तैसा
जी भर जीमो बिना डकार
कल और इलेक्सन होंगे
✍️ चिराग़ जैन

नफ़रतें

आइये, मिलकर बढ़ायें नफ़रतें
चप्पे-चप्पे पर उगायें नफ़रतें

धर्म अपना यूँ निभायें नफ़रतें
एक दिन हमको ही खायें नफ़रतें

प्यार, माफ़ी,अम्न और इंसानियत
इन सभी को काट आयें नफ़रतें

गर मुहब्बत की कोई बातें करे
तो उसे ज़िन्दा जलायें नफ़रतें

जिसने ये दुनिया बनाई प्यार से
आओ, उसको भी सिखायें नफ़रतें

✍️ चिराग़ जैन

एक अदद मनुष्य का सवाल है

दो दिन पहले हिसार की ख़बर थी कि एक व्यापारी को उसकी कार में ज़िन्दा जला दिया। अब करौली की ख़बर है कि मन्दिर के पुजारी को ज़िन्दा जला दिया।
हे ईश्वर! पाशविकता का यह पथ आखि़र किस मन्ज़िल तक ले जायेगा हमारे समाज को। मैंने बचपन में एक महिला को आग की लपटों में घिरे हुए सड़क पर दौड़ते देखा है। (वह एक दुर्घटना थी, जिसमें खाना बनाती महिला की साड़ी ने अंगीठी से आँच पकड़ ली थी) लेकिन उस महिला की चीख़ें आज भी मेरे दिल को दहला देती हैं। मैं महीनों ठीक से सो न सका था।
पीड़ा, भय, निराशा और करुणा से गुँथी वह चीख़ जब भी याद आती है तो मन विह्वल हो उठता है। मैं कल्पना कर रहा हूँ कि उस चीख़ में आक्रोश और घृणा भी मिल जाये, तो उससे तो सारा ब्रह्मांड काँप जाता होगा। फिर ऐसे कौन लोग हैं जिनके ज़मीर इनके प्रभाव से अनछुए रह जाते हैं!
इस घटना पर भी राजनीति और प्रशासन अपनी-अपनी फेस सेविंग से ज़्यादा कुछ न करेंगे, लेकिन इस आग की राख से यह प्रश्न पुनः उठ खड़ा हुआ है कि हम कौन से समाज का निर्माण करने में व्यस्त हैं? हम किस सभ्यता को पोसने में बेसुध हुए जा रहे हैं? हिन्दू-मुस्लिम; सवर्ण-दलित; ब्राह्मण-मीणा …और कितने विभक्त होंगे हम। कल ब्राह्मणों में भी शैव-वैष्णव होने लगेगा। आखि़र कहाँ जाकर अन्त होगा इस अभिशाप का?
करौली की घटना को ब्राह्मण बनाम मीणा का रंग दिया जा रहा है। हद्द है, हम उस समाज की स्थापना क्यों नहीं करते जिसमें पीड़ित और अपराधी दोनों को ही केवल मनुष्यता की कचहरी में खड़ा किया जाये! एक मीणा के अपराध से पूरा मीणा समाज अपराधी कैसे हो गया?
इस हिसाब से तो देश का प्रत्येक व्यक्ति अपराधी है। सामान्यीकरण की इसी प्रवृत्ति की आँच पर राजनीति अपनी रोटियाँ सेंकती है। ‘मरने वाला आदमी था क्या यही क़ाफ़ी नहीं!’ यही हमने हाथरस में किया और यही करौली में।
जातियों के इस वर्गसंघर्ष से देश को बचाने के लिये समाज में मुरझाती जा रही मानवता के बीजों को संरक्षित करना होगा ताकि अपराध करनेवाले को इस बात का डर रहे कि यदि वह अपराध करके घर लौटेगा तो अपने मुहल्ले में रहनेवाले मनुष्यों से आँखें कैसे मिलायेगा?

✍️ चिराग़ जैन

राजनीति की फ़िल्म इंडस्ट्री

राजनीति की स्क्रिप्टिंग और प्रशासन का अभिनय देखकर लगता है कि उत्तर प्रदेश में फ़िल्म इंडस्ट्री बनाने का विचार निराधार नहीं था।
✍️ चिराग़ जैन

बलात्कार को ओनर किलिंग बनाने की शुरुआत

सियासत किस तरह करती रही बर्ताव, मत भूलो
कुरेदेंगे तुम्हारे ही बदन के घाव, मत भूलो
तुम्हारी चीख़ से कुर्सी न हिल जाये मसीहा की
अरे ओ हाथरस वालो, अभी उन्नाव मत भूलो

✍️ चिराग़ जैन

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