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टिकट लेते आना

चाहे झूठ बोल के, चाहे भेद खोल के
लेते आना, टिकट लेते आना

तुम साइकिल पर पर चढ़ जाना
इक टोपी लाल लगाना
थोड़ा डण्ड पेल के
थोड़ा दण्ड़ झेल के
लेते आना
टिकट लेते आना

तुम कमल का फूल खिलाना
पूरे भगवा रंग जाना
जय श्री राम बोल के
जट श्री श्याम बोल के
लेते आना
टिकट लेते आना

तुम बिन मतलब ही लड़ना
पंजे की उंगली पकड़ना
बिंदी साथ लेके
चूड़ी हाथ ले के
लेते आना
टिकट लेते आना

जनता की बात न करना
असली मुद्दों से बचना
कभी जेब फाड़ के
कभी झोला झाड़ के
लेते आना
टिकट लेते आना

✍️ चिराग़ जैन

जबरन वेक्सिनेशन

केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाखि़ल किया है कि किसी को जबरन वेक्सिनेशन नहीं लगाया जा सकता। यह ख़बर टीवी पर देखी और याद आ गया वह सब कुछ जो पिछले कुछ समय में व्यवहार में देखा है।
हवाई जहाज में यात्रा करने के लिए वेक्सीन की दोनों डोज़ होना अनिवार्य है। यदि ऐसा न हो तो हर बार यात्रा से 48 घंटे पूर्व का आरटीपीसीर दिखाना होगा (मूल्य न्यूनतम 500 रुपये प्रति टेस्ट)। लेकिन इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि सरकार ने किसी को वेक्सिनेशन के लिए विवश किया है।
सरकारी कर्मचारियों, डॉक्टरों, पुलिसवालों के साथ साथ ओला-उबर ड्राइवरों, डिलीवरी बॉय, चौकीदार, अर्बन क्लैप सर्वर व अन्य लोगों के लिए वेक्सिनेशन अनिवार्य किया गया। लेकिन किसी को जबरन वेक्सिनेशन के लिए विवश नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट भी सरकार के इस हलफ़नामे को फाइल में सहेज लेगा। आप जब मॉल, दफ़्तर वगैरह पर जाएंगे तो वहाँ गार्ड के व्यवहार से आपको महसूस होगा कि दोनों वेक्सिनेशन के बिना आपकी कहीं कोई इज़्ज़त नहीं है। लेकिन यह तय है कि किसी को वेक्सिनेशन के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा।
आपके घर पर काम करनेवाली मेड को, आपकी गाड़ी साफ़ करनेवाले को (सरकारी निर्देशों का हवाले देकर) बिना वेक्सिनेशन के सोसाइटी में घुसने नहीं दिया जाएगा लेकिन किसी को भी वेक्सीन लगवाने के लिए विवश नहीं किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि मेरी यह पोस्ट वेक्सीन अथवा कोविड संबंधी नियमों के पक्ष अथवा विपक्ष में कोई राय प्रस्तुत नहीं करती। इसका उद्देश्य केवल काग़ज़ी ख़ाना-पूरी और व्यवहारिक परिस्थिति के मध्य का अंतर स्पष्ट करना है।
इस वितण्डे में सभी सरकारें बराबर हैं। दिल्ली में आप कैब में दो से अधिक लोग नहीं बैठ सकते। मैं कई दिन से समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि इससे कोरोना कैसे रुक जाएगा? मैं अपने माता-पिता को लेकर एक ही घर से निकलूँ लेकिन अगर एक ही कैब में बैठकर ट्रेवल करूँ तो कोरोना हो जाएगा।
मैं उन्हें लेकर अपनी गाड़ी में चलूँ या हायर करके टैक्सी में घूमूँ तो भी कोरोना नहीं होगा लेकिन ओला-उबर में बैठते ही कोरोना हो जाएगा।
समाजवादी पार्टी की चुनावी रैली में पीछे बैनर पर ‘वर्चुअल रैली’ लिख दिया जाएगा और कोरोना उस बैनर को पढ़ते ही चुनाव आयोग के नियमों का सम्मान करते हुए वापस लौट जाएगा।
दिल्ली में दुकानें खुलेंगी तो लोगों की भीड़ से कोरोना फैल जाएगा, लेकिन उन्हीं दुकानों के आगे रेहड़ी-पटरी लगाने पर कोरोना नहीं फैलेगा।
किसी राजनेता की रैली की तैयारी में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ती रहें लेकिन किसी बिटिया की विदाई के लिए आशीर्वाद देने वाली हथेलियों और किसी दिवंगत की शवयात्रा में कंधों की संख्या सीमित होनी चाहिए।
कोरोना के नाम पर समाज को जागरूक करने की बजाय ये जो ढोंग-ढकोसला चल रहा है, उसके चलते लोग इन नियमों के प्रति कैज्युअल हो रहे हैं। अदालतों में हलफ़नामे देकर आप काग़ज़ों का पेट तो भर देंगे साहब लेकिन आपने अपने आचरण से जनता के मन की इस उलझती गुत्थी को न सुलझाया तो आने वाले चुनावों में यही गुत्थी आपकी जीत की रफ़्तार को उलझा देगी।

~चिराग़ जैन

भाषा के स्तर से झाँकता व्यक्तित्व

भाषा किसी भी व्यक्तित्व का प्रथम विज्ञापन है। आप अपनी बात कहने के लिए जिस शब्दावली का प्रयोग करते हैं, वह आपकी मूल प्रवृत्ति की द्योतक है।
राजनैतिक भाषणों की गाली-गलौज, अराजकता, अभद्रता तथा अशिष्टता के सैंकड़ों उदाहरणों से यूट्यूब पटा हुआ है। निरर्थक वक्तव्य, कुतर्क, अश्लीलता और मूर्खतापूर्ण वक्तव्यों को रेखांकित करके मीडिया नकारात्मकता को हतोत्साहित करता है। यह अच्छी बात है। ट्रोलिंग कि माध्यम से भी ऐसी पोस्ट्स ख़ूब वायरल हो जाती हैं। लेकिन मुझे एक भी पोस्ट आज तक ऐसी नहीं मिली जो भाषा का स्तर पर सभ्य तथा शिष्ट लोगों की प्रशंसा में लिखी गयी हो। नकारात्मकता को हतोत्साहित करने में जितनी ऊर्जा व्यय होती है उसकी आधी ऊर्जा भी यदि सकारात्मकता के प्रोत्साहन में निवेश की जाए तो पूरा परिदृश्य बदल जाएगा।
जैसे प्रत्येक दल में बड़बोले, अशिष्ट और गालीबाज़ों की उपस्थिति है वैसे ही प्रत्येक दल में शिष्ट, विनम्र, शालीन तथा सभ्य नेताओं की भी उपस्थिति है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम इन नेताओं के सद्गुणों पर चर्चा करते ही नहीं हैं।
बात ये सभी लोग अपनी-अपनी पार्टी के एजेंडे के अनुरूप ही कहते हैं, लेकिन बात कहने का इनका सलीक़ा उल्लेखनीय है।
दो दशक के सामाजिक जीवन, कवि-सम्मेलनीय यात्राओं और लपेटे में नेताजी के सैंकड़ों एपिसोड करने के कारण अनेकानेक राजनैतिक व्यक्तित्वों से भेंट हुई है। इनमें से कुछ लोगों की वक्तृत्व कला तथा भाषा शैली मन मोह लेती है।
मैं पुनः स्पष्ट कर दूँ कि इनमें से किसी भी नेता के राजनैतिक विचार पर चर्चा न करके मैं केवल इनके भाषा संस्कार की बात कर रहा हूँ।
इस क्रम में पहला नाम है श्री सुधांशु त्रिवेदी का। रामचरितमानस की चौपाइयों से लेकर हिंदी की सैकड़ों कविताएं, उर्दू के हज़ारों अशआर तथा संस्कृत के अनेक श्लोक इन्हें कंठस्थ हैं। किसी भी विषय पर अपनी बात रखते समय ये इन काव्यांशों से अपनी बात को पुष्ट करते हैं। भाषा का संस्कार ऐसा है कि शब्द सधे हुए तथा प्रभावी वाक्य विन्यास के साथ उपस्थित होते हैं।
ठीक इसी तरह श्रीमती रागिनी नायक को भी न जाने कितनी ही नज़्में, ग़ज़लियात, कविताएं, चौपाइयां और श्लोक रटे हुए हैं। और साहित्यिक समझ इतनी परिपक्व है कि संदर्भ उपस्थित होते ही बिल्कुल परफेक्ट पंक्तियाँ उद्धृत करने में ये दक्ष हैं। स्वर को कब कितना ऊँचा करना है और कब खिलखिलाकर चर्चा के तनाव को ग़ायब कर देना है -इसकी समझ रागिनी जी को भरपूर है।
एक वक्ता के रूप में सुधांशु जी और रागिनी जी; दोनों ही की एक ख़ासियत मुझे बहुत प्रभावित करती है और वह यह कि ये दोनों ही लोग सामनेवाले के अखाड़े में उसके स्तर पर उतरकर दाँव लगाना जानते हैं लेकिन जिस भी अखाड़े में उतरते हैं उसे बहुत जल्दी अपने स्तर तक ले आते हैं।
श्री शत्रुघ्न सिन्हा भी हर बात का उत्तर किसी काव्योक्ति से देकर लाजवाब कर देते हैं। उनका अध्ययन कोष बहुत समृद्ध है। और सबसे बड़ी बात यह कि वे अशआर को अशआर की ही तरह पढ़ना जानते हैं।
ऐसे ही एक वक्ता है श्री राकेश सिन्हा। कड़वे सवालों का उत्तर देते समय भी उनकी मिठास कभी ग़ायब नहीं होती। श्री सुधांशु मित्तल भी बड़े धैर्य के साथ विरोधी की बात सुनते हैं फिर मुस्कुराते हुए अपने राजनैतिक अनुभव के पिटारे से कोई संदर्भ तलाशकर धीमी आवाज़ में पुख्ता बात कहते हैं। श्री मनीष सिसोदिया भी असभ्यता के दायरे से दूर रहकर अपनी बात रखने में परिपक्व हैं।
तर्क की कसौटी पर श्री गौरव वल्लभ, श्री कन्हैया कुमार, श्री आलोक शर्मा, श्री कपिल सिब्बल, श्री श्रीकांत शर्मा, श्री शाहनवाज़ हुसैन, श्री अससुद्दीन ओवैसी भी विषय को भटकाने की बजाय टू द प्वाइंट उत्तर देते हैं, किन्तु इन सबको कई जगह धीरज खोते देखा जा चुका है। असभ्य न भी हों तो इनकी आवाज़ से इनके अनियंत्रण को भाँप लिया जाता है।
भारतीय राजनीति ने पंडित अटल बिहारी वाजपेयी और सुषमा स्वराज सरीखे वक्ताओं के उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। लालू प्रसाद यादव जैसा हास्यबोध; आनन्द शर्मा जैसी समझ; शशि थरूर जैसी व्याख्या; के एक गोविंदाचार्य जैसी विद्वत्ता; राजनाथ सिंह जैसा ठहराव और मीरा कुमार जैसी मृदुता भारतीय राजनीति की पहचान रही है।
यदि हमने अच्छे लोगों की चर्चा करना शुरू कर दिया तो भारतीय राजनीति का वह दौर फिर लौट सकेगा।

✍️ चिराग़ जैन

विघटन

“अलवर में एक मूक-बधिर बालिका के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ।” इस ख़बर में न तो ‘अलवर’ शब्द महत्वपूर्ण है, न ‘मूक-बधिर’। इसमें अगर कुछ महत्वपूर्ण है तो वह है बलात्कार। इसमें किसी शब्द पर शर्मिंदा हुआ जा सकता है तो वह शब्द है बलात्कार।
लेकिन हम इस एक शब्द को छोड़कर, बाक़ी हर शब्द पर चर्चा करेंगे। भाजपा समर्थक ‘अलवर’ शब्द को बार बार बोलकर राजस्थान की कांग्रेस सरकार को नीचा दिखाएंगे। उत्तर में कांग्रेस समर्थक ‘हाथरस-हाथरस’ चिल्लाकर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को चिकोटी काटेंगे। कोई ‘दलित-दलित’ चिल्लाएगा तो कोई बलात्कृता और बलात्कारी का धर्म बताकर चिल्लाने लगेगा।
लेकिन इन सब चीख़-चिल्लाहटों में वो एक चीख़ कराहकर दम तोड़ देगी, जो उस दुर्घटना में किसी चिड़िया के हलक़ से निकली होगी। हम बलात्कार को छोड़कर हर विषय पर चर्चा करेंगे।
आख़िर कब तक हम मूल विषय की आवाज़ को अपने शोर-शराबे की क्षमता से दबाते रहेंगे? कई बार ऐसा लगता है कि कहीं ये राजनैतिक दल इस बात की प्रतीक्षा तो नहीं करते कि चुनाव से पहले अगर विरोधी पार्टी की सरकार वाले राज्य में कोई बलात्कार हो जाए तो बाज़ी पलटी जा सकती है। …लेकिन मन यह मानने को तैयार नहीं होता कि कोई मनुष्य किसी बलात्कार की प्रतीक्षा कर सकता है। लेकिन जिस तरह बलात्कार के बाद राजनीति होती है, उसे देखकर इस आशंका को सिरे से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता।
निश्चित रूप से, प्रशासन या राजनेता बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के समर्थन में नहीं हो सकते। लेकिन वे ऐसा कर पाने का नैतिक बल क्यों नहीं दिखा पाते कि इस तरह की किसी भी दुर्घटना पर अपराधी की जाति, धर्म और विचारधारा को दरकिनार करके स्पष्ट विरोध दर्ज कराए।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम ख़ालिस इंसान होकर सोचने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाते? किसानों की आत्महत्या भाजपा के शासनकाल में हुईं तो कांग्रेस शोर मचाने लगी। अरे भाई, एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं करते कि एक भी आत्महत्या प्रशासन के लिए शर्मनाक है। फिर चाहे वह जिसकी भी सरकार हो।
एक बार, किसी एक मुद्दे पर हम सब कोरे भारतवासी होकर क्यों नहीं सोच सकते। एक बार भाजपा समर्थक भाजपा से, और कांग्रेस समर्थक कांग्रेस से सवाल क्यों नहीं पूछ पाते?
ऐसी कौन सी शासन व्यवस्था का सपना हम देख चुके हैं जिसमें शासन कोई भी करे, व्यवस्था पूरी तरह चरमराई ही रहेगी? एक बार महंगे को महंगा, झूठे को झूठा, मूढ़ को मूढ़, भ्रष्ट को भ्रष्ट, अभद्र को अभद्र, अश्लील को अश्लील क्यों नहीं कहा जा सकता?
एक बार विपक्षी पार्टी में मौजूद किसी अच्छे इंसान की सार्वजनिक प्रशंसा क्यों नहीं की जा सकती? इतने लंबे समय तक राजनीति को प्रमुख मानकर देख चुके तो एक बार मुद्दों को प्रमुख मानकर क्यों नहीं देखा जा सकता?
किसानों के आंदोलन पर पानी की बौछार करवाने वाली सत्ता की आलोचना करने वाला विपक्ष एक बार इतना नैतिक बल क्यों नहीं जुटा पाता कि वह रामदेव के आंदोलन पर आधीरात को हुए लाठीचार्ज के लिए क्षमायाचना कर सके।
अलवर के बलात्कार पर अशोक गहलोत को घेरने वाले भाजपाई एक बार यह स्वीकार क्यों नहीं कर पाते कि बलात्कार हाथरस में हो या हैदराबाद में; अलवर में हो या दिल्ली में …बलात्कार सिर्फ़ बलात्कार होता है। और इस अपराध के अपराधियों को यथाशीघ्र सज़ा दिलवाने के लिए हम सब राजनीतिज्ञ एकजुट होकर काम करेंगे।
एक बार किसी बलात्कार की ख़बर में घटनास्थल, जाति और धर्म टटोलने से पहले हम अपने घर के आंगन में खेलती किलकारी के सिर पर हाथ फेरकर यह शपथ क्यों नहीं उठा सकते कि कम से कम इस एक विषय पर हमारी धारणा किसी राजनैतिक प्रोपेगेंडा से प्रभावित नहीं होगी। न पक्ष में, न विपक्ष में।
दलित का बलात्कार! क्या मतलब है इस बात का? सवर्ण का होता तो क्या अपराध न होता? मुस्लिम के साथ दरिंदगी? हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन के साथ होती तो दुखद न होती? आख़िर कब तक हम इन मातमों में माइक तलाशते रहेंगे?
कोई सद्भाव की बात करे तो उसमें वामपंथ तलाशा जाने लगता है। कोई मिलकर रहने को कहे तो उसे कांग्रेसी चमचा कहकर ट्रोल किया जाता है। कोई सांस्कृतिक चेतना का हवाला दे तो उसे संघी और भाजपाई कहकर अपमानित किया जाता है। कोई मनुष्यता पर सतर्क विवरण प्रस्तुत कर तो उसे रवीश का चेला कहा जाता है। कोई सभी दलों से अलग हटकर केवल भारतीय होने की अपील करे तो उसे केजरीवाल की राह पर चलने वाला बताया जाने लगता है।
मैं देश के सभी राजनैतिक दलों से अपील करता हूँ; मैं देश के सभी बुद्धिजीवियों से अनुरोध करता हूँ; मैं देश के सभी धर्मगुरुओं से निवेदन करता हूँ; मैं देश की सभी सेलिब्रिटीज़ से रिक्वेस्ट करता हूँ कि घृणा और विघटन की राह पर बहुत आगे निकल आए इस देश को एक बार मनुष्यता की भव्यता की याद दिलाएँ ताकि जब हमारी अगली पीढ़ी के साथ कोई अन्याय हो तो उसके आँसू पोंछने वाले हाथ उससे उसकी जाति, कुल, धर्म या राजनैतिक विचारधारा का सर्टिफिकेट न मांगे।

✍️ चिराग़ जैन

कुँए में भांग पड़ी है

प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक की घटना पर दोनों तरफ़ के लोग जो ट्रोलिंग कर रहे हैं, वह अधिक दुःखद है। यह विषय देश के सर्वाेच्च नेतृत्व की सुरक्षा से जुड़ा है। इसमें परिहास और उपहास की कोई गुंजाइश नहीं है। बल्कि आदर्श स्थिति तो यह थी कि इसमें राजनीति की भी संभावनाएँ न खोजी जातीं।
सीधा-सा मसअला है कि जो विभाग अथवा अधिकारी इसके लिए उत्तरदायी हैं, उन पर कार्रवाई की जावे। लेकिन इसकी बजाय दोनों ओर के लोग इस दुर्घटना को पंजाब चुनाव में भुनाने के लिए कांग्रेसी और भाजपाई होकर दौड़ पड़े हैं।
यह घटना शर्मनाक है। दोनों तरफ़ अतिवाद हावी है। मोदी जी के समर्थक चन्नी की तुलना नवाज़ शरीफ़ से और पंजाब की तुलना पाकिस्तान से करने लगे हैं। तो मोदी विरोधियों ने इसे किसान आंदोलन में हुई मौतों का बदला करार दे दिया। दोनों ही घृणास्पद हैं।
राजनीति जब इस देश के लोक को लोकतंत्र और संविधान का सम्मान सिखाने की बजाय भाजपाई और कांग्रेसी होना सिखा रही थी तब शायद उसे यह नहीं पता था कि इस राह पर कैसे-कैसे मोड़ आ सकते हैं।
बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के पैर का प्लास्टर मीम और जोक्स का विषय बना था तब भाजपाइयों को यह इल्म न रहा होगा कि उनके लीडर भी हाड़-मांस के ही बने हैं और चोट किसी को भी लग सकती है। कांग्रेसी जब नरेंद्र मोदी के लड़खड़ाने पर चुटकियाँ ले रहे थे तब वे भूल गए थे कि यही जनता, रैली में पत्थर फेंककर एक प्रधानमंत्री की नाक घायल कर चुकी है। तब वे भूल गए थे कि घृणा की जिन वादियों में राजनीति के बीज बोए जाते हैं उनका शिखर ख़ून से लथपथ हो जाता है।
द्वेष और स्वार्थ की इन क्यारियों में लोकतंत्र का बगीचा नहीं फूल पाएगा। हम धीरे-धीरे नहीं, बहुत तेज़ी से वर्गों में बँटते जा रहे हैं। हम इतने संवेदनहीन होते जा रहे हैं कि जब दूसरे पक्ष के आंगन में मातम होता है तो हम अपने चौक में जश्न मनाने लगते हैं। हम इतने निष्ठुर हो गए हैं कि शवयात्रा पर भी पत्थर फेंकने से नहीं कतराते।
हम मृत्यु के अवसर पर भी अपने-अपने झंडे उठाए गाली-गलौज करने लगते हैं। राहत इंदौरी, ऋषि कपूर, सुशांत सिंह राजपूत, रोहित सरदाना, विनोद दुआ और न जाने कितने दिवंगतों ने अपनी अंतिम यात्रा में ये बदबूदार गालियाँ झेली हैं।
हमारी राजनैतिक महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गयी है कि हमने श्मशान और कब्रिस्तान तक को अखाड़ा बना लिया है। हिंदू-मुस्लिम से अधिक बड़ा द्वंद्व कांग्रेसी-भाजपाइयों में चल पड़ा है। मोदी समर्थक और मोदी विरोधी के मध्य तलवारें खिंच रही हैं। सौहार्द और समन्वय की बात करने वाले गाली खा रहे हैं। ऐसे में पंजाब की घटना से पूरे देश के राजनेताओं को यह सीखना पड़ेगा कि जिन रास्तों में नागफनी बोई जा रही है, उनसे कभी ख़ुद भी गुज़रना पड़ सकता है।
ईश्वर एक मनुष्य के रूप में प्रत्येक राजनीतिज्ञ को भी स्वस्थ तथा दीर्घायु रखे और मेरे देश की जनता को विवेक का वरदान दे!

✍️ चिराग़ जैन

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