Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
ऐसे प्रश्नों की झड़ियां लगा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
है नाक में नकेल भाइयो
समन भेज कर पलट दिया है खेल समूचा ईडी ने
बिन बल्ले के शॉट लगाया कितना ऊँचा ईडी ने
ग्यारह घण्टे तक बैठाकर की है पूजा ईडी ने
जिनको कोई नहीं पूछता उनको पूछा ईडी ने
इनको कुर्सी की ताक़त दिखा दी, ये चकरी सी घुमा दी
बनी हुई है रेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
तुम नाराज़ हुए सिस्टम का यूज पर्सनल करने पर
ईडी-सीबीआई सबके अपने पीछे पड़ने पर
उनको ज्ञान सुनाते हो तुम यूँ मनमानी करने पर
तुमने भी तो बैठाए हैं दो-दो सीएम धरने पर
गहलोत जी की ड्यूटी लगा दी, चटाई सी बिछा दी
धरने पर हैं बघेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
कांग्रेस को खूब पता है कैसे क्या क्या होता है
किस दफ्तर से हुआ इशारा, किस दफ्तर का न्योता है
कौन भला किसके कहने पर किसके कपड़े धोता है
इनसे ज़्यादा किसे खबर है कौन कहाँ का तोता है
बीजेपी ने तुम्हारी मुनादी, तुम्हीं को सुना दी
पहचानो ये गुलेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
जिसके हाथ रहेगी सत्ता वो ही रंग दिखाएगा
जो विपक्ष में है वो नैतिकता की बात बनाएगा
ऑर्डिनेंस फाड़ा था तुमने तुमको याद न आएगा
कोई लाठी, कोई अपना बुलडोजर ले आएगा
सबने सिस्टम की धज्जी उड़ा दी, इमारत गिरा दी
ये ही है रेलम पेल भाइयो
ईडी दफ्तर में पेशी करा दी, घिरे हैं राहुल गांधी
सत्ता का है ये खेल भाइयो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
धुन: डोली में बिठाइके कहार…
अभी तो लगाई फटकार
जल्दी ही लेना पुचकार
जड़ दिया मुँह पर प्रवक्ता के ताला
नूपुर हुए हैं ख़ामोश
जो हमसे अब अपना दामन बचाय रहे
उनने ही भरा था ये जोश
लुट गया अचानक
लुट गया न जाने कैसे
लुट गया साहिब का प्यार
अभी तो लगाई फटकार
जो भी विरोधी मिला
उसको ही हमने जी भर के कर दिया ट्रोल
कल तक तो साहब को
खूब सुहाते थे अपने ये नफरत के बोल
अब काहे हो रामा
अब काहे ओ स्वामी मोहे
अब काहे रहे दुत्कार
अभी तो लगाई फटकार
फुनवा मिलाय दिया कोई बिदेसिया
मालिक के भर दीन्हे कान
हमको किनारे करके साहिब बचाय लीन्हा
अपनी छबि का नुक़सान
मुख मोड़ा, क्यों ऐसे
मुख मोड़ा क्यों ऐसे भला
मुख मोड़ा परवरदिगार
अभी तो लगाई फटकार
ट्विटर पे ऐसी-ऐसी गरिया सुनाई
किया नहीं किसी का लिहाज
अपनी प्रोफाइल पर लिख नहीं पा रहे
हम एक अक्षर भी आज
छिन गया हमारा
छिन गया सारा रोज़गार
अभी तो लगाई फटकार
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
विक्रम तुम तो वर्तमान हो
बल, विवेक, सामर्थ्य सभी कुछ मिला-जुलाकर
आगत का सिंगार करो तुम
ये क्या अपने कंधे पर तुम भूत लादकर घूम रहे हो
क्या तुमको आभास नहीं है
जब भी तुम उस प्रेतकाय के
उलझे केशों से उलझे हो
तब तब तुम अपने भविष्य को
पीठ दिखाए खड़े रहे हो
और कभी जब उसे लादकर
तुम भविष्य की ओर बढ़े हो
तब उसने तुमको बेमतलब
गल्प-कथा में व्यस्त किया है
ऐसी कितनी दंतकथाएँ
तुम्हें भविष् की ओर
देखने से हरदम रोका करती हैं
तुम उसके प्रश्नों का उत्तर देकर ज्यों ही इतराते हो
वह अतीत फिर उसी डाल की ओर
अचानक उड़ जाता है
और तुम्हारा पांव दुबारा
फिर भविष्य को छोड़
भूत की ओर यकायक मुड़ जाता है
तुम जो इस नंगे अतीत को
अपने कंधे पर ढो-ढोकर
किसी तंत्र तक ले आने पर अड़े हुए हो
केवल इस ज़िद के कारण ही
वर्तमान से बहुत दूर तुम
किसी भयानक भूत-स्थल पर खड़े हुए हो
काश कभी ये जान सको तुम
तुम्हें भूत के पीछे जिसने भेज दिया है
वह तुमसे निष्कंटक होकर
अपनी स्वार्थ साधना में संलग्न हुआ है
उसे पता है
भूत कभी भी उस मसान से बाहर नहीं निकल सकता है
कोई कैसा भी विक्रम हो
अगर भूत से उलझ गया तो
भूत उसे भी उस मसान से बाहर नहीं निकलने देगा!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Lapete Mein Netaji, Poetry
कुर्सी का घमासान इधर भी है, उधर भी
दो लोगों का गुणगान इधर भी है, उधर भी
जो डेडिकेट है वो सिर्फ झंडे उठाए
दल बदलुओं का मान, इधर भी है उधर भी
जो हाँ में हाँ मिलाए, वही पद पे रहेगा
सच कहने में नुक़सान इधर भी है, उधर भी
किस्मत न बदल पाओ तो क्यों दल बदल रहे
सिद्धू तो परेशान इधर भी है उधर भी
मुफ्ती, पंवार, ठाकरे, अखिलेश या जयंत
पंजे के संग कमान इधर भी है, उधर भी
शाहों की ख्वाहिशों पे ही प्यादे निसार हों
ये खेल का विधान, इधर भी है उधर भी
जिसकी भी घुड़चढ़ी हो वहीं नाच रहे हैं
दो-चार पासवान इधर भी हैं, उधर भी
मैं जिनके साथ हूँ वही ईमानदार हैं
सिब्बल का ये बयान इधर भी है, उधर भी
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
एक राजा के दो बेटे थे। एक नाटे कद का था और दूसरा लंबे कद का। बचपन से ही दोनों में तनाव रहता था। जब वे बड़े हुए तो राजा ने राज्य का बंटवारा कर दिया और पूरे देश के अधिकतम नाटे नागरिक नाटे बेटे के देश में चले गए। मूल राज्य में लंबे नागरिक रह गए। लेकिन कुछ नाटे लोग अपना देश छोड़कर नाटे देश में नहीं गए और लंबे राजा के शासन में रहने लगे।
लंबे राजा ने अपने राज्य में बचे सभी नाटे लोगों को माली, तांगा, मजदूरी, दर्जी, हजामत और अन्य छोटे कामों में लगाए रखा। वे सोचने-समझने का विवेक न हासिल कर लें इसलिए नगर में जगह जगह उनके लिए नाटे बाबा के नाम पर समुदाय केंद्र बना दिये जहां हर ढाई पहर बाद पूरे नाटे समुदाय को इकट्ठा होना अनिवार्य कर दिया। अपने लोगों से उनके बीच यह बात और फैला दी कि वो जितने ज़्यादा बच्चे पैदा करेंगे उतना ही उनका भला होगा। उन्हें यह भी बता दिया कि उनकी किसी भी परम्परा में यदि बदलाव किया गया तो यह उनकी सामुदायिक भावनाओं का अपमान होगा।
अब लंबे लोग व्यापार करते रहे और नाटे लोग उनके यहां नौकरी करते रहे और बदबूदार परंपराओं को निबाहते हुए जनसंख्या बढाने में लगे रहे। विकासहीन रूढ़ियों में बंधी यह जनसंख्या अपने संकरे मुहल्लों में सीमित रहकर बीमारियों और अशिक्षा का शिकार बनी रही।
कुछ समय बाद लंबे समुदाय के कुछ लोग नाटे लोगों की इस दशा से द्रवित हुए और उन्होंने स्वयं को लंबे समुदाय का शुभचिंतक घोषित करके राज्य की सत्ता हथिया ली। सत्ता हाथ में आते ही उन नए राजाओं ने सबसे पहले नाटे समुदाय में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करना शुरू किया। उनके समुदाय केंद्र ध्वस्त करने शुरू कर दिए। और अपने लोगों से लंबे समुदाय में यह बात फैला दी कि लंबे लोगों को भी हर ढाई पहर बाद लंबे बाबा के समुदाय केन्द्र पर इकट्ठा होना चाहिए और ज्यादा बच्चे पैदा करने चाहियें।
अब अपने ऊपर अचानक आए संकट से नाटे लोगों का समुदाय जागरुकता की ओर बढ़ने लगा है और शिक्षा, सभ्यता तथा विकास के पथ पर अग्रसर लंबू समुदाय काम-धंधा, रोज़गार, कला, हास्य और उत्सव भुलाकर कट्टरता, घृणा, प्रतिहिंसा, नारेबाजी और उपद्रवों में रुचि लेने लगा है।
सत्ता में बैठे लोग मन ही मन खुश हैं कि उन्होंने नाटे लोगों के विकास की बाड़ गिरा भी दी और लंबे समुदाय वाले उन्हें अपना शुभचिन्तक भी मान रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन