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विरोध

देर तक खड़ा
रिरियाता रहा बादल
लेकिन नीम
रूठा ही रहा
न तो पाथेय दिया
निंबोरी का
न ही आंगन सँवारा
नीमपुष्प से।

लेट आए हो ना बदरा
अब भुगतो
भूख सहोगे
तो समझोगे
किसी की प्यास!

✍️ चिराग़ जैन

बरसात की एक सुबह

लाजवाब है आज की सुबह
रात भर
धोया गया है सारा शहर

हर पेड़ को
नहलाया गया है रात भर

उत्सव का
नज़ारा कर रहा हूँ
अपनी बालकॅनी से।

दारू पी है शायद
नीम और पीपल ने।
अभी तक झूम रहे हैं
दोनों याड़ी।

सहजने की फलियाँ
बिछ गई हैं
…मुजरा करने के बाद।

मिट्टी की ख़ुश्बू वाला फ्रेशनर
अभी भी महक रहा है
परिंदे घुस आए हैं
मुफ्त की पार्टी उड़ाने।

एक ख़ूबसूरत-सा अहसास
बौराए जाता है मुझे भी!

✍️ चिराग़ जैन

बहार आई है

पूरे गुलशन की फ़िज़ाओं में ख़ुशी छाई है
हर दिशा नूर न जाने कहां से लाई है
शाख से फूल सजे हैं, कि फूल से शाखें
कुल मिलाकर ये हुआ है कि बहार आई है

✍️ चिराग़ जैन

जलन

बूंद बारिश की उसको छूती है
मन मेरा ज़ार-ज़ार जलता है
मैं उसे प्यार करूं तो बेहतर
और लोगों का प्यार खलता है

✍️ चिराग़ जैन

हरसिंगार

तुमसे सिंचित कली
हौले-हौले खिली
चहकी …महकी
इतराने लगी।
हवाओं में
बिखरने लगी उसकी ख़ुश्बू।

…अरे!
तुम रूठ क्यों गए हरसिंगार?
काॅम्प्लेक्स में आ गए हो क्या?
बर्दाश्त न हुई
अपने जने की ख़ुश्बू?
भार लगने लगा
अपना ही अंश?

तुम्हारी तो कीर्ति ही बढ़ाता था!
वरना कौन देखता था तुम्हारी ओर?
तुमने उसे ही गिरा दिया
ज़मीन पर!

देखो कैसा बिछ गया है बेचारा!
अनवरत निहारता
तुम्हारी ओर।

तुम मुँह फेरे खड़े हो!
ठूँठ कहीं के!

✍️ चिराग़ जैन

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