विकास की बाढ़
बहुत दिन बीते
शहर ने डुबो दी थी
एक नदी
विकास की बाढ़ में।
आज जमुना किनारे आया
तो लगा
कि उतर गई है
विकास की बाढ़
फिर से
बाहर निकल आई है
आदमियों में डूबी
…जमुना।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
बहुत दिन बीते
शहर ने डुबो दी थी
एक नदी
विकास की बाढ़ में।
आज जमुना किनारे आया
तो लगा
कि उतर गई है
विकास की बाढ़
फिर से
बाहर निकल आई है
आदमियों में डूबी
…जमुना।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिस डाली का काटा जाना आज अखर जाता है तुमको
उस डाली के कटने से ही कल को तुम फलदार बनोगे
जिस छैनी के छूने भर से चीख़ निकलती है पत्थर की
उस छैनी की चोटों से तुम पूजा के हक़दार बनोगे
अनुभव के दो हाथ समूचे माटी-माटी सन जाएंगे
तब जाकर मिट्टी के ढेले को किंचित आकार मिलेगा
मिट्टी से पहले हाथों की भाग्य लकीरें घिस जाएंगी
तब बर्तन कहला पाने का मिट्टी को अधिकार मिलेगा
जिन जलते शोलों से तन-मन सब कुछ झुलसेगा भीतर तक
उनके कारण ही तुम प्यासे ओंठों पर बौछार बनोगे
गंगा बनकर पुजना है तो, गोमुख से झरना ही होगा
बूंदों को बारिश बनना है, बादल को मरना ही होगा
रामशरण स्वीकार नहीं हो, और मुक्ति की इच्छा हो तो
कंचन मृग का स्वांग रचा कर, सीता को हरना ही होगा
अपने सारे सुख को अपने हाथों वनवासी कर दोगे
तब सम्भव है तुम जीते जी धरती पर अवतार बनोगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
एक मज़हब को पनाह दी थी कभी बस्ती ने
आज तक ज़ात को क़ीमत चुकानी पड़ती है
इक हसीं शाम की ख़्वाहिश में क़दम बहके थे
अब तो हर रात को क़ीमत चुकानी पड़ती है
ग़ैब ख़ामोश था जब क़त्ल हुए थे जंगल
इसकी बरसात को क़ीमत चुकानी पड़ती है
गर कलम शाही तमन्नाओं की परवाह करे
फिर तो हर हाथ को क़ीमत चुकानी पड़ती है
सबकी मुस्कान बनाए रखूँ इस चाहत की
मेरे जज़्बात को क़ीमत चुकानी पड़ती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Free Verse, Mann To Gomukh Hai, Poetry
मौसम के मूड को
तपा डालता है सूरज
आग की तरहं
ठण्डी हवा को
बना डालता है लू।
हरे पत्ते
हो जाते हैं ज़र्द
देख ही नहीं पाता
किसी का सुख
जलोकड़ा कहीं का!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
परिंदों का सिहर जाना अचानक
किसी आहट से डर जाना अचानक
तुम्हारा लौट कर जाना अचानक
नई ख़ुशियों का मर जाना अचानक
कई दिन से जो मन में उठ रही थी
उस आंधी का गुज़र जाना अचानक
अचानक ज़िन्दगी से जा रहे हो
कभी हो पाए तो आना, अचानक
✍️ चिराग़ जैन