Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
गहराई में जाकर बिल्कुल चुप हो जाती हैं
और किनारे आकर लहरें शोर मचाती हैं
लहरें पल भर में जीवन का सार बताती हैं
जिसमें से उठती हैं उस में ही मिल जाती हैं
जब उस अनुपम प्रथम मिलन की यादें आती हैं
नम होते हैं अधर और पलकें मुस्काती हैं
साहिल केवल कचरा ही देता है सागर को
फिर भी लहरें साहिल को मोती दे जाती हैं
मैं तो भावों और शब्दों में उलझा रहता हूँ
पर उनसे जुड़कर ग़ज़लें पावन हो जाती हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
बहुत ज़्यादा न हो पर कुछ तो हसरत सबको होती है
जहाँ में नाम और शोहरत की चाहत सबको होती है
मरासिम हर दफ़ा ताज़िन्दगी निभता नहीं लेकिन
किसी से इक दफ़ा सच्ची मुहब्बत सबको होती है
मन अपने आप से भी इक ना इक दिन ऊब जाता है
किसी अपने की दुनिया में ज़रूरत सबको होती है
हर इक मुज़रिम को लगता है, उसी पर सख़्त है मुन्सिफ़
नहीं तो हर सज़ा में कुछ रियायत सबको होती है
किसी को बादशाहत दी, किसी को झोपड़ों के सुख
मगर फिर भी मुक़द्दर से शिक़ायत सबको होती है
फ़क़त इक मौत जीवन को कोई मौक़ा नहीं देती
वगरना एक-दो लमहों की मोहलत सबको होती है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
जीत ने मात से रिश्वत ली है
दिल ने जज़्बात से रिश्वत ली है
चांदनी कम है अंधेरा ज़्यादा
चांद ने रात से रिश्वत ली है
फिर से बारिश में चुएगा छप्पर
इसने बरसात से रिश्वत ली है
सब समय की दुहाई देते हैं
सबने हालात से रिश्वत ली है
मुझको लगता है मिरी नींदों नें
कुछ ख़यालात से रिश्वत ली है
कैसे सच्चा जवाब दे कोई
जब सवालात से रिश्वत ली है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी
कुछ मुंडेरों के मुक़द्दर में चमेली आ गयी
पैर भी सुस्ता लिये, आँखों ने भी दम ले लिया
ज़िंदगी की राह में, दिल की हवेली आ गई
झाँकता है हर कोई ऐसे दिल-ए-नाशाद में
जैसे आंगन में कोई दुल्हन नवेली आ गई
बोझ कंधों का उतर कर गिर गया जाने कहाँ
जब मेरे सिर पे बुज़ुर्गों की हथेली आ गई
तीरगी का ख़ौफ़, सन्नाटे की दहशत थी मगर
इक किरण सूरज की धरती पर अकेली आ गयी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Poetry, Unpublished
घन, पंछी, बरखा करें, गर्जन, कलरव, सोर
हृदय मयूरा झूमिहै, ज्यों सावन में मोर
जब मेघन का नेह जल, बरसत है चहुँ ओर
इस प्रेमी मन भीगता, उत बिरहन की कोर
✍️ चिराग़ जैन