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वो कश्मीर हमारा है

हिमगिरि की गोदी में पसरा जो इक हरा बगीचा है
जिसकी झीलों को पुरखों ने स्वेदकणों से सींचा है
जिसके कण-कण में भारत की सौंधी ख़ुश्बू बिखरी है
जिसके प्रांगण में हरियाली दिव्य रूप में बिखरी है
जहाँ धरा पर स्वर्ग सरीख़ा अद्भुत भव्य नज़ारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

एक ओर हरियाली घाटी हरा रंग लहराती है
श्वेत बर्फ़ से ढँकी चोटियाँ चांदी बन छा जाती हैं
सांझ-सवेरे सूरज झीलों के पानी को रंगता है
इसी तरह कश्मीर रोज़ दो बार तिरंगा बनता है
स्वयं प्रकृति ने दुनिया भर को हर दिन दिया इशारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

अमरनाथ से हरगिज़ अपना रिश्ता तोड़ नहीं सकते
मानसरोवर जाने वाली राहें छोड़ नहीं सकते
‘बुद्धं शरणं गच्छामि’ स्वर से गुंजित लद्दाख जहाँ
हम उस पुण्य धरा से पल भर भी मुख मोड़ नहीं सकते
जिसे आस्था भरी दृष्टि से अपलक नित्य निहारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

जिन शिखरों ने सीमा-प्रहरी का किरदार निभाया है
जिसके गीतों को बच्चों ने विद्यालयों में गाया है
जिसके दम पर पूरा भारत सदा रहा निश्चिंत-निडर
कैसे माने भारत कि वो पर्वतराज पराया है
सेल्यूकस-सा विश्व विजेता जिसके आगे हारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

सवा पाँच सौ काबिल बेटे इक करगिल पर वार दिए
अरबों-खरबों रुपए इसकी रक्षा हेतु निसार दिया
जिसके जन-जन की ख़ुशियों की लेते ज़िम्मेदारी हम
भला दान मेें कैसे दे दें वो केसर की क्यारी हम
नज़र गड़ी जिस पर चोरों की, जो अनमोल सितारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है

बेशक़ हम शिव के वंशज हैं, विष धारण कर सकते हैं
लेकिन वक़्त पड़े तो शंकर तांडव भी कर सकते हैं
कर्ण दान में दे सकते हैं निज रक्षा के साधन भी
लेकिन धर्म नीति से हमने जीते बीसों रावन भी
क्षमा विवशता नहीं हमारी, ये स्वभाव हमारा है
दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर हमारा है
✍️ चिराग़ जैन

स्वतन्त्रता

मन के मलंग मतवाले महानायकों की
कुर्बानियों का परिणाम है स्वतन्त्रता
स्वर की बुलन्दियों ने जो अदालतों में किया
क्रान्ति का वो दिव्य यशगान है स्वतन्त्रता
शहीदों ने भूख-प्यास सह के बचाया जिसे
भारती का वही स्वाभिमान है स्वतन्त्रता
लाल-बाल-पाल औ सुभाष जैसे ऋषियों की
साधना का शुभ्र वरदान है स्वतन्त्रता

✍️ चिराग़ जैन

आदमी बौना अच्छा

जिनको लगता न हो धरती का बिछौना अच्छा
ऐसे शिखरों से तो फिर आदमी बौना अच्छा

मैंने ये देख के मेले में लुटा दी दौलत
मुर्दा दौलत से तो बच्चों का खिलौना अच्छा

मेरे होते हुए भी कोई मेरा घर लूटे
फिर तो मुझसे मेरे खेतों का डरौना अच्छा

राम ख़ुद से भी पराए हुए राजा बनकर
ऐसे महलों से था जंगल का बिछौना अच्छा

उसकी ममता से मेरा मन भी सँवर उठता था
अब के सिंगार से अम्मा का दिठौना अच्छा

✍️ चिराग़ जैन

मीडिया : एक चेहरा ये भी

हमारे मुल्क़ की क़िस्मत में ये विस्फोट क्यूँकर था
शहर से गाँव तक माहौल कल दमघोट क्यूँकर था
पसीना चू रहा था सबकी पेशानी से पर फिर भी
ख़बर पढ़ते हुए उनके बदन पर कोट क्यूँकर था

✍️ चिराग़ जैन

मुल्क़ में दहशत

जो फैलाने चले हैं मुल्क़ में दहशत धमाकों से
वही छुपते फिरा करते हैं इक मुद्दत धमाकों से

न ख़बरों में उछाल आया, न बाज़ारों में सूनापन
न बिगड़ी मुल्क़ के माहौल की सेहत धमाकों से

वही हल्ला, वही चीखें, वही ग़ुस्सा, वही नफ़रत
हमें अब हो गई इस शोर की आदत, धमाकों से

ये दहशतग़र्द अब इस बात से आगाह हो जाएँ
कि अब आवाम की बढ़ने लगी हिम्मत धमाकों से

वज़ूद अपना जताने के लिए वहशी बने हैं जो
उन्हें हासिल नहीं होती कभी शोहरत धमाकों से

✍️ चिराग़ जैन

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