Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
रात कटेगी, दिन निकलेगा
यह क्रम तो निर्धारित ही है
दिन इक दिन मुझ बिन निकलेगा
यह अनुमोदन पारित ही है
मैं इस भ्रम में जूझ रहा हूँ
मुझसे ही सब काज सधेंगे
पर दुनिया के लोग मुझे भी
दो ही दिन में बिसरा देंगे
विस्मृतियों के वरदानों पर
यह दुनिया आधारित ही है
चाहत, सपना, डर, उम्मीदें
प्रेम, प्रयास, प्रथा, यश-वैभव,
गर्व, विनय, संबंध, सृजन, सुख
हर्ष, विजय, सम्मान, पराभव
इन सब आभासी शब्दों पर
सृष्टि कथा विस्तारित ही है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हिंदी की साहित्यिक गोष्ठियों में यह प्रश्न अक्सर चर्चा का विषय बनता है कि कवि-सम्मेलनों का स्तर गिर रहा है। मंच पर फूहड़ता बढ़ रही है। चुटकुलेबाज़ ख़ुद को कवि कहने लगे हैं। लफ़्फ़ाज़ी और बकवास करके श्रोताओं का समय नष्ट किया जाता है। वही पुरानी कविताएँ सुनाकर मोटे लिफाफे लेने का चलन बढ़ गया है। कविता के धंधेबाज़ों ने मंच को बर्बाद कर दिया है, इत्यादि।
वैष्णोदेवी में कभी एक पहाड़ी जंगल को लांघ कर तीन पिंडियों के दर्शन किये जाते थे। उस समय निष्ठावान पुजारी तमाम कष्ट सहकर पिंडियों की सेवा करने जाता था। फिर वहाँ दुर्गम मार्ग की जगह एक सड़क बन गई। उस सड़क पर चलकर खोमचे तीर्थ तक पहुंच गए। फिर लोग घूमने-फिरने के लिए वैष्णोदेवी जाने लगे। फिर लोग पिकनिक मनाने वैष्णोदेवी जाने लगे। फिर लोग हनीमून मनाने वैष्णोदेवी जाने लगे। लेकिन इस स्थिति में भी आस्थावान पुजारी ने कभी पिंडियों को गाली नहीं दी।
उस पुजारी की पीढियां चुक गई किन्तु पिंडियों की आराधना एक दिन भी नहीं रुकी। हिंदी काव्य मंचों पर बढ़ रही विकृतियों के नाम पर कुल कवि सम्मेलनों को फूहड़ कह देना ऐसा ही है ज्यों तीर्थक्षेत्र पर खोमचे की गंदगी देखकर ईश्वर की मूर्ति के प्रति निष्ठा समाप्त हो जाए।
हिंदी की लोकप्रियता में इज़ाफ़ा करने वाले कवि सम्मेलनों को उन आस्थावान पुजारियों की ज़रूरत है जो किसी भी स्थिति में अपने ईश्वर के प्रति अपना समर्पण कम न होने दें। तीर्थयात्रियों की हरक़तों से रुष्ट होकर मंदिर की इमारत पर कालिख़ पोतना कहाँ तक नैतिक है? जब मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर पहला खोमचा जमा था उस समय पुजारी किस उपक्रम में व्यस्त थे? जब पवित्र तीर्थ की जड़ में हनीमून पैकेज वाला होटल खुला था तब पुजारी किस खोह में घुसकर तपस्या कर रहे थे?
खुसर-पुसर को “परिचर्चा” कहने वाले बुद्धिजीवियों को मंच की उठा-पटक से ऐतराज़ है लेकिन सम्मानों और पुरस्कारों पर होने वाले जुगाड़ उनकी दृष्टि में अपराध नहीं है। यदि किसी योग्य मेधावी ने परिवेश से परेशान होकर स्थान छोड़ा है तो ऐसा करके उसने किसी अयोग्य के लिए अवसर निर्माण करने का अपराध किया है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ताननेवाले जमाने भर की तोपें तान लें
हौसला बारूद से डरता नहीं, ये जान लें
छोड़िये साहिब, खुशी से कौन मरता है भला
दर्द ही हद से गुजर जाए तो फिर भी मान लें
जो कभी हमको कहा करते थे अपनी जिंदगी
खुदकशी के मूड में हों तो हमारी जान लें
देख लीजे कुछ हमारे पास बचने पाए ना
ख्वाब लें, उम्मीद लें, अल्फाज लें, अरमान लें
इस भरे बाजार में हम भी बहुत बेचैन हैं
वे पुराना लूट लें तो हम नया समान लें
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
एक विशेषण की चाहत में, संज्ञा का अपमान किया है
लाए को अनदेखा करके, पाए पर अभिमान किया है
अभिलाषा के रथ पर फहरी स्पर्धा की उत्तुंग ध्वजा है
लोभ बुझे तीरों से भरकर लिप्सा का तूणीर सजा है
अपना ही सुख खेत हुआ है, कैसा शर संधान किया है
जीवन को वरदान मिला है, श्वास किसी की दासी कब है
मीठे जल से ना बुझ पाए, तृष्णा इतनी प्यासी कब है
निश्चित की आश्वस्ति बिसारी, संभव का अनुमान किया है
मानव होना बहुत न जाना, जाने क्या से क्या बन बैठा
चोर, दरोगा, दास, नियामक और कभी धन्ना बन बैठा
ख़ुशियों का अमृत ठुकराकर, कुंठा का विषपान किया है
भोर न जानी, रैन न देखी, दिन भर की है भागा-दौड़ी
सुख के पल खोकर जो जोड़ी, छूट गई हर फूटी कौड़ी
अपने जीवन के राजा ने औरों को श्रम दान किया है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ज़िन्दगानी है, या कोई किताब अनजानी
साँस चलती है या सफ़हे पलटते रहते हैं
✍️ चिराग़ जैन