Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सघन तलाशी समय करेगा, धीरज के गठरी-झोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
देख रही हैं उनकी आँखें, षड्यंत्रों के दृश्य घिनौने
फिर भी त्याग नहीं पाए वे, अपने संयम के मृगछौने
सूरज पूजा करता होगा, श्वासों में भड़के शोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सच जबड़े भींचे बैठा है, झूठ निरंतर बोल रहा है
अपराधों के उत्सव में बस, निर्दोषों का मोल रहा है
मासूमों की किलकारी ही, आज चुनौती हथगोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
सहना है तो सह ही लेंगे, कठिन समय की पीर विजेता
कुछ मुठभेड़ों से उकताकर, तनिक न खोते धीर विजेता
प्राण गँवाकर और बढ़ेगी, रंगत बासंती चोलों की
और कथाएँ युग बाँचेगा, शायद कल इन अनबोलों की
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जब मन में ताण्डव करते हों संबंधों के क्लेश
तब कोई भी दे सकता है संयम का उपदेश
धीरज संग ढहने लगते जब यादों के अवशेष
ऐसे में पीड़ा देता है संयम का उपदेश
भाई का शव देख हुआ जब एक विभीषण क्लांत
तब यह ज्ञान मिला संकट में मन को रखिये शांत
ओछे हैं जो पीड़ा लखकर खो देते हैं धीर
दारुण दुख पाकर संयत हों वे ही सच्चे वीर
लक्ष्मण पर मूच्र्छा छाई तो बदल गया परिवेश
जो अर्जुन को समझाते थे, है संसार असार
पूर्व नियत घटनाओं का ही आभासी विस्तार
बंधु, सखा, परिवार, पितामह, शैशव के अनुबंध\
जो समझाते थे मिथ्या हैं ये सारे संबंध
वो रो-रोकर भिजवाते थे राधा को संदेश
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आओ अपने घर में सूरज का इक अंश उठा लाएँ
आओ जीवन के अंधियारे का विध्वंस उठा लाएँ
जिस सूरज की स्वर्णिम किरणें धरती को दमकाती हैं
जिस ऊर्जा से पोषित होकर सब फसलें लहराती हैं
उस सूरज की एक किरण का जगमग वंश उठा लाएं
जो सूरज की ऊर्जा वैदिक मंत्रों में ढल सकती है
वो ऊर्जा घर के भीतर बिजली बनकर जल सकती है
यंत्रों के इस मानसरोवर का इक हंस उठा लाएं
ये ऊर्जा मानवता के हित ईश्वर का उपहार सखे
इस पर कुछ अवरोध नहीं ना सिस्टम ना सरकार सखे
बिजली के उस इंतज़ार का सार्थक ध्वंस उठा लाएं
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
दिन भर आग बबूला होकर
दम्भ दहक का बोझा ढोकर
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
नदिया की कलकल धारा से शीतलता पाने
मरना देखा, जीना देखा
सबका दामन झीना देखा
दौलत के सिर छाया देखी
श्रम के माथ पसीना देखा
रूप गया क़िस्मत के द्वारे, दो रोटी खाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
भोर भये मैं सबको भाया
सांझ ढले जग ने बिसराया
दोपहरी में कोई मुझको
आँख उठा कर देख न पाया
जिसने इस जग को गरियाया, जग उसको जाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
चंदा डूबा दूर हुआ था
मैं अम्बर का नूर हुआ था
शाम हुई फिर चाँद उगा तो
मान तड़क कर चूर हुआ था
ढलते की सुधि छोड़ चले सब, उगते को माने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
जो मिले बस उसे ही निभाते रहो
वक़्त के साज पर गुनगुनाते रहो
सुख मिले तो ख़ुशी के तराने रचो
दुख मिले दर्द के गीत गाते रहो
दर्द हद से गुज़रने लगे जिस घड़ी
उस घड़ी लेखनी से शरण मांग लो
और टूटे हुए स्वप्न को बीनकर
शब्द से काव्य की सीपियाँ टाँक लो
भाग्य जब दर्द से आज़माए तुम्हें
तुम सृजन कर उसे जगमगाते रहो
क्या मिला, क्या अचानक पराया हुआ
इन सवालों का दामन नहीं थामना
जब कभी धड़कनों में विकलता बढ़े
ताल की चाल जैसा उसे साधना
अश्रुओं को रसों में अनूदित करो
और फिर देर तक मुस्कुराते रहो
एक दिन जब कथा मौन हो जाएगी
गीत ही ये कहानी पुनः गाएगा
तुम समर्पित हुए प्रीति की राह पर
पीढ़ियों को यही बात बतलाएगा
तुम सदा स्वार्थ के लोभ से हीन थे
इस अकथ की गवाही बनाते रहो
तुम अगर चाह लो पीर से टूटकर
जीवनी शक्तियों का अनादर करो
तुम अगर चाह लो दर्द की भेंट का
बाँह फैलाए सत्कार सादर करो
तुम अगर चाह लो छटपटाते रहो
तुम अगर चाह लो जग सजाते रहो
✍️ चिराग़ जैन