Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
कौम को लूट के खाना नहीं सीखा हमने
इतनी शिद्दत से कमाना नहीं सीखा हमने
वक्त के साथ ही बर्ताव बदल जाता है
बस यही तौर-ए-जमाना नहीं सीखा हमने
कोई कश्ती ही पलट जाए तो मर्जी उसकी
बीच में छोड़ के जाना नहीं सीखा हमने
जिन चिरागों से हुआ एक भी लम्हा रौशन
उन चिरागों को बुझाना नहीं सीखा हमने
एक वो हैं कि गिनाए चले जाएँ अहसान
एक हम हैं कि जताना नहीं सीखा हमने
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सदा कसा ही नहीं रहेगा, जीवन पर कष्टों का फंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा
रिश्तों के अपनेपन का भी, पीड़ा रूप बदल जाती है
जिनके बिन जीवन मुश्किल था, उनकी संगत खल जाती है
जितना तेज़ तपेगा सूरज, उतना अधिक मेह बरसेगा
जितना ज्यादा विरह सहेंगे, उतना गहन नेह बरसेगा
पत्थर छैनी सहकर पुजता, लकड़ी झेल रही है रंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा
शनि की महादशा झेली है, अब कष्टों से डरना कैसा
सपनों को मरते देखा है, इससे बढ़कर मरना कैसा
अंतर्दशा बदलने से ही, मन के पत्थर घुल जाते हैं
लग्न कुण्डली नहीं बदलती, लेकिन गोचर खुल जाते हैं
हर क्षण रूप बदलता रहता, ये किस्मत का गोरखधंधा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा
जिसको भी अमरत्व मिलेगा, वह जग को नश्वर मानेगा
जिसको विष पीना आता है, उसको जग ईश्वर मानेगा
रावण हँसता है लंका में, राम बिलखते सिया विरह में
कंस राजसुख भोग रहा है, कृष्ण जन्मते बंदीगृह में
सारा जीवन कष्ट सहे जो, नाम उसी का आनंदकंदा
सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
सावधान रहकर रेंगा जा सकता है, चला जा सकता है किन्तु दौड़ा नहीं जा सकता। दौड़ने के लिए विश्वास की आवश्यकता होती है। जिस राह पर दौड़ रहे हो, उस पर विश्वास; जिन पैरों से दौड़ रहे हो, उन पर विश्वास; जिन राहगीरों के साथ दौड़ रहे हो, उन पर विश्वास। जिस वृक्ष के नीचे से गुज़रोगे, उस पर विश्वास करना होगा कि वह आपके ऊपर गिर नहीं पड़ेगा। आसमान पर विश्वास करना पड़ेगा कि वह टूट नहीं जाएगा। दाहिने पैर को विश्वास करना होगा कि जब तक वह हवा में रहेगा, तब तक बाँया पाँव उसके हिस्से का भी संतुलन बनाए रखेगा। बाँए पैर को आश्वस्त होना होगा कि जब वह अपने हिस्से की दौड़ लगाएगा तो दाहिना पैर देह के बोझ को ज़िम्मेदारी से संभाले रखेगा। इनमें से किसी भी विश्वास का स्थान संदेह ने ले लिया तो वह संदेह आपके पैरों को जकड़ लेगा।
जड़ के विश्वास पर ही देवदार के तना भौतिकी के समस्त नियमों के विपरीत, सैंकड़ों फीट तक उठता चला जाता है। यदि उस तने को जड़ पर विश्वास न हो और वह बार-बार मुड़कर जड़ की मजबूती जाँचने लगे तो वह अष्टवक्र सरीखा झाड़ बनकर रह जाएगा।
सृष्टि विश्वास पर टिकी हुई है। सूर्य पर हमें विश्वास है कि वह शाम को ढल जाएगा। चन्द्रमा पर हमें विश्वास है कि वह नियत क्रम में घटता-बढ़ता रहेगा। यहाँ तक कि मृत्यु पर भी हमें विश्वास है कि वह एक न एक दिन अवश्य आएगी। बस, हम नहीं करते तो सिर्फ़ इस जीवन पर विश्वास नहीं करते। जिस जीवन का प्रारंभ प्रसव जैसी अद्वितीय पीड़ा से होता है उसकी शक्ति पर हमें भरोसा नहीं हो पाता। जिस मस्तिष्क ने बिना किसी प्रशिक्षण के देह के रोम-रोम पर नियंत्रण कर रखा है उसकी क्षमता पर हम संदेह करने लगते हैं।
जिन संबंधों की ऊर्जा शक्ति एक पूरी सृष्टि से लोहा लेने को तैयार रहती है, उन संबंधों पर हमें विश्वास नहीं है। जिस प्रेम के बूते सृष्टि की हज़ार बार सृजित की जा सकती है, उस प्रेम पर हम भरोसा नहीं कर पाते और घृणा को पोसने लगते हैं। लहलहाते हुए खेत का स्वप्न देखनेवाले लोग, बीज की क्षमताओं पर संदेह नहीं करते। जितनी ऊर्जा हम बीज पर संदेह करने में खपाते हैं, उतनी ही ऊर्जा अपने श्रम, अपनी इच्छाशक्ति और भूमि की उर्वरता को पोसने में खपाएँ तो खेत में फसल ज़रूर लहलहाएगी।
जीवन जीने के लिए विश्वास, श्वास से भी अधिक आवश्यक है। विश्वास के अभाव में कोई भी सफ़र गति नहीं पकड़ सकता; न क़ामयाबी का, न भक्ति का, न प्रेम का और न ही रिश्तों का! जो मन में संदेह रखकर इनमें से किसी राह पर चलता है, वह दरअस्ल अपने-आप को छल रहा होता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
हार भी है, जीत भी है
पीर भी है, प्रीत भी है
अनवरत इक शोर भी है
आपदा घनघोर भी है
किन्तु अन्तस् में अमर आह्लाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
मानता हूँ उत्सवों का दौर थोड़ा कम हुआ है
आंधियों से आम्रवन का बौर थोड़ा कम हुआ है
किन्तु कलरव ने चहकने की प्रथा त्यागी नहीं है
मांगलिक वेला अभी सब हार कर भागी नहीं है
कोयलों का आम से संवाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
दृष्टि की सीमा तलक अनजान वीराना पड़ा है
कान के उस पार सीमाहीन सन्नाटा खड़ा है
किन्तु हाथों पर तनिक रंगीन-सा एहसास भी है
‘पीर का भी अंत होगा’ -एक ये उल्लास भी है
मौन का आनंद अंतर्नाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
धीर टूटेगा लखन की चेतना को लुप्त पाकर
मन विकल होगा किसी अभिमन्यु को समिधा बनाकर
किन्तु द्रोणाचल किसी संजीवनी को जन्म देगा
शौर्य को अमरत्व युग-युग तक समूचा धर्म देगा
सत्य का यश मौत के भी बाद जीवित है
होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
रेत का साम्राज्य है बस
हो चुके हैं घाट बेबस
पर्वतों पर जल नहीं है
दूर तक बादल नहीं है
चल रहे हैं रेत पर, तपती दुपहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
पत्थरों के आख़िरी कण तक नहीं है बून्द जल की
याद रख पाए नमी को इस जतन में आँख छलकी
आँख के नीचे बची है शेष, झरनों की निशानी
पाँव के छाले सुनाते हैं जलाशय की कहानी
खेत से उठती हर इक आवाज़ बहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
स्रोत सूने हो गए हैं, बस्तियों में हैं शिकारी
थक चुका सागर तरस कर, प्यास जीती, आस हारी
जोड़ रखती थीं धरा को, वे जड़ें बिखराव में हैं
इक सदी का दर्द जीवित इन जड़ों के घाव में है
मर गया कलरव नदी की पीर लहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
श्रम जलाशय खोजता है रेत से सूखे क्षणों में
पीढ़ियाँ घिरने लगी हैं आग के आकर्षणों में
फूँक दे जो ज़िन्दगी को, अब न ऐसा स्वप्न पालो
हो सके तो नौनिहालों को झुलसने से बचा लो
हर नमी को सोखता सूरज सुनहरी है
एक युग से प्यास ठहरी है
✍️ चिराग़ जैन