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अभय

मीत तुम चाहतों से डरा मत करो
चाह की जीत दिखलाउंगा एक दिन
मुक्त हो जाओगी तुम विवशताओं से
एक बंधन सजा जाउंगा एक दिन

तुम अगर कर सको तो यही बस करो
जब खुलें पंख तो रोकना मत उन्हें
जब कभी कामनाएँ तरल हो उठें
तो किसी लाज से सोखना मत उन्हें
रीत जाना नहीं, रीतियों की तरह
मैं नया रंग भर जाउंगा एक दिन

प्यार के नूर की बात करते सभी
प्यार का नूर सबको सुहाता नहीं
हम समझ ही नहीं पा रहे हैं अभी
प्यार क्यों बेहिचक बोल पाता नहीं
ये नियम, झूठ की पैरवी हैं प्रिये
सत्य का रूप दिखलाउंगा एक दिन

देह ने विष पिया, आत्मा ने नहीं
तुम मुझे देह अपनी नहीं सौंपना
जिन रिवाज़ों दूभर हुई ज़िन्दगी
सोच में तुम उन्हें बस नहीं रोपना
उम्र भर की छुअन भूल ही जाओगी
उंगलियों में समा जाउंगा एक दिन

✍️ चिराग़ जैन

तपस्या

जब मुझे विश्वास होगा, तुम मुझे हासिल न होगे
मैं पुनः संसार सागर में स्वयं को झोंक दूंगा
जो रसायन दग्ध करता है हृदय को, धमनियों को
व्यस्तताओं से उसी की हर क्रिया को रोक दूंगा

जिस घड़ी होगा सुनिश्चित, भाग्य रेखा में नहीं तुम
बस तभी इक वक्र रेखा, शुक्र पर्वत छोड़ देगी
जब मुझे आभास होगा, भावना बेमोल है अब
बुद्धि बढ़कर तब अचानक मोह बंधन तोड़ देगी
हाँ, कठिन होगा हृदय से रक्त शोधन मात्र करना
कामना की प्यास को मैं रीतियों की ओक दूंगा

क्या पता उस पल स्वयं पर भी नियंत्रण हो न मेरा
पर स्वयं को आँकड़ों में व्यस्त करना सीख लूंगा
जिन अनर्गल कर्मकाण्डों की प्रणय ने पीर झेली
मैं उन्हीं से प्रीत का घर ध्वस्त करना सीख लूंगा
मैं स्वयं को भी नहीं अच्छा लगूंगा उन दिनों जब
प्रेम में डूबे हुओं को शिष्ट बनकर टोक दूंगा

प्रेम के बिन रस नहीं बनता हृदय की वीथियों में
किन्तु फिर भी रक्त का संचार चलता ही रहेगा
तंत्रिकाओं का सिहरकर फिर उभरना उभरना बंद होगा
कोशिकाओं का मगर व्यापार चलता ही रहेगा
देखने भर के लिए संसार चलता ही रहेगा
किन्तु मैं मन को ख़ुद अपने हाथ से परलोक दूंगा

✍️ चिराग़ जैन

सख़्त पहरा है

आज कुछ अचरज नहीं है भाग्य के व्यवहार पर
पूर्णता आ ही नहीं सकती कभी इस द्वार पर
सख्त पहरा है
किसी पिछले जनम के पाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का

भावना से शून्य कैसे प्रार्थना होगी कहो ना
है बहुत दूभर विवशता लाद कर संबंध ढोना
रेत के घर क्यों सदा ही लहर की ज़द में रहे हैं
प्रश्न गहरा है
अर्थ क्या है बस उंगलियों पर सरकते जाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का

किसलिए सुख से सदा वंचित रही अच्छी कहानी
क्यों नयन की कोर पर है पीर का अनुवाद पानी
गीत की दारुण कथा सुन सृजन की पलकें सजल हैं
अश्रु ठहरा है
क्यों हुआ निःशब्द जीवन गीत के आलाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का

जब हथेली की लकीरों से उलझना हो अकारण
कुण्डली में मिल न पाए गृहदशाओं का निवारण
जिस खगोली पिण्ड ने जीवन अंधेरा कर रखा है
वह सुनहरा है
रंग क्या देखूँ नियति से जुड़ चुके अभिशाप का
हूँ स्वयं कारक नियति में मिल रहे संताप का

✍️ चिराग़ जैन

भारतीय सेना की कार्रवाई

एक शरारती लड़का पूरे मोहल्ले के लोगों को तंग करता रहता था। वो रात में चैन से सोते लोगों के घर की घंटी बजाकर भाग जाता था। कई बार उसे समझाया गया। पंचायत में भी उसे टोका गया। लेकिन वो समझने को तैयार नहीं था। रोज़ की तरह एक दिन वह किसी की घंटी बजाने की सेंध लगाए बैठा था। उसी मौके का लाभ उठाकर एक दबंग पड़ोसी ने उस शरारती लड़के के घर पर खुजली का पाउडर बिखेर दिया। सूना है कि वो लड़का गाँव के जोहड़ में खुजा-खुजा कर खूनमखून बरामद हुआ है।

✍️ चिराग़ जैन

दिगम्बरत्व

प्रश्न उठा है जैन धर्म के संत नग्न क्यों रहते हैं
प्रश्न उठा है जग में रहकर आत्ममग्न क्यों रहते हैं
प्रश्न उठा है जैन धर्म में बिल्कुल ढील नहीं है क्या
सभ्य जगत् में नग्न विचरना; ये अश्लील नहीं है क्या
सच समझे बिन बकबक करना, थोथा मान तुम्हारा है
त्याग वेश पर नाक चढ़ाना ये अज्ञान तुम्हारा है
काम अगर सर चढ़ जाए तो जीव व्यथित हो जाता है
मन भीतर से निश्छल हो तो त्याग घटित हो जाता है
वस्त्र त्यागना क्या कोई करतब फ़िल्मी हीरो का है
काम विजित कर नग्न विचरना; ये टेवा वीरों का है
शुद्ध आचरण की बातें, अभिमानी नहीं सुनी तुमने
संतों का बस बाना देखा, बानी नहीं सुनी तुमने
चखने वाले ने जूठे बेरों में मीठा प्रेम चखा
जिसके मन में जो मूरत थी उसने वैसा रूप लखा
सच बतलाओ, बचपन में जब नंगे डोला करते थे
तब भी क्या तुम ऐसी ओछी भाषा बोला करते थे
बचपन में हर नारी तुमको क्या केवल तन लगती थी
माँ का दूध पिया तब भी क्या कामवासना जगती थी
कह सकते हो तब तुमको इन बातों का आभास न था
कह सकते हो तब अन्तस् में कोई कामविलास न था
मन का पाप उजागर ना हो इस हित साधन जोड़ लिए
जब मन में कालिख आई तो उजले कपडे ओढ़ लिए
तुमको भय है काम भावना पर तुम पार न पाओगे
मन में पाप उठेगा तो तुम उसे मार ना पाओगे
लेकिन नग्न विचरने वाले संतों को ये फ़िक्र नहीं
धर्मध्यान से सिक्त ह्रदय में, काम-पाप का ज़िक्र नहीं
आत्मसाधना में बाधक अभिशाप भस्म हो जाएगा
तप की ज्वाला में जलकर हर पाप भस्म हो जाएगा
तुम क्या जानो जैन धर्म का क्या इतिहास सुनहरा है
तुम क्या समझो पंचेद्रियों पर धर्मध्यान का पहरा है
केशलोच पर वो बोले जो खुद को नोच नहीं सकते
कितनी कठिन तपश्चर्या है, तुम ये सोच नहीं सकते
हम वो नहीं जिन्होंने केवल धन वैभव ही जोड़ा है
हम उनके वंशज हैं जिनने जीत-जीत कर छोड़ा है
तोरण पर पशुकष्ट देखकर हममें करुणा जागी है
हमने चक्रवर्ती की सब संपत्ति जीत कर त्यागी है
जैन धर्म का साधक केवल क्षमा सुधा ही पीता है
हमने कमठ सरीखा दानव आचरणों से जीता है
हमको अपने मुनिराजों से क्षमाधर्म का ज्ञान मिला
हमें कठिन उपसर्ग समय में संयम का वरदान मिला
हम हिंसक हो जाते तो तुम इतना बोल नहीं पाते
हम बदला लेने लगते तो मुंह तक खोल नहीं पाते
हम भी तुमको गाली दें तो तुम जैसे हो जाएंगे
हम तुम जैसे होकर अपने कुल को नहीं लजायेंगे
तुम इक बार विचारो फिर से अहंकार ही चूका है
उसका चेहरा घृणित हो गया, जिसने नभ पर थूका है
हाथी निकला, श्वान बौराये; कहो लफंगा कौन हुआ
दर्पण में जाकर तो देखो सचमुच नंगा कौन हुआ

✍️ चिराग़ जैन

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