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निर्माण-प्रक्रिया

टूट कर बिखरे हुए व्यक्तित्व पर
आँसुओं ने कर दिया छिड़काव
गूंद डाला मुट्ठियों से भाग्य ने
हो गईं सब ग्रंथियाँ समभाव

अनुभवों में सन गईं जब कर्म की दोनों हथेली
तब समय के चाक पर निस्तेज ने आकार पाया
उंगलियों ने दाब दे-देकर दुलारा पोरवों से
तब कहीं संज्ञा हुई हासिल, तभी किरदार पाया
जो हुआ साकार उससे लोक ने
ठीक ऐसा ही किया बर्ताव

जो दहकती आग से गुजरे उन्हीं में पूर्णता है
सौंधता है बाँह में उनकी ठहर कुछ देर पानी
जो लपट के ताप से बचकर निकल आए अधूरे
उन घड़ों से आस रखकर डूब जाती है जवानी
सोहनी की प्रीत प्यासी रह गई
भर न पाया माहियों का घाव

टूट जाना ही प्रथम सोपान है निर्माण क्रम का
दर्द से धुलकर चमक आती पिघलती पुतलियों में
विष पचा लेगा जगत तो क्षीर से अमृत मिलेगा
घर्षणों का दर्द पत्थर को सजाता उंगलियों में
रेत पर बैठी निरर्थक ही रही
भीगकर ही पार होती नाव

✍️ चिराग़ जैन

मोल केवल ध्येय का है

प्रश्न तो उद्देश्य का है, मोल केवल ध्येय का है
जो मिला आशीष बनकर, अर्थ उस पाथेय का है
मात्र जीने के लिए सब लोग जीकर मर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।

जो सहजता से नियत पथ पार कर उजियार देगी
बस उसी पहली किरण को अर्घ्य का वैभव मिलेगा
बादलों के द्वंद से भी दामिनी उत्पन्न होगी
किन्तु इस हठधर्मिता को मान वैसा कब मिलेगा
एक प्राची की उपज है, एक गर्जन की सहेली
एक को जग पूजता है, एक से सब डर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।

एक गोवर्द्धन उठाकर कृष्ण गिरधारी कहाए
द्रोणपर्वत हाथ पर धर लाए थे हनुमान सारा
किन्तु जब कैलाश को लंका लिवाने चल दिया तो
शक्ति के मद में पगा लंकेश का अभिमान हारा
एक जग कल्याण का था, एक निज अभिमान का था
एक मन भीतर विराजे, एक मन बाहर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं।
कर्म तो सब कर रहे हैं।

कृष्ण ने जिस काल में युग के हृदय पर छत्र पाया
कंस ने उस ही समय में लोकनिंदा पाई जग से
जब युधिष्ठिर धर्म की सीमा समझकर लड़ रहे थे
तब सुयोधन कर रहा था, धूर्तता-चतुराई जग से
एक रावण का अहम था, एक राघव की सरलता
एक ने कुल को डुबोया, एक के पत्थर बहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं
कर्म तो सब कर रहे हैं

✍️ चिराग़ जैन
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समझौता

अपने स्वर्ण सरीखे शब्दों में मैं अगर मिलावट कर लूँ
तो चमकीले पत्थर मेरे भी जीवन में जड़ जाएंगे
कुंदन जैसे शुद्ध विचारों में कुछ समझौता घुल जाए
तो मेरे हित नित्य सफलता के आभूषण गढ़ जाएंगे

चंदन कहकर कीकर बेचूँ -लाभ यही है, मंत्र यही है
लोभ प्रपंचों की दुनिया में धर्म यही है, तंत्र यही है
लेकिन ऐसी विजय पताका किन हाथों से फहराऊंगा
दर्पण के सम्मुख आया तो मैं कैसे मुख दिखलाऊँगा
जिस दिन मेरा पेट विवश कर देगा गर्दन के झुकने को
उस दिन मेरी ख़ुद्दारी के दावे झूठे पड़ जाएंगे

नैतिक शिक्षा की पुस्तक का ज्ञान भुलाना आवश्यक है
अपने आदर्शों के शव का कुचला जाना आवश्यक है
भौतिक सुख की नीरस आँखों में काजल शोभा पाएगा
लेकिन अपने अंतर्मन की भस्म बनाना आवश्यक है
मानव का तन कोरा शव है, शेष न हो यदि लाज ज़रा भी
दैहिक सुख तो यहाँ धरा पर पड़े-पड़े ही सड़ जाएंगे

महल-दुमहलों की रंगत से, नेह भरा छप्पर बेहतर है
रेशम के महंगे चोगों से कबिरा की चादर बेहतर है
भीष्म पितामह के सीने पर बाण चलाते अर्जुन से तो
पुत्रविरह में कट कर गिरता द्रोण तुम्हारा सिर बेहतर है
आश्रम में रहकर संन्यासी संबंधों की लाज रखेंगे
महलों में रहकर दो भाई आपस में ही लड़ जाएंगे

✍️ चिराग़ जैन

अवसान

सुबह उगे सूरज का ढलना निश्चित है हर शाम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

जिनका जीवन ग्रंथ हुआ था
जिनका कीना पंथ हुआ था
जो रावण का काल बन गए
मानवता का भाल बन गए
जिनने दीन अहिल्या तारी
जिनने युग की भूल सुधारी
जिनके चिन्ह क्षितिज पर ठहरे
जिनके तप से पत्थर तैरे
सरयू की लहरों में उतरे वो पुरुषोत्तम राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

जिनकी कीर्ति युगों से ऊँची
आभारी थी सृष्टि समूची
गीता के उद्घोषक थे जो
पाण्डव दल के पोषक थे जो
यौवन पर उपकार रहे जो
कष्टों का उपचार रहे जो
भीषण रण के नायक थे जो
द्वापर के अधिनायक थे जो
केवल भ्रम की भेंट चढ़े थे वो माधव घनश्याम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

अपना क्या अस्तित्व यहाँ पर
जंगल में इक कीट बराबर
हम कितने भोले-भाले हैं
दायित्वों का भ्रम पाले हैं
कितने आए, कितने बीते
जग के कीर्ति कलश कब रीते
छिटका कर कुछ दिन को छींटे
थोड़े हारे, थोड़े जीते
हम भी छोड़ चले जाएंगे जीवन का संग्राम रे
फिर भी कब रुकते हैं पल भर इस दुनिया के काम रे

✍️ चिराग़ जैन

संघर्ष का जयगान

लड़ते-लड़ते हार गया था कल जो सूरज अंधियारे से
उसकी एक किरण से गहरे अंधकार की मौत हो गई
मस्तक की त्यौरी बन जाती थी जिस विष का नित्य ठिकाना
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई

जिस रिश्ते को छोड़ गए थे निर्जन वन में निपट अकेला
जिसको अपनेपन से ज़्यादा भाया दुनिया भर का मेला
जिसका था अनुमान हमें वो हारा-टूटा मिल जाएगा
या तो अब वो नहीं मिलेगा या फिर रूठा मिल जाएगा
जिसको झूठी चमक-दमक में गहरी पीड़ा दे आए थे
उसको हँसते-गाते पाकर शर्मसार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई

धरती के शासन की इच्छा जीवन का आधार बनी थी
क्रूर अशोक भयावह जिसकी बर्बरता अख़बार बनी थी
जिसको निर्दोषों का रक्त बहाने मे कुछ क्षोभ नहीं था
जिसको मन की कोमलता के रक्षण का भी लोभ नहीं था
जिसकी अपराजेय कीर्ति को हार कभी स्वीकार नहीं थी
जब वैराग्य घटा तो उसकी जीत-हार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई

जिनके दिए उदाहरण हमने, उनके जीवन समतल कब थे
उनकी भाग्य लकीरों में जाने कैसे-कैसे करतब थे
जिसको इधर डुबोया जग ने, उसको उधर उबर जाना है
धड़कन की रेखा सीधी होने का मतलब मर जाना है
समय पुरानी तलवारों को घिसकर पैना कर देता है
जंग दिखे तो यह मत समझो तेज धार की मौत हो गई
इक मुस्कान खिली तो उस सारे विकार की मौत हो गई

✍️ चिराग़ जैन

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