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नीरज जी का प्रयाण उत्सव

हिंदी भवन में नीरज जी का प्रयाण उत्सव मृत्यु के महोत्सव की मिसाल बन गया। जीवन भर जिजीविषा के आधार पर उत्सव जीनेवाले महाकवि को विदा करने आए लोगों की आँखें नहीं, मन भीग गया। नीरज जी का खिलखिलाता हुआ चेहरा हिंदी भवन सभागार में सुसज्जित भव्य मंच को आलोकित कर रहा था। दाहिनी ओर स्टूल पर उनका एक अन्य चित्र स्थापित था, जिसे गुलदावरी के फूलों की माला से सजाया गया था। ग़ुलाब की पंखुरियाँ गीत के शिखर पुरुष को श्रद्धांजलि देने के लिए उपस्थित थीं। उत्सव ही था, …ख़ालिस कवि का ख़ालिस उत्सव! कार्यक्रम प्रारम्भ से पूर्व सभागार एक भारी आवाज़ के रेकॉर्ड से महक रहा था। साउंड मैनेजर ने नीरज जी की आवाज़ में उनके गीतों की सीडी प्ले की हुई थी। सवा पाँच बजे श्री सुरेन्द्र शर्मा जी ने मंच संभाला। दर्शक-दीर्घा ने तालियों के साथ प्रयाण के इस महोत्सव का उद्घाटन किया। डॉ अशोक चक्रधर ने नीरज जी के काव्य पर बोलते हुए उनके व्यक्तित्व को भी अपने अंदाज़ में बयान किया। इसके बाद अगले दो घंटे ऊर्जा की वृष्टि के थे। श्री विनोद राजयोगी, डॉ प्रवीण शुक्ल, श्री गजेंद्र सोलंकी, सुश्री मनीषा शुक्ला, श्री ज्ञानप्रकाश आकुल, चिराग़ जैन और शशांक प्रभाकर ने नीरज के इस अवसान पर लिखी गईं अपनी कविताओं से काव्यांजलि प्रस्तुत की। श्री पवन दीक्षित, डॉ सीता सागर और डॉ विष्णु सक्सेना ने अपने स्वर में नीरज की रचनाओं का पाठ कर स्वरांजलि दी।
पवन दीक्षित जी ने उसी ख़रज भरी आवाज़ में उसी विलम्बित स्वर में नीरज जी के अशआर पढ़े तो कौतूहल, श्रद्धा, आश्चर्य तथा प्रसन्नता के सम्मिश्रण से सभागार भर गया। डॉ गोविंद व्यास, श्री रामनिवास जाजू और श्री मनोहर मनोज जी ने अपने संस्मरणों से नीरज जी के जीवन की चेतना और जीवंतता को प्रकाशित किया। कार्यक्रम सम्पन्न होने पर पूरे सदन ने नीरज के शानदार जीवन को स्टैंडिंग ओवेशन दिया और नीरज जी के सम्मान में तालियों के पहाड़ खड़ा कर दिया।
तभी पार्श्व में किशोर कुमार की आवाज़ में नीरज जी खनखना उठे- ‘शोखि़यों में घोला जाए फूलों का शबाब….’ फिर तो बिना किसी पूर्वयोजना के अग्रिम पंक्ति में खड़े कवि थिरकने लगे। ताल के साथ तालियाँ बज रही थीं, प्रत्येक कंठ किशोर के स्वर से ऊँचा जाकर अपने महाकवि के गीत याद होने का दम्भ भर रहा था, पैर बिना पूछे ताल की संगत कर रहे थे। अरुण जैमिनी, सपन भट्टाचार्य, विष्णु सक्सेना, सुरेन्द्र शर्मा, गुणवीर राणा, महेंद्र शर्मा, सत्यदेव हरयाणवी, गजेंद्र सोलंकी, प्रवीण शुक्ला, नन्दिनी श्रीवास्तव, सीता सागर, वेदप्रकाश वेद, विनय विश्वास, ऋतु गोयल, मनीषा शुक्ला, महेंद्र अजनबी, सुरेन्द्र सार्थक, पी के आज़ाद, शम्भू शिखर, पद्मिनी शर्मा, यूसुफ़ भारद्वाज, शालिनी सरगम, मुमताज़ नसीम, संदीप शजर, जैनेन्द्र कर्दम, चिराग़ जैन, ज्ञानप्रकाश आकुल, पवन दीक्षित, अरुणा मुकीम, विभा बिष्ट, शुभि सक्सेना, अनिल गोयल, सुदीप भोला, दीपक सैनी, रेखा व्यास, रामनिवास जाजू, प्रदीप जैन और न जाने कितने सितारे अपने सूर्य के ध्रुवतारा बन जाने का उत्सव मना रहे थे। ….फिर सेल्फी सेशन …..फिर चायपान ….और फिर अपने अपने भीतर नीरज की अनुगूंज सहेजे सब सभागार से विदा हो गए। सुनते हैं रात भर सभागार के वायुमंडल में एक तराना तैरता रहा – ख़ाली-ख़ाली कुर्सियाँ हैं ख़ाली-ख़ाली तम्बू है ख़ाली-ख़ाली घेरा है बिना चिड़िया का बसेरा है…!
✍️ चिराग़ जैन

मेरे गीत उधार रहेंगे

सपनों का विस्तार रहेंगे
आँसू की मनुहार रहेंगे
युग-युग तक सारी दुनिया पर, मेरे गीत उधार रहेंगे

जिन शब्दों से कर्ज़ा लेकर, भावों की झोली भरता था
रोते-रोते जिस पीड़ा के माथे पर रोली धरता था
उस पीड़ा का सार रहेंगे
भाषा का श्रृंगार रहेंगे
शब्दों की नश्वर काया में, प्राणों का संचार रहेंगे
युग-युग तक सारी दुनिया पर, मेरे गीत उधार रहेंगे

बातों में घुल-मिल जाएंगे, चैपालों की रंगत होंगे
एकाकी राहों पर चलते मौन पथिक की संगत होंगे
चिट्ठी का आधार रहेंगे
उत्सव का गलहार रहेंगे
माँ की मीठी लोरी होंगे, बाबा की फटकार रहेंगे
युग-युग तक सारी दुनिया पर, मेरे गीत उधार रहेंगे

घोर उदासी की सेना से जब अभिलाषा का रण होगा
मेरा गान प्रबल सहयोगी आशाओं का उस क्षण होगा
कोशिश पर बलिहार रहेंगे
और थकन पर वार रहेंगे
नफ़रत से तपती धरती पर, प्यार भरी रसधार रहेंगे
युग-युग तक सारी दुनिया पर, मेरे गीत उधार रहेंगे
✍️ चिराग़ जैन

(श्री गोपालदास नीरज जी के निधन पर)

काव्यपाठ के प्रारंभिक प्रमाण

चारों वेद काव्यरूप हैं और इनमें श्रुतियों का संकलन है अतः यह माना जा सकता है कि वेद का प्रत्येक ऋषि वाचिक परम्परा का कवि रहा होगा। तथापि इन श्रुतियों के पाठ का कोई प्रामाणिक संदर्भ ज्ञात नहीं है।
महर्षि वाल्मीकि ने क्रौंचवध की घटना से आहत होकर श्लोक उच्चारा था –

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम्।।

यह श्लोक स्वरचित कविता के पाठ का प्रथम प्रामाणिक उदाहरण है। उत्तर रामायण में अयोध्या की राजसभा में लव-कुश द्वारा रामकथा का पाठ किया गया। इस घटना को भी काव्यपाठ का उदाहरण माना जा सकता है। यहाँ यह तथ्य विशेष ध्यातव्य है कि जब लव-कुश रामकथा सुनाते थे, तब वहाँ जन-सामान्य उपस्थित होता था।
कुरुक्षेत्र के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण द्वारा गीता के अठारह अध्यायों का पाठ किया गया। यह भी काव्यपाठ का ही एक उदाहरण माना जा सकता है।
इस्लाम पूर्व मक्का में उकाज नामक स्थान पर अरब के कवि एकत्रित होते थे। इस सम्मेलन में भाग लेनेवाले कवियों के बीच काव्य-प्रतियोगिता होती थी और विजेता की कविता को स्वर्णपत्र पर अंकित कर जिस दीवार पर लगाया जाता था उसे ही आज हम काबा कहते हैं। इस्लाम पूर्व काव्य ग्रन्थ सेररूल-ओकुल के नाम से आज भी प्रतिष्ठित है।
भक्तिकाल में संत कवियों का परस्पर सम्मिलन अंततः काव्य-गोष्ठी की शक्ल ले लेता था। सूरदास प्रतिदिन एक भजन रचकर आरती के समय उसका पाठ करते थे। कुम्भलदास, रैदास, मीराबाई जैसे कवियों की भेंट के वृत्तांत भक्तिकालीन साहित्य में भरे पड़े हैं। रीतिकाल भी राजाओं के मनोरंजनार्थ कवियों के काव्यपाठ की घटनाओं के प्रमाण प्रस्तुत करता है।
राजपूत राजाओं के महल में विधिवत कवि नियुक्त किये जाते थे, जो राजा के कार्यों का गुणगान तथा युद्धकाल में मनोबल वृद्धि हेतु कविताएँ लिखते थे और सभा में उनका पाठ करते थे। मुग़ल काल में उर्दू के शायरों की महफ़िल बादशाहों के दरबार में जमती थी। मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र ख़ुद एक बेहतरीन शायर थे, जो इस महफिलों में एक शायर की हैसियत से शिरक़त भी करते थे। मीर, ज़ौक़, ग़ालिब जैसे कितने ही नामचीन शायर इन मुशायरों की शान होते थे। उर्दू-मुशायरों का वर्तमान स्वरूप इन्हीं दरबारों से तैयार हो गया था, लेकिन हिंदी कवि सम्मेलनों ने जो शक़्ल आज अखि़्तयार की है उसकी मिट्टी बहुत बाद में गुंथनी शुरू हुई।
गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ के संयोजन में जो पहला कवि सम्मेलन हुआ, उसमें कुल 27 कवियों ने काव्यपाठ किया और उसके आयोजक थे- ‘सर जॉर्ज ग्रियर्सन’। उसके बाद साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में कवि-सम्मेलनों के आयोजन की परंपरा चल निकली। यहाँ तक कवि सम्मेलनों में अर्थ का संयोग नहीं हुआ था।
कविगण ससम्मान आमंत्रित किये जाते थे और बन्द मुट्ठी में जो पत्र-पुष्प आयोजक दे देता था, वह स्वीकार कर लेते थे। मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुभद्राकुमारी चौहान, गिरिजाकुमार माथुर, वियोगी हरि, सोहनलाल द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, रमई काका और हरिवंशराय बच्चन जैसी विभूतियाँ, इसी प्रकार कवि सम्मेलनों में काव्यपाठ करती रहीं।
ऐसा मेरा अनुमान है कि किसी कार्यक्रम में आयोजक के द्वारा प्रदत्त इस मानदेय पर या तो कोई विवाद हुआ होगा अथवा आलोचना हुई होगी, जिसके बाद कवियों को बंद मुट्ठी में मानदेय दिए जाने की परंपरा निमंत्रण के समय सुनिश्चित किये जाने वाले मानदेय में परिवर्तित हो गई होगी। यद्यपि यह राशि भी नाममात्र की ही होती थी। इसी दौरान बच्चन जी ने मधुशाला लिखी। मधुशाला इतनी लोकप्रिय हो गई कि बच्चन जी प्रत्येक कवि सम्मेलन की आवश्यकता बन गए। एक बार बच्चन जी अस्वस्थ हुए तो उन्होंने आयोजक को सूचित किया कि स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से वे कवि-सम्मेलन में उपस्थित नहीं हो सकेंगे। आयोजक ने अपनी प्रतिष्ठा का वास्ता देते हुए बच्चन जी पर कार्यक्रम में उपस्थित होने का दबाव बनाया तो बच्चन जी ने अपनी मनमर्ज़ी के मानदेय पर उपस्थित होना स्वीकार कर लिया।
यहाँ से कवि सम्मेलनों में मानदेय की राशि आयोजकों की मर्ज़ी से कवियों के अधिकार क्षेत्र में आ गई। इसी दौर में दिल्ली में पण्डित गोपाल प्रसाद व्यास जी ने लालकिला कवि सम्मेलन की स्थापना की। यह आयोजन देश भर में कवि-सम्मेलनों की प्रतिष्ठा वृद्धि का कारण बना। वर्ष भर लोग इसकी प्रतीक्षा करने लगे। व्यास जी चुन-चुन कर श्रेष्ठतम कवियों को इस मंच पर बुलाने लगे। इसकी ख्याति में चार चांद तब लगे जब देश के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू इस आयोजन में मुख्य अतिथि बनकर आए। बड़े-बड़े राजनेता, बड़े-बड़े सितारे, उद्योग, समाजसेवा और शिक्षा जगत् की श्रेष्ठ प्रतिभाएँ इस आयोजन की दर्शक दीर्घा में दिखाई देने लगी।
लालकिला कवि सम्मेलन किसी भी कवि की प्रतिष्ठा का नियामक बन गया। शिवमंगल सिंह सुमन, देवराज दिनेश, भवानीप्रसाद मिश्र, रामवतार त्यागी, रमानाथ अवस्थी, माया गोविंद, रामदरश मिश्र, बालस्वरूप राही, गोपाल सिंह नेपाली, बलबीर सिंह रंग, शिशुपाल सिंह निर्धन, कन्हैयालाल नन्दन, इंदिरा गौड़, बाबा नागार्जुन, मुकुट बिहारी सरोज जैसे रचनाकार लालकिले की शोभा के दैदीप्यमान नक्षत्र बन गए। किन्तु इस आयोजन का उत्तरदायित्व भी था, एक साहित्यिक संस्था के ही कंधों पर था। इसी दौरान श्री रामरिख मनहर ने कवि सम्मेलनों को मारवाड़ी सेठों के द्वार तक पहुँचाने के लिए अथक परिश्रम किया।
अब कवि सम्मेलन में अर्थ का मार्ग खुल गया। इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली और वाराणसी की सीमाओं को तोड़कर कवि सम्मेलन राजस्थान, मुम्बई, कोलकाता और मद्रास (अब चेन्नई) तक भौगौलिक विस्तार पा गया। ज्यों ही साहित्यिक संस्थाओं से निकलकर कवि सम्मेलनों ने उन्मुक्त गगन में पंख पसारे ठीक उसी समय गोपालदास नीरज, बालकवि बैरागी और काका हाथरसी सरीखे लोकप्रिय कवि अस्तित्व में आए।
नीरज जी हिंदी कवि सम्मेलनों की जनप्रियता की आधारशिला बन गए। खरद की गुनगुनाहट में जब गीत लोकार्पित होता तो श्रोतादीर्घा सम्मोहित हो उठती। नीरज जी ने गीत को प्रेम के गुलाबी बगीचे से दर्शन के भव्य देवालय तक की यात्रा करवाई। नयन कोर पर अपनी पीड़ा का नीरानुवाद संजोकर लोग स्मित अधरों से नीरज को सुनते थे। उनकी सजीव आँखें और शरारती हँसी उनकी प्रस्तुति में मणिकांचन योग निर्मित करती थी।
नीरज के इस सम्मोहन में कवि सम्मेलनों का कारवां बहुत तेज़ी से लोकप्रियता की मंज़िलें तय करता हुआ बढ़ने लगा। संभवतः नीरज जी पहले ऐसे कवि थे जिन्होंने अपनी लेखनी के साथ-साथ अपनी अदाओं से भी लोगों के दिल पर राज किया। यह उनकी अदाओं का ही करिश्मा था कि यद्यपि उनके अधिकतर लोकप्रिय गीत दर्शन की धुरि पर केंद्रित थे, फिर भी उन्हें प्रेम और सौंदर्य के कवि के रूप में जाना गया।
‘कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है’; ‘अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए’; ‘आदमी को आदमी बनाने के लिए’ और ‘कारवां गुज़र गया’ जैसे गीतों की सरल शब्दावली और गूढ़ अर्थवत्ता ने गीत की धारा मोड़ दी। इस दौर में कविता साहित्यिक अभिरुचि से विहीन जन तक पहुँचने में क़ामयाब हुई।
यद्यपि वीर रस की भाषा अभी भी अपेक्षाकृत क्लिष्ट थी, लेकिन बालकवि बैरागी की कविता राष्ट्र पर मर मिटने के शौर्य के साथ-साथ जीवन की कठिन परिस्थितियों में स्वाभिमान के जीवट की वक़ालत करने लगी तो उसकी भावभूमि और भाषा स्वतः ही अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति से जुड़ती चली गई। शहीदों के प्रति करुणा और श्रद्धा उत्पन्न करती ओज कविता करुण रस, भक्ति रस, रौद्र रस और वीर रस का संगम स्थल बन गई।
लोगों का मन सीमा पर खड़े बेटों के प्रति वात्सल्य से भरने लगा। वीर रस की कविता शिराओं के रक्तप्रवाह को तीव्र करने के साथ-साथ आँखों को भी नम करने लगी। बैरागी जी की लोकप्रियता का आलम यह था कि देश के बड़े कवि सम्मेलनों में बैरागी जी की उपस्थिति न हो तो श्रोता कार्यक्रम शुरू नहीं होने देते थे। इस दौर तक कवि सम्मेलन मंच पर गीत का बोलबाला था। जीवन दर्शन के गीत, प्रेम के गीत और सामरिक माहौल में ओज के गीत।
हास्यरस को हेय दृष्टि से देखा जाता था। मंच पर जब हास्य का कवि काव्यपाठ करता था तो शेष कवि उसे अनदेखा करते थे। यद्यपि रमई काका जैसे कवियों ने जनता के तनाव को ठहाकों में बदलने की परंपरा को बख़ूबी निभाया, लेकिन हास्यरस को वह सम्मान नहीं मिल सका जिसका वह हक़दार था। जनता हास्य पसंद तो करती थी, किन्तु मंच पर बैठे अन्य कवियों की भंगिमा को देखकर यह हास्यप्रेम जता नहीं पाती थी।
ऐसे समय में मंच पर काका हाथरसी का प्रवेश हुआ। उनकी प्रस्तुति से मंचासीन कवियों की त्यौरियाँ पिघलने लगीं और दर्शक दीर्घा की स्मित ने ठहाके का रूप ले लिया। यहाँ से कवि सम्मेलनों का रंग-रूप बदल गया। काका की लोकप्रियता का सूरज गाँव-खेड़ों से लेकर सात समुंदर पार तक दमकने लगा। व्यंग्य के कवियों ने अपनी रचनाओं में हास्य का अनुपात बढ़ा दिया। अब व्यंग्य, व्यंग्य न रहकर ‘हास्य-व्यंग्य’ बन गया। कवि-सम्मेलन भी कवि-सम्मेलन से ‘हास्य कवि-सम्मेलन’ बन गए।
कवि सम्मेलनों के बैनर पर ‘हास्य’ शब्द लगाना आवश्यक हो गया। मंच पर हास्य कवियों का अनुपात बढ़ने लगा। काका की कुंडलियों ने समाचार पत्रों में स्थान बना लिया। पण्डित गोपाल प्रसाद व्यास और रामरिख मनहर जैसे मंच-संचालकों के संचालन में चुटीली टिप्पणियों, सहज जुमलों, व्यंग्योक्तियों और चुटकुलों ने जगह बनानी शुरू की।
नीरज, बैरागी और काका ने हिंदी कवि सम्मेलनों का चेहरा आमूल-चूल बदल दिया। बदलती तकनीक के साथ बनती बिगड़ती परंपराओं की कहानी अगली कड़ी में…
✍️ चिराग़ जैन

कवि सम्मेलनों का सफ़र

कवि सम्मेलनों का सफ़र सौ साल पूर्ण करने के पड़ाव पर है। अक्टूबर 1920 में श्री अयोध्या सिंह उपाध्याय जी की अध्यक्षता और श्री गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ जी के संयोजन में हिंदी के प्रकाण्ड विद्वान श्री जॉर्ज ग्रियर्सन जी के निवास पर कुल 27 कवियों का कवि सम्मेलन हुआ जिसे कवि सम्मेलन का पहला क़दम माना जा सकता है। तब से अब तक यह परंपरा अनवरत चल रही है। स्वाधीनता संग्राम, चीन युद्ध, पाक युद्ध, आपातकाल, कारगिल युद्ध और तमाम ऐतिहासिक घटनाओं में कवि सम्मेलनों ने जन भावना को बौद्धिक ख़ुराक़ उपलब्ध कराई है। कवि सम्मेलनों की इस क्षमता के कारण ही पत्रकारिता के विद्वानों ने इस माध्यम को “लोक परंपरागत जनसंचार माध्यम” के रूप में स्वीकार किया है। देश भर में मनोरंजन तथा बैद्धिक विमर्श को समानांतर रूप से साधने वाली यह कला परिवर्तित होती सामाजिक परिस्थितियों तथा जनता की मानसिक परिस्थितियों के अनुरूप सम्प्रेषण की भाषा व विधा का निर्धारण करती रही है। यही लचीलापन इस कला की सम्प्रेषणीयता को अक्षुण्ण बनाए हुए है। इस प्रभावी सम्प्रेषण माध्यम के अनेक महत्वपूर्ण स्तम्भ 9-10 जुलाई को हरिद्वार में एकत्रित हुए तथा उन्होंने कला के इस भवन के वैभव व गरिमा की वृद्धि की दिशा में विचार विनिमय किया। कवि सम्मेलन समिति के इस अधिवेशन में अपनी क्षमताओं की सीमा के साथ मैंने भी गिलहरी जैसा योगदान दिया, इस हेतु मन संतुष्टि के भाव से आनंदित है।

✍️ चिराग़ जैन

बैरागी जी को शब्दाजंलि

शब्दों को ईंधन करने का
जीवट ठण्डा होता है क्या
ज्वाला में दहकर भी कंचन
अपनी आभा खोता है क्या
यम के आदेशों से डरकर
कब कीर्तियान रुक पाते हैं
कुछ श्वासों के थम जाने से
क्या झंझावत चुक जाते हैं
मिट्टी को भस्म बना देना
-बस यही चिता कर पाती है
अक्षुण्ण वज्र रह जाता है
और स्वयं चिता मर जाती है
काया ने आँखें मूंदी हैं
चिंतन के नेत्र प्रखर ही हैं
जिव्हा ने चुप्पी ओढ़ी है
भावों के शब्द मुखर ही हैं
दीपक की पीर समझने को
बलिदान कई रातें करके
जो थका नहीं इक क्षण को भी
नक्षत्रों से बातें करके
जिसने जर्जर पीड़ाओं को
समिधा का मान दिलाया हो
जिसने जग की तृष्णाओं को
अंजलि से अमिय पिलाया हो
जिसने कविता में जीवन भर
अनहद का अंतर्नाद रचा
जिसने ज्वाला की लपटों का
कविताओं में अनुवाद रचा
जिसने आँसू की आह सुनी
जिसने करुणा का रोर सुना
जिसने युग की पीड़ा गाई
जिसने आशा का शोर सुना
यमदूत उसे ले जाने का
उपक्रम कैसे कर सकता है
जिसने शब्दों में प्राण भरे
वह स्वयं कहाँ मर सकता है
करुणा में जब पग जाते हैं
फिर अक्षर ध्वस्त नहीं होते
सूरज-वूरज होते होंगे
बैरागी अस्त नहीं होते

✍️ चिराग़ जैन

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