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रामधारी सिंह दिनकर

भारत के ओज स्वरावतार
जनता के मन की दृढ़ पुकार
कविता के तेजस्वी सपूत
वाणी में शौर्य सुधा अकूत
ज्वाला से जब भर गए नेत्र
शब्दों में उतरा कुरुक्षेत्र
गाया करुणा की भृकुटि तान
वह रश्मिरथी का महागान
गीतों में सामधेनी धधकी
जनहित की ज्यों दामिनी दमकी
श्रृंगार रचा उर्वशी सजी
कविता के घर पाजेब बजी
ऐसा शब्दों का प्यार सधा
श्रृंगार सधा, अंगार सधा
शोध अरु इतिहास मिलाय रचे
संस्कृति के चार अध्याय रचे
शासन से आँख मिलाय जिया
नभपिण्डो से बतियाय जिया
है कौन निविड़ जो हरा नहीं
दिनकर जीवत है मरा नहीं
जब भी सत्ता बौराती है
जनता दिनकर को गाती है
जब भी अंधियारा गहरेगा
दिनकर प्राची में प्रहरेगा
रश्मियाँ नहीं लेतीं विराम
दिनकर को शत्-शत् है प्रणाम

✍️ चिराग़ जैन

कला का मुँह काला कर दिया जाए

“कला का मुँह काला कर दिया जाए” -ये हुक्म अपने आप को दिया है कलयुग के कुकर्मियों ने। कोलाहल पर किलोल की विजय न हो जाए। अपनी महत्वाकांक्षाओं को मनोरंजन के सत्य भाषण से बचाने के लिए सियासत रोज़ नए पैंतरे खेल रही है। कोई मुज़फ्फरनगर के दंगों पर बोलने लगे तो उलेमाओं का फ़तवा उछाल दो, कोई पंजाब के सुट्टे पर बोले तो उसे सेंसर की देहरी पर रगड़ दो। कोई दिल्ली की समस्याओं पर कलम चलाए तो उसे मोदी का चापलूस कहकर अपमानित करो। कोई केंद्र सरकार की किसी नीति पर ऊँगली उठाए तो उसे “कांग्रेसी कुत्ता” कहो। कोई कांग्रेस की हरकतों पर लिखने की कोशिश करे तो उसे संघी कहकर प्रताड़ित करो। कोई फकीरों की मज़ार पर क़व्वाली गाने लगे तो उसे गोली मार दो।
ऑल इण्डिया बकचोद, बिग बॉस, ग्रैंड मस्ती और सनी लियोने जैसे प्रतिमानों की खिड़की से कला का आकलन करो ताकि कलाकार ख़ुद ब ख़ुद शर्मसार होकर ख़ुदकुशी कर ले। कला फिल्मों को आर्थिक विपन्नता से घोंट दो और फिर व्यावसायिक फिल्मों के उदाहरण प्रस्तुत कर फिल्मों की अनुपयोगिता का ढोल पीटो।
कोई हँसने-हँसाने की कोशिश में व्यंग्य के चौबारे में टहलने लगे तो उस पर मानहानि का मुक़द्दमा दर्ज कर दो। कोई न्यूज़ चैनलों से उत्तरदायित्वहीनता का कारण पूछ ले तो उसे चैनल पर दिखाना बंद कर दो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जुमला झूठे सर्वेक्षण और अश्लील विज्ञापनों के पक्ष में मुखर होना चाहिए। कला, कलाकार और सत्य… -इन सबको तो फांसी चढ़ा देना चाहिए।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Comedian got arrested for his sarcasm

विभक्त

सृजन की जाह्नवी
विभक्त होकर भी
गंगा ही रहेगी।

तुम देखना
उन्मुक्त बहती संवेदना से
विभक्त होती धार
मोक्षदायिनी होकर पुजेगी
…हर की पौड़ी पर।

कविता से विभक्त काव्यांश
सूक्ति हो जाते हैं
और श्लोक से विभक्त वर्ण
मंत्र बन जाते हैं।

एक सृजन ही तो है
जहां विभक्तियां
धातुओं को अर्थ की
पहचान देती हैं।

✍️ चिराग़ जैन

लालकिला कवि-सम्मेलन

प्यारे देशवासियो!
आपको यह सूचित करते हुए ख़ुशी हो रही है कि हम पंजाबी, हम सिंधी, हम ये, हम वो सब कुछ हैं लेकिन सुरक्षा कारणों से हम हिंदी नहीं हो पा रहे हैं। यह बताते हुए मैं फूला नहीं समा रहा हूँ कि हिंदी कवि-सम्मेलन जगत् का शीर्ष कहा जाने वाला लालकिला कवि-सम्मेलन इस बार सुरक्षा कारणों से “स्थगित” कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली सरकार केअधीनस्थ सभी भाषा अकादमियां कवि-सम्मेलन का आयोजन करती हैं। इस श्रृंखला में हिंदी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी और संस्कृत भाषा के कवि-सम्मेलन होते रहे हैं। इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय कवि-सम्मेलन था “हिंदी भाषा” का गणतंत्र दिवस कवि-सम्मेलन।
उक्त कार्यक्रम हर साल लालकिले के भीतर फुटबॉल मैदान में होता था। बीच में कुछ वर्ष यह आयोजन सुरक्षा कारणों से तालकटोरा स्टेडियम में भी हुआ। लेकिन इसके रद्द अथवा स्थगित होने की कोई घटना याद नहीं आती।
वैसे इस कार्यक्रम का रद्द होना देशहित में ही है। इसकी लोकप्रियता और गरिमा को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक अनेक प्रधानमंत्रियों ने इसमें उपस्थित रहकर अपना समय नष्ट किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और राज्यपालों को तो इसका आकर्षण कभी छोड़ ही न सका। ऐसे में इसके न होने से कितने सारे महत्वपूर्ण लोगों का कितना सारा कीमती समय बचा; यह गणतंत्र के लिए शुभ है।
अकादमी की ओर से आधिकारिक सूचना यह है कि स्थान उपलब्ध न होने के कारण कवि-सम्मेलन स्थगित किया जा रहा है। यह अच्छी बात है। गणतंत्र के अवसर पर लालकिले को सुरक्षा एजेंसियों ने किसी गुप्त स्थान पर छुपा दिया है ताकि आतंक की काली नज़र लालकिले की आभा को धूमिल न करदे। यदि लालकिले को कुछ हो जाता तो गणतंत्र परेड की झाँकियाँ कहाँ जाकर अपने पैर दबवातीं।
मेरे एक मित्र हैं जिनको अब मैं शत्रु मानने लगा हूँ। उन्होंने मुझसे इतना घटिया सवाल पूछा कि जब स्थान बदल कर बाकी भाषाओं का कवि-सम्मेलन हो सकता है तो हिंदी का क्यों नहीं। अब बोलो, कौन समझाए इनको! अरे यार, हिंदी की सुरक्षा ज़्यादा ज़रूरी है। हिंदी घुट-घुट कर मर जाए, तो हम स्वीकार कर सकते हैं लेकिन हिंदी आतंकियों की गोली से मरे इसे हमारी सरकार किसी सूरत बर्दाश्त नहीं कर सकती। वैसे भी, जिस प्रकार अन्य खेलों के उत्थान के लिए क्रिकेट पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है; जिस प्रकार पिछड़ों के विकास के लिए अगड़ों का शोषण ज़रूरी है उसी प्रकार अन्य भाषाओं के कवि-सम्मेलन की सफलता के लिए हिंदी के कवि-सम्मेलन को ठण्डे बस्ते में डालना अनिवार्य है।
अब ये मत पूछना कि विश्व पुस्तक मेला हज़ारों कीअव्यवस्थित भीड़ के साथ प्रगति मैदान में सुरक्षित रह सकता है तो कवि-सम्मेलन एक व्यवस्थित श्रोता समूह के साथ बंद इमारत में असुरक्षित क्यों है? ये भी मत पूछना कि छत्रसाल स्टेडियम में ऑड-इवन की क़ामयाबी का जश्न मनाने के लिए स्थान उपलब्ध हो सकता है तो कवि-सम्मेलन के लिए इतने बड़े शहर में स्थान का अभाव क्यों है?
इस प्रकार के प्रश्न बेमानी हैं। सरकार ने जनता की सुरक्षा के लिए ख़ुद को संकट में डाला। छत्रसाल स्टेडियम में मुख्यमंत्री जी ने सारे संकटों के सम्मुख अपनी छाती अड़ा दी और जनता के मुँह को काला होने से बचा लिया। इसको कहते हैं नेतृत्व। ऐसे लोगों की भावनाओं पर प्रश्न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को संदेह के घेरे में खड़ा कर देगा।
इसलिये एक टुच्चे से कवि-सम्मेलन के न होने का शोक न मनाओ रे बंधु बल्कि अपने भाग्य को सराहो कि हमारा देश किन महान विभूतियों के हाथ में है।

और हाँ
वो एन्ड में क्या बोलते हैं
जय हिन्द!

✍️ चिराग़ जैन

इच्छा

मुझे हुनर की बड़ी नेमतें अता करना
मेरे ख़ुदा तू मुझे शोहरतें अता करना
मैं रोज़ रात इक हुजूम से मुख़ातिब हूँ
ख़ुद से मिल पाऊं इतनी मोहलतें अता करना

✍️ चिराग़ जैन

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