Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हिंदी की साहित्यिक गोष्ठियों में यह प्रश्न अक्सर चर्चा का विषय बनता है कि कवि-सम्मेलनों का स्तर गिर रहा है। मंच पर फूहड़ता बढ़ रही है। चुटकुलेबाज़ ख़ुद को कवि कहने लगे हैं। लफ़्फ़ाज़ी और बकवास करके श्रोताओं का समय नष्ट किया जाता है। वही पुरानी कविताएँ सुनाकर मोटे लिफाफे लेने का चलन बढ़ गया है। कविता के धंधेबाज़ों ने मंच को बर्बाद कर दिया है, इत्यादि।
वैष्णोदेवी में कभी एक पहाड़ी जंगल को लांघ कर तीन पिंडियों के दर्शन किये जाते थे। उस समय निष्ठावान पुजारी तमाम कष्ट सहकर पिंडियों की सेवा करने जाता था। फिर वहाँ दुर्गम मार्ग की जगह एक सड़क बन गई। उस सड़क पर चलकर खोमचे तीर्थ तक पहुंच गए। फिर लोग घूमने-फिरने के लिए वैष्णोदेवी जाने लगे। फिर लोग पिकनिक मनाने वैष्णोदेवी जाने लगे। फिर लोग हनीमून मनाने वैष्णोदेवी जाने लगे। लेकिन इस स्थिति में भी आस्थावान पुजारी ने कभी पिंडियों को गाली नहीं दी।
उस पुजारी की पीढियां चुक गई किन्तु पिंडियों की आराधना एक दिन भी नहीं रुकी। हिंदी काव्य मंचों पर बढ़ रही विकृतियों के नाम पर कुल कवि सम्मेलनों को फूहड़ कह देना ऐसा ही है ज्यों तीर्थक्षेत्र पर खोमचे की गंदगी देखकर ईश्वर की मूर्ति के प्रति निष्ठा समाप्त हो जाए।
हिंदी की लोकप्रियता में इज़ाफ़ा करने वाले कवि सम्मेलनों को उन आस्थावान पुजारियों की ज़रूरत है जो किसी भी स्थिति में अपने ईश्वर के प्रति अपना समर्पण कम न होने दें। तीर्थयात्रियों की हरक़तों से रुष्ट होकर मंदिर की इमारत पर कालिख़ पोतना कहाँ तक नैतिक है? जब मंदिर की ओर जाने वाले रास्ते पर पहला खोमचा जमा था उस समय पुजारी किस उपक्रम में व्यस्त थे? जब पवित्र तीर्थ की जड़ में हनीमून पैकेज वाला होटल खुला था तब पुजारी किस खोह में घुसकर तपस्या कर रहे थे?
खुसर-पुसर को “परिचर्चा” कहने वाले बुद्धिजीवियों को मंच की उठा-पटक से ऐतराज़ है लेकिन सम्मानों और पुरस्कारों पर होने वाले जुगाड़ उनकी दृष्टि में अपराध नहीं है। यदि किसी योग्य मेधावी ने परिवेश से परेशान होकर स्थान छोड़ा है तो ऐसा करके उसने किसी अयोग्य के लिए अवसर निर्माण करने का अपराध किया है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
सच समझते आदमी की बेक़ली से पूछ लो
नेकियाँ ख़ामोश क्योंकर हैं, बदी से पूछ लो
मैं कहाँ कह पाऊँगा अपनी हकीक़त मंच से
यूँ करो तुम जा के मेरी डायरी से पूछ लो
एक गिरते आदमी पर हँस पड़ी तो क्या हुआ
पुत्र के शव पर बिलखती द्रौपदी से पूछ लो
दूसरों की बेहतरी का मोल क्या होगा जनाब
फैक्टरी के पास से गुज़री नदी से पूछ लो
इल्म का कोरा दिखावा हो चुका हो तो हुज़ूर
मसअले का हल चलो अब सादगी से पूछ लो
ज़िन्दगी जीने का सबसे ख़ूबसूरत क्या है ढंग
जिस सदी में हम हुए हैं, उस सदी से पूछ लो
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
मंच पर दो शब्द कहने की विवशता
भौंथरा करती रही है
सैंकड़ों शब्दों की पैनी धार को,
मार डाला है
बनावट से सुसज्जित ग्रीटिंगों ने
मौन अधरों पर थिरकते प्यार को।
बात दिल से झूमकर निकले
तो फिर
बस ‘भाइयो-बहनो’ का सम्बोधन
भरी महफ़िल को दीवाना बना दे,
धमनियों से बह के आए शब्द हों तो
एक ही विन्यास
बर्बर डाकुओं की क्रूरता को
आदमीयत का
(सभी को मान्य)
पैमाना बना दे।
किन्तु अब इस दौर में
भाषाओं के व्यापारियों से
मंच के भाषण लिखाए जा रहे हैं।
स्वार्थ की डाली पे बैठे
काग को कोयल बताकर
अब सियारी गीत गाए जा रहे हैं।
चापलूसी
ज्ञान का मांगा हुआ लहंगा पहनकर
मंच पर मुजरा करे तो
अब उसे मुजरा नहीं कहते।
शब्द के लच्छे बनाकर
वक़्त के महंगे लम्हे
बर्बाद करने की कला
श्रोताओं को पूर्णार्थ की ख़्वाहिश से
कोसों दूर रखती है।
प्रेम, मानवता, दया, करुणा
हमारी संस्कृति
माँ-बाप, हिन्दुस्तान
जनता, लोकसत्ता
न्याय और संघर्ष
अपनी सभ्यता
संवेदना, अध्यात्म
और ऐसे ही ढेरों शब्द
अपने अर्थ का बल क्षीण करके
अधमरे से हो गए हैं।
अब इन्हें सुनकर किसी के
रोंगटे उठते नहीं हैं।
हमने अपने मानसिक रनिवास में बैठी
प्रशंसा की सुरक्षा के लिए
जिन शब्दों का पहरा बिठाया है
उन्हें ख़ुद ही नपुंसक कर दिया है,
शांति के सब वाक्य
इतने खोखले शब्दों के मिलने से बने हैं
समझ लो
हमने अपने हाथ से
माहौल हिंसक कर दिया है।
शब्द ऐसे जी के बोले जाएँ
मदिरा बोल देने मात्र से
पूरी सभा मदहोश हो जाए।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
वाणी, विद्या, वीणा, विमर्श
लालित्य, लास्य, लय, लोमहर्ष
व्याकरण, वर्ण, वैभव, विचार
अभिव्यक्ति, अल्पना, अलंकार
भाषा, भूषण, भाषण, भविष्य
दर्शन, दीपक, दादरा, दृश्य
नवरस, नाटक, नूपुर, निनाद
सरगम, संस्कृति, साधना, साध
तूलिका, ताल, ताण्डव, तुरंग
मुद्रा, मृदुता, मंचन, मृदंग
कल्पना, कण्ठ, कविता, कहास
रूपक, रचना, रस, रंग, रास
गायन, गीता, गंधर्व, गीत
पूजा, पुराण, पद, प्रेम-प्रीत
संगीत, सृजन, सुर, स्वर, सुगंध
वंशी, वनिता, विद्वत, वसंत
इन सब शब्दों का एक सार
माँ हंसवाहिनी का सिंगार
हो शोक, हर्ष, आनंद, खेद
है नहीं सृजनपथ रंच भेद
स्तंभित अतीत है मूर्तिमान
चित्रों में आगत की उड़ान
अनुभव पर है इतिहास शेष
कल्पना खोजती भविष देश
करती कविता युग का बखान
तब दर्पण देखे वर्तमान
हर काल-देश की व्यक्त शक्ति
हर सृजन साधना आप भक्ति
वाणी को कर दो दिव्य धाम
स्वाकार करो मेरा प्रणाम
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
हम हैं हिंदी कविता की बुनियाद में गड़ने वाले लोग
कहीं बहुत जमने वाले और कहीं उखड़ने वाले लोग
कवि-सम्मेलन पर मजमेबाज़ी का तमगा मत टाँको
मंचों पर भी मिल जाते हैं, लिखने-पढ़ने वाले लोग
✍️ चिराग़ जैन