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ओछी हथेली

कंकडी को यदि तिजोरी में रखोगे
वो कनक का मूल्य जाँचेंगी यक़ीनन
क़ामयाबी से जुडी ओछी हथेली
सभ्यता का मुँह तमाचेंगी यक़ीनन

एक नग़्मा लिख लिया जिसने वही अब
वेद के वैभव पर अपना रौब झाड़े
डीप फ्रीज़र में पड़ा टुकड़ा ज़रा सा
हिमशिखर की श्वेत चादर को लताड़े
वेदियों में नगरवधुएँ मत बिठाओ
महफ़िलों में रोज़ नाचेंगी यक़ीनन

कृष्ण की रणनीति से अर्जुन लड़ेगा
कीर्ति फिर भी कर्ण के मस्तक चढ़ेगी
चक्रव्यूहों में जयी हो या नहीं हो
रीति तो अभिमन्यु का ही यश गढ़ेगी
आज तुम छल से समर को जीत जाओ
कल कथाएँ सत्य बाँचेंगी यक़ीनन

✍️ चिराग़ जैन

फिर आया सूरज

दिन भर आग बबूला होकर
दम्भ दहक का बोझा ढोकर
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
नदिया की कलकल धारा से शीतलता पाने

मरना देखा, जीना देखा
सबका दामन झीना देखा
दौलत के सिर छाया देखी
श्रम के माथ पसीना देखा
रूप गया क़िस्मत के द्वारे, दो रोटी खाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

भोर भये मैं सबको भाया
सांझ ढले जग ने बिसराया
दोपहरी में कोई मुझको
आँख उठा कर देख न पाया
जिसने इस जग को गरियाया, जग उसको जाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

चंदा डूबा दूर हुआ था
मैं अम्बर का नूर हुआ था
शाम हुई फिर चाँद उगा तो
मान तड़क कर चूर हुआ था
ढलते की सुधि छोड़ चले सब, उगते को माने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

✍️ चिराग़ जैन

शोर शराबा क्यों है

रे सागर! सच-सच बतला दे
इतना शोर शराबा क्यों है
भीतर तो चुप-चुप रहता है
तट पर मार दिखावा क्यों है

मीठी नदिया के पानी को, तू है इतना प्यारा सागर
वो तो तुझमें डूब गई पर, तू ख़ारा का ख़ारा सागर
इन लहरों में इक नदिया की कलकल का परछावा क्यों है

दिन भर सूरज की गर्मी का चुप-चुप तूने भार उठाया
चंदा शीतल था तो तूने कितना भीषण ज्वार उठाया
उद्दण्डों से भय कैसा है, भद्रजनों पर धावा क्यों है

तू जग में सर्वाधिक विस्तृत, तू जग में सर्वाधिक गहरा
तू ही दुनिया भर के मोती-मूंगों का भी स्वामी ठहरा
इतना सब वैभव पाकर भी, सबसे अधिक अभागा क्यों है

✍️ चिराग़ जैन

कुछ ग़लत भी नहीं

कुछ सही भी नहीं, कुछ ग़लत भी नहीं
प्रेम फंसता नहीं ज्ञान-अज्ञान में
प्राण तो सृष्टि भर से अधर हो गए
देह उलझी रही मान-अपमान में

प्रेम ने जब हृदय को सहज कर दिया
कोई सीमा बची ही नहीं लाज की
श्याम के बालपन पर सलोनी लगी
नग्नता और निर्लज्जता आज की
लाज दो हालतों में सताती नहीं
एक अपनत्व में एक अज्ञान में

जब कभी भी समर्पण की नौका चढ़ा
प्यार बैकुंठ की देहरी पा गया
फँस गया जब कभी स्वार्थ के जाल में
बस तभी वासना का धुआं छा गया
कुछ समस्याओं में ही फँसे रह गए
कुछ मगन हो रहे हैं समाधान में

✍️ चिराग़ जैन

अतिवादी

गुरमेहर कौर वाले मुद्दे पर जिस तरह की चर्चाएँ उठी हैं उससे यह तो स्पष्ट है कि इस देश में अतिवादी लोग पूरी तरह सक्रिय हैं। युद्ध के विरुद्ध एक तख़्ती उठा लेने पर लड़की का जीना हराम कर डाला है हमने। “बॉर्डर” फिल्म के अंत में जब युद्ध की विभीषिका के विरुद्ध पाकिस्तान को “मेरे भाई” और “मेरे दोस्त” जैसे संबोधनों से नवाज़ा गया था तब माहौल इतना ख़राब नहीं था।
हद्द हो गई है। किसी ने चूल्हा जलाने के लिए माचिस उठाई तो उसे आगज़नी का अपराधी सिद्ध करने पर तुल गए। किसी ने सब्जी बिनारने के लिए चाकू उठाया तो उसे हत्या की साज़िश के आरोप में पथराना शुरू कर दिया। इतने भयभीत क्यों हो गए हैं कि पाकिस्तान का नाम आते ही हम चर्चा छोड़ कर नाम लेने वाले को लतियाने लगते हैं।
और अगर यह मान भी लिया जाए कि गुरमेहर ने अपराध किया ही है तो क्या बीस साल की बिटिया को समझाने का इस मुल्क में यही उपाय बचा था कि उसे बलात्कार की धमकी दे दी जाए। किसी ने फिल्म में कुछ दिखाया तो जनता उसे पीटने पहुँच गई। किसी ने तख़्ती पर कुछ लिखा तो जनता ने उसके बलात्कार की तैयारी कर ली।
क्या है ये सब। घृणा नहीं होती इस कल्पना से कि एक बीस साल की लड़की को किसी भूल अथवा अपराध की सज़ा देने के लिए चार देशभक्तों के उसका बलात्कार किया। चुल्लू भर पानी नहीं है किसी के पास इस देश की व्यवस्थाओं में पनप रही नपुंसकता के लिए? क्या हम एक अराजक समाज की निर्मिति नहीं कर रहे हैं।
अभी किसी ने गुरमेहर का एक वीडियो व्हाट्स एप्प पर भेजा है जिसमें वह लड़की कार में एक गाने पर उल्लास में नाच रही है। वीडियो के साथ यह लिखा गया है कि जिसके पिता शहीद हुए हों उसे इतना खुश होने का समय कैसे मिल गया? …कितने अमानवीय हो गए हैं हम। कल को किसी शहीद की बेटी या बीवी किसी ठेले पर गोलगप्पे खाती दिख गई तो हम उसे चरित्रहीन मान लेंगे। किसी शहीद का बेटा दोस्तों के साथ स्कूल पिकनिक पर चला गया तो हम उसे आवारा सिद्ध कर देंगे। इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं हम? क्या शहीदों के परिवारों को हँसते-खेलते देखना हमारे लिए असह्य हो गया।
सोशल मीडिया के इस दौर में बेसिर-पैर के सन्देश भरे हुए हैं। चुटकुले, अश्लीलता, बेमतलब ज्ञान और वैद्यजी के नुस्खे भेड़चाल में अग्रेषित किये जा रहे हैं। लेकिन किसी बच्ची के चरित्र, किसी परिवार की खुशियों, किसी इंसान की ज़िंदगी और किसी दिल की धड़कनों पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली पोस्ट अग्रेषित करने से पूर्व इतना ज़रूर विचार लेना चाहिए कि आग की लपटें जब भड़क जाती हैं तो वे उन्हें भड़काने वाले की झोंपड़ी को बचकर नहीं निकलतीं।

✍️ चिराग़ जैन

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