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आग की ख़बर

अगर इस आग को बढ़ने से रोकना चाहे
तो अपने मुल्क़ को इस आग की ख़बर से बचा

मीडिया की ख़बरों की भूख किस हद तक इस देश की रीढ़ में दीमक की भूमिका अदा कर रही है; इसका अगला उदाहरण है कन्हैया कुमार। कोई भी शख़्स अराजकता के उदाहरण प्रस्तुत करके सुर्ख़ियाँ बटोरे, राष्ट्रीय अस्मिता की लाश पर पाँव रखकर लाइम लाइट में आए और मीडिया द्वारा बने जन समर्थन के आधार पर “बेचारा” अथवा “पीडित” बनकर जेल से बाहर आकर देशभक्ति की जुमलेबाज़ी करे और हीरो बन जाए। और सफ़र सिर्फ़ यहीं ख़त्म नहीं होगा। अचानक से मिली पब्लिसिटी से फूल कर जब यह सद्यजात देशभक्त मीडिया को गाली बके तो यही मीडिया पाला बदल कर उसके पीछे पड़ जाए।
ऐसा क्या हो गया इस देश में कि अख़बार के बैनर से लेकर प्राइम टाइम तक सिवाय कन्हैया कुमार कुछ बचा ही नहीं। और कन्हैया भी वो जो अपने भाषण के दौरान जब मीडिया का धन्यवाद ज्ञापन करता है तो उसमें प्राइमटाइम पर छा जाने की गर्वोक्ति व्यंग्य की शक्ल लेकर उभरती है, जिसे सुनकर वहाँ बैठे अन्य देशभक्त ठहाका लगाते हैं। पूरे देश की मीडिया एक विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष की पीसी कवर करने के लिये ओबी लेकर रिरियाने लगेगी तो कौन स्थितप्रज्ञ रह सकेगा।
“वो बहुत अच्छा बोलताहै”; “वो सबको धो देता है”; वो नया लीडर है” आदि आदि… इन जुमलों को वे समाचार प्रस्तोता और पत्रकार मंत्र की तरह जप रहे हैं, जिन्हें हमने इस देश में सूचनाएँ पहुँचाने का दायित्व सौंपा है।
वो कैसा बोलता है, इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिये कि वो क्या बोलता है। एक तरफ़ वह कहता है कि उसे असमानता से आज़ादी चाहिये। दूसरी तरफ़ वह कहता है कि उसे संघवाद से एलर्जी है। एक तरफ़ उसे बोलने की आज़ादी चाहिये दूसरी तरफ़ वह दक्षिणपंथियों को ख़ामोश कर देना चाहता है। एक तरफ़ वह जातिवाद और लिंगभेद से मुक्ति चाहता है, दूसरी तरफ़ वह जातीय आधार पर सुनिश्चित दलितों को प्राथमिकता देना चाहता है।
क्यों भई, समानता की कौन सी सार्वभौमिक परिभाषा में किसी को भी विशेष मानने की वक़ालत मिलती है। कहाँ लिखा है कि दक्षिणपंथी विचारधारा का कोई भी शख़्स किसी भी स्थिति में कोई सही बात बोल ही नहीं सकता।
एक तरफ़ तुम स्वयं को इस देश के हितों का वक़ील घोषित करते हो दूसरी तरफ़ आप आँखो पर पट्टी बांध कर कहते हो कि उमर और अनिर्वाण पर देश द्रोह का मुक़द्दमा इसलिये नहीं चलाया जाना चाहिये क्योंकि जेएनयू का कोई भी विद्यार्थी देशद्रोह होही नहीं सकता। एक तरफ़ आपको इस देश के क़ानून में विश्वास है, दूसरी तरफ़ आप न्यायालय को लगभग चेतावनी देते हुए कहते हैं कि देशद्रोह क़ानून का ग़लत इस्तेमाल नहीं होना चाहिये। अगर तुम्हें इस देश के क़ानून में विश्वास है तो गिरफ़्तारी के बाद तुम्हारी परछाई पकड़ कर लोकप्रियता का बैकुण्ठ तलाशते कुर्ताधारकों को सड़कों पर उतरने की क्या ज़रूरत थी।
तुम इस देश कीराजनीति से निराश नहीं हो कन्हैया। तुम भाजपा, संघ, एवीबीपी और पूरी दक्षिणपंथी विचारधारा के ख़िलाफ़ हो। तुम तथ्य उद्घटित करो, उसमें कोई किसी भी विचारधारा का व्यक्ति अपराधी सिद्ध होकर शीशे में उतरता हो तो स्वीकार है, लेकिन किसी को सिर्फ़ इसलिये अपराधी कहकर उसका मख़ौल नहीं उड़ाने दिया जा सकता कि वह राष्ट्रवादी है।
ये तुम्हारी सोच होगी मिस्टर कन्हैया कुमार, कि जेएनयू का कोई विद्यार्थी देशद्रोही हो ही नहीं सकता। हम इस देश की मूल आत्मा के पक्षधर हैं। हम उन उदाहरणों का अनुकरण करते हैं कि सगा भाई भी अपराधी हो तो उसका विरोध करना हमारा धर्म है।
तुम कहते हो कि स्मृति ईरानी जेएनयू को फ़ैलोशिप देती रहतीं तो उनके ख़िलाफ़ मुर्दाबाद के नारे नहीं लगते। इस बात को खुली धमकी न माना जाए तो और क्या कहा जाएगा। मतलब जो तुम्हें पैसे देगा, वो ज़िंदाबाद और जो नहीं देगा वो मुर्दाबाद। शर्म करो मिस्टर कन्हैया कुमार्। चंद पैसों के लिये किसी की ख़िलाफ़त करने वाले लोग इस मुल्क़ के ख़िलाफ़ कितनी आसानी से खड़े हो सकते हैं; इसकी पोल तुम ख़ुद खोल रहे हो। ख़ैरातों को अधिकार मानने की आदत डाल तो ली है तुमने, इस आदत से बच कर रहना। इन आदतों की नींव पर खड़े किलों की दीवारों का खोखलापन अक्सर ख़ुद ही चीख़-चीख़ कर बता देता है कि हमारे सहारे मत खड़े होना, हम बहुत जल्दी ढह जाएंगे।

✍️ चिराग़ जैन

भावों का अवसान

सच जब किरच-किरच कर बिखरा
भावों का अवसान हो गया
उसको शब्दों तक लाने में
कवि भी लहूलुहान हो गया

सच के टुकड़े हाथ उठाए
जिसने उन्हें निकट से देखा
उसकी हुई हथेली घायल
भंग हुई जीवन की रेखा
अक्षर साथ छोड़कर भागे
वाणीकुल वीरान हो गया

सब सिद्धांत तड़ककर टूटे
झूठे पर्दों ने सुख लूटे
बड़े हुए तो हमने पाए
बचपन के सब किस्से झूठे
मछली जल की रानी है; ये
घड़ियालों को ज्ञान हो गया

मटके में जो कंकड़ डाले
उनने सारा पानी सोखा
प्यासा कौआ श्रम कर करके
अब भी खा जाता है धोखा
कछुओं के तप से भी ऊँचा
खरगोशों का स्थान हो गया

✍️ चिराग़ जैन

लड़ाई की संभावनाएं

सुर-असुर; शैव-वैष्णव; कौरव-पाण्डव; आर्य-द्रविड़, बौद्ध-वैष्णव, जैन-बौद्ध, हिन्दू-मुस्लिम, भारतीय-अंग्रेज, ऊँच-नीच और अमीर-ग़रीब का परस्पर संघर्ष तो समझ लिया हमने! लेकिन रजवाड़े आपस में क्यों लड़े, मराठा-पेशवाओं में आपसी संघर्ष क्यों था, मुग़ल आपस में क्यों एक न हुए, मौर्यो में भितरघात कैसे हुआ, और तो और कांग्रेसी एक क्यों न रह सके, जनता दल क्यों विभक्त हुआ, तेलंगाना का संघर्ष क्यों हुआ, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा क्यों बना, शिवसेना दुफाड़ क्यों हो गई, वरुण गांधी और राहुल गांधी में क्यों नहीं बनी, प्रमोद महाजन और प्रवीण महाजन का अंत कैसे हुआ, आडवाणी जी और मोदी जी में दूरी क्यों है, केजरीवाल और अन्ना और योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण और किरण बेदी अलग-अलग क्यों हो गए। -इन सब प्रश्नों का अलग अलग उत्तर तलाशने की आवश्यकता नहीं है। सीधा सा मतलब है बंधु। किसी भी वर्ग को इस देश की समस्याओं का दोषी ठहराना बंद होना चाहिए। यदि सारे हिंदुओं को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा तो मुसलमान शीया-सुन्नी होकर लड़ेंगे। सारे मुसलमानों को बाहर निकाल दिया गया तो हिन्दू ब्राह्मण-बनिए-क्षत्रिय-शूद्र होकर सिर फोड़ेंगे। सबसे अहिंसक जैनियों को अकेला छोड़ दो तो वे श्वेताम्बर-दिगंबर-तेरापंथी-बीसपंथी-मूर्तिपूजक और न जाने क्या क्या होकर लड़ने लगेंगे। और शांति के प्रतिमान समझे जाने वाले बौद्धों को अकेला छोड़ दो तो उनके पास भी ढेर संभावनाएँ शेष हैं। गोत्र, वंश, कुल, भाषा, शिक्षा, पंथ किसी भी भेद पर लड़ना जब तय ही है तो किसी भी वर्ग को बाहर निकाल कर लड़ाई की संभावनाएं कम न करो। ऐसा करोगे तो लड़ाई हो जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

परिधि

जो लोग
चोरी किये जाने के ख़िलाफ़ हैं
वे लोग
सिर्फ दूसरों के द्वारा चोरी किये जाने के खिलाफ हैं

जो लोग
झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
वे लोग सिर्फ दूसरों का झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
और जो लोग
स्त्रियों को सुरक्षित देखना चाहते हैं
वे लोग
स्त्रियों को सिर्फ दूसरों से सुरक्षित देखना चाहते हैं

ये बात
समझ तो नहीं आती
लेकिन समझ रहा हूँ

कि वे लोग
जब चोरी करते पकड़े जाएँ
तो उसको इत्तफ़ाक़ समझना चाहिए
वे लोग
जब झूठ बोलते पकड़े जाएँ
तो उस परिस्थिति को समझना चाहिए
और वे लोग
जब किसी स्त्री को दबोचे हुए
नंगे होने लगें
तो उसको
ब्राॅड माइंडेड होकर देखना चाहिए

क्योंकि वे लोग
सभ्य समाज की परिधि हैं
और सभ्य होने के नाते
मुझे परिधि लांघने का
कोई हक़ नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

लालकिला कवि-सम्मेलन

प्यारे देशवासियो!
आपको यह सूचित करते हुए ख़ुशी हो रही है कि हम पंजाबी, हम सिंधी, हम ये, हम वो सब कुछ हैं लेकिन सुरक्षा कारणों से हम हिंदी नहीं हो पा रहे हैं। यह बताते हुए मैं फूला नहीं समा रहा हूँ कि हिंदी कवि-सम्मेलन जगत् का शीर्ष कहा जाने वाला लालकिला कवि-सम्मेलन इस बार सुरक्षा कारणों से “स्थगित” कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली सरकार केअधीनस्थ सभी भाषा अकादमियां कवि-सम्मेलन का आयोजन करती हैं। इस श्रृंखला में हिंदी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी और संस्कृत भाषा के कवि-सम्मेलन होते रहे हैं। इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय कवि-सम्मेलन था “हिंदी भाषा” का गणतंत्र दिवस कवि-सम्मेलन।
उक्त कार्यक्रम हर साल लालकिले के भीतर फुटबॉल मैदान में होता था। बीच में कुछ वर्ष यह आयोजन सुरक्षा कारणों से तालकटोरा स्टेडियम में भी हुआ। लेकिन इसके रद्द अथवा स्थगित होने की कोई घटना याद नहीं आती।
वैसे इस कार्यक्रम का रद्द होना देशहित में ही है। इसकी लोकप्रियता और गरिमा को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक अनेक प्रधानमंत्रियों ने इसमें उपस्थित रहकर अपना समय नष्ट किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और राज्यपालों को तो इसका आकर्षण कभी छोड़ ही न सका। ऐसे में इसके न होने से कितने सारे महत्वपूर्ण लोगों का कितना सारा कीमती समय बचा; यह गणतंत्र के लिए शुभ है।
अकादमी की ओर से आधिकारिक सूचना यह है कि स्थान उपलब्ध न होने के कारण कवि-सम्मेलन स्थगित किया जा रहा है। यह अच्छी बात है। गणतंत्र के अवसर पर लालकिले को सुरक्षा एजेंसियों ने किसी गुप्त स्थान पर छुपा दिया है ताकि आतंक की काली नज़र लालकिले की आभा को धूमिल न करदे। यदि लालकिले को कुछ हो जाता तो गणतंत्र परेड की झाँकियाँ कहाँ जाकर अपने पैर दबवातीं।
मेरे एक मित्र हैं जिनको अब मैं शत्रु मानने लगा हूँ। उन्होंने मुझसे इतना घटिया सवाल पूछा कि जब स्थान बदल कर बाकी भाषाओं का कवि-सम्मेलन हो सकता है तो हिंदी का क्यों नहीं। अब बोलो, कौन समझाए इनको! अरे यार, हिंदी की सुरक्षा ज़्यादा ज़रूरी है। हिंदी घुट-घुट कर मर जाए, तो हम स्वीकार कर सकते हैं लेकिन हिंदी आतंकियों की गोली से मरे इसे हमारी सरकार किसी सूरत बर्दाश्त नहीं कर सकती। वैसे भी, जिस प्रकार अन्य खेलों के उत्थान के लिए क्रिकेट पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है; जिस प्रकार पिछड़ों के विकास के लिए अगड़ों का शोषण ज़रूरी है उसी प्रकार अन्य भाषाओं के कवि-सम्मेलन की सफलता के लिए हिंदी के कवि-सम्मेलन को ठण्डे बस्ते में डालना अनिवार्य है।
अब ये मत पूछना कि विश्व पुस्तक मेला हज़ारों कीअव्यवस्थित भीड़ के साथ प्रगति मैदान में सुरक्षित रह सकता है तो कवि-सम्मेलन एक व्यवस्थित श्रोता समूह के साथ बंद इमारत में असुरक्षित क्यों है? ये भी मत पूछना कि छत्रसाल स्टेडियम में ऑड-इवन की क़ामयाबी का जश्न मनाने के लिए स्थान उपलब्ध हो सकता है तो कवि-सम्मेलन के लिए इतने बड़े शहर में स्थान का अभाव क्यों है?
इस प्रकार के प्रश्न बेमानी हैं। सरकार ने जनता की सुरक्षा के लिए ख़ुद को संकट में डाला। छत्रसाल स्टेडियम में मुख्यमंत्री जी ने सारे संकटों के सम्मुख अपनी छाती अड़ा दी और जनता के मुँह को काला होने से बचा लिया। इसको कहते हैं नेतृत्व। ऐसे लोगों की भावनाओं पर प्रश्न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को संदेह के घेरे में खड़ा कर देगा।
इसलिये एक टुच्चे से कवि-सम्मेलन के न होने का शोक न मनाओ रे बंधु बल्कि अपने भाग्य को सराहो कि हमारा देश किन महान विभूतियों के हाथ में है।

और हाँ
वो एन्ड में क्या बोलते हैं
जय हिन्द!

✍️ चिराग़ जैन

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