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मानव की तस्वीर

पंक्ति अक्षर-शरों भरी तूणीर दिखाई देती है
दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है
हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो
हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है

✍️ चिराग़ जैन

दीपावली

अमावस के आकाश में रौशनी का खेल
माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल
चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई
और आग में जलती देश की कमाई
मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है
और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है
क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश?
क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन है दीपकों के पास?
क्या सड़क को भूखों से ज़्यादा भूख लगती है?
क्या मेरे देश में फूँकने के लिये भी कमाई बचती है?

काश,
ये सारे प्रश्न
हमारी राहों से सदा-सदा के लिये मिट जायें
इसी कामना के साथ संभव हैं
दीपावली की शुभकामनाएँ।

✍️ चिराग़ जैन

स्वार्थ

तीर कोरे स्वार्थ के जब तरकशों से जुड़ गए
बाम पर बैठे कबूतर फड़फड़ाकर उड़ गए
स्वार्थ शामिल हो गया जब से हमारी सोच में
पग हमारे ख़ुद-ब-ख़ुद राहे-गुनाह पर मुड़ गए

✍️ चिराग़ जैन

आदमीयत का अंदाज़ा

हम मुहब्बत का अंदाज़ा करेंगे
वो हिमाक़त का अंदाज़ा करेंगे

जब तलक दूरियाँ न हों शामिल
कैसे चाहत का अंदाज़ा करेंगे

आदमी को समझ न पाए जो
क्या वो क़ुदरत का अंदाज़ा करेंगे

दौरे-ग़म में कहे कोई कुछ भी
सब नसीहत का अंदाज़ा करेंगे

आदमी ज़िब्ह करने वाले ही
आदमीयत का अंदाज़ा करेंगे

ख़ुद ही आफ़त बुलाएंगे और फिर
ख़ुद ही राहत का अंदाज़ा करेंगे

जब भी बेबाक़ सच कहेंगे हम
वो बग़ावत का अंदाज़ा करेंगे

हम तो अपना समझ के कह देंगे
सब तिज़ारत का अंदाज़ा करेंगे

लोग मेरी हरेक हरक़त से
मिरी फितरत का अंदाज़ा करेंगे

✍️ चिराग़ जैन

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