Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
खण्ड-खण्ड कर रहे देश की अखण्डता को,
ऐसे दुष्ट लोगों का विनाश होना चाहिए
जातिवादियों के जीवन में हलाहल घुले,
साम्प्रदायिकों का सर्वनाश होना चाहिए
ज्वालाएँ प्रचण्ड मेरे भारत में फिर जलें,
एक-एक कोने में प्रकाश होना चाहिए
न हो कोई जाति न धरम कोई शेष रहे,
पूरे भारत में मधुमास होना चाहिए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Doha, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
ईश्वर, बालक, माँ, कवि, ये सब एक समान
इन्हें प्रेम से जीत लो, छोड़ो वेद-पुरान
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
पंक्ति अक्षर-शरों भरी तूणीर दिखाई देती है
दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है
हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो
हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
अमावस के आकाश में रौशनी का खेल
माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल
चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई
और आग में जलती देश की कमाई
मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है
और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है
क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश?
क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन है दीपकों के पास?
क्या सड़क को भूखों से ज़्यादा भूख लगती है?
क्या मेरे देश में फूँकने के लिये भी कमाई बचती है?
काश,
ये सारे प्रश्न
हमारी राहों से सदा-सदा के लिये मिट जायें
इसी कामना के साथ संभव हैं
दीपावली की शुभकामनाएँ।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Muktak, Poetry, Unpublished
तीर कोरे स्वार्थ के जब तरकशों से जुड़ गए
बाम पर बैठे कबूतर फड़फड़ाकर उड़ गए
स्वार्थ शामिल हो गया जब से हमारी सोच में
पग हमारे ख़ुद-ब-ख़ुद राहे-गुनाह पर मुड़ गए
✍️ चिराग़ जैन