Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
पथराए हुए नयन बोले
देहरी बोली, आंगन बोले
फिर राम अयोध्या लौटे हैं
पुलकित होकर जन-जन बोले
साकेत स्वर्ग हो जाएगा, अब रामराज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
अब नहीं कहीं कोई अबला, पत्थर बनकर दिन काटेगी
अब नहीं कहीं कोई रेखा, मानव-मानव को बाँटेगी
शबरी के बेर चखें राघव, फिर ये रिवाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
जिस धाम चुनौती उपजेगी, उस धाम उपाय निकालेंगे
नल-नील, गिलहरी सब मिलकर, सागर पर सेतु बना लेंगे
अपने सीमित संसाधन से हर कामकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
अब कहीं किन्हीं सुग्रीवों के अन्तस् में क्षोभ नहीं होगा
अब युद्ध जीतने वाले को, लंका का लोभ नहीं होगा
अपनी-अपनी मर्यादा में, अब राजकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
विपत्ति मनुष्य को उसकी लापरवाही पर ध्यान देने का अवसर देती है। संभवतः किसी भी समय में किसी भी पीढ़ी के पास यह अवसर नहीं रहा होगा कि कई-कई सप्ताह तक बिना कुछ काम किये रहा जाए और उससे कोई प्रत्यक्ष हानि न हो। हमेशा समय की कमी का रोना रोनेवाला मानव आज पूरी तरह फ़ुरसत में है। उसकी दुकान बंद है, लेकिन उसे कोई बेचैनी इसलिए नहीं है कि उसके ग्राहक का कहीं और जाने का भय नहीं है। उसकी फैक्ट्री बंद है, लेकिन वह इस बात से संतुष्ट है कि उसके प्रतिद्वंद्वी की भी फैक्ट्री बंद है। फैक्ट्री ही क्या पूरा बाज़ार बंद है। बाज़ार ही क्या पूरा शहर बन्द है। शहर ही क्या पूरा देश बंद है। देश ही क्या पूरी दुनिया बन्द है। इतनी फ़ुरसत कभी किसी पीढ़ी के मनुष्य को उपलब्ध नहीं हुई है।
जब इस फ़ुरसत में बोरियत से बचने के समस्त उपायों से बोर हो जाएंगे तब दुनिया पलटकर देखेगी कि जिन कार्यों में हम अब तक इतने व्यस्त थे, वे सब तो हमारे इस संकट में हमारी सहायता कर ही नहीं पा रहे हैं। हम युद्ध की तैयारियों के लिए भयावह अस्त्र-शस्त्र बना रहे थे, लेकिन फिलहाल उनकी कोई सुधि ही नहीं ले रहा है। हम अपने थोथे अहंकार की पुष्टि के लिए समाज को ऊँची-नीची जातियों की अनुसूची में बाँट रहे थे, लेकिन महामारी का यह रक्तबीज न तो अनुसूचित जातियों को बख़्श रहा है न ही अनुसूचित जनजातियों को। हम उनके धर्मस्थल से ज़्यादा भव्य अपना धर्मस्थल बना रहे थे लेकिन यह महामारी मंदिर के फ़र्श से लेकर, मस्जिद की हौज तक हर जगह मौजूद है। हम घोटाले और घपले कर-कर के पूंजी बना रहे थे लेकिन आज हमारे पास उस पूंजी को ख़र्च करने का उपाय नहीं है। जो एक बड़ा भूखंड विजय कर चक्रवर्ती बने फिरते थे, वे आज दो कमरों के फ्लैट में बंद हैं। जिनके पास हर काम के लिए नौकर-चाकर थे, वे आज अपने घर में ख़ुद झाड़ू-पोंछा कर रहे हैं। कितना आश्चर्य है कि सुख के समय में हम अमीर, ग़रीब, हिन्दू, मुस्लिम, सवर्ण, अछूत, शहरी, ग्रामीण, गोरे, काले, साक्षर, निरक्षर, स्त्री, पुरुष और न जाने क्या-क्या संज्ञाएँ तथा विशेषण ओढ़े फिरते हैं; लेकिन दुःख आते ही हम सब ख़ालिस मनुष्य हो जाते हैं।
दो-दो महायुद्ध झेलने के बाद यूरोप ने यह सबक लिया कि जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति किसी भी सरकार का प्रथम उद्देश्य होना चाहिए। सत्ता और वर्चस्व की होड़ में विनाश के भयावह दृश्य देख लेने के बाद यूरोप के देशों ने अपनी सीमाओं पर ख़र्च होनेवाले धन का अधिकतम अंश अपने नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने पर लगाना शुरू किया।
कोरोना के विरुद्ध जारी इस महायुद्ध के समय में हम यह संकल्प तो ले ही सकते हैं कि हमारे देश के प्रत्येक नागरिक के पास जीवन जीने के न्यूनतम संसाधन तो अवश्य ही हों। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सभी दल जब ‘वर्चस्व’ की लड़ाई लड़ें तो उसका बोझ उस बजट पर न पड़े जो जनता के ‘अस्तित्व’ की रक्षा के लिए निर्धारित हो। युद्ध के लिए अस्त्र ख़रीदे भी जाएँ और बनाए भी जाएँ, लेकिन उन हथियारों को ख़रीदने के लिए किसी अस्पताल या किसी स्कूल का बजट एडजस्ट न किया जाए। हमारा राष्ट्रीय ध्वज मंगल पर भी फहराए और चांद पर भी फहराए; लेकिन पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज के नीचे सोनेवाला कोई परिवार फाके तो नहीं कर रहा।
इन स्थितियों के लिए न तो मैं किसी सरकार पर दोषारोपण करना चाहता हूँ, न ही जनता पर। हमारी प्राथमिकताएँ क्या हों, यह हमें कोविडकाल चीख़-चीख़कर बता रहा है। पीछे पलटकर किसी से शिकायत करने जाने की संभावना शेष नहीं है। अशोक जब कलिंग के बाद संन्यास के पथ पर चले होंगे तब उन्होंने अपने वर्तमान को देखकर ही निर्णय लिया होगा; यदि वे अतीत से उलझते तो अतीत उन्हें कभी भविष्य सुधारने की मोहलत नहीं देता।
मैं वर्तमान को परिवर्तन का कलिंग युद्ध मानकर एक शांत और सुखद भविष्य की ओर क़दम बढ़ाने की संस्तुति करता हूँ। वर्तमान हमें बता रहा है कि लॉकडाउन की इस परिस्थिति में हमारे पास एक ऐसा पुख्ता तंत्र होना चाहिए था कि सरकार कम्प्यूटर पर सबकी यूनीक आईडी के माध्यम से चिन्हित कर पाती कि एक सौ पैंतीस करोड़ लोगों में से कितने ऐसे हैं जिनके व्यवसाय के कॉलम में ‘दिहाड़ी मजदूर’ लिखा है। यूनिक आईडी के माध्यम से सरकार उन सबके परिवारों की पहचान आसानी से कर लेती और उनके खाते में आवश्यक राशि पहुँचाकर उन्हें मरने से बचा लेती।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि हमारे पास न्यूनतम शिक्षा के साथ-साथ सिविक सेंस विकसित करने की भी शिक्षा प्रणाली होनी चाहिए ताकि सरकार को जनता की भलाई के लिए उस पर लाठियाँ न भाँजनी पड़ें।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि हमारी स्वास्थ्य सेवाओं के पास इतनी व्यवस्था अवश्य हो कि यदि किसी संकट की घड़ी में पाँच प्रतिशत जनसंख्या किसी महामारी, प्रदूषण, रोग, युद्ध आदि से प्रभावित हो जाए तो उनके उपचार में बाधा न आए।
वर्तमान चीख़-चीख़कर कह रहा है कि सरकार के पास ऐसे अधिकार हों कि ऐसी आपदा के समय निजी विमानन कम्पनियों, निजी अस्पतालों, निजी फार्मा कंपनियों, निजी टेलीकॉम कंपनियों, निजी मीडिया चैनल्स, निजी रिटेल स्टोर्स आदि को सरकारी नियंत्रण में लेकर जनहित में प्रयोग किया जा सके।
जो लोग निजीकरण की वक़ालत करते फिरते हैं, उनसे वर्तमान स्पष्ट शब्दों में कह रहा है कि जब बस्ती में आग लगती है तब व्यापारी केवल अपनी दुकान बचाता है और जैसे ही उसकी दुकान सुरक्षित होती है तो वह पानी की बाल्टियाँ बेचकर बस्ती में धंधा करने लगता है। राजनैतिक दल उस समय आग बुझाने का दिखावा करते हैं ताकि चुनाव के समय बस्ती में वोट मांगने का अधिकार मिल सके। केवल सरकार ही है जो पूरी बस्ती की आग बुझाने के लिए प्रयास करती है।
यह भीषण समय बीतने के बाद यदि हम अपनी मानवता को बलिष्ठ करके घरों से बाहर निकले तो ‘दुनियाबन्दी’ की दुर्घटना मनुष्यता के एक नए युग का सूत्रपात करेगी; लेकिन इसके बीतते ही यदि हम फिर से ‘मनुष्य’ की बजाय कोई भी अन्य संज्ञा लपेट बैठे तो कोरोना के विरुद्ध इस लड़ाई में शहीद हुए लोगों के बलिदान और हफ़्तों तक घरों में बंद रहकर अवसाद झेल रहे देश की तपस्या व्यर्थ हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
Published in Dainik Jagaran of 31 March 2020
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
मैं अयोध्या हूँ।
मेरे स्वभाव में किसी परिस्थिति का सही अंत न तो केवल कौरवों के जीत है, न ही केवल पाण्डवों की जीत। मैंने राम को ख़ुशी-ख़ुशी वन जाते देखा है, मैंने देखा है कि जब राम वन से लौट कर आए तो भरत के मन में राज्य छिनने की पीड़ा नहीं थी, अपितु भाई के लौट आने का हर्ष था।
आज फिर सरयू के घाट पलकें बिछाए एक फैसले की राह देख रहे हैं। इस फैसले के बाद अगर राम और रहमान दोनों के घर घी के दीपक जगमगा गए तो यह राम के अस्तित्व की सबसे बड़ी गवाही होगी। लेकिन इस फ़ैसले से यदि एक भी मन खिन्न हुआ तो मैं अपने राम को बता दूंगी कि राम, तुम फिर से वन चले जाओ, क्योंकि नगरवासी कुरुक्षेत्र की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
सत्ता चाहे जिसकी भी हो, अहम् नहीं स्वीकार प्रजा को
कर्मकांड से कर्मयोग ने पल में लिया उबार प्रजा को
गोकुलवालो छोड़ो छलिया इंद्रदेव का पूजन करना
पर्वत ढोकर ही मिलता है, जीने का अधिकार प्रजा को
सत्ता की मनमानी का करना होगा प्रतिकार प्रजा को
चुप रहने से निर्भरता का होता व्याधि-विकार प्रजा को
श्रमजीवी भी दान-दया का पात्र बने तो युग कोसेगा
कर्म छोड़ कर कृपा निहारे तो सौ-सौ धिक्कार प्रजा को
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
साहित्य समाज का दर्पण है और धर्म समाज का परकोटा है। साहित्य और धर्म में गहरा संबंध है। समाज में विचार की प्रतिष्ठापना अथवा परिस्थितियों के सम्यक चित्रण के लिए पौराणिक पात्रों तथा धार्मिक रीतियों के उदाहरण प्रस्तुत करना साहित्य का शगल रहा है।
कृष्ण के बालस्वरूप का वर्णन कर, भक्ति के प्रतीक को वात्सल्य का बिम्ब बनाकर हर गृहिणी का कन्हैया बना देना सूरदास का ऐसा ही एक सफल प्रयास था। रामायण के राम को मानस के राम तक कि यात्रा कराते समय तुलसी को भी भाषादम्भ का त्रास झेलना पड़ा किन्तु अवधी बोली की मीठी चौपाइयों ने समाज को राम दिए और राम को समाज।
पौराणिक कथाओं के प्रतीकों को आधार बनाकर या किसी एक पात्र को केंद्र में रखकर लिखे गए खंडकाव्य समाज लिए सदैव उपयोगी सिद्ध हुए हैं। ऐसा भी देखा गया है कि कुछ स्थानों पर इन खंडकाव्यों के प्रमुख पात्र की पीड़ा के सम्मुख अन्य सभी पात्र कठघरे में खड़े दिखाई देने लगे। यशोधरा महाकाव्य में बुद्ध कठघरे में खड़े हैं तो रश्मिरथी में पूरा कुरुकुल सवालों के घेरे में है। ऐसे ही द्रौपदी और साकेत जैसे ग्रंथ महाभारत तथा रामायण के अनेक महान चरित्रों से प्रश्न पूछते दिखाई देते हैं।
गद्य साहित्य में ‘वयं रक्षामः’ जैसे उपन्यासों ने रामचरितमानस के खलनायक का पक्ष प्रस्तुत करने की हिम्मत की है।
विश्व की सभी भाषाओं में पौराणिक संदर्भों से प्रतीक उठाने और पूज्यनीय चरित्रों से प्रश्न पूछने की परंपरा रही है। ग्रीक साहित्य का तो अधिकांश हिस्सा पौराणिक संदर्भों से ही निर्मित है। अंग्रेजी साहित्य ने भी पादरियों और चर्च पर जमकर कटाक्ष किये हैं। हिंदी साहित्य में भी जातीय व्यवस्था, ब्राह्मणवाद और राम-कृष्ण जैसे आस्था केंद्रों को आधार बनाकर बात करने का अभ्यास है।
उर्दू ग़ज़ल भी इस रिवाज़ से अछूती नहीं है। अपेक्षाकृत अधिक कट्टर होने के बावजूद इस्लाम से सवाल करते हुए या इस्लामिक परंपराओं पर कटाक्ष करते हुए उर्दू ग़ज़ल ने कोई कठिनाई महसूस नहीं की। कहीं-कहीं तो मुल्ला-शेख़ आदि की बाक़ायदा खिल्ली ही उड़ाई गई है।
इस्लाम में शराब हराम है लेकिन शराब का पक्ष लेते हुए कितने ही अशआर कहे गए, जिनमें इस्लाम की इस परंपरा को सीधे निशाना बनाया गया है। कुछ उदाहरण देखें-
ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यूँ
क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया
-शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
‘ज़ौक़’ जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
उन को मयख़ाने में ले आओ सँवर जाएंगे
-शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
लुत्फ़-ए-मय तुझ से क्या कहूँ ज़ाहिद
हाए कमबख़्त तू ने पी ही नहीं
-दाग़ देहलवी
झूम के जब रिन्दों ने पिला दी
शैख़ ने चुपके-चुपके दुआ दी
-कैफ़ भोपाली
ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा न हो
-नामालूम
भक्ति और भगवान के मध्य कोई तीसरा नहीं हो सकता। ईश्वर को भक्त से मिलने के लिए किसी संदेशवाहक की ज़रूरत नहीं होती -इस बात को कहने के लिए उर्दू शायरी में ऐसा भी शेर मिलता है, जिसमें मूसा को आड़े हाथों लेते हुए भी शायर को हिचकिचाहट नहीं हुई-
हमें भी जलवागाह-ए-नाज़ तक लेकर चलो मूसा
तुम्हें ग़श आ गया तो हुस्ने-जानां कौन देखेगा
-नामालूम
मुफ़लिसी में धार्मिक अपव्यय पर तंज करते हुए निदा फ़ाज़ली का एक दोहा ख़ूब मक़बूल हुआ-
बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान
अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान
इश्क़ को कर्मकाण्ड से बड़ा बताते हुए दाग़ देहलवी कहते हैं-
आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बन्दगी से ख़ुदा नहीं मिलता
और इन सबके इतर भक्त को भगवान से बड़ा बताते हुए असद अंसारी ने ऐसा शेर कहा जिसमें यह स्पष्ट कर दिया कि ख़ुदा ने ही बन्दे को नहीं बनाया बल्कि बन्दा भी ख़ुदा बना सकता है-
बन्दापरवर मैं वो बन्दा हूँ कि बहरे-बन्दगी
जिसके आगे सिर झुका दूंगा ख़ुदा हो जाएगा
अल्लामा इक़बाल ने भी आत्मविश्वास के आगे ईश्वर के झुक जाने की बात बहुत प्रभावी ढंग से कही-
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे -बता तेरी रज़ा क्या है
ग़ज़ब ये है कि कविता के इस तेवर से कभी ऐसा नहीं हुआ कि आस्थाएँ खंडित हो गई हों, भावनाएँ आहत हो गई हों। सूफ़ी सहित्य तो अदब की ज़ुबान के दायरे से बाहर आकर ख़ुदा से तू-तड़ाक के लहजे में बात करता रहा लेकिन कभी कहीं कोई हंगामा नहीं बरपा।
इधर नाज़ ख्यालवी की एक नज़्म, जिसे नुसरत फ़तेह अली ख़ान ने गाया है, उसमें जिस लहजे में ख़ुदा पर सवाल उठाए गए हैं वह तो और भी अनोखा है। नज़्म का उन्वान ही ईश्वर को गोरखधंधा कहते हुए सामने आता है। उस नज़्म के कुछ अंश इस प्रकार हैं-
जब बजुज़ तेरे कोई दूसरा मौजूद नहीं
फिर समझ में नहीं आता तेरा पर्दा करना
तुम एक गोरखधंधा हो
नहीं है तू तो फिर इंकार कैसा
नफी भी तेरे होने का पता है
नहीं आया ख़्यालों में अगर तू
तो फिर मैं कैसे समझा तू ख़ुदा है!
तुम एक गोरखधंधा हो
हैरान हूँ इस बात पर तुम कौन हो, क्या हो
हाथ आओ तो बुत, हाथ ना आओ तो ख़ुदा हो
तुम एक गोरखधंधा हो
अक्ल में जो घिर गया, लाइन्तहा क्योंकर हुआ
जो समझ में आ गया फिर वो खुदा क्योंकर हुआ
तुम एक गोरखधंधा हो
जब के तुझ बिन कोई नहीं मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ खुदा क्या है
तुम एक गोरखधंधा हो
छुपते नहीं हो, सामने आते नहीं हो तुम
जलवा दिखा के जलवा दिखाते नहीं हो तुम
दैरो-हरम के झगड़े मिटाते नहीं हो तुम
जो अस्ल बात है वो बताते नहीं हो तुम
ये माबदो-हरम ये कलीसा-ओ-दैर क्यूं?
हरजाई हो जभी तो बताते नहीं हो तुम
तुम एक गोरखधंधा हो
दिल पर हैरत ने अजब रंग जमा रखा है
एक उलझी हुई तस्वीर बना रखा है
कुछ समझ में नहीं आता कि ये चक्कर क्या है
खेल क्या तुमने अज़ल से ये रचा रखा है
रुह को जिस्म के पिंजरे का बनाकर क़ैदी
उस पर फिर मौत का पहरा भी बिठा रखा है
देके तदबीर के पंछी को उड़ानें तूने
दामे-तकबीर भी हर-सम्त बिछा रखा है
करके आराइशी कोनैन की बरसों तुमने
ख़त्म करने का भी मंसूबा बना रखा है
लामकानी का बहरहाल है दावा भी तुम्हें
नाह्लो-अकरब का भी पैग़ाम सुना रखा है
ये बुराई, वो भलाई, ये जहन्नुम, वो बहिश्त
इस उलटफेर में फ़रमाओ तो क्या रखा है
जुर्म आदम ने किया और सज़ा बेटों को
अद्लो-इंसाफ का मियार भी क्या रखा है
देके इंसान को दुनिया में ख़लाफत अपनी
इक तमाशा-सा ज़माने में बना रखा है
अपनी पहचान की ख़ातिर है बनाया सबको
सबकी नज़रो से मगर खुदको छुपा रखा है
तुम एक गोरखधंधा हो
जो कहता हूँ, माना तुम्हें लगता है बुरा-सा
फिर है मुझे तुमसे बहरहाल गिला-सा
चुपचाप रहे देखते तुम अर्शे-बरी पर
तपते हुए कर्बल में मोहम्मद का नवासा
किस तरह पिलाता था लहू अपना वफ़ा को
खुद तीन दिनों से वो अगरचे था प्यासा
दुश्मन तो बहरहाल थे दुश्मन, मगर अफ़सोस
तुमने भी फ़राहम ना किया पानी ज़रा-सा
इन सब उदाहरणों की आवश्यकता इसलिए पड़ी की पिछले कुछ वर्षों से हमने कट्टरता का एक बाना ओढ़ लिया है। कवि कुछ भी लिखता है तो किसी न किसी की आस्थाएँ आहत हो जाती हैं। कविता के निहितार्थ तक पहुँचने की बजाय धर्म का चश्मा लगाकर हम प्रतीकों में अटककर रह जाते हैं।
हिन्दू धर्म, जिसकी सहिष्णुता विश्व भर के लिए अनुकरणीय रही है, जहाँ ईश्वर से परिहास करने की परंपरा रही है, जहाँ ईश्वर को घर-आंगन के किलोल करते बालक का स्वरूप दिया गया है, वहाँ कुछ भी कहते ही भावनाएँ आहत होने लगी हैं। हमारी आस्थाएँ इतनी कमज़ोर कैसे हो सकती हैं?
ध्यान से देखें तो सम्भवतः विश्व के किसी अन्य धर्म के पास हँसता हुआ ईश्वर नहीं है। पैग़म्बर, जीसस, बुद्ध, महावीर, हरकुलिस जैसे पौराणिक चरित्रों के चित्रण में हास्य और किलोल के प्रसंग नहीं मिलते। लेकिन कृष्ण के चरित्र में यह सब कुछ है। कृष्ण माँ से डाँट खाते हैं, कृष्ण माँ को तंग करते हैं, कृष्ण माखन चुराते हैं, कृष्ण गोपियों से छेड़छाड़ करते हैं, कृष्ण प्रेम करते हैं, कृष्ण क्रोधित होते हैं और कृष्ण दुःखी भी होते हैं। कृष्ण के पास सब कुछ करने की क्षमता है। राम पैंजनिया बांधकर ठुमककर चल सकते हैं। यह कल्पना अन्य किसी ईश्वरीय चरित्र के साथ इतनी सरल नहीं है।
ऐसे में साहित्य में पुराणों के प्रयोग निषेध की तख़्ती चिपका देना समाज के उन्नयन में अवरोधक है। हम अपने ईष्ट में अपने जीवन की वर्तमान परिस्थितियों के उदाहरण तलाशकर उनसे समाधान मांगने के अभ्यासी हैं।
प्रश्न पूछने से कोई ईश्वर छोटा नहीं होता और जो प्रश्न पूछने से छोटा हो जाए वह ईश्वर नहीं होता।
✍️ चिराग़ जैन