Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
सुनो!
सब कुछ तो बटोर लाया हूँ
अपने पुराने मकान से
नये मकान में;
फिर भी
काफ़ी कुछ छूट गया है वहीं
…जस का तस।
अलमारी के पीछे
जाला पूरती रहती थी एक मकड़ी
उसका घर तहस-नहस कर आया हूँ
अपना घर बदलते हुए।
दीवाली की सुबह
रसोई की चौखट पर
सरस की टहनियाँ टाँकते थे पिताजी;
उनकी सूखी हुई डंडियाँ
चुभती हुई सी छूट गई हैं
चौखट की झिरियों में।
राखी के सोन चिपकाने से
एक निशान बन जाता था दीवार पर
वो साथ न आ सका।
और छोटी बहन ने
पूजा वाले कमरे में
थापे लगाए थे
विदा होते हुए।
…जिन्हें देखने भर से
जीवंत हो जाती थी बहन की विदाई;
…उन्हें सहेजने का
कोई ज़रिया न हुआ।
पड़ोस वाले अंकल
यूं भी
कभी बतियाते तो नहीं थे,
लेकिन आज
जब ट्रक में चढ़ रहा था उनका पड़ोस,
तो वे अपनी बालकनी में
रोज़ से
कुछ ज़ियादा ख़ामोश नज़र आए।
नये घर की दीवारें
एकदम नयी हैं।
फ़र्श पर नहीं है
किसी दीये की चिकनाई के घेरे।
ट्यूब के पीछे
अभी नहीं बसा है
किसी छिपकली का घरौंदा।
यहाँ सामने वाले छज्जे से
लुंगी पहने कोई अधेड़
आते-जाते घूरता भी नहीं है।
एक बड़े से ट्रक में
लाद तो लाए हम
एक पूरा युग
लेकिन वक़्त लगेगा
उस युग को
इन दीवारों पर छाने में
अभी वक़्त लगेगा
इस मकान को
घर बनाने में।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
बूंद भर जल नहीं दो भले तुम मुझे
दीखते ही रहो बस घड़ों की तरह
क्या हुआ गर कभी प्यास बाकी रही
ज़िन्दगी चुक गई आस बाकी रही
जिन ज़मीनों की अरदास बाकी रही
खोखली हो गई बीहड़ों की तरह
मंडियों में सजाया हुआ नेह हूँ
मैं शपथ में बसा एक संदेह हूँ
वक़्त के हाथ जर्जर हुई देह हूँ
बस लिपटते रहो चीथड़ों की तरह
वैभवों का बिखरता हुआ कक्ष हूँ
इक वृहन्नल के आगे खड़ा लक्ष हूँ
आँधियों का सताया हुआ वृक्ष हूँ
तुम बरसते रहो कंकड़ों की तरह
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
कोई जब लौट कर आए तो उसकी आबरू रखना
बहुत आसां नहीं होता है फिर से लौट कर आना
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सिर्फ दिखावे भर के सारे उत्सव मेले हैं
सब अपने-अपने जीवन में निपट अकेले हैं
अपनेपन का नाम सुना है, शक्ल नहीं देखी
रिश्तों पर मिटने वालों की नस्ल नहीं देखी
बाहर से ख़ुश हैं पर भीतर बहुत झमेले हैं
वैभवशाली दिखने की इक होड़ लगी है रे
जर्जरता भी बाहर से बेजोड़ लगी है रे
हीरे बनकर घूम रहे मिट्टी के ढेले हैं
बेमतलब की प्रीत, ठिठोली पीछे छूट गई
मन से मन तक जाने वाली डोरी टूट गई
कौन बताए किसको किसने क्या दुःख झेले हैं
जिनसे अपनापन चाहा उनसे सम्मान मिला
संबंधों की नब्ज़ छुई तो मन बेजान मिला
वाणी पर है शहद दिलों में सिर्फ करेले हैं
क्या संबंधों वाले सारे किस्से झूठे थे
या सचमुच पिछली पीढ़ी के लोग अनूठे थे
क्या अब भी दुनिया में वैसे कुछ अलबेले हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
बेहद आलीशान मकान का
सपना पाला है तो
पहले संस्कारों की झाड़ियाँ उखाड़ दो
और वो जो ज़मीर है ना
उसे मकान की नींव में गाड़ दो।
इससे नींव को मज़बूती तो मिलेगी ही
जी भी कड़ा हो जाएगा
और पत्थर जैसे कलेजे की सपोर्ट से
सपनों का महल खड़ा हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन