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पुतली का पसीना

कितना कष्ट उठाया मैंने, मुझको इसका भान नहीं है
इतना सा है खेद कि इसका तुमको ही संज्ञान नहीं है

दुनिया का चेहरा तकने में, आँखों की पुतली दुखती है
लेकिन दर्द हवा होता जब ये तुम पर आकर रुकती है
पुतली का बह चला पसीना, फिर भी तुमको ध्यान नहीं है

एक दिवस मन के रंगों ने, भावुकता से होली खेली
उसके बाद अहर्निश मन ने, मिलने की व्याकुलता झेली
इस व्याकुलता की क्या तुमसे, थोड़ी भी पहचान नहीं है

तुम हारे तो धीर बँधाई, तुम जीते तो उत्सव गाया
पीर तुम्हारी लिखते-लिखते, मैं अपना मन देख न पाया
जो कुछ गीतों में उतरा है, वो मेरा निज गान नहीं है

✍️ चिराग़ जैन

हमारी याद ताज़ा है

अगर फ़ुर्सत मिले तो झाँक भर लेना किताबों में
हमारी याद ताज़ा है अभी सूखे गुलाबों में

हमें डर था, कहीं इज़हारे-दिल तुमको ख़फ़ा कर दे
तुम्हारी “हाँ” बिना सोचे चली आई जवाबों में

✍️ चिराग़ जैन

प्रेम के इक ताल में

आजकल मुझसे न पूछो, कब उगा सूरज गगन में
आजकल मैं प्रेम के इक ताल में उतरा हुआ हूँ

बुद्धि का मत है विकलता मौन से होगी नियंत्रित
किन्तु हर इक रोम अब वाचाल हो बैठा अचानक
अब गिरा या तब गिरा का एक कौतुक चल रहा है
मन मुआ मोती भरा इक थाल हो बैठा अचानक
भाग्य है जिसका चुभन स्वीकार कर शृंगार करना
आजकल मैं उस कढ़े रूमाल में उतरा हुआ हूँ

कल्पना शालीनता के छोर से आगे बढ़ी है
प्रेम मन की देहरी को लांघ तन पर छा रहा है
कनखियों से देख कर वो झट पलट लेती निगाहें
इस झिझक को देख मेरा मन प्रफुल्लन पा रहा है
दृष्टि मेरी भाँप कर वो ढाँपती जिससे स्वयं को
मैं अभी उस लाल ऊनी शाॅल में उतरा हुआ हूँ

✍️ चिराग़ जैन

खुद से दूर

महफ़िलों की तेज़ नज़रों से छिटककर रो पड़ा
मन हुआ भारी तो इक पल को पलटकर रो पड़ा

राम जाने एक सूने घोंसले को देखकर
इक मुसाफिर क्यों अचानक से बिलखकर रो पड़ा

प्यार से, झुँझलाहटों से हर तरह रोका उन्हें
और फिर बेसाख़्ता लाचार होकर रो पड़ा

अपने सब अपनों को खुद से दूर जाता देखकर
लौटकर आया तो पर्दों से लिपटकर रो पड़ा

✍️ चिराग़ जैन

नये घर में

सुनो!
सब कुछ तो बटोर लाया हूँ
अपने पुराने मकान से
नये मकान में;
फिर भी
काफ़ी कुछ छूट गया है वहीं
…जस का तस।

अलमारी के पीछे
जाला पूरती रहती थी एक मकड़ी
उसका घर तहस-नहस कर आया हूँ
अपना घर बदलते हुए।

दीवाली की सुबह
रसोई की चौखट पर
सरस की टहनियाँ टाँकते थे पिताजी;
उनकी सूखी हुई डंडियाँ
चुभती हुई सी छूट गई हैं
चौखट की झिरियों में।

राखी के सोन चिपकाने से
एक निशान बन जाता था दीवार पर
वो साथ न आ सका।

और छोटी बहन ने
पूजा वाले कमरे में
थापे लगाए थे
विदा होते हुए।
…जिन्हें देखने भर से
जीवंत हो जाती थी बहन की विदाई;
…उन्हें सहेजने का
कोई ज़रिया न हुआ।

पड़ोस वाले अंकल
यूं भी
कभी बतियाते तो नहीं थे,
लेकिन आज
जब ट्रक में चढ़ रहा था उनका पड़ोस,
तो वे अपनी बालकनी में
रोज़ से
कुछ ज़ियादा ख़ामोश नज़र आए।

नये घर की दीवारें
एकदम नयी हैं।
फ़र्श पर नहीं है
किसी दीये की चिकनाई के घेरे।
ट्यूब के पीछे
अभी नहीं बसा है
किसी छिपकली का घरौंदा।
यहाँ सामने वाले छज्जे से
लुंगी पहने कोई अधेड़
आते-जाते घूरता भी नहीं है।

एक बड़े से ट्रक में
लाद तो लाए हम
एक पूरा युग
लेकिन वक़्त लगेगा
उस युग को
इन दीवारों पर छाने में
अभी वक़्त लगेगा
इस मकान को
घर बनाने में।

✍️ चिराग़ जैन

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