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विचारधारा

विचारधारा वह बोझा है, जो योग्य पात्रों पर लादकर कुम्हार हाथ हिलाते हुए ‘इधर-उधर’ विचरते रहते हैं।
✍️ चिराग़ जैन

कोरोना में अवसर

कोरोना की दूसरी लहर बीत चुकी है, लेकिन राजनीति में ख़ुशी की लहर नहीं आई। वे अब भी आपस में लड़ रहे हैं।
जब देश में कोरोना का ताण्डव चल रहा था तो पॉलिटिकल पार्टियों में इस बात पर लड़ाई थी कि ये जनता तुम्हारी है, इसे तुम बचाओ। अब जब ताण्डव शान्त हुआ है तो हर पार्टी यह चिल्ला रही है कि ये जनता हमारी है, इसे हमने बचाया है।
हमारे पॉलिटीशन्स का मन बड़ा चंचल है। इसलिए जब वे एक बात पर लड़ते-लड़ते बोर हो जाते हैं तो उसे छोड़कर नए विषय पर लड़ने लगते हैं। और जब सब विषयों से बोर हो जाते हैं तो चुनाव लड़ने लगते हैं।
चुनाव के आगे दुनिया की सारी लड़ाइयाँ छोटी लगने लगती हैं। इसलिए अब देश के नेता यूपी में चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली आने-जाने लगे हैं। जो तकनीकी कारणों से यूपी के चुनाव में सीधे भाग नहीं ले पाएंगे वे वैक्सीन की सफलता और हेल्थ सिस्टम की कैपेसिटी का झुनझुना बजाकर टाइम पास करते रहेंगे।
जब किसी पॉलिटिकल पार्टी के नेताओं को लड़ने के लिए कोई योग्य उम्मीदवार नहीं मिलता, तो वो आपस में लड़ने लगते हैं। इसी व्यवस्था के तहत दो-तीन दिन भाजपा में यह सुगबुगाहट हुई कि योगी जी यूपी चुनाव में भाजपा का चेहरा नहीं होंगे। लेकिन केन्द्रीय कार्यालय ने झट से स्पष्टीकरण देकर अफ़वाहों का मज़ा किरकिरा कर दिया। इस स्पष्टीकरण से यह तय हो गया कि योगी जी ही मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे। और कांग्रेस से जतिन प्रसाद को भाजपा में मिलाकर यह भी बता दिया गया कि यह चुनाव भी भाजपा अपने पॉपुलर स्टाइल से ही लड़ेगी।
उधर जतिन प्रसाद के भाजपा में जाने से कांग्रेसी बहुत दुःखी हैं। उनका कष्ट ये है कि उन्हें यूपी में जतिन प्रसाद के बिना ही हारना पड़ेगा।
मुख्य मुद्दे चुनाव में रोड़ा न अटकाएँ, इसके लिए राजनैतिक प्रवक्ताओं ने टीवी डिबेट में टोंटी, हाथी और मंदिर जैसे मंत्र पढ़ने शुरू कर दिए हैं। इन मंत्रों के प्रभाव से शिक्षा, रोज़गार, महंगाई, सड़क, पानी, बिजली और क़ानून व्यवस्था जैसे भूत ग़ायब हो जाते हैं।
ग़ायब होने से याद आया, पिछले दिनों ट्विटर ने उपराष्ट्रपति के अकाउंट से ब्लू टिक ग़ायब कर दिया। इससे पूरे देश में हड़कंप मच गया। इस हड़कम्प से हमें समझ आया कि जिन व्यक्तित्वों के ट्विटर पर होने से ट्विटर वेरिफाइड होता था, उन व्यक्तियों को भी अब ट्विटर के वेरिफिकेशन से फ़र्क़ पड़ने लगा है। नेता वही जो ट्विटर मन भाए।
उपराष्ट्रपति के खाते का ब्लू टिक हटने से विपक्षी नेताओं ने भी अपने ट्विटर खातों पर ट्विटर की निंदा की और मन ही मन उसको शाबासी दी।
शाबासी से याद आया, पिछले दिनों उद्धव ठाकरे भी प्रधानमंत्री से मिलने दिल्ली आए। हर न्यूज़ चैनल पर हंगामा मच गया कि बिना चुनाव के दो नेता आपस में मिल कैसे सकते हैं! इस महत्वपूर्ण ख़बर की कवरेज में न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर्स ने जनता को बताया कि उद्धव जी और मोदी जी के बीच बहुत मधुर सम्बन्ध हैं। ये सुनकर जनता को चक्कर आ गया कि इनके मधुर सम्बन्धों की भाषा इतनी मीठी है तो दुश्मनी के लिए ये किस भाषा से शब्द इम्पोर्ट करते होंगे।
बहरहाल, चुनाव के बादल आसमान में छाने लगे हैं। उत्तर प्रदेश में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनने की वजह से वहाँ मूसलाधार रैलियाँ होने की संभावना है। बीच-बीच में गालियों की ओलावृष्टि होने की भी आशंका है।
टेलीफोन की रिंगटोन पर जनता के लिए हिदायत जारी की जा रही है कि बहुत ज़रूरी काम होने पर ही घर से बाहर निकलें।
हिदायत सुनकर लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब उनके ज़िले में रैली होगी और वे बिना मास्क के, एक-दूसरे से सटकर घर से बाहर निकल पाएंगे।
✍️ चिराग़ जैन

सत्यमेव जयते

सत्य के आधार पर खड़े
चार-चार शेर भी
झूठ बोलनेवालों को
कुछ नहीं कहते।

देश की हर सरकारी मुहर पर
एक झूठ लिखा है –
‘सत्यमेव जयते’।
✍️ चिराग़ जैन

मदद की होड़

रेगिस्तान की दोपहर में
पानी को तरस रहा एक प्यासा
तपती हुई रेत में पड़ा था;
ऊपर से सूरज का भी रुख कड़ा था।
उसको पानी देने के लिए
केंद्र सरकार ने बिल पास किया;
राज्य सरकार ने भी
उसका स्वतः संज्ञान लिया।

लेकिन ज्यों ही
राज्य सरकार का कारिंदा
मदद लेकर प्यासे की ओर बढ़ा,
उसके सद्भाव को लगा
एक जोरदार झटका;
क्योंकि पीछे केंद्र सरकार
लेकर आ रही थी
पानी से भरा मटका।

उधर केंद्र सरकार की नज़र भी
राज्य सरकार की मदद योजना पर पड़ी
तो उसके मटके की
आँखें हो गयी बड़ी।

अब प्यासा हो गया था गौण
दोनों एक-दूसरे से पूछने लगे-
“तू कौन? तू कौन?”

दोनों ही मदद करने के
मूल लक्ष्य से भटक गए
और एक-दूसरे से ऐसे भिड़े
कि दोनों के मटके चटक गये।

फिर राज्य सरकार ने भरी हुंकार
और प्यासे की विरुद्ध दर्ज की
नामज़द एफआईआर।
“कि राज्य सरकार को बदनाम करने के लिए
प्यासा व्यक्ति
नाटक कर रहा है
और जनता में
राज्य की व्यवस्था के विरुद्ध
घृणा भर रहा है।”

केंद्र सरकार ने
इस एफआईआर की
पूरी ही पैमाइश कर दी
और प्यासे की प्यास की
सीबीआई जाँच की फरमाइश कर दी।

घंटों तक चलता रहा यह ड्रामा
मीडिया से लेकर
अदालतों तक पसर गया हंगामा
आस के मटके फूट चुके थे
समाधान का पानी बिखर चुका था
और प्यासा, दो घूँट पानी के इंतज़ार में
रहनुमाओं की ओर देखते-देखते
कबका मर चुका था!

✍️ चिराग़ जैन

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