+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

डेमोक्रेसी को बचा लो

डेमोक्रेसी को बचा लो तुमको कुर्सी की कसम
इसकी टूटी नाव संभालो तुमको कुर्सी की कसम

जो अपने खेमे में है उसकी फाइल दबवा दो
जो विरोध करता हो उसकी कचहरी लगवा दो
इस आदत पर मिट्टी डालो तुमको कुर्सी की कसम

रामदेव के आंदोलन पर लाठीचार्ज कराया
अब पसली टूटी तो नैतिकता का पाठ पढ़ाया
भैया कुछ तो ठीक लगा लो तुमको कुर्सी की कसम

हरखू की रोटी का मुद्दा फिर फिर टल जाता है
ख़बरों में बाबाजी का बुलडोजर चल जाता है
रोटी के भी प्रश्न उठा लो तुमको कुर्सी की कसम

हम चुनाव पर आँख गड़ाकर बैठे घात लगाए
भूख, ग़रीबी, शिक्षा इनका जो हो वो हो जाए
अब ये साफ़-साफ़ कह डालो तुमको कुर्सी की कसम

नफ़रत, गाली, झूठ, सियासी दांव-पेंच और दंगा
इनका भगवा उनका हरिया, घायल हुआ तिरंगा
इन घावों पर लेप लगा लो तुमको कुर्सी की कसम

✍️ चिराग़ जैन

साहित्य और समाधान

अपराध करने जा रहे व्यक्ति को सबसे ज़्यादा डर अपने-आपसे लगता है। यही कारण है कि चोर, हत्यारे, जेबकतरे, झूठे, षड्यंत्रकारी, मिलावटखोर, रिश्वतखोर, बलात्कारी और अन्य प्रकार के अपराधी अपराध करने के लिए एकांत तलाशते हैं। यह एकांत अन्य किसी से नहीं, बल्कि स्वयं से चाहिए होता है।
चोरी करते व्यक्ति को यदि कोई हल्की-सी आहट भी सुनाई दे जावे तो वह भयभीत हो जाता है। उसका यह भय लोगों के जाग जाने का भय नहीं होता, अपितु अपनी आत्मा के जाग जाने का भय होता है। वह जानता है, कि यदि ज़मीर जाग गया तो खुली तिजोरी में से भी वह एक तिनका न उठा सकेगा। वह आश्वस्त है कि आत्मा ने करवट ली, तो सब बटोरा हुआ सामान वापस वहीं रखना पड़ेगा। इसलिए हर अपराधी आहट सुनकर पसीना-पसीना हो जाता है।
पूरी दुनिया का साहित्य समाज में व्याप्त विद्रूपताओं के लिए इसी आहट की भूमिका अदा करता है। एक बार इस आहट से चेतना कुलबुला जाए, फिर किसी दण्ड संहिता की आवश्यकता न रह जाएगी। बलात्कार को उन्मत्त व्यक्ति बलात्कृता का मुँह नहीं, अपनी आत्मा के कान भींच रहा होता है। उसे भय रहता है कि कहीं इसकी दर्द भरी आवाज़ ने उसकी आत्मा को छू लिया तो फिर वह कुछ न कर सकेगा। वह जानता है कि उसके भीतर का मनुष्य जाग गया, तो फिर उसके सिर पर सवार पशु मूक हो जाएगा।
यही कारण है कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ किसी समस्या का समाधान सौंपने का प्रयास नहीं करतीं, बल्कि समस्या की आत्मा का द्वार झखझोरकर मौन हो जाती हैं। यही कारण है कि श्रेष्ठ फिल्मों में ‘हैप्पी एंडिंग’ या ‘ट्रेजिक एंडिंग’ की आवश्यकता नहीं होती। वे तो समस्या को पूरी ताक़त से दहला कर फेड आउट हो जाती हैं। समस्त व्यंग्य साहित्य समस्या के ज़मीर पर चोट करता है। समस्त हास्यरस समस्या की चेतना को गुदगुदाकर जगाना चाहता है।
उमराव जान फ़िल्म के समापन पर नायिका यह भाषण नहीं देती की अन्यान्य परिस्थितियों के कारण कोठों तक पहुँची लड़कियाँ निरपराध हैं, यदि वे कभी लौट आएँ तो उनके आंगनों को उनका स्वागत करना चाहिए, न कि तिरस्कार..! यह संदेश तो झीनी चिक में से झाँकती नायिका की आँखों पर स्पष्ट लिखा है। फ़िल्म का कुल उद्देश्य यही है कि समाज की आत्मा जागकर इन आँखों का दर्द पढ़ने योग्य बने।
गाय की पूँछ पकड़कर स्वर्ग जानेवाला होरी सामाजिक रूढ़ियों पर चोट करके केवल समाज की आत्मा को जगाना चाहता है। वह गोदान के पक्ष अथवा विरोध में कोई फैसला सुनाता नहीं दिखाई देता।
साहित्यकार से सामाजिक अथवा राजनैतिक समस्याओं समाधान मांगनेवाले लोग न तो साहित्य से परिचित हैं, न ही समाज से। जिस साहित्यिक कृति को गाली देने का उन्हें कोई स्कोप नहीं मिलता, वहाँ वे समाधान का पुछल्ला उठा लाते हैं।
साहित्यकार केवल समस्या को रेखांकित करके समाज के सम्मुख प्रस्तुत करता है। किसी अन्याय के अनदेखा रह जाने की स्थिति से जूझकर उसे सार्वजनिक पटल पर उपस्थित करता है। उसे देखकर कोई अपनी आत्मा को जगाने की बजाय, उल्टे साहित्यकार का ही पंचनामा करने लगे तो यह ऐसे ही है ज्यों किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अस्पताल पहुँचानेवाले की थाने में पेशी होना।
साहित्यकार समाधान का मार्ग बता सकता है, उस पर चलना तो समाज को स्वयं ही होगा। निराला इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ती महिला से समाज का साक्षात्कार ही करा सकते हैं। यदि समाज यह कहने लगे कि निराला उसे पत्थर तोड़ते देखकर कविता लिखने क्यों बैठ गए, उसकी सहायता क्यों नहीं की। तो यह उलाहना समष्टि के पथ पर बढ़ चले रचनाकार को व्यष्टि तक सीमित कर देने का कुप्रयास होगा।
बाबा तुलसी ने रामकथा में राम का चरित्र समाज के सामने रखा। उससे अर्थ ग्रहण करके रामराज की स्थापना का कार्य तुलसी का नहीं, समाज का है। वेदव्यास ने द्वापर में घटित महायुद्ध के कारण तथा मानसिकता समाज के सम्मुख प्रकट की। अब उन स्थितियों से अपने समाज को बचाए रखना समाज का काम है।
कबीर की सभी रचनाएँ कर्मकाण्ड और ढोंग पर चोट करती हुई आगे बढ़ जाती हैं। वे किसी मुल्ला या किसी पण्डित को प्रवचन नहीं देते, बल्कि उनकी क्रियाओं पर कटाक्ष करके उनके ज़मीर का द्वार खटखटाते हैं।
साहित्यकार समाज को विवेकी बनाना चाहता है। यदि समाधान भी साहित्यकार ही सौंप देगा तो समाज अपने विवेक का प्रयोग करने की क्षमता खो बैठेगा। फिर समाज की दशा उन मवेशियों की तरह हो जाएगी जो किसी के हाँकने पर किसी दिशा में बढ़ जाते हैं। फिर साहित्यकार और प्रवचनकार में कोई अंतर न रह जाएगा। फिर आत्मा को जगाने की बजाय भीड़ जुटाने को वरीयता दी जाने लगेगी। फिर सभ्यता के विकास की बजाय अपने-अपने दोपाये मवेशियों के क़बीले लेकर प्रत्येक साहित्यकार ‘लीडर’ बना बैठा होगा।

✍️ चिराग़ जैन

मुनाफ़े का रन-वे

विमानन सेवाओं ने मुनाफ़े को वरीयता देते हुए यात्रियों के कष्टों को पूरी तरह अनदेखा कर दिया है। आप जब कोई फ्लाइट बुक करते हैं तो उसके हिसाब से आगे का कार्यक्रम तथा बुकिंग भी प्लान करते हैं। जब सब कुछ तय हो जाता है तब अचानक पता चलता है कि एअरलाइंस को सवारी कम मिली, इसलिए उसने आपसे बिना पूछे आपको किसी अन्य फ्लाइट में शिफ्ट कर दिया है। इस बदलाव से आपका यात्रा का उद्देश्य, आपकी आगे की यात्रा तथा आपका सुख-चैन ध्वस्त होता हो तो होता रहे। जब आप एयरलाइंस के ऑफिस में फोन करके इस असुविधा की शिकायत करते हैं तो वहाँ आईवीआर की तरह रटे हुए वाक्य बोलनेवाले मनुष्य आपसे कुल तीन वाक्यों में बात करते हैं:
1. आपको हुई असुविधा के लिए हमें खेद है।
2. आप यदि यात्रा नहीं करना चाहते तो आपको फुल रिफण्ड मिलेगा।
3. सॉरी, सर यह कंपनी पॉलिसी है, इसमें हम आपकी कोई सहायता नहीं कर सकते।
इन तीन वाक्यों के बल पर वे आपका रक्तचाप अपने हवाई जहाज से भी ऊँचा पहुँचाकर फोन काट देते हैं।
फ्लाइट कैंसिलेशन के कारण बताते हुए ‘ऑपरेशनल रीज़न’ लिखकर काग़ज़ की ख़ाना-पूर्ति कर दी जाती है।
आप परेशान होकर अन्य फ्लाइट विकल्प देखते हैं तो अन्य एयरलाइंस की टिकट ‘आपदा में अवसर’ तलाशते हुए दो-तीन गुनी बढ़ चुकी होती है। अब आपको समझ नहीं आता कि फुल रिफण्ड देनेवाली एयरलाइंस का धन्यवाद किन शब्दों में ज्ञापित करें!
मैं ऐसी ही एक एयरलाइंस से फुल रिफंड लेने की ख़़ुशी मनाता हुआ, तीन गुना किराया और चार गुना समय नष्ट करके वाराणसी से चेन्नई जा रहा हूँ। रास्ते में चार घण्टे बंगलोर हवाई अड्डे पर बैठकर इतनी दयावान विमानन सेवाओं के प्रति कृतज्ञ महसूस करूंगा।
न्यायालय में इस प्रकार के मुक़द्दमों के भाग्य में सिवाय धूल के कुछ नहीं है। प्राधिकृत नियामकों को नैतिक-अनैतिक तरीक़े से विमानन सेवाओं से उगाही करने से फ़ुर्सत नहीं मिलती। लोक कल्याणकारी सरकारों ने ये सब सेवाएँ निजी हाथों में बेचकर अपना पल्ला झाड़ ही लिया है।
चूँकि सरकार सर्वज्ञ होने के साथ-साथ स्थितप्रज्ञ भी है, अतः वह यह सारा खेल जानते हुए भी अपनी वेदी पर चढ़नेवाले चढ़ावे से आगे देखने का प्रयास नहीं करती। जनता के दुःख-दर्द में यदि सरकार हस्तक्षेप करेगी तो जनता अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने की इम्यूनिटी नहीं जुटा पाएगी, इसलिए सरकार जनता को मुनाफ़ाखोरों के आगे फेंककर अपने हिस्से का चढ़ावा चबाते हुए जनता के संघर्ष का खेल देखती रहती है।
हाल ही में जिस सरकारी एयरलाइंस को निजी हाथों में बेच दिया गया है, उसमें नए मालिक ने आरटीआई और जन-शिकायतों की सारी फाइलें नष्ट करके ये दोनों विभाग बंद कर दिए हैं। जनता के प्रति उत्तरदायित्व का इससे बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता।
आम नागरिक इस बात से ख़ुश है कि विमानन सेवाओं के किरायों से लेकर मनमानी तक, कहीं कोई अवरोधक नहीं है… देश सही दिशा में विकास कर रहा है।

✍️ चिराग़ जैन

पाड़ ले मेरी पूँछ

जन्तर-मन्तर पर एक आन्दोलन उपजता है। युवा, वृद्ध, स्त्री, पुरुष, अमीर, ग़रीब सब एक बूढ़ी काया में तन्त्र के सुधार की उम्मीद देखने लगते हैं। कोई राजनैतिक आधार नहीं, कोई प्रोपेगेंडा नहीं, कोई ग्लैमर नहीं… पीछे बैनर पर महात्मा गांधी का भव्य चित्र, आगे श्वेत वसन धारी अन्ना हजारे, माइक पर जनता को आंदोलन का अर्थ समझाते कुमार विश्वास और अनशनकारी के साथ बैठे अरविंद केजरीवाल तथा मनीष सिसोदिया।
कांग्रेस शासन के अहंकार से त्रस्त मीडिया ने अपने सारे कैमरे जन्तर-मन्तर की ओर घुमा दिए। एक शब्द यकायक पूरे देश में आग की तरह फैल गया – ‘जनलोकपाल’। जिस तरह की तहरीरें हुईं, उनसे जन-समर्थन का आकार बढ़ता गया। जिसे देखो वही ‘मैं भी अन्ना’ की टोपी लगाए जन्तर-मन्तर की ओर बढ़ चला।
उधर दस वर्ष से सत्ता पर क़ाबिज़ कांग्रेस की मनमानियों का विरोध करनेवाले बुद्धिजीवी तथा सामाजिक व्यक्तित्व भी आंदोलन के मंच पर आ पहुँचे। शांतिभूषण, प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, आशुतोष, किरण बेदी और न जाने कितने ही लोकप्रिय चेहरे आन्दोलन के मंच पर दिखने लगे। जनता का सैलाब उमड़ रहा था। ‘जनलोकपाल’ बिल गीत, संगीत, नुक्कड़ नाटक, नारेबाज़ी, कविता पर सवार होकर पूरे माहौल पर छा गया था।
कांग्रेस के तत्कालीन विरोधी राजनेताओं ने भी इस मंच पर चढ़ने की कोशिश की, लेकिन आंदोलन की कोर कमेटी ने किसी भी राजनैतिक व्यक्तित्व को मंच पर चढ़ने की अनुमति नहीं दी। इस निर्णय के कारण उमा भारती और ओमप्रकाश चौटाला सरीखे जनप्रतिनिधियों को आंदोलन तक पहुँच कर बैरंग वापस लौटना पड़ा।
इस निर्णय से जनता का विश्वास और बढ़ा। मीडिया ने इस निर्णय को ख़ूब हाइलाइट किया और जन्तर-मन्तर पर जनता की सूनामी आ गयी।
सबको यक़ीन हो गया कि यह ‘जनलोकपाल बिल’ भारतीय तन्त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की इति कर देगा। उन दिनों अचानक से जनता में भी ईमानदारी के अंकुर फूटने लगे थे। मैंने देखा कि जो लोग सौ-पचास रुपये ले-देकर निकल लेने के अभ्यस्त थे, उन्होंने भी चालान होने पर बाक़ायदा चालान भरना शुरू कर दिया था। यह सब देखकर महसूस हुआ कि यदि सिस्टम का करप्शन दूर हो जाए तो जनता स्वतः नियमों का सम्मान करने लगती है।
जो लोग भारत की जनता को भ्रष्टाचारी कहकर ‘इस देश का कुछ नहीं हो सकता’ टाइप के डायलॉग बोलते हैं, उन्हें मैं यह बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि राजनीति, ब्यूरोक्रेसी और उद्योगों के आधार पर पनप रहे मध्यस्थों को छोड़ दें तो बाक़ी जनता को किसी भी प्रकार के नियम का उल्लंघन करने में कोई रुचि नहीं है। यदि जनता आश्वस्त हो कि उसके टैक्स का पैसा स्विस बैंकों के आंकड़ों में तब्दील नहीं होगा या राजनैतिक हित साधने के लिए प्रकारांतर से वोट ख़रीदने का अस्त्र न बनेगा तो उसे टैक्स देने में कोई आपत्ति नहीं होगी। इसलिए जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार के लपेटे में जनता को समान रूप से शामिल करता है, वह परिस्थिति को सुलझाने और समझने की बजाय पीड़ित को दोषी सिद्ध करने में अधिक विश्वास रखता है।
अन्ना आंदोलन के समय जनता की उम्मीदें जाग उठी थीं और ‘सिविल सोसाइटी’ नामक अवधारणा पुनः अस्तित्व में आई थी। जेपी आंदोलन के बाद जनता का ऐसा संगठित रूप पहली बार दिखाई दिया था। मुझे अच्छी तरह याद है, उन दिनों अन्ना की हर हरक़त सरकारी तंत्र की नींद उड़ा देती थी।
इसी अवसर का लाभ उठाकर बाबा रामदेव ने भी काले धन के खि़लाफ़ मोर्चा खोल दिया। रामलीला मैदान में पहुँचने का आह्वान हुआ और बाबा रामदेव जब दिल्ली हवाईअड्डे पर उतरे तो पाँच-पाँच कैबिनेट मिनिस्टर उनकी मनुहार के लिए एयरपोर्ट पर हाथ बांधे खड़े थे।
उधर अन्ना आंदोलन जनलोकपाल की हठ पर अड़ा था। रामलीला मैदान में आधी रात को लाठीचार्ज हुआ और बाबा का आंदोलन कुचल दिया गया। इधर कई दौर की बातचीत के बाद भी सरकार और अन्ना आंदोलन के मध्य कोई सहमति नहीं बनी तो एक दिन मीटिंग के बाद तत्कालीन कानून मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने मीडिया के सामने झुंझलाकर कहा कि – ‘चुनाव लड़ें ना, बिल बनाना है तो चुनाव लड़कर सरकार में आओ और बनवा लो बिल।’
इससे पूर्व राजनेताओं को मंच न दिए जाने के मुआमले में अरविन्द केजरीवाल अन्ना के मंच से यह घोषणा कर बैठे थे कि न तो हम किसी राजनैतिक दल को अपने मंच पर आने देंगे और न ही राजनीति में पदार्पण करेंगे। लेकिन सिब्बल की चुनौती के बाद कोर कमेटी में यह सुगबुगाहट होने लगी थी कि राजनैतिक पार्टी बनाई जावे या नहीं।
एक धड़ा कहता था कि इतने बड़े जन-समर्थन को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव लड़ना सभी का अधिकार है और अच्छे चरित्र के लोगों को राजनीति में सक्रिय होना भी चाहिए। उधर, दूसरे पक्ष का यह मानना था कि यदि हमने राजनीति में पदार्पण किया तो यह आंदोलन भी पिछले आंदोलनों की भाँति अपने सत्व का चुम्बकत्व खो देगा। सिविल सोसाइटी की अवधारणा ध्वस्त हो जाएगी और भविष्य में जनता ऐसे जन-आंदोलनों से जुड़ने से पहले हज़ार बार विचार करेगी।
इस दूसरे पक्ष में स्वयं अन्ना हजारे भी शामिल थे। दिल्ली का चुनाव सामने था और आंदोलनकारियों को बहुत जल्दी कोई बड़ा निर्णय लेना था। इस स्थिति में राजनीति में जाने के समर्थकों ने अन्ना की बात को अनदेखा करके ‘आम आदमी पार्टी’ की घोषणा कर दी।
जिस कोर कमेटी ने राजनेताओं को आंदोलन का मंच नहीं लेने दिया था, वही कोर कमेटी आंदोलन का मंच छोड़कर राजनीति के अखाड़े में दाँव लगाने लगे। अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास, संजय सिंह, योगेन्द्र यादव और तमाम चेहरे जनसभाएँ करके वोट जुटाने में लग गए।
किरण बेदी सरीखे व्यक्तित्व अन्ना के समर्थन में राजनैतिक पार्टी से दूर रहे और केजरीवाल आदि की राजनैतिक महत्वाकांक्षा की भर-भर निंदा करने लगे।
आंदोलन पार्श्व में चला गया और राजनीति की बिसात बिछ गयी। आम आदमी पार्टी का कुछ लोग मखौल बनाने लगे और कुछ इसे उम्मीद की किरण कहकर समर्थन में आ जुटे।
प्रारम्भिक स्थिति यह थी कि पार्टी के पास चुनाव लड़ने के लिए कुल सत्तर प्रत्याशी नहीं थे। ‘जो मिला उसे टिकट दे दिया’ -की नीति पर प्रत्याशी घोषित किये गए। उधर भारतीय जनता पार्टी ने उन्हीं किरण बेदी को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित कर दिया, जो राजनीति में उतरने पर केजरीवाल की निंदा कर रही थीं।
देश का राजनैतिक परिप्रेक्ष्य बदल गया। कांग्रेस का बड़ा किला यकायक ध्वस्त होने लगा। शीला दीक्षित जैसी सफल राजनेत्री कांग्रेस की अहमन्यता की भेंट चढ़ गयी और दिल्ली विधानसभा से कांग्रेस ग़ायब हो गयी। उधर केन्द्र की कांग्रेस सरकार भी लोकनिंद्य हुई और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता ने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर सुशोभित कर दिया।
राजनीति का चरित्र पूरी तरह बदल गया। इसके बाद राजनैतिक बैनर्स का रंग-रूप बदलने लगा। भारतीय जनता पार्टी के पोस्टर्स से अटल-आडवाणी युग समाप्त हो गया और दिल्ली की गद्दी पर बैठे केजरीवाल ने अपने साथियों से एक-एक करके किनारा कर लिया। जो पार्टी से बाहर जाता, वही केजरीवाल को महत्वाकांक्षी बताकर आलोचना करता।
कुछ जो ज़्यादा आहत हुए उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में ठीया बना लिया। कुछ येन-केन-प्रकारेण राजनीति में बने रहने के लिए कुछ-कुछ उछलकूद करते रहते हैं।
जन्तर मन्तर पर जो पौधा बोया गया था, उसके एक-एक पत्ते को झाड़ दिया गया और जिन अन्ना को आगे रखकर आन्दोलन खड़ा किया गया, वे पिछले कुछ वर्षों से अदृश्य हैं। बाबा रामदेव राजनैतिक गतिविधियों से लोकप्रियता बटोरकर पतंजलि के प्रोडक्ट्स के व्यापार को शानदार तरीके से चला रहे हैं। कंपनियों की ख़रीद-फ़रोख़्त करके उन्होंने अपने टर्न ओवर को आश्चर्यजनक रूप से बढ़ा लिया है। उनसे आजकल कोई कालेधन संबंधी उनके दावों पर प्रश्न करता है तो वे उसको कहते हैं कि ‘मेरी पूँछ पाड़ ले!’
इधर आंदोलन के प्रभाव से बनी पार्टी ने पंजाब में भारी सफलता प्राप्त की और नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री भगवंत मान ने यह आदेश पारित किया है कि पंजाब के सरकारी दफ्तरों में अब सरदार भगतसिंह और बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर की ही तस्वीर लगाई जाएगी। महाराज रणजीत सिंह, महात्मा गांधी और विवेकानन्द के चित्र सरकारी दफ्तरों से हटा दिए गए हैं। इस निर्णय से यह सिद्ध होता है कि राजनीति में श्रद्धा तथा सम्मान भी गणित की पुस्तकों के अनुसार तय किया जाता है।
महात्मा गांधी की तस्वीर अन्ना आंदोलन की आखि़री याद थी। उसे हटाकर पंजाब सरकार ने यह बता दिया है कि जिसके नाम पर जितने समय तक समर्थन मिलेगा, उसकी तस्वीर उतने समय तक मुस्कुराती रहेगी।
सबके अपने-अपने मार्गदर्शक मंडल हैं… सबके अपने अपने रालेगण सिद्धि हैं और सबके अपने-अपने महात्मा गांधी हैं। सबके अपने आदर्श हैं और सबकी अपनी राजनीति है… जनता कुछ पूछे तो कह दिया जाएगा – ‘जा मेरी पूँछ पाड़ ले।’

✍️ चिराग़ जैन

चुनाव के बाद

जीत और हार के शोर-शराबे के बाद यकायक राजनैतिक गलियारों में सन्नाटा पसर गया है। जीतनेवाले इतने स्पष्ट बहुमत से जीते हैं कि मीडिया के पोस्ट इलेक्शन अलायंस और हॉर्स ट्रेडिंग जैसे कैप्सूल धरे के धरे रह गये हैं।
यही स्पष्ट बहुमत वर्तमान लोकतंत्र की दरकार है। आरोप-प्रत्यारोप जैसे तमाम हो-हल्ले पर चुनाव परिणाम ने पूर्णविराम लगा दिया है।
इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि अब जीतनेवाले सरकार चलाएँ और बाक़ी सबकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गयी। जो नहीं जीत सके हैं, उनका उत्तरदायित्व अब और अधिक हो गया है। विपक्ष लोकतंत्र को आकार देनेवाली हथेली है। यदि विपक्ष अपना काम ठीक से न करे तो सत्ता के चाक पर घूमती सरकार बेतरतीब आकार लेने लगेगी।
वर्तमान राजनैतिक चर्चाओं में विपक्ष को सरकार का शत्रु मानने की परंपरा चल निकली है, जबकि विपक्ष लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग होते हुए प्रकारांतर से सरकार का हिस्सा ही है।
विपक्ष को यह समझना होगा कि उसकी भूमिका चाक पर घूमती मिट्टी को लोई को आवश्यक छुअन और दबाव से सार्थक आकार देने तक सीमित है। यदि हथेली मिट्टी की लोई को हटाकर स्वयं चाक पर घूमने का प्रयास करेगी तो स्वयं भी घायल होगी और भविष्य के निर्माण को भी ध्वस्त कर देगी।
इसी प्रकार सरकार को भी यह समझना होगा कि तेज़ गति से घूमती लोई पर यदि कोई अंगुली का दबाव महसूस होने लगा है तो इसका अर्थ है कि अब तंत्र के एक निश्चित आकार में ढलने का समय आ गया है।
हथेली मिट्टी से स्वयं को रिप्लेस न करे और मिट्टी हथेली की छुअन से परहेज न करे तो लोकतंत्र के चाक की गति निर्माण का कारण बन जाएगी।
जनता ने विधायिका की नियुक्ति कर दी है। अब इसके बाद जनता का भाजपाई, कांग्रेसी, सपाई, बसपाई, आपिया या अकाली होना समीचीन नहीं है। अब जनता को भी जनता होकर हर जीते हुए प्रत्याशी को अपना प्रतिनिधि मानकर उसे तंत्र के प्रचालन का अधिकार देना होगा। अब हर जीते हुए प्रत्याशी को भी जनता को ‘पाँच वर्ष के लिए अनावश्यक’ समझने की बजाय सर्वाेच्च सत्ता समझते हुए प्रत्येक निर्णय से पूर्व इस सर्वाेच्च सत्ता के प्रति उत्तरदायित्व बोध से युक्त रहना होगा।
-सत्ता को यह मानना होगा कि सवाल पूछनेवाला हर व्यक्ति सरकार का विरोधी नहीं है।
-विपक्ष को यह मानना होगा कि सरकार के प्रत्येक निर्णय का विरोध आवश्यक नहीं है।
-जनता को यह जानना होगा कि विपक्ष के अभाव में कोई भी सत्ता जनता की बात नहीं सुन सकती।
-मीडिया को यह समझना होगा कि हर बुलेटिन में शोर भर देने का नाम पत्रकारिता नहीं है।
-साहित्य को यह स्वीकारना होगा कि नारे, जयकारे, आरती, चालीसा और गाली को कभी साहित्य नहीं कहा जाएगा।

© चिराग़ जैन

error: Content is protected !!