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वितण्डावाद का ताण्डव

‘सत्ता का खेल तो चलेगा। सरकारें आएंगी-जाएंगी। पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतन्त्र अमर रहना चाहिए। क्या आज के समय में ये कठिन काम नहीं हो गया है? ये चर्चा तो आज समाप्त हो जाएगी। मगर कल से जो अध्याय शुरू होगा, उस अध्याय पर थोड़ा ग़ौर करने की ज़रूरत है। ये कटुता बढ़ना नहीं चाहिए।’ -पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के ये शब्द आज भी रह-रहकर हमारे कानों में गूंजते हैं।
सोशल मीडिया के इस दौर में वितण्डावाद का जो ताण्डव हम दिन-प्रतिदिन देख रहे हैं, उसके अंत में हमारे पास कटुता के अतिरिक्त कुछ शेष न रह जाएगा। राजनैतिक दलों ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर जिस तरह से एक पूरी पीढ़ी की सोच को सीमित करने का प्रयास किया है, वह पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी के स्वर में वर्णित ‘लोकतंत्र’ की परिकल्पना के विपरीत आचरण का मार्ग है। मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि यह प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक राजनैतिक दल की है।
रामायण ने हमें सिखाया है कि शत्रु जिस द्वार से आक्रमण करेगा, समाधान भी उसी द्वार से आएगा। यही कारण है कि लक्ष्मण मूर्च्छित हुए तो वैद्य सुषेण भी उसी लंका से उपचार के लिए आए, जिससे मेघनाद आया था।
यदि हम आज से ही सोशल मीडिया का प्रयोग करते समय कुछ बातों का पालन करना प्रारंभ करें तो शायद इस माध्यम का प्रयोग करके प्रोपेगैंडा करने वाली सभी एजेंसियाँ हतोत्साहित होंगी। फिर देशहित की बात करने पर जब कोई आप पर तंज करेगा कि आप राजनैतिक माहौल सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं; तो आप उसे बता सकेंगे कि हम अफवाह के उस तंत्र की जड़ खोद रहे हैं, जिसकी डालियों पर सामाजिक विघटन के फल लगते हैं।
1. यदि जन-सामान्य की समस्या से जुड़ी अथवा लोकतंत्र की समालोचना से संबंधित किसी पोस्ट को अमुक राजनैतिक दल का ‘विरोध’ सिद्ध करने का प्रयास किया जाए तो ऐसे कमेंट्स को इग्नोर करेंगे। उन्हें उत्तर देते ही आप उन्हें सफल कर देंगे क्योंकि उनका उद्देश्य ही यह है कि आप विषय को भूलकर स्वयं को निष्पक्ष साबित करने में व्यस्त हो जाएँ।
2. अश्लील, अभद्र तथा असंसदीय शब्दावली का प्रयोग करने वाले व्यक्ति को (भले ही वह आपकी पोस्ट के समर्थन में हो) तुरंत ब्लॉक करेंगे।
3. किसी भी सम्प्रदाय की आड़ में कट्टरता, अराजकता और हिंसा का समर्थन करनेवाले व्यक्ति की पोस्ट/कमेंट को इग्नोर करेंगे।
4. उन फेक प्रोफाइल्स की पहचान करके उन्हें अपनी मित्रता सूची से बाहर करेंगे, जिनका निर्माण ही किसी दल अथवा विचारधारा के प्रचार हेतु किया गया है। ध्यान से देखने पर आप समझ जाएंगे कि ऐसी प्रोफाइल्स पर डीपी से लेकर वॉल तक कहीं भी प्रोफ़ाइल होल्डर की पहचान नहीं मिलती। इनकी वॉल पर या तो डीपी चेंज नोटिफिकेशन के अलावा कुछ नहीं मिलेगा या फिर राजनैतिक दलों के प्रोपेगेंडा पेज से शेयर करके लाई गई पोस्ट्स होंगी। ये ही वो प्रोफाइल्स हैं जिनके दम पर राजनैतिक दल अफवाह और झूठ फैलाने तथा मुद्दों से भटकाने में सफल होते हैं।
5. किसी भी राजनेता के निजी जीवन में प्रवेश करके उसकी चरित्र हत्या को ‘आलोचना’ का नाम देने वाली पोस्ट से दूरी बनाए रखेंगे। क्योंकि किसी की निजता का सम्मान न किया गया तो भविष्य में कोई भी समाज के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं करेगा।
6. किसी राजनेता का नाम बिगाड़कर, या उसे फेंकू, तड़ीपार, पप्पू, टोंटीचोर आदि नाम से संबोधित करनेवालों को दूर से प्रणाम करेंगे क्योंकि इनके पास कोई सामाजिक अथवा राजनैतिक समझ नहीं है, ये लोग सुनी-सुनाई अभद्रता से विषय को भटकाना चाहते हैं।
7. किसी भी राजनेता की बीमारी, चोट, कद-काठी, लिंग, जाति, धर्म, रंग, चेहरा-मोहरा और बोली का उपहास करके मूल विषय को भटकाने के प्रयासों से सावधान रहेंगे क्योंकि हमें राजनेताओं से जनता का नेतृत्व करवाना है, उनसे पारिवारिक सम्बंध नहीं जोड़ना है।
8. टीवी डिबेट में अलग-अलग राजनैतिक दलों के प्रवक्ता जिन जुमलों से बहस को नष्ट कर देते हैं, उन जुमलों से अपनी पोस्ट्स और कमेंट बॉक्स को बचाएंगे।
9. वर्तमान अथवा भविष्य के प्रश्न को इतिहास, जाति अथवा सम्प्रदाय पर अटकाकर नष्ट करने वालों को उत्तर देने में ऊर्जा ध्वंस नहीं करेंगे।
10. फेसबुक पर कुछ भी लिखने से पूर्व यह विचार अवश्य करेंगे कि इससे किसी प्रकार से मनुष्यता अथवा लोकतंत्र तो आहत नहीं हो रहा।
ये नियम यदि हमने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से पालन करने आरम्भ कर दिए तो मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि आप बहुत जल्दी ही अपने समाज को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाए जा रहे वितण्डों से मुक्ति होता देखेंगे।
और एक अंतिम बात- अपने रक्त संबंधों; पारिवारिक मित्रों; सहकर्मियों; सहयात्रियों अथवा संबंधियों से चर्चा करते समय यदि अपने पक्ष और संबंध में से किसी एक को चुनना पड़े तो संबंध को बचाएंगे क्योंकि जो हमारे अपने हैं, वो आज नहीं तो कल हमारे साथ अवश्य खड़े होंगे।
भारत एक ऐसा उपवन है जहाँ अलग-अलग रंग के फूल खिलते हैं। हमें उन व्यापारियों की कोई ज़रूरत नहीं है, जो फूलों को डालियों से अलग करके बाज़ार में बेच दें। हमें तो वह माली चाहिए जो अलग-अलग रंग के फूलों को करीने से लगाकर बगीचे की सुंदरता बढ़ा सके।
सहमत हों, तो राष्ट्रहित में शेयर ज़रूर करें।

✍️ चिराग़ जैन

भारतीय लोकतंत्र : एक ढकोसला

भारतीय जनता पार्टी के चुनावी चाणक्य बाक़ायदा मीडिया के सामने बैठक बुलाकर यह बताते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का वोट अपनी ओर मिलाने के लिए वे जाट नेताओं को माना रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी घोषणा करके दलितों की पार्टी होने का दावा करती है। एआईएमएम घोषित करती है कि वह मुसलमानों की पार्टी है। शिवसेना डंके की चोट पर ख़ुद को हिन्दू समाज की पार्टी बताती है। शिरोमणि अकाली दल के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि वह सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है।
और यह सब तब जबकि हमारे यहाँ संवैधानिक रूप से धर्म-सम्प्रदाय के आधार पर कोई राजनैतिक दल गठित नहीं किया जा सकता।
आज जब दिल्ली में जाटों की मनुहार चल रही थी तो उस पंचायत में भाग लेने के लिए माननीय गृहमंत्री जी गणतन्त्र दिवस की परेड से सीधे वहाँ पधारे थे। बाद में टीवी चौनल्स पर जाट नेता सर-ए-आम बता रहे थे कि जाट किस दल को वोट देंगे। और यह सब तब जबकि हमारा संविधान हमें बताता है कि भारत में गुप्त मतदान प्रणाली है और किसी भी मतदाता पर न तो किसी को मत देने के लिए दबाव बनाया जा सकता है न ही उससे पूछा जा सकता है कि वह अपने मताधिकार का प्रयोग किसके पक्ष में करेगा!
इन सब विरोधाभासों को देखता हूँ तो समझ आता है कि भारतीय लोकतंत्र एक ऐसा ढकोसला बनकर रह गया है जिसकी गरिमा को तार-तार करने में पूरा तंत्र समान रूप से सक्रिय है। सभी राजनैतिक दल भारतीय लोकतंत्र को बाल पकड़कर घसीटते हुए जुआघर में लाते हैं और बारी-बारी से उसका चीरहरण करते हैं। बस अंतर इतना है कि जब एक पक्ष चीरहरण कर रहा होता है तो दूसरा पक्ष पांडवों के कपड़े पहन लेता है और जब दूसरा पक्ष चीरहरण में संलग्न होता है तो पहला पक्ष लपक के उसके कपड़े लपेटकर नैतिक होने का अभिनय करने लगता है।
लोकतंत्र बेचारा ईश्वर से गुहार लगाता है। बीस-तीस वर्ष की गुहार के बाद ईश्वर तो नहीं आता लेकिन ईश्वर का गेट-अप पहनकर कोई आता है और दोनों पक्षों को तितर-बितर करके ख़ुद चीरहरण करने लगता है। सभागार में बैठे राजा से लोकतंत्र इसलिए कुछ नहीं कह पाता, क्योंकि राजा की आँखों पर लोकतंत्र ने ख़ुद अपने हाथों से पट्टी बांधी है।
सभा में कुछ विदुर भी हैं। जो इस चीरहरण पर दोनों पक्षों से प्रश्न करता है। लेकिन दोनों पक्ष चीरहरण की अनैतिकता पर उत्तर देने की बजाय विदुर से प्रतिप्रश्न करते हैं कि जब उस पक्ष वाले चीरहरण कर रहे थे तब तुम कहाँ थे?
विदुर बताता है कि मैं उनसे भी प्रश्न कर रहा था। लेकिन वे उसकी बात नहीं मानते और उसके प्रत्येक प्रश्न पर प्रतिप्रश्न उछाल कर उसे लोलक की भाँति इधर-से-उधर दौड़ाते रहते हैं।
इस भागदौड़ से परेशान होकर कभी-कभी विदुर किसी एक पक्ष के साथ चीरहरण में शामिल हो जाता है और जो विदुर ऐसा नहीं कर पाता वह इस गुत्थी को सुलझाने में उलझ जाता है कि दोनों में से कौन सा पक्ष अधिक बेहतर है। वह जिसने एक ही झटके में लोकतंत्र को निर्वस्त्र कर दिया, या फिर वह जिसने तड़पा-तड़पा के हलाल स्टाइल में कपड़े उतारे।
आज गणतंत्र दिवस के दिन यह लिखते हुए मेरे भीतर एक सिहरन हो रही है कि इस देश के गणतंत्र पर राजनीति का घुन लग चुका है। बेशर्मी और ढिठाई से दल बदलने वाले लोग; अपनी कही हुई बात से पलट जाने वाले लोग; जिसे गाली दें, स्वार्थ के लिए उसके गले लग जाने वाले लोग; जिसकी उंगली पकड़ कर चले, उसे लात मारने वाले लोग; रंगे सियारों की तरह अपने मुंह में तिनके ठूस कर मौक़ा मिलते ही हुआ-हुआ करने वाले लोगों में से भारतीय समाज का भविष्य तलाश पाना लगभग असंभव हो चुका है।
चुनाव के इस भौंडे नाटक के बीच भारतीय जनमानस के भविष्य पर कालिख पोती जा रही है। लेकिन मैं इतना ज़रूर जानता हूँ कि यदि एक व्यक्ति भी इस लेख से यह समझ सका कि जिन राजनैतिक सियारों के स्वर में स्वर मिलाकर हम अपने आंगन में विष बो रहे हैं, उनका न हो हमारे धर्म से कोई सरोकार है, न हमारे वंशजों से, न हमारे भविष्य से और न ही हमसे; तो मुझे लगेगा कि अभी इस राष्ट्र की राजनीति को यह भय दिखाया जा सकता है कि जनता का विवेक अभी मरा नहीं है।

© चिराग़ जैन

मतदान

वोटिंग के दिन उंगली पर जो स्याही का निशान बनता है, वही निशान एक दिन लोकतन्त्र का राजतिलक सिद्ध होगा।

✍️ चिराग़ जैन

टिकट लेते आना

चाहे झूठ बोल के, चाहे भेद खोल के
लेते आना, टिकट लेते आना

तुम साइकिल पर पर चढ़ जाना
इक टोपी लाल लगाना
थोड़ा डण्ड पेल के
थोड़ा दण्ड़ झेल के
लेते आना
टिकट लेते आना

तुम कमल का फूल खिलाना
पूरे भगवा रंग जाना
जय श्री राम बोल के
जट श्री श्याम बोल के
लेते आना
टिकट लेते आना

तुम बिन मतलब ही लड़ना
पंजे की उंगली पकड़ना
बिंदी साथ लेके
चूड़ी हाथ ले के
लेते आना
टिकट लेते आना

जनता की बात न करना
असली मुद्दों से बचना
कभी जेब फाड़ के
कभी झोला झाड़ के
लेते आना
टिकट लेते आना

✍️ चिराग़ जैन

आगे टोल प्लाज़ा है

वह दिन दूर नहीं जब हर टोल प्लाज़ा पर लिखा होगा कि अगला टोल प्लाज़ा 500 मीटर आगे है।
2017 में भारत सरकार ने सभी वाहनों के लिए टोल टैक्स भुगतान करने के लिए ‘फास्ट टैग’ आवश्यक कर दिया था। इसके समर्थन में यह तर्क दिया गया था कि इससे टोल प्लाज़ा पर लगने वाली लम्बी कतारों से मुक्ति मिलेगी। (यद्यपि तब भी यह नियम था कि यदि टोल प्लाज़ा पर एक निश्चित दूरी से अधिक लम्बी लाइन लग जाए तो सभी वाहनों को बिना टोल वसूले जाने दिया जाएगा।)
यदि किसी ने फास्ट टैग न लगवाया तो टोल प्लाज़ा से गुज़रते समय उससे दोगुने पैसे वसूले जाएंगे। अब जनता विवश होकर निजी कंपनियों के पास फास्ट टैग ख़रीदने पहुँची। कंपनियों ने सिक्योरिटी मनी के रूप में 150-200 रुपये प्रत्येक वाहन धारक से धरवा लिए। रीचार्ज के लिए जमा करवाने वाली रक़म करोड़ों रुपये का आँकड़ा पार कर गयी।
अब हर वाहन पर फास्ट टैग लग गए और वाहन चालक यह समझने लगे कि टोल प्लाज़ा पर जाम लगना बंद हो जाएगा। कुछ जगह हुआ भी लेकिन अधिकतर टोल प्लाज़ा पर फास्ट टैग की मशीनें काम नहीं करतीं। वहाँ खिड़की पर बैठा वसूलीकर्ता आपको गाड़ी आगे-पीछे करवाता रहता है। फिर भी मशीन स्कैन न कर सके तो आपको कह दिया जाता है कि आपके फ़ास्ट टैग में बैलेंस नहीं है। आप आश्चर्यचकित होकर मोबाइल निकालते हैं। फिर उसमें फास्ट टैग की एप्प खोलकर उसे बैलेंस दिखाते हैं। वह अपने भावनाशून्य चेहरे को दूसरी ओर घुमाकर एक अजीब से स्वर में चिल्लाता है। उस स्वर को सुनकर कुछ मिनिट बाद एक प्राणी अपने हाथ में एक छोटा-सा स्कैनर लेकर आता है। आपके फास्ट टैग को स्कैन करता है और तब आप टोल से निकल पाते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में यदि आप थोड़े भी चिड़चिड़ाते हैं तो तुरंत आपकी गाड़ी के चारों ओर छह-सात पहलवान प्रकट हो जाएंगे और आपको प्रकान्तर से समझा देंगे कि हमसे पैसे वसूलने के लिए इन्होंने सरकार को पैसे दिए हैं, इसलिए इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
रोज़-रोज़ की इस ज़्यादती से परेशान होकर आप थाने जाने का विचार करते हैं और एक दिन थाने चले जाते हैं। थानेवाले आपको पहले प्यार से और फिर डाँटकर चलता कर देते हैं। आप थाने के बाहर खड़े होकर समझ जाते हैं कि पुलिसवालों के हाथों बेइज़्ज़त होने की अपेक्षा ठेकेदार के गुंडों के हाथों लुटना बेहतर है।
अब टोल प्लाज़ा पर कितनी भी लाइन लगे, आप चुपचाप खड़े रहते हैं। इस जिल्लत से गुज़रते हुए आपको यह ध्यान ही नहीं रहता कि कब आपके टोल टैक्स में 20-25 प्रतिशत की वृद्धि कर दी गयी है। इस वृद्धि का विरोध नहीं किया जा रहा, इससे ठेकेदार ख़ुश है। ठेकेदार जनता से वसूलकर मोटा पैसा सरकार को दे रहा है, इससे सरकार ख़ुश है। (क्योंकि सरकार का काम बिज़निस करना नहीं है) और जनता… वह यह सोचकर ख़ुश है कि पहले से बनी हुई सड़क पर जो नया टोल प्लाज़ा बन रहा है, उस पर अभी टोल शुरू नहीं हुआ है।

✍️ चिराग़ जैन

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