Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
मन बहुत भावुक है। जिस देश के सरकारी कर्मचारी दिन में भी काम नहीं करते, उस देश के राजनेता रात भर काम करते रहे। जिन राजनेताओं को हम भ्रष्टाचारी कहते हैं, वे राजनेता महाराष्ट्र में सरकार बनाने की भयंकर आपाधापी के बीच किसानों की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए प्रधानमंत्री से मिले। जिन विधायकों को हम शातिर समझते हैं, वे बेचारे तो इतने भोले हैं कि अजित पँवार जैसे घर के भेदी ने ‘चुपके से’ भाजपा के समर्थन पर हस्ताक्षर करवा लिए।
ग़द्दार तो जनता है, जिसने शिवसेना को वोट देकर महाराष्ट्र में ऐसी संकट की स्थिति उत्पन्न कर दी कि शिवसेना भाजपा को ब्लैकमेल करने लगी। यदि भाजपा ने शिवसेना से गठबंधन करके चुनाव लड़ा भी था, तो भी जनता को यह समझना चाहिए था कि उद्धव ठाकरे भाजपा को ब्लैकमेल कर सकते हैं। चला गया सत्तालोलुप ठाकरे भ्रष्ट एनसीपी और देशद्रोही कांग्रेस से मिलकर सरकार बनाने। अब क्या भाजपा चुपचाप बैठी जनता की बर्बादी देखती रहती। महाराष्ट्र में इतना अंधेरा फैल गया था कि पँवार परिवार में आग लगाकर उजाला किया। उस अग्नि में अजित पँवार की अग्निपरीक्षा लेकर उन्हें शुद्ध किया और तब जाकर महाराष्ट्र में लोकतंत्र का उजाला फैल सका।
कांग्रेस के प्रति भी मन श्रद्धा से भर रहा है। जो शिवसेना कांग्रेस की जानी दुश्मन थी, जिस शरद पँवार ने सोनिया गांधी के विरुद्ध प्रोपेगेंडा किया, जिस शरद पँवार को राजीव गांधी ने पॉइज़न कहा था; उनके साथ भी सरकार बनाने को तैयार हो गई ताकि देश की जनता का हित करने का अवसर उसके हाथ से न निकल जाए। यह सब कुछ क्या व्यक्तिगत हित के लिए किया जाता है! डूब मरना चाहिए ऐसा सोचनेवालों को। ये तो बेचारे राष्ट्रहित और लोकहित के लिए दर-दर भटकते फिरते हैं।
यह इस देश की सियासत के पवित्र संस्कार ही तो हैं कि इतने सारे नेता जनता की भलाई का दायित्व उठाने के लिए एक-दूसरे का सिर फोड़ रहे हैं। वो तो भला हो ईडी और सीबीआई का; जो सरकार के पुनीत निस्पृह उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कमज़ोर खिलाड़ियों को धमकाकर राष्ट्रहित की ओर मोड़ देती है। सरकार जानती है कि देशहित के बड़े लक्ष्य की पूर्ति के लिए यदि एकाध गुनहगार को पैरोल देनी पड़े, एकाध चोट्टे को ईडी और सीबीआई के शिकंजे से बचाना पड़े तो यह बलिदान लोकहित के महान लक्ष्य के सामने बहुत बौना है।
सरकार यह भी जानती है कि जिन जीते हुए विधायकों को जीतते ही गोडाउन में बंद कर दिया जाता है, उस माल को कुछ ज़्यादा क़ीमत पर ख़रीदने में भी कोई बुराई नहीं है। डील, ट्रेडिंग, फॉर्मूला जैसे शब्द लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं। जनता का वोट ख़रीदने की टुच्ची हरक़त करनेवाली राजनीति से कहीं बेहतर है कि जनता का वोट पानेवाले नेता को ही ख़रीद लिया जाए। हमारी राजनीति रिटेल से होलसेल तक आ गई है।
यह लोकतंत्र का समग्र विकास है। जिन लोगों को अभी भी राजनेताओं की नीयत पर संदेह है, उन्हें सचमुच पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
गांधी परिवार की सुरक्षा में कटौती हुई तो एनएसयूआई के कार्यकर्ता गृहमंत्री के घर के बाहर इकट्ठा हो गए। वकीलों पर आन पड़ी तो वकीलों ने पुलिस मुख्यालय का घेराव कर लिया। सरेआम कहा कि उन्हें थाने की कार्रवाई पर भरोसा नहीं है, इसलिए सीबीआई, विजिलेंस के साथ विशेष जाँच समिति बनवाई जाए।
पुलिस की छवि बचाने की नौबत आई तो शीर्ष नेतृत्व ने आँसू बहाकर बेचारे पुलिसवालों की पतवार थाम ली। इन सब मुआमलों के झरोखे में एक बार उस आम आदमी की भी सुधि ले लेनी चाहिए जिसके पास यह बताने का भी ज़रिया नहीं है कि वह असुरक्षित महसूस कर रहा है। वह सुरक्षा की झोली पसारे थाने चला जाए तो पुलिसवालों का रवैया और भाषा उसे अपमानित करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ती। वह न्याय की उम्मीद लेकर न्यायालय पहुँचता है तो न्याय व्यवस्था की पेचीदगियाँ, न्याय प्रक्रिया की गति और न्याय तंत्र की लाचारियाँ उसके पूरे जीवन को कचहरी के चक्कर लगवाकर नष्ट कर डालती हैं।
किसी सरकारी दफ्तर में आपका काम पड़ जाए तो थोड़ी ही देर में आपके मन में इस देश की व्यवस्था के प्रति घृणा से भर उठता है। रेलवे आरक्षण केंद्र पर मशीनें ख़राब हैं, मैन्युअल टिकट बनाने वाली बीसियों खिड़कियाँ हैं, लेकिन उनमें से दो या तीन पर आदमी मौजूद है। हम सिस्टम से इतने डरे रहते हैं कि बाकी खिड़कियों पर अनुपस्थित कर्मचारी के विषय में प्रश्न करते ही झिड़क दिए जाते हैं। एयरपोर्ट पर अर्द्धसैनिक बल के जवान फ्रीस्किंग की सारी मशीनें चालू नहीं करते, लोग लंबी-लंबी लाइनों में लगे रहते हैं लेकिन बाकी के काउंटर ओपन करने को कह नहीं पाते।
अस्पतालों में डॉक्टर से डरते हैं, दफ़्तरों में क्लर्क से, बैंक में बैंकर से। बस में चढ़ो तो कंडक्टर डाँटता है, बस से उतरो तो ड्राइवर। रेल में टीटी से डर लगता है तो सड़क पर सारजेंट से। थाने और न्यायालय तो हैं ही डाँट-पीट के केंद्र। सरकारी नौकरियों में ज़िन्दगी के तीस-पैंतीस साल बितानेवाले कर्मचारी की पेंशन सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ है, लेकिन दो-ढाई साल विधायकी भोगनेवाले लीडर को पालना सरकार की ज़िम्मेदारी है। किसी विवशता में किसी बीमार को बिना हेलमेट अस्पताल ले जाने लगो तो ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन है, लेकिन किसी मुस्टंडे नेता की रैली में सैंकड़ों दुपहिए तीन-तीन सवारियाँ लादकर बिना हेलमेट अख़बार में छपें तो यह फ़ख़ की बात है।
किस ढोंग को हमने व्यवस्था मान लिया है? व्यवस्था के नाम पर एक सर्कस चल रहा है, जहाँ रंग-बिरंगे जोकर पहले से फिक्स स्क्रिप्ट के अनुसार अपना नकली पेट, नकली हाथ या नकली नाक गिरा देता है, बाकी जोकर उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं। इस खेल में जनता यह भूल जाती है कि वह जनता है, और वह भी तालियाँ बजाकर मज़ाक़ उड़ा रहे जोकरों में शामिल हो जाती है।
कोई भी राजनैतिक दल इस देश के लिए कुछ नहीं कर रहा। सब अपना-अपना सर्कस सजाने में जुटे हैं। हमें लगता है कि हम जोकरों पर हँस रहे हैं, लेकिन वास्तव में हर शो के बाद सारे जोकर हम पर हँसते हैं कि आज फिर हमारी स्क्रिप्ट को सच समझकर लोग तालियाँ पीटते रहे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
इससे वो ही बच पाया, जो औरों को मरवाए
न्याय भवन में जनहित का इक ढोंग चलाया जाता है
ऊँची-ऊँची बातें करके पास बुलाया जाता है
फिर धोखे से इस चौसर के पासे बदले जाते हैं
इस दलदल में धर्मराज तक अपराधी बन जाते हैं
सिंहासन तन-मन से अंधा, वीर पड़े मुँह बाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर, कैसे प्राण बचाए
न्याय, मूर्ति बनकर बैठा है, षड्यंत्रों का मेला है
नियमों का इक चक्रव्यूह है, जिसमें सत्य अकेला है
आरोपी पर धाराओं के शस्त्र चलाए जाते हैं
नियमों का खिलवाड़ बनाकर वीर गिराए जाते हैं
सच के साथी प्रथम द्वार तक, पार नहीं कर पाए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए
वो जिसने आरोप लगाया, उससे प्रश्न करेगा कौन
ढोंग किसी का, क्षोभ किसी का, लेकिन मोल भरेगा कौन
राजभवन के जयकारों की क़ीमत कौन चुकाता है
सत्ता का अन्याय जगत् में मर्यादा कहलाता है
सच ख़ुद को साबित करता है, झूठ खड़ा इतराए
लाक्षागृह का अतिथि आख़िर कैसे प्राण बचाए
✍️ चिराग़ जैन
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हम भारत के लोग एक ऐसे तंत्र में जीने को विवश हैं, जहाँ जनता का शासन, जनता के प्रति कोई जवाबदेही महसूस नहीं करता। टेलिविज़न पर जो विज्ञापन आते हैं उनका एकमात्र उद्देश्य अपना माल बेचना होता है। दीवाली आती है तो वे अपने माल के विज्ञापन में दीवाली फेस्टिवल का जुमला जोड़ देते हैं, हम उतावले होकर दीवाली की ख़ुशी में उनका माल ख़रीदकर ख़ुश हो लेते हैं। फिर पंद्रह अगस्त आता है तो वे अपने पान मसाले के इश्तिहार में ‘आज़ादी’ जैसा कोई जुमला जोड़कर हमें पान मसाला चिपका देते हैं। हम देशभक्ति की भावुकता में पान मसाला चबाने के उपक्रम को राष्ट्रभक्ति समझ बैठते हैं। होली पर उसी पान मसाले को ज़िन्दगी के ‘रंग’ पर ट्रांसलेट कर दिया जाता है और हम समझने लगते हैं कि होली मनाने के लिए अमुक पान मसाला चबाने से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। इसी तरह हमारे शादी-ब्याह और आपसी संबंधों तक कि भावुकता का हवाला देकर सब अपना धंधा चलाते रहते हैं और हम वहीं के वहीं खड़े रह जाते हैं।
राजनीति भी ऐसा ही करती है। बिहार में माल बेचना हो तो बिहारियों के पर्व-त्यौहार भुनाए जाते हैं। महिलाओं को आकृष्ट करना हो तो अचानक महिलाओं का कष्ट राजनेताओं के दिल में दहाड़ें मारने लगता है। तमिलनाडु से वोट बटोरने हों तो हिंदीभाषी राजनेता भी वणक्कम बोलने लगते हैं। हम इस पर रीझने लगते हैं कि फलाने जी हमारी भाषा बोल रहे हैं। जैसे एक बार माल बिक जाने के बाद अपनत्व जता रहा व्यवसायी आपकी शिकायतों से इर्रिटेट होने लगता है उसी तरह एक बार चुनाव जीतने के बाद वणक्कम बोलने वाले नेताजी आपकी नमस्ते का भी जवाब नहीं देते।
हमारी रोज़मर्रा की समस्याओं से न तो किसी व्यवसायी का कोई लेना-देना है न ही किसी राजनेता का। फिर भी हम बार-बार इनके इश्तिहारों में अपनी भावुकता की चुम्बक से चिपके रहते हैं।
महानगरों में कैब सर्विस चलती है। कैब कम्पनियां धड़ल्ले से लोगों की जेब पर डाका डालती हैं, लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका मानना है कि जो आदमी कैब में चल सकता है उसे थोड़ा बहुत लूट भी लिया जाए तो इससे कोई आफत नहीं आ जाएगी। विकल्पहीनता की स्थिति यह है कि बसों में जगह नहीं है, अपनी गाड़ी लेकर निकलें तो पार्किंग वाला लूट लेता है। कुछ बोलो तो वही जुमला कि जो गाड़ी चला रहा है वो सौ-पचास रुपये के लिए झगड़ा क्यों कर रहा है?
हवाई जहाज में चलो तो विमान कम्पनियों ने जेबतराशी का गुर सीख रखा है। फ्लाइट कैंसिल हो जाए तो आप मुँह बाये देखते रहो। आप पाँच मिनिट लेट हो जाओ तो आपको फ्लाइट नहीं पकड़ने दी जाएगी, लेकिन फ्लाइट को दो, तीन, चार, पाँच घण्टे लेट कर दिया जाए तो आप इंतज़ार करने को मजबूर हैं। फ्लाइट बुक कराते समय आप पूरा पैसा भुगतान करते हैं। फिर फ्लाइट कम्पनी कहती है कि वेब चैक इन कर लीजिए ताकि हवाई अड्डे पर लाइन में न लगना पड़े। हम वेब चैक इन के लिए कम्प्यूटर खोलते हैं तो कम्पनी कहती है कि चैक इन करने के लिए सीट चुननी हो तो अलग से पैसे देने होंगे। हम कहते हैं कि सीट के ही तो पैसे देकर हमने टिकट बुक कराई थी। सामने से ग्राहक सेवा प्रतिनिधि कहता है कि सॉरी सर, कम्पनी पॉलिसी है, इसमें हम कुछ नहीं कर सकते।
दिल्ली में सड़क पर ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार ने ट्रैफिक पुलिस मुहैया करवाई है। उनको कहा गया है कि जो नियम तोड़े उसका चालान काटो। अलग-अलग ग़लती के लिए अलग-अलग जुर्माना है। किसी-किसी केस में लाइसेंस तीन महीने के लिए सस्पेंड भी किया जाता है। किसी-किसी में लाइसेंस ले लिया जाता है और वाहन चालक को कहा जाता है कि कोर्ट में जाकर चालान भुगतान करके लाइसेंस कोर्ट से लेना होगा। कोर्ट के नाम से घबराया नागरिक पुलिसवाले से अनुरोध करता है कि कोर्ट का चालान न कीजिये। पुलिसवाला कोर्ट के इस भय को समझता है, इसलिए जिसे भी पकड़ता है उसे सीधा बोलता है कि लाइसेंस जब्त होगा और तीन/चार हज़ार का चालान होगा। शिकंजे में फँसा आदमी गिड़गिड़ाने लगता है, पुलिसवाला दया से भरकर उससे पाँच-सात सौ रुपये ऐंठता है और कभी सौ रुपये का चालान बनाकर, और कभी वह भी बनाए बिना उसे चलता करता है।
इसमें यह कहा जा सकता है कि जिसने ग़लती की है उसका जुर्माना तो होना ही चाहिए। बेशक़ उसका जुर्माना होना चाहिए लेकिन इस जुर्माने की आड़ में सड़क पर हैरासमेंट कतई उचित नहीं है। ट्रैफिक पुलिस की आँखों के सामने चौराहों पर भिक्षावृत्ति होती है, एक वर्ग विशेष की भूषा बनाकर ताली बजा-बजाकर सरेआम लूट होती है।
जिन सड़कों पर चलने का दंड भुगतना पड़ता है, उनकी तीन में से दो लेन तक रेहड़ी, रिक्शा, बसें खड़ी रहती हैं। बाएँ मुड़नेवाले दाहिनी लेन में चलते हैं, दाएँ मुड़नेवाले बाएँ मुड़नेवालों का रास्ता रोक लेते हैं। सामान्य गति में चल रहे वाहन को हॉर्न बजा-बजाकर परेशान किया जाता है। सड़क टूटी हो तो महीनों तक उसकी मरम्मत नहीं होती, कोई गाड़ी ख़राब हो जाए तो उसे हटाने की कोई व्यवस्था नहीं है, सर्विस रोड पर दुकानें खुली हुई हैं, फुटपाथ पर खोखे बने हुए हैं -इन सबके लिए सरकार की ओर से कोई निदान नहीं खोजे जाते। जिन गाड़ियों का रोड टैक्स ले रहे हो, उनके लिए पार्किंग की व्यवस्था करना सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है।
ऐसा नहीं है कि इन सब अव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार के लिए शिक़ायत का प्रावधान नहीं है। वह टुनटुना भी जनता के हाथ में थमाया गया है लेकिन वह इतना पेचीदा है कि उसमें चाबी भरते-भरते बंदे के हाथ लहूलुहान हो जाते हैं, लेकिन उस खिलौने की गरारी नहीं घूमती। सुना है कि उसकी गरारी में ज़ंग लग गया है जिसमें रुपयों की ग्रीस डाले बिना काम नहीं बनता।
औरतें रोती हैं तो उनके पक्ष में कानून बना दिया जाता है। सरकारों की जय-जयकार हो जाती है। बाद में पता चलता है कि उस कानून का दुरुपयोग करके कई निर्दाेष परिवार बर्बाद किये जा रहे हैं। सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह इस कानून को बदलकर अपना वोट बैंक गँवाने की मूर्खता नहीं करना चाहती। कोई वर्ग विशेष चिल्लाता है तो सरकार उनके हाथ में ब्रह्मास्त्र दे देती है कि तुम हमें वोट देना, इसके बदले में जिस मर्ज़ी पर आरोप लगाकर उसे गिरफ़्तार करवा सकते हो।
स्कूलों में एडमिशन कराने जाओ तो लुटो, अस्पताल में इलाज कराने जाओ तो लुटो, सरकारी बस में चलो तो कष्ट सहो, सरकारी रेल में चलो तो लेट होते रहो, सरकारी दफ़्तर में काम पड़ जाए तो टेबल-टू-टेबल चढ़ावा चढ़ाते रहो, पासपोर्ट बनवाओ तो अपनी सही जानकारियों को सही कहने के लिए भी इंवेस्टिंग अफसर को चढ़ावा चढ़ाओ, रोते हुए थाने में जाओ तो अपनी असली समस्या को भूलकर पुलिसवालों से जान छुड़ाने का उपाय खोजते फिरो, अदालत में जाओ तो शिकायत करने के लिए वक़ील पर आश्रित रहो, शिक़ायत हो जाए तो तारीखों और दफ़ाओं के फेर में ज़िन्दगी बिता दो। कुल मिलाकर भारतीय जनता के पास एक ही विकल्प है कि वह सरकारों और राजनैतिक दलों के कौतुक देखती रहे और नुक्कड़ की बहस में अपने विरोधी को यह बताने का प्रयास करे कि जिस मुर्गे की तुम तरफ़दारी कर रहे हो, वह तो गर्दन के नीचे वार करता रहा, हमारे वाले मुर्गे ने तो सीधे टेंटुए पर चोंच मारी है।
भारतीय नागरिक इस दुनिया का सर्वाधिक लाचार लेकिन अधिकार प्राप्त प्राणी है, क्योंकि हमारे देश में जनहित सर्वाेपरि है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
युग बदला, हालात वही हैं
निर्बल पर आघात वही हैं
चेहरा बदला है चौसर ने
लेकिन शह और मात वही हैं
लगता है फिर महासमर से, बस थोड़ी ही दूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
फिर कुंती मजबूर हुई हैं, फिर कचरे में कर्ण मिले हैं
फिर पांचाली चीररहित है, फिर कुनबे के होंठ सिले हैं
महलों की फिर गोद भरे जो, क्षमता सिर्फ़ नियोगी की है
सत्ता या तो अंधे की है या नाकारा रोगी की है
हर शासन पाखण्डी निकला
न्यायालय भी मंडी निकला
अम्बा को वरदान मिला तो
उसका रूप शिखण्डी निकला
सब प्रतिशोधों से प्रेरित हैं, सबकी साध अधूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
गुरुकुल शिक्षा की रेवड़ियां, जाति देख कर बाँट रहे हैं
प्रतिभा का अपमान हुआ है, द्रोण अंगूठे काट रहे हैं
गुरुता स्वार्थ टटोल रही है, करुणा का पथ छोड़ चुकी है
रंगभूमि सारे नियमों को अपने हित में मोड़ चुकी है
आश्रम सभी अशुद्ध हुए हैं
विद्या पथ अवरुद्ध हुए हैं
परशुराम इक सूतपुत्र की
क्षमता लखकर क्रुद्ध हुए हैं
चिड़िया की हत्या कर देना, अर्जुन की मजबूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
कुंती पर भी प्रश्न उठाओ, बिन ब्याहे आह्वान किया क्यों
भीष्म पितामह से भी पूछो, अनुचित का सम्मान किया क्यों
क्यों दुःशासन ही दोषी हों, क्यों दुर्योधन ही दंडित हों
जो प्रतिकार नहीं कर पाए, वो क्योंकर महिमामंडित हों
हर इक सभा-समिति बदल दो
प्रतिशोधों की नीति बदल दो
अम्बा, भीष्म सुरक्षित होंगे
स्वयंवरों की रीति बदल दो
यह परिवर्तन कर देने को, हर मन की मंज़ूरी है अब
सच मानो, सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
✍️ चिराग़ जैन