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मतदान क्यों ज़रूरी है

राजनीति किसी भी दल की हो, उसकी बदतमीज़ी जनता की निष्क्रियता के बल पर ढिठाई बनने लगती है। भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप में ‘मतदान’ ही एकमात्र अस्त्र है जो जनता के पास है। शेष तंत्र से हताश होकर इस अस्त्र को भी नष्ट कर देना, भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा देने जैसा है।
जिस क्षेत्र की जनता पूर्ण मतदान कर देगी, उसकी अभिरुचियों और आकांक्षाओं को अनदेखा करना किसी भी दल के लिए असंभव होगा। मध्यमवर्ग की ज़रूरतें किसी भी राजनैतिक दल की वरीयता सूची में इसी कारण नहीं शामिल हो पातीं क्योंकि मध्यमवर्गीय नागरिक मतदान प्रक्रिया से सर्वाधिक उदासीन हैं। राजनीति हमें लोकतंत्र से बाहर करना चाहती है, ताकि अपने कैडर और कार्यकर्ताओं के वोट से ही विधानसभाओं और संसद की सूरत तैयार हो सके। आम मतदाता यदि वोटिंग की प्रक्रिया से न जुड़ा तो उसकी ओर किसी का ध्यान न जाएगा।
इस देश में, आयकर देनेवालों से किसी सरकार को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, इसीलिए बजट बनाते समय आयकर देनेवालों को ही घोड़े से खच्चर बनाया जाता है। इस देश में नियमों का पालन करनेवाले भी सरकार के किसी काम के नहीं हैं, इसीलिए पूरी न्याय व्यवस्था अपराधियों के बचाव में जुट जाती है और पीड़ित को सिद्ध करना पड़ता है कि उसके साथ अपराध हुआ है।
लेकिन इस देश में वोट देनेवाले से हर सरकार को फ़र्क़ पड़ता है, इसीलिए झुग्गियों की पीड़ा हर पार्टी सुन पाती है और हाउस टैक्स भरनेवाला बेचारा दफ़्तरों के चक्कर लगा-लगाकर टूट लेता है; इसीलिए अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित किया जाता है और बिल्डरों को पूरी क़ीमत चुकानेवाला नागरिक किराये के मकान में रहकर, अदालतों के चक्कर काट रहा है। वोट को अनावश्यक समझोगे तो राजनीति के लिए अनावश्यक हो जाओगे। इस देश के लिए न सही, लोकतंत्र के लिए न सही; अपने अस्तित्व के लिए ही सही, वोट ज़रूर डालें।
इससे पहले कि लोकतंत्र फीका हो जाए, अपनी उंगली पर नीला निशान लगवा आओ।

✍️ चिराग़ जैन

लोकतंत्र का बकासुर

यह लोकतंत्र का सौंदर्य है कि जिस प्रदेश में चुनाव होते हैं, पूरे देश की चिंताएँ और चिंतन उसी प्रदेश पर केंद्रित हो जाते हैं। बाक़ी पूरे देश में सब कुछ अपने आप ठीक चल रहा होता है।
हमारे संविधान निर्माताओं ने कितनी दूरदर्शिता के साथ यह व्यवस्था की होगी कि देश के तमाम खुराफ़ाती मस्तिष्कों से देश को बचाए रखने के लिए एक बार में किसी एक प्रदेश की भेंट दे दी जाए। यूँ भी गाँव को बकासुर के आतंक से बचाने के लिए स्वतः ही एक व्यक्ति को बकासुर की भेंट चढ़ा देने के क़िस्से हमें सुनाए गए हैं। शोले में गब्बर सिंह जी ने भी यही समझाया था कि – ‘राजनीति के प्रकोप से हमें अगर कोई बचा सकता है तो वह स्वयं राजनीति ही है। अगर इसके बदले में राजनीति एक बार में एक प्रदेश को तहस-नहस कर देती है तो इसमें क्या बुराई है!’
हमारा लोकतंत्र देश के एक प्रदेश को छकड़े पर लादकर बकासुर के द्वार तक पहुँचा देता है। राजनीति प्रदेश का शिकार करने से पहले उसके साथ किलोल करती है। हम इस किलोल में बकासुर की सहृदयता, देशभक्ति, जनहित-भावना, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा ढूंढने लगते हैं। देर तक बकासुर हमें दौड़ाते रहते हैं। हम भूल जाते हैं कि हम वह भेंट है जिसे कच्चा चबाकर यह असुर अपना पेट भरेगा। जब हम यह बात पूरी तरह भूल जाते हैं तब मुस्कुराते हुए बकासुर ठहाका लगाते हैं, हम कालिया और उसके साथियों की तरह ठहाके में डूब जाते हैं, पूरे वातावरण में शिकार और शिकारी के ठहाके गूंजने लगते हैं और फिर ठांय-ठांय-ठांय की आवाज़ के साथ सिनेमाघर में सन्नाटा पसर जाता है और बकासुर अगली भेंट के स्वागत में खर्राटों का स्वागत-गान गाने लगता है।
बकासुर कहते हैं ‘शू गाय’; हम गाय बचाने दौड़ पड़ते हैं। बकासुर कहते हैं ‘शू लिंगायत’; हम धर्म बचाने दौड़ पड़ते हैं। बकासुर कहते हैं ‘शू धर्मनिरपेक्षता’; हम मानवता बचाने दौड़ पड़ते हैं। ‘शू सीएए’; ‘शू जनलोकपाल’; ‘शू शाहीन बाग़’; ‘शू पैट्रोल के दाम’; ‘शू प्याज़’; ‘शू चौकीदार’; ‘शू पप्पू’; ‘शू मफ़लर’; ‘शू चायवाला’; ‘शू खाँसी’; ‘शू सीलिंग’; ‘शू पद्मावत’; ‘शू पटेल आरक्षण’; ‘शू जाट आरक्षण’; ‘शू गुर्जर आरक्षण’; ‘शू जीएसटी’; ‘शू बिहारी’; ‘शू पंद्रह लाख’; ‘शू हिन्दू राष्ट्र’; ‘शू गांधी’; ‘शू गोडसे’; ‘शू सावरकर’; ‘शू पटेल’… सरदार बोलता है और हम भागने लगते हैं। हमें लगता है सरदार खुश होगा, शाबासी देगा! लेकिन सरदार ठाने बैठा है कि उसने हमें कहाँ पहुँचाना है। सरदार जानता है कि जो डर गया वो मर गया। इसलिए सरदार हिंदुओ को बताता है कि मुसलमान तुम्हें मार देंगे। मुसलमानों को समझाता है कि हिन्दू तुम्हें भगा देंगे। सरदार कालिया को बताता है कि पद्मावती रिलीज़ हो गई तो संस्कृति का सत्यानाश हो जाएगा। कालिया पद्मावती की रिलीज़ रोकने के लिए जान दे देता है। कालिया के मरते ही सरदार पद्मावती को पद्मावत बनाकर रिलीज़ करवा देता है।
हर बकासुर अपने शिकार को बताता है कि फलां पार्टी का बकासुर शिकार की एक-एक उंगली को तोड़-तोड़ कर खाता है। मैं इतना निर्मम नहीं हूँ कि अपने शिकार को दस बार अलग-अलग नोचूँ। मैं एक ही बार में पूरी बाँह उखाड़ कर चबा जाता हूँ। इतनी करुणा देख हमारी आँखें भीग जाती हैं और हम ख़ुशी-ख़ुशी अपनी बाँह आगे बढ़ा देते हैं ताकि करुणा का यह पुंज हमारी बोटियाँ नोचकर, हमें उंगलियाँ चबानेवाले बकासुर से बचा ले!

✍️ चिराग़ जैन

देश का भला

“भाई! देश का भला कब होगा?”
“जब आपके वोट से हम चुनाव जीतेंगे।”

“भैया जी! चुनाव में जीत मुबारक़ हो। अब देश का भला कीजिये!”
“अभी तो जीते हैं यार। चुनावों में रात-दिन काम किया है। साँस तो ले लें।”

“सर जी! आपको चुनाव जीते एक साल हो गया, अब देश का भला कीजिये।”
“विपक्ष ने हमारा जीना मुहाल कर रखा है। रोज़ सरकार के कामकाज पर हंगामा हो रहा है। इनसे निबटना पड़ेगा, तब देश का भला करेंगे।”

“जनाब! सरकार बने दो साल हो गए, अब तो देश…!”
“अरे यार तुम तो पीछे ही पड़ गए। सरकार के पास बहुत काम हैं। इतनी सारी समितियां हैं, इतने सारे विभाग हैं, इतने सारे अफसर हैं। इनसे फुर्सत मिले तब तो कुछ करें।”

“सरकार, तीन साल बीत गए। महंगाई बढ़ रही है, सड़कें टूट रही हैं, ग़रीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी, अपराध से जनता त्रस्त है।”
“तुम बार-बार यहाँ क्यों चले आते हो। अपने गिरेबान में झाँको। सरकार सड़कें बनवाती है, तुम उन्हें तोड़ देते हो। सरकार कहाँ तक करेगी। तुम लोग इस लायक हो ही नहीं कि तुम्हारे लिए कुछ किया जाए। जाओ पहले समाज को जागरूक करो, हर बार मुँह उठा कर सरकार के पास मत आया करो।”

“माई-बाप! एक साल रह गया है आपकी सरकार का। जनता आपसे नाराज़ है। लोगों में ग़ुस्सा है कि आपने जनता के लिए कोई काम नहीं किया।”
“ये सब हमारे ख़िलाफ़ विपक्ष का षड्यंत्र है। हमारी अर्थव्यवस्था बेहतर हुई है। दफ़्तरों में भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया है। चारों तरफ़ ख़ुशहाली है। ग़रीब आदमी सुखी हो गया है। पूरी दुनिया में हमारे नाम का डंका बज रहा है। और आप कहते हैं कि सरकार ने काम नहीं किया। यह विपक्ष का फैलाया हुआ भ्रम है।”

“हाँ भई! अब क्यों आए हो? हम तुम्हें वोट नहीं देंगे।”
“आप हमारी विचारधारा के मजबूत स्तम्भ हैं। आप हमसे नाराज़ हो गए तो देश ग़लत हाथों में चला जाएगा। हम आपसे वादा करते हैं कि आपकी सारी शिकायतें दूर कर देंगे।”
“रहने दीजिए, ऐसे वादे आपने पिछली बार भी किये थे।”
“तो ठीक है। दे दीजिए उन लोगों को वोट जो हमारी जाति के विरोधी हैं। बैठा दीजिये उन्हें कुर्सी पर जो हमारे धर्म के दुश्मन हैं। होने दीजिए देश को ग़ुलाम। आप देश की हानि से पहले अपने स्वार्थ की सोचते हैं। हमें शर्म आती है कि आप जैसे लोगों के लिए हमारे महापुरुषों ने अपने प्राण दिए।”
नेताजी की लताड़ सुनकर वोटर शर्मिंदा हो गया और चुपचाप गर्दन नीचे करके वोट और देश नेताजी के हाथों में दे आया ।

✍️ चिराग़ जैन

आरोपी और अपराधी

आरोपी और अपराधी में क्या अंतर होता है; यह समझने के लिए विवेक का जागृत होना आवश्यक है। उन्माद विवेक की हत्या करके जन्म लेता है। उन्माद भीड़ का मूल स्वभाव है। हमारी राजनीति हमें नागरिकों से जनता और जनता से भीड़ बनाने में तो सफल हो ही गई है। जब लिंचिंग और एनकाउंटर जैसे हथकंडे जन से प्रशंसा पाने लगें, तब समाज में तर्क और निष्पक्षता की बात कहने पर अपशब्द ही सुनने को मिलेंगे। सोशल मीडिया पर आसाराम और रामरहीम का अब तक भी समर्थन किया जा रहा है। यह प्रश्न किसी आसाराम और रामरहीम का है ही नहीं! प्रश्न आत्मबल और आत्मविश्वास से हीन उस भीड़ का है जो किसी भी गड़रिये की हाँक सुनते ही ख़ुद को बकरी समझ लेती है।
प्रश्न उन युवाओं का है, जो किसी भी चर्चा में तर्क के मूलभाव को सुनने से पूर्व कहनेवाले की विचारधारा का परिचय टटोलने लगते हैं। प्रश्न उन लोगों का है जो आठ दिन में यह भूल जाते हैं कि हैदराबाद की दुर्घटना के मूल कारणों में पुलिस की लापरवाही भी एक बड़ा कारण थी। आज जिस पुलिस की विरुदावलियाँ गाई जा रही हैं, उसी पुलिस के व्यवहार और आचरण की विश्वसनीयता की स्थिति यह है कि उसके सम्मुख स्वीकार गया तथ्य भी न्यायालय में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। उस पुलिस की जाँच प्रक्रिया इतनी दोषरहित है कि आरुषि हत्याकांड में पुलिस की दो अलग-अलग टीमों ने समान तथ्यों के आधार पर बिल्कुल विपरीत आकलन अदालत के सम्मुख प्रस्तुत किया था।
दहेज हत्याएँ हुईं तो सरकार ने दहेज विरोधी और घरेलू हिंसा विरोधी क़ानून बना दिए। सरकार की वाहवाही हुई और बाद में इन क़ानूनों का दुरुपयोग कर हज़ारों परिवार बर्बाद होते रहे। दामिनी कांड हुआ तो केवल लड़की की शिक़ायत के आधार पर किसी को भी गिरफ़्तार करने का नियम बन गया, सरकार की वाहवाही हो गई और इन क़ानूनों के दम पर ब्लैकमेलिंग का धंधा चल निकला। हमारा पूरा तंत्र जल्दबाज़ी में है। जल्दी से लीपापोती करो, नहीं तो महिलाओं के वोट हाथ से निकल जाएंगे।
जल्दी से घोषणा करो, नहीं तो जनता सरकार के विरुद्ध हो जाएगी। आंदोलनकारियों को भी जल्दी से सब कुछ चाहिए होता है। इतनी जल्दबाज़ी में समस्याओं के विवेकपूर्ण उपाय नहीं हो सकते। अदालतें एक मुआमले का फ़ैसला सुनाने में दशकों लगा देती हैं, वहाँ काम जल्दी हो; इसकी किसी को चिंता नहीं है लेकिन क़ानून बनाने में जल्दी करने की होड़ लग जाती है। यदि विधायिका अपने निर्णयों में जल्दी न करे तो न्यायपालिका को अपने निर्णय में देर न करनी पड़े, और कार्यपालिका को अपनी जल्दबाज़ी से अराजकता की प्रशंसा लूटने का अवसर न मिल सके!

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Hyderabad Police encountered rapists dramatically.

न्याय व्यवस्था

बलात्कार जैसे अपराध के अपराधी के प्रति पूरा देश घृणा से भरा है। मनुष्य की खाल में छिपे दैत्यों को उनकी करनी का कठोर से कठोर दण्ड मिलना ही चाहिए। हैदराबाद में पुलिस ने केवल उन चार दरिंदों को ही नहीं मारा है, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था की लचर प्रवृत्ति के मुँह पर भी जोरदार तमाचा जड़ा है जो ‘आरोपी’ को ‘अपराधी’ सिद्ध करने में अरसा गुज़ार देती है। यदि पुलिस ने जानबूझकर यह एनकाउंटर किया है तो आँख पर काली पट्टी बांधे बैठी न्याय की गांधारी को स्वयं अपनी आँखें फोड़कर धृतराष्ट्र हो जाना चाहिए क्योंकि पांचाली चीरहरण पर मूक बैठनेवाले सिंहासन को दुर्याेधन की जंघा पर किये गए गदा प्रहार के समय आपत्ति की उंगली उठाने का अवसर नहीं मिलता।
अभी भी लाखों लोग सच्चे-झूठे मुआमलात में अदालत के फैसलों का इंतज़ार कर रहे हैं। बिल्डर ने फ्लैट बेचकर पूरे पैसे ले लिए और समय पर फ्लैट नहीं दिया… इतने सीधे-सादे मुआमले को भी बरसों-बरस घसीटा जाता हो तो अदालत में किसी का विश्वास रहेगा भी कैसे? शर्म आती है यह कहते हुए कि पीड़ित के अपराधी बन जाने तक अदालतें कोई फैसला नहीं कर पातीं। कोई इस फैसले के इंतज़ार में आत्मदाह कर लेता है, तो कोई हत्यारा बन जाता है। यह एनकाउंटर भारतीय न्याय प्रणाली के लिए संभवतः अंतिम अलार्म है।
जिस तरह लोग हैदराबाद पुलिस को बधाइयाँ दे रहे हैं उससे साफ़ है कि जनता यह मान चुकी है कि यह एनकाउंटर नहीं बल्कि एक सोची समझी रणनीति है, जिसे एनकाउंटर की शक्ल देकर प्रस्तुत किया गया है। जनता यह स्वीकार कर चुकी है कि पुलिस को मिले इस क़ानूनी औज़ार का यह बिल्कुल सही प्रयोग है। जनता यह सीख रही है कि अदालत जाने से बेहतर है किसी क़ानून की ओट में बाहर ही मुआमला रफ़ा-दफ़ा कर दो, क्योंकि अदालत के लिए किसी को दोषी सिद्ध करने में जितना समय लगेगा उससे कम में आप स्वयं को निर्दाेष सिद्ध कर देंगे। पता नहीं कि इससे न्याय तंत्र कोई सबक ले पाएगा या नहीं, लेकिन यदि न्याय व्यवस्था का नया रूप इस एनकाउंटर की मिट्टी से निर्मित हो रहा है तो अदालतों को अपनी इति श्री के लिए तैयार रहना होगा।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Hyderabad Rape culprits encountered by police.

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