Article, Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
नीरज जी ने जब भी नज़र उठा कर देखा तो उनकी अदा दिल पर छप गई। उन्होंने अपनी भारी आवाज़ में कुछ आदेश कर दिया तो लगा कि हम धन्य हो गए। नीली लुंगी और जेब वाली बनियान पहने जब वे लोगों को सम्मोहित करते दिखते थे तब महसूस होता था कि कोई फकीर अपनी अल्हड़ मस्ती में हम नए साधकों को चपत लगाते हुए कहा रहा है कि – ‘अरमानी के सूट पहनने से कुछ नहीं होगा बे, अरमानों को स्वर देना सीख!’
उनका पूरा जीवन एक ख़ालिस कवि का जीवन था। कोई बड़ा आदमी भी उनसे मिलने आया तो उन्होंने उसके प्रभाव में कपड़े बदलना ज़रूरी न समझा। अपने अंतर्नाद में वे इतने सहज हो गए थे कि मुख्यमंत्री से बात करते समय भी उनके स्वर का आरोह-अवरोह ठीक वैसा होता था जैसा शशांक से या चिराग़ से बात करते हुए होता था।
उन्होंने 93 वर्ष की आयु में अपने भीतर के किशोर को कभी धीमा न पड़ने दिया। प्रशंसा और प्रसिद्धि की इतनी ऊँचाइयाँ देख चुके थे कि भय या लोभ उन्हें कुछ ओढ़कर जीने के लिए प्रेरित न कर सके।
उनके व्यवहार में साफ दिखता था कि वे हर मिलनेवाले पर अपनत्व का अधिकार अनुभूत करते थे। कार्यक्रम में पहुँचकर अपने स्वास्थ्य के अनुरूप अपने काव्यपाठ का क्रम तय करने में कभी संकोच नहीं करते थे। उनका आदेश इतना अधिकारपूर्ण होता था कि उससे उत्पन्न होनेवाली तमाम व्यवहारिक चुनौतियाँ नगण्य लगती थीं।
उनके आदेश को टालना या उन्हें उसकी कठिनाई बताने का प्रयास असंभव था। मुझ जैसे नए कवियों के नाम याद न रहने पर जब वे शशांक भाई से ‘दिल्लीवाला लड़का’ कहकर मेरा ज़िक्र करते थे तो लगता था कि किस वटवृक्ष ने झुककर एक तिनके का माथा चूम लिया हो।
वे बहुत प्यारे थे। वे बहुत सच्चे थे। वे बहुत अच्छे थे। और सबसे अच्छा यह था कि वे अब तक हमारे साथ थे। उनकी उपस्थिति में काव्यपाठ करते समय ऐसा लगता था कि कविता उनके कानों में धुलकर निखार पा रही हैं और किसी पंक्ति पर वे वाह कर देते थे तो लगता था कि बस, क़िला फतह हो गया।
वे हमें बहुत उपलब्ध थे। इतने कि उन्हें सहेजने की बात याद ही न रही। पर अब वे पूरी तरह अनुपलब्ध हैं, अब हम उन्हें चाह कर भी सहेज नहीं सकते।
अलीगढ़ में अग्नि ने गीतों के विदेह देवता को आलिंगनबद्ध कर लिया है। आसमान बरसकर उनके इस अंतिम गीत को संगीत दे रहा है। तिरंगे ने अपनी संस्कृति के इस लाडले रचनाकार को भरे मन से विदा किया। और हम उनकी स्मृतियों में डूबते-उतराते उनके सैंकड़ों गीत गुनगुनाकर ख़ुद को तसल्ली दे रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Ek Adad Kirdar, Poetry
ये निशा आज फिर नीरज-निशा कहाएगी
बस क्षोभ यही; इसमें अब वैसा नूर नहीं
ग़ज़लें बाक़ी हैं, गीत बचे हैं अनगिन पर
ये आज तुम्हारे स्वर सुख से भरपूर नहीं
तुम गीत नहीं रचते थे, जादू करते थे
दर्शन की देहरी पर श्रृंगार सजाते थे
रस की गगरी के चातक बड़े छबीले थे
शब्दों की टोली से कितना बतियाते थे
जब आज शाम मैंने सूरज को देखा था
वह लिए शरारत भरे नयन इतराता था
अब जाना उसकी इस इतराहट का मतलब
वह तुम्हें मनाकर साथ लिवाए जाता था
जग को लगता है यही कि ’नीरज’ मौन हुआ
दरअस्ल कारवाँ और बढ़ाने निकले हो
धरती की गोद हरी कर के कविताओं से
अब नभ भर को गीतिका सुनाने निकले हो
थक जाना या चुक जाना; वह भी ’नीरज’ का
मालूम नहीं जलवा नादान ज़माने को
महफ़िल-महफ़िल तुम स्वयं बताते फिरते थे
सदियाँ कम हैं ’नीरज’ की याद भुलाने को
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
“कविता व्याकरण के दोष बर्दाश्त कर सकती है लेकिन भाव के चरित्र में मिलावट नहीं झेल पाती।” – यही गुरुमंत्र दिया था मेरे भीतर के कवि को श्री राजगोपाल सिंह जी ने। पितृत्व और गुरुत्व की गुणमुक्ताओं को मित्रता के सूत्र में पिरोने से संबंध का जो गलहार बनेगा, बस वही नाम है मेरे और उनके सम्बन्ध का। कितनी ही यात्राओं, कितने ही संस्मरणों और कितने ही संघर्षों के चित्र सजीव हो उठते हैं, उनका नाम गुनने भर से। ग़ज़ल और गीत के अतिरिक्त बाग़वानी के वे ख़ूब शौकीन थे। बोनसाई और कैक्टस की उनकी दीवानगी उनके व्यक्तित्व का दर्पण बन गई। बोनसाई की तरह उन्होंने जीवन भर अपना क़द बढ़ाने से अधिक ध्यान अपने अस्तित्व की पूर्णता पर दिया और कैक्टस की तरह कंटीला जीवन जीने के बावजूद कहीं से भी तड़कने पर गीत का दूधिया बहाव कम नहीं हुआ। कैक्टस कंटकों के लिए जाना जाता है, लेकिन राजगोपाल जी ने यह समझा कि काँटों की बदनामी झेलता कैक्टस वर्ष में एक बार पुष्पित भी होता है और जब यह पुष्प खिलता है तो इसके एक फूल के सम्मुख हज़ारों कुमुदनियों की प्रसिद्धि फीकी पड़ जाती है। आज भी नजफगढ़ में उनके घर की छत पर उनके ये बोनसाई और कैक्टस उनकी मान्यताओं का अनुवाद कर रहे हैं। उनके अशआर में यह हरियाली अपने पूरे सौष्ठव के साथ उपस्थित है। प्रकृति के प्रेम में पगी ग़ज़लों के रचयिता के जन्मदिन का आयोजन है। वे तो नहीं होंगे लेकिन उनकी स्मृतियां होंगी, उनका चित्र होगा और उनकी कविताओं में प्रदर्शित उनका पूरा चरित्र होगा। पूरा जीवन लेखनी को समर्पित करने वाले राजगोपाल सिंह जी को याद करने के लिए अपने जीवन के कुछ पल निकाल सकें तो आप भी आना! अच्छा लगेगा!
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
शब्दों को ईंधन करने का
जीवट ठण्डा होता है क्या
ज्वाला में दहकर भी कंचन
अपनी आभा खोता है क्या
यम के आदेशों से डरकर
कब कीर्तियान रुक पाते हैं
कुछ श्वासों के थम जाने से
क्या झंझावत चुक जाते हैं
मिट्टी को भस्म बना देना
-बस यही चिता कर पाती है
अक्षुण्ण वज्र रह जाता है
और स्वयं चिता मर जाती है
काया ने आँखें मूंदी हैं
चिंतन के नेत्र प्रखर ही हैं
जिव्हा ने चुप्पी ओढ़ी है
भावों के शब्द मुखर ही हैं
दीपक की पीर समझने को
बलिदान कई रातें करके
जो थका नहीं इक क्षण को भी
नक्षत्रों से बातें करके
जिसने जर्जर पीड़ाओं को
समिधा का मान दिलाया हो
जिसने जग की तृष्णाओं को
अंजलि से अमिय पिलाया हो
जिसने कविता में जीवन भर
अनहद का अंतर्नाद रचा
जिसने ज्वाला की लपटों का
कविताओं में अनुवाद रचा
जिसने आँसू की आह सुनी
जिसने करुणा का रोर सुना
जिसने युग की पीड़ा गाई
जिसने आशा का शोर सुना
यमदूत उसे ले जाने का
उपक्रम कैसे कर सकता है
जिसने शब्दों में प्राण भरे
वह स्वयं कहाँ मर सकता है
करुणा में जब पग जाते हैं
फिर अक्षर ध्वस्त नहीं होते
सूरज-वूरज होते होंगे
बैरागी अस्त नहीं होते
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
आह! हिंदी के शौर्य जा सूरज डूब गया। कवि सम्मेलनों में दिनकर की ऊष्मा को उग्र करके जीवित रखने वाला अमर रथ ऊर्ध्वगामी हो गया। कविता की वर्तिका की जाज्वल्यमान आभा खो गई। कड़वा है, पर सत्य है बैरागी जी नहीं रहे। आज शाम गोधूलि वेला में वे दिनकर के संग अस्त हो गए। जीवंत इतने थे कि आयु की विवशताओं के सम्मुख घुटने टेक कर कभी निष्क्रिय नहीं हुए। आज दोपहर तक मनासा में एक कार्यक्रम में शिरक़त करके लौटे और ज़िन्दगी को अभिमान से कह गए कि अंतिम श्वास तक सक्रिय रहा हूँ। संघर्षों की भट्ठी में तपकर दमकी एक रौशनी बुझी है आज। इन तूफानों की रफ्तार बता रही है कि कोई बहुत विशाल वटवृक्ष धराशायी हुआ है। प्रणाम दद्दू!
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Demise of Balkavi Bairagi