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खूबसूरत ज़िन्दगी का दर्दनाक अंत

सफलता के पथ पर एक प्रेत रहता है, जिसका नाम है अवसाद। इसकी पकड़ बहुत मज़बूत है। मुस्कुराहटों और खिलखिलाहटों की महफ़िल से छिटक कर अचानक एकाकी हो गए लोगों पर यह सामने से हमला करता है।
सफलता के पथ का पथिक जब व्यावसायिक सफलता और व्यक्तिगत चुनौतियों के बीच झूल रहा होता है तब न जाने किस बिंदु पर यह प्रेत उसे ऐसा अड़ंगा देता है कि यदि संभला न जाए तो प्राण संकट में पड़ जाएं। इसी बिंदु पर अक्सर मृत्यु के कष्ट, जीवन की चुनौती से सरल जान पड़ते होंगे। इसी आयाम पर मर जाना, जी लेने से सहज लगता होगा। यहीं आकर जिजीविषा के अस्त्र हताशा के पाश से परास्त हो जाते होंगे।
सृजन और कला से विभक्त होकर जब क्लेश और तनाव की अंधी खोह में गिरना पड़े तो चेतन मस्तिष्क शून्य हो जाता होगा। उस क्षण में दैहिक कष्ट की तुलना में मानसिक पीड़ा बड़ी हो जाती होगी।
प्रत्यूषा और ज़िया खान जैसी प्रतिभाएं ऐसे ही किसी क्षण पर अवसाद के प्रेत की शिकार हुई होंगी। उसकी सफलता और उसके भीतर के कलाकार के लिए क्लेश अथवा तनाव झेलना असंभव हो गया होगा। स्टूडियो की फोकस लाइट से निकल कर स्वयं के साथ अनावश्यक तनाव के गहन अँधेरे उसकी बर्दाश्त से बाहर हो गए होंगे।
कला और सृजन पारलौकिक विधाएँ हैं। इनसे जुड़े हर शख़्स में एक फ़क़ीर वास करता है। उस फकीर को दुनियादारी के अनावश्यक झगड़ों से दूर रखा जाना चाहिए। उसका समाज में रहने का तरीका अलग लेकिन उत्तरदायित्वपूर्ण होता है। उसे उसके तरीके से दुनिया को बेहतरी की ओर ले जाने दिया जाना चाहिए। उसे सृजन से पृथक करना उसकी राह में काँटे बोने जैसा है।
प्रत्यूषा ने सही किया या ग़लत ये मैं नहीं जानता लेकिन एक कलाकार होने के नाते इतना अवश्य जानता हूँ कि उसकी परिस्थितियां उसके साथ सही नहीं कर रही थीं, वरना इतनी खूबसूरत ज़िन्दगी का ऐसा दर्दनाक अंत कौन कोमलहृदयी कर सकेगा!

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Suicide of Pratyusha Mukarji

दशरथ मांझी

वाह वाह!
नाम ही दशरथ था
काम तो
शतरथ वाला किया।
जुनून; लगन; मेहनत; सनक; दीवानगी
…इन सबसे आगे का शब्द खोज
बे शब्दकोश!

हुए होंगे कहीं पत्थर
जिनको तराशता था आदमी
मैंने तो आज
पत्थरों को
इक आदमी तराशते देखा।
सचमुच यार
सितार की झंकार
और बंसी की तान पर
थिरकती मुहब्बत से
ज़्यादा महँगी लगी
छैनी-हथौड़े की टंकार पर
उकरती मुहब्बत!

-✍️ चिराग़ जैन

क़लाम साहब नहीं बिके

मन दुखी है
मेरा ही नहीं… सबका
आज सिर्फ़ क़लाम साहब ही
सुपुर्द-ए-ख़ाक़ नहीं हुए
उनके साथ ही दफ़्न हो गई
ये उम्मीद भी
कि इस देश का मीडिया
कभी ज़िम्मेदार होगा
इस देश का मीडिया
कभी संवेदनशील होगा
इस देश का मीडिया
कभी इस देश का होगा।

मीडिया ने बोला नहीं
पर साफ़-साफ़ बता दिया
याक़ूब ज़्यादा बिकाऊ था…
अच्छा ही हुआ
हमारे क़लाम साहब
नहीं बिके
आख़िरी दिन भी।

✍️ चिराग़ जैन

कलाम साहब नहीं रहे!

आह!
कलाम साहब नहीं रहे!
जीवन की अंतिम श्वास तक
सक्रिय और सकारात्मक रहकर
आप नहीं रहे!!
देह ही हारी होगी
मन तो जीवित ही था आपका
चिकित्सकों ने काश मन टटोला होता
तो कह न पाते कि “ही इज़ नो मोर…”
सुना है “लिवेबल प्लेनेट अर्थ” पर बोल रहे थे आप
महसूस हुआ होगा इस दौरान
कि ये प्लेनेट अब लिवेबल रहा नहीं।
आपने कभी जुड़ने ही नहीं दिया अपने साथ
कोई वाद, कोई धर्म, कोई विशेषण।
आप मानव थे
सिर्फ़ मानव…
भरपूर मानव।
आपने कभी कुछ नहीं लिया इस देश से
आपने कभी कुछ नहीं मांगा इस देश से
यहाँ तक कि
अंतिम समय इतना भी समय नहीं दिया
कि कोई कुछ दे सके आपको।
आपने कभी प्रवचन नहीं दिया
आपका हर आचरण एक संदेश देता था।
एक लम्बे समय बाद बच्चों को कोई ऐसा मिला था
जिसके जैसा बनने के सपने देखे गये।
बच्चों जैसी जो निश्छल खिलखिलाहट आपकी सखी थी
वह आपके अन्तर्मन की जीवंत एक्स-रे थी।
आप राष्ट्रपति ही नहीं थे कलाम साहब
आप तो हृदयाधिपति थे इस देश के
आप धड़कते रहोगे यौवन के सीने में
आप खिलते रहोगे बच्चों की मुस्कान में
आप पुलकते रहोगे उत्सवों में
आप दौड़ते रहोगे धमनियों में
बन्द गले का सूट पहने
जब कोई लम्बे सफ़ेद बालों वाला
खिलखिलायेगा हाथ हिलाकर
तब सब कहेंगे
ये तो कलाम साहब जैसा है यार!

✍️ चिराग़ जैन

संतोष आनन्द जी के घर महाशोक

जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं, जब शब्द हिचकियों और सुबकियों में अनूदित होजाते हैं। आज संतोष आनंद जी को सुबकते हुए देखा तो उनके गीतों की जिजीविषा वहाँ व्याप्त सन्नाटे में लास्य करने लगी। इसी जिजीविषा की उंगली थामकर मृत्त्यु के सम्मुख निरुपाय खड़ा एक बुज़ुर्ग बाप कदाचित् फिर से अपनी सुबकियों का शब्दानुवाद कर सके।
संकल्प और नंदिनी की शोकसभा में बैठा था तो कहीं दूर अवचेतन में एक गीत गूँजता रहा-
“जो दिल को तसल्ली दे, वो साज उठा लाओ
दम घुटने से पहले ही, आवाज़ उठा लाओ…”
संतोष जी को माइक दिया गया तो उनकी जिजीविषा ने उनकी जर्जर देह में प्रवेश किया, उन्होंने माइक लिया, एक पल को पलकें झपकीं, फिर अपने मेरुदंड को सीधा करते हुए सीने को प्राणवायु से लबरेज़ कर बोले- “मैं टूटुंगा नहीं… मैं इस बच्ची रिद्धिमा के लिये जिऊंगा… मैं इस परिवार के लिये जिऊंगा…!”
सबकी आँखें नम थीं, सभा समाप्त हुई, सब बाहर निकले… द्वार पर संतोष जी की पत्नी, उनकी दो बेटियाँ और उनकी पोती बैठी थी… संतोष जी अपने काँपते हाथों से सबका अभिवादनकर विदा कर रहे थे… उनकी आँखें लगातार बोल रही थीं- …मैं जिऊंगा …मैं टूटुंगा नहीं…!

✍️ चिराग़ जैन

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